तौहीद का महत्व

TOuheed Ka mehtav

मसला 10 : अक़ीदाए तौहीद पर ईमान न लाने वाले जहन्नम में जाएंगे।

عن عبدالله بن مسعود رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من مات يجعل لله ندا أدخل النار ۔ رواه البخاري

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया : “जो आदमी इस हाल में मरे कि अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक ठहराया था वह आग में दाख़िल होगा।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। (किताबुल ईमान)

عن جابر بن عبد الله رضي الله عنه قال سيعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول من لقي الله لا يشرك به شيئا دخل الجنة ومن لقيه يشرك به دخل النار رواہ مسلم

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० को फ़रमाते हुए सुना है कि : ‘‘जिसने अल्लाह तआला से इस हाल में मुलाक़ात की कि उसके साथ किसी को शरीक नहीं ठहराया, वह जन्नत में दाख़िल होगा, और जो अल्लाह तआला से इस हाल में मिला कि उसने अल्लाह तआला के साथ शिर्क किया हो वह जहन्नम में जाएगा।” इसे मस्लिम ने रिवायत किया है। (किताबुल ईमान)

मसला 11 : तौहीद का इक़रार न करने वालों को नबी से क़राबतदारी भी जहन्नम के अज़ाब से नहीं बचा सकेगी।

عن ابن عباس رضي الله عنهما أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال أھون أهل النار عذابا أبو طالب وهو منتعل بنعلين يغلي منهما دماغه رواه مسلم

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया : “जहन्नमियों में से सबसे हल्का अज़ाब अबू तालिब को होगा वह आग की दो जूतियां पहने होंगे जिससे उनका दिमाग खौल रहा होगा। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

(किताबुल ईमान)

वज़ाहत : दूसरी हदीस मसला 101 के तहत मुलाहिज़ा फ़रमाएं।

मसला 12 : रसूले अकरम सल्ल० ने हज़रत मुआज़ रज़ि० को शिर्क करने की बजाए क़त्ल हो जाने या आग में जल जाने की नसीहत फ़रमाई।

عن معاذ رضي الله عنه قال أوصاني رسول الله صلى الله عليه وسلم بعشر كلمات قال: لا تشرك بالله شيئا وإن قتلت و حرقت ولا تعقن والديك وإن أمراك أن تخرج من أهلك ومالك ولا تتركن صلاة مكتوبة متعمدا فإن من ترك صلاة مكتوبة متعمدا فقد برئت منه ذمة الله ولا تشربن خمرا فإنه رأس کل فاحشة وإياك والمعصية فإن بالمعصية حل سخط الله عز وجل وإياك والفرار من الزحف وإن ھلك الناس وإذا أصاب الناس موتبان وأنت فيهم فاثبت وأنفق على عيالك من طولك ولا ترفع عنهم عصاک أدبا وأخفهم في الله ۔ طرواه أحمد

हज़रत मुआज़ रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने मुझे दस बातों की ताकीद फ़रमाई। (1) अल्लाह तआला के साथ किसी को शरीक न करना चाहे तुम्हें क़त्ल कर दिया जाए या आग में जला दिया जाए। (2) अपने वालिदैन की नाफ़रमानी न करना, चाहे वे तुम्हें तुम्हारे अहल और माल से अलग होने का हुक्म दें। (3) जान बूझकर फ़र्ज़ नमाज़ तर्क न करना क्योंकि जिसने फ़र्ज़ नमाज़ जान बूझकर तर्क की वह अल्लाह तआला की हिफ़ाज़त या माफ़ी के ज़िम्मे से निकल गया। (4) शराब न पीना क्योंकि यह तमाम बे-हयाई का संरचश्मा है। (5) गुनाह से बचना, क्योंकि गुनाह से अल्लाह तआला का गज़ब नाज़िल होता है। (6) मैदाने ज़ंग से भागने से गुरेज़ करना, चाहे लोग मर रहे हों। (7) जेब (किसी जगह वबा या बीमारी के बाइस) लोग मरने लगें और तुम पहले से वहां मुक़ीम हो तो वहीं ठहरे रहना। (8) अपने अहलो अयाल पर तौफ़ीक़ के मुताबिक़ ख़र्च करना। (9) अपने अहलो अयाल को (दीन पर चलाने के लिए) लाठी के इस्तेमाल से गुरेज़ नहीं करना। और अल्लाह तआला के बारे में उन्हें डराते रहना।” इसे तबरानी ने रिवायत किया

(सही तेर्गीग)

मसला 13 : अक़ीदा तौहीद पर ईमान न रखने वाले को उसके नेके अमल क़यामत के दिन कोई फ़ायदा नहीं देंगे।

عن عائشة رضي الله عنها قالت: قلت يا رسول الله ابن جدعان كان في الجاھلیة يصل الرحم ويطعم المسكين فھل ذاك نافعه قال لا ینفعه إنه لم يقل يوما رب اغفرلی خطیئتی یوم الدین ۔ رواه مسلم

हज़रत आईशी रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० से अर्ज़ किया कि , “जुदआन का बेटा ज़माना जाहिलियत में सिला रहमी करता था, मिस्कीन को खाना खिलाता था, क्या यह काम उसे फ़ायदा देंगे?” आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया • “उसे कुछ फ़ायदा न देंगे क्योंकि उसने कभी यूं नहीं कहा “ऐ मेरे रब! क़यामत के दिन मेरे गुनाह माफ़ फ़रमाना।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। (किताबुल ईमान)

मसला 14 : अक़ीदा तौहीद पर ईमान न रखने वाले को मरने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति की दुआ या नेक अमल का सवाब नहीं पहुंचता। .

عن عبدالله بن عمرو أن العاص وأن هشام بن العاص ابن وائل نذر في الجاھلیة أن ينحر مائة بدنة وان ھشام بن العاص نحر حصته خمسين بدنة وأن عمروا سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك فقال أما أبوك فلو كان أقر بالتوحید فصمت وتصدقت عنه نفعه ذلك رواه أحمد

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि० से रिवायत हैं कि आस बिन वाइल ने जाहिलियत में सौ ऊंट कुर्बान करने की नज़र मानी थी, हिशाम बिन आस ने अपने हिस्से के पचास ऊंट ज़ब्ह कर दिए, लेकिन हज़रत अम्र रज़ि० ने रसूलुल्लाह सल्ल० से मसला दरयाफ़्त किया तो आप सल्ल० ने फ़रमाया : “अगर तुम्हारा बाप तौहीदपरस्त होता और तुम उसकी तरफ़ से रोज़ा रखते या सदक़ा करते तो उसे सवाब मिल जाता।” इसे अहमद ने रिवायत किया (मुंतक़िल अख़बार किताबुल जनाइज़)

मसला 15 : तौहीद का इक़रार न करने वालों के ख़िलाफ़ हुकूमत वक़्त को जंग करने का हुक्म है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال أمرت أن أقابل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله ویومنوا بي وبما جئت به فإذا فعلوا  ذلك عصموا مني دماءهم وأموالهم إلا بحقها وحسابهم على الله ۔ رواه مسلم

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया: “मुझे लोगों से लड़ने का हुक्म दिया गया है यहां तक कि वे ला इला-ह. इल्लल्लाहु का इक़रार करें। मुझ पर ईमान लाएं, मेरी लांई हुई तालीमात पर ईमान लाएं, अगर वे ऐसा करें तो उन्होंने अपने खून (यानी जाने) और अपने माल मुझसे बचा लिए मुगर हक़ के बदले और उनके आमाल का हिसाब अल्लाह तआला के ज़िम्मे है। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।                                                                         (किताबुल ईमान)

वज़ाहत :

  1. “मगर हक़ के बदले” का मतलब यह है कि अगर वे कोई ऐसा काम करें जिसकी सज़ा क़त्ल हो मसलन क़त्ल या ज़िना या मुरतद होना, वगैरह- तो फिर उन्हें शरीअत के मुताबिक़ क़त्ल की सज़ा दी जाएगी।
  2. तौहीद का इक़रार न करने वाले अगर इस्लामी हुकूमत के तहत ज़िम्मी बनकर रहना कुबूल कर लें तो फिर उनके ख़िलाफ़ जंग नहीं होगी।

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