Aurat Aur o Mardon Me Samanta

औरत व मर्द में समानता

पश्चिम में औरत मर्द के बीच समानता का मतलब यह है कि औरत हर जगह मर्द के कांधा से कांधा मिलाकर खड़ी नज़र आ जाए। दफ़्तर हो या दुकान, फैक्ट्री हो या कारखाना, होटल हो या क्लब, पार्क हो या मनोरंजन स्थल, नाचघर हो या प्ले ग्राउंड औरत मर्द की समानता या औरत की आज़ादी या औरतों के अधिकारों का यह फ़लसफ़ा बघारने की असल ज़रूरत औरत को नहीं बल्कि मर्द को पड़ी है जिसके सामने दो ही उद्देश्य थे एक औद्योगिक क्रान्ति के लिए फैक्ट्रियों और कारखानों की पैदावार में वृद्धि, दूसरे जिन्सी लज़्ज़त की प्राप्ती। दूसरे शब्दों में पश्चिम में औरत की आज़ादी के आन्दोलन का असल प्रेरक दो ही चीजें हैं “पेट और शर्मगाह"

तथ्य तो यह है कि पश्चिम के लोगों का सारा जीवन इन्हीं दो चीज़ों के चारों ओर घूम रहा है। जीवन के इस फ़लसफ़े ने मानव जाति को क्या दिया इस पर हम इससे पहले विस्तार से बहस कर चुके हैं यहां हम “औरत मर्द की समानता" के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण स्पष्ट करना चाहते हैं। इस्लाम ने मर्दऔर औरत की मानसिक और शारीरिक बनावट और भौतिक गुणों को समक्ष रखते हुए दोनों के अलग अलग अधिकार निर्धारित किए हैं। कुछ मामलों में दोनों को समान दर्जा दिया गया है कुछ में कम और कुछ में ज़्यादा। जिन कामों में समान दर्जा दिया गया है वे निम्न हैं

  1. इज्जत व आबरू की सुरक्षा

इस्लाम में इज़्ज़त व आबरू की सुरक्षा के लिए जो आदेश मों के लिए हैं वही आदेश औरतों के लिए भी हैं। क़ुरआन में जहां मर्दो को यह हुक्म दिया है कि वे एक दूसरे का उपहास न उड़ाएं वहीं औरतों को भी यह हुक्म है कि वे एक दूसरी का उपहास न उड़ाएं। मर्दो और औरतों को समान हुक्म दिया गया है। “एक दूसरे व्यंग पर व्यंग न करो, एक दूसरे को बुरे नामों से याद न करो, एक

  1. कुरआन में अल्लाह ने हर समय पेट और हर समय शर्मगाह का फ़लसफ़ा रखने वाले मनुष्य की कुत्ते से उपमा दी है जिसकी आदत में दो ही चीजें रखी गयी हैं या तो वह हर जगह उठते बैठते चलते फिरते खाते पीने की चीज़ों को सूंघता फिरता है इससे समय मिले तो फिर शर्मगाह को चाटने और सूंघने में मगन रहता है इसके अलावा उसे दुनिया का तीसरा काम नहीं। (देखें . सूरह आराफ़ 176)

दूसरी की ग़ीबत न करो।"(सूरह हुजरात)

नबी सल्ल० का इर्शाद है- “हर मुसलमान (मर्द या औरत) का खून, माल और इज़्ज़त एक दूसरे पर हराम है।" (मुस्लिम)

इज्ज़त और आबरू के हवाले से औरत का मामला मर्द की तुलना में अधिक नाजुक है इसलिए इस्लाम ने औरत की इज़्ज़त और आबरू की सुरक्षा के लिए अलग से कड़े आदेश उतारे हैं। अल्लाह का इर्शाद है- “जो लोग पाक दामन, बे ख़बर मोमिन औरतों पर आरोप लगाते हैं उन पर दुनिया व आख़िरत में लानत (फटकार) की गयी है और उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है।"(सूरह नूर 23) ।

दूसरी आयत में पाकदामन औरतों पर तोहमत लगाने की सज़ा अस्सी कोड़े निर्धारित की गयी है (सूरह नूर-4) जबकि औरत की इज़्ज़त लूटने की सज़ाअस्सी कोड़े हैं (सूरह नूर-2) यदि मर्द विवाहित है तो इसकी सज़ा संगसार (पत्थर मारना) है।(अबू दाऊद)

नबी सल्ल० के जीवन काल में एक औरत अंधेरे में नमाज़ के लिए निकली। रास्ते में एक व्यक्ति ने उसे गिरा लिया और उसके साथ बलात्कार किया। औरत के शोर मचाने पर लोग आ गए। और बलात्कारी पकड़ा गया। नबी सल्ल० ने उसे संगसार करा दिया और औरत को छोड़ दिया। (तिर्मिज़ी)

औरत की इज़्ज़त और आबरू के मामले में उल्लेखनीय और अहम बात यह है कि इस्लामी शरीअत ने इसका कोई भौतिकी या वित्तीय बदला कुबूल करने की इजाजत नहीं दी और न ही इसे क़रारनामे के तौर पर गुनाह का दर्जा दिया है। नबी सल्ल० के ज़माने में एक लड़का किसी व्यक्ति के घर काम करता था लड़के ने उस व्यक्ति की पत्नी से ज़िना किया तो लड़के के बाप ने पत्नी के पति को सौ बकरियां और एक लौंडी देकर राज़ी कर लिया। मुक़दमा नबी सल्ल० की अदालत में गया तो आपने इर्शाद फ़रमाया कि बकरियां और लौंडी वापस लो और जानी व ज़ानिया को सज़ा दी।(बुख़ारी व मुस्लिम)

औरत की इज़्ज़त और आबरू की यह धारणा न इस्लाम से पहले कभी रही है न इस्लाम आने के बाद किसी दूसरे धर्म या समाज ने प्रस्तुत की है। कहना चाहिए कि औरत की इज़्ज़त और आबरू के मामले में इस्लाम ने प्रमुख आदेश देकर मर्द के मामले में औरत को कहीं अधिक महत्वपूर्ण और उच्च स्थान प्रदान किया है।

  1. जान की सुरक्षा

इन्सानी जान के तौर पर मर्द और औरत दोनों की जान की सुरक्षा समान है। अल्लाह का इर्शाद है…

“जो व्यक्ति किसी मोमिन (मर्द हो या औरत) को जान बूझ कर क़त्ल करे उसकी सज़ा जहन्नम है।"(बुख़ारी)

अन्तिम हज के अवसर पर दिए गए ख़ुत्बे में नबी सल्ल० ने इर्शाद फ़रमाया___

“अल्लाह ने तुम सब (मर्दो और औरतों) के खून और माल एक दूसरे पर हराम कर दिए हैं।"(मुसनद अहमद)

“नबी सल्ल० के ज़माने में एक यहूदी ने एक लड़की को क़त्ल कर दिया। नबी सल्ल० ने लड़की के बदले में यहूदी को क़त्ल करा दिया।" (बुखारी)

स्पष्ट रहे जानते बूझते किए जाने वाले क़त्ल में इस्लाम ने मर्द और औरत की दैत में कोई फर्क नहीं रखा। ज़िम्मियों के अधिकारों का उल्लेख करते हुए आपने फ़रमाया- “जिसने किसी ज़िम्मी (मर्द हो या औरत) को क़त्ल किया अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है।"(नसाई)

अज्ञानता के दौर में औरत की जान का चूंकि कोई महत्व न था बल्कि उसकी पैदाइश को अशुभ की अलामत माना जाता था इसलिए अल्लाह ने औरत की जान की सुरक्षा के लिए बड़े कठोर स्वर में आयतें नाज़िल की__

“और जब ज़िन्दा गाड़ी गयी लड़की से पूछा जाएगा कि वह किस अपराध में क़त्ल की गयी।"(सूरह तकवीर)

  1. भलाई का सवाब

भले कर्मों के सवाब में मर्द व औरत पूरी तरह समान हैं। अल्लाह का इर्शाद है- “जो नेक काम करेगा चाहे मर्द हो या औरत बशर्ते कि वह मोमिन हो ऐसे सब लोग जन्नत में दाखिल होंगे जहां उन्हें बे हिसाब रिज्क दिया जाएगा।" (सूरह गाफ़िर-40)

एक दूसरी आयत में इर्शाद है- “मर्दो और औरतों में से जो लोग सदक़ा देने वाले हैं और जिन्होंने अल्लाह को क़र्ज़ हसना दिया है उन सबको निश्चय ही कई गुना बढ़ाकर दिया जाएगा और उनके लिए बेहतरीन बदला है।"        (सूरह हदीद-18)

सूरह आले इमरान में अल्लाह का इर्शाद है- “मैं तुममें किसी का अमल बर्बाद नहीं करता चाहे मर्द हो या औरत। तुम सब एक दूसरे के जिन्स से हो।"

… (आयत-195) इस्लाम में कोई अमल ऐसा नहीं जिसका सवाब मर्दो को केवल इसलिए ज़्यादा दिया गया हो कि वे मर्द हैं और औरतों को इसलिए कम दिया गया कि वे औरतें हैं बल्कि इस्लाम ने फ़ज़ीलत का पैमाना तक़वा को बनाया है। यदि कोई औरत मर्द के मुकाबले में अल्लाह से अधिक डरती है तो निश्चय ही औरत ही अल्लाह के निकट श्रेष्ठ होगी क्योंकि अल्लाह का इर्शाद है

“अल्लाह के निकट तुम सब (मर्दो और औरतों) में अधिक इज़्ज़त वाला वह है जो सबसे अधिक अल्लाह से डरता है।" (सूरह हुजुरात-13) 4. ज्ञान की प्राप्ती ___इस्लाम ने ज्ञान की प्राप्ती के मामले में भी औरत को मर्द के समान दर्जा दिया है। नबी सल्ल ने सहाबियात की शिक्षा के लिए हफ्ते में एक दिन मुक़र्रर कर रखा था जिसमें आप औरतों को नसीहतें करते और शरीअत के अहकाम बतलाते (बुख़ारी किताबुल इल्म) हज़रत आइशा रजि० और हज़रत उम्मे सलमा रजि० ने दीन का ज्ञान सीखने और उम्मत तक पहुंचाने में मिसाली रोल निभाया। हज़रत आइशा रजि० दीन का ज्ञान हासिल करने वाली औरतों का साहस बढ़ाया करतीं। एक अवसर पर आप फ़रमाती हैं- “अन्सारी औरतें कितनी अच्छी हैं कि दीनी मसाइल मालूम करने में झिझकती नहीं हैं।" (मुस्लिम)

कुरआन मजीद की बहुत सी आयतें और नबी करीम सल्ल० की हदीसें ऐसी हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि इस्लाम औरतों को मर्दो की तरह न केवल दीन का ज्ञान हासिल करने की इजाजत देता है बल्कि उसे ज़रूरी ठहराता है। कुरआन में अल्लाह फ़रमाता है

“ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो! अपने आपको और अपने घर वालों को जहन्नम की आग से बचाओ।" (सूरह तहरीम-9)

_स्पष्ट है जहन्नम की आग से बचने और औलाद को बचाने के लिए ज़रूरी है कि स्वयं भी वह शिक्षा हासिल की जाए और औलाद को भी उस शिक्षा से सुसज्जित किया जाए जो जहन्नम से बचने का साधन बन सकती है। नबी करीम सल्ल० का इर्शाद है- “हर मुसलमान पर इल्म हासिल करना अनिवार्य है।"

(तबरानी) उलमा के निकट इस हदीस शरीफ़ में मुसलमान से तात्पर्य मर्द ही नहीं बल्कि मुसलमान मर्द और औरतें दोनों हैं। उपरोक्त आदेशों से यह बात स्पष्ट है कि इस्लाम में औरत को भी ज्ञान प्राप्त करने का उतना ही हक़ हासिल है जितना मर्द को। जहां तक सांसारिक शिक्षा का संबंध है शरी सीमाओं के अन्दर रहते हुए ऐसा ज्ञान जो औरतों को उनके धर्म और अक़ीदे का बागी न बनाए और व्यवहारिक जीवन में औरतों के लिए लाभकारी भी हो, सीखने में इन्शाअल्लाह कोई हरज नहीं। 5. सम्पत्ति का अधिकार

जिस प्रकार मर्दो के सम्पत्ति के अधिकार को सुरक्षा हासिल है उसी तरह इस्लाम ने औरतों की सम्पत्ति के अधिकारों को भी सुरक्षा प्रदान की है। यदि

औरत किसी जायदाद की मालिक है तो किसी दूसरे को इसमें से कुछ लेने का कोई हक़ नहीं जैसे मेहर औरत की सम्पत्ति है जिसमें उसके भाई बाप यहां तक कि बेटे या पति को कुछ लेने का हक़ नहीं है। इस्लाम ने जिस प्रकार मर्दो के लिए विरासत के हिस्से मुक़र्रर किए हैं वैसे ही औरतों के लिए भी मुक़र्रर किए हैं। इस्लाम ने औरत की सम्पत्ति के अधिकार को इतनी सुरक्षा दी है कि औरत चाहे कितनी ही मालदार क्यों न हो और पति कितना ही गरीब क्यों न हो, पत्नी का भरण पोषण बहरहाल मर्द ही के ज़िम्मे है। औरत अपनी सम्पत्ति में से यदि एक पैसा भी घर पर खर्च न करे तो शरीअत की ओर से उस पर कोई गुनाह नहीं। यहां यह मसला स्पष्ट करना भी ज़रूरी मालूम होता है कि औरत से स्वयं कह कर मेहर माफ़ कराना जायज़ नहीं। यदि कोई औरत अपनी स्वयं मर्जी से हंसी खुशी माफ़ कर दे तो जायज़ है वर्ना निश्चित मेहर अदा करना उसी तरह वाजिब है जिस प्रकार किसी का क़र्ज़ अदा करना वाजिब होता है। जो लोग केवल इस नीयत से लाखों का मेहर मुक़र्रर कर लेते हैं कि औरत से काफ़ करा लेंगे वे निश्चय ही गुनाहगार होते हैं। 6. पति का चयन

जिस तरह मर्द को इस्लाम ने इस बात का हक़ दिया है कि वह अपनी स्वयं की मर्जी से जिस भी मुसलमान औरत से निकाह करना चाहे कर सकता है इसी तरह औरत को भी इस्लाम इस बात का पूरा पूरा हक़ देता है कि वह अपनी मर्जी

से पति का चयन कर ले लेकिन कम उम्री और ना तजुरबेकारी के तक़ाज़ों को समक्ष रखते हुए शरीअत ने निकाह में संरक्षक को भी आवश्यक ठहराया है जिसका विवरण पिछले पृष्ठों में आ चुका है।

  1. खुला का अधिकार

जिस प्रकार शरीअत ने मर्द को ना पसन्दीदा औरत से अलहदगी के लिए तलाक़ का अधिकार दिया है उसी तरह-औरत को ना पसन्दीदा मर्द से अलग होने के लिए खुला का अधिकार दिया है जिसे औरत आपसी बातचीत या न्यायालय के द्वारा हासिल कर सकती है। एक औरत नबी अकरम सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुई और अपने पति की शिकायत की। आपने उससे पूछा- “क्या तुम मेहर में दिया गया बागं वापस कर सकती हो? _औरत ने कहा- “हां ऐ अल्लाह के रसूल!" आपने उसके पति को हुक्म दिया कि उससे अपना मेहर वापस ले लो और उसे अलग कर दो।” (बुख़ारी)

उपरोक्त सात कामों में इस्लाम ने औरतों को मर्दो के समान अधिकार प्रदान किए हैं जिन कामों में औरतों को मर्दो के असमान (अर्थात कम) अधिकार दिए हैं वे यह हैं

  1. परिवार का मुखिया होना … इस्लाम मर्द और औरत दोनों की शारीरिक बनावट और प्राकृतिक क्षमताओं

को सामने रखते हुए दोनों के कार्य क्षेत्र का निर्धारण करता है। इस्लाम का दृष्टिकोण यह है कि मर्द और औरत अपनी अपनी शारीरिक बनावट और भौतिक गुणों के आधार पर अलग अलग उद्देश्यों के लिए पैदा किए गए हैं। शारीरिक बनावट की दृष्टि से प्रौढ़ अवस्था के बाद मर्दो के अन्दर कोई शारीरिक परिवर्तन नहीं होता सिवाए इसके कि चेहरे पर दाढ़ी और मूंछ के बाल उगने लग जाते हैं और उनके अन्दर जिन्सी भावनाएं जाग जाती हैं जबकि औरत के अन्दर प्रौढ़ अवस्था के बाद जिन्सी जागरुकता के अलावा बड़े प्रमुख परिवर्तन हो जाते हैं वे यह कि औरत को हर महीने मासिकधर्म का खून आने लगता है जिससे उसकी शारीरिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन भी पैदा हो जाते हैं। औरत का श्वांस, पाचन, पट्ठों की व्यवस्था, खून की गर्दिश, मानसिक व शारीरिक क्षमताएं मानो पूरा शरीर उससे प्रभावित होता है।

33 व्यस्क मर्द व औरतें अच्छी तरह जानते हैं कि औरत को प्रकृति हर महीने इस कष्टदायक स्थिति से केवल इसलिए दोचार करती है कि उसे मानव जाति के वजूद जैसे महान उद्देश्य के लिए तैयार किया जाता है। औरत का व्यस्क होने के बाद हर महीने हफ़्ता दस दिन इस कष्टदायक स्थिति से दोचार रहना, फिर गर्भ के दिनों में सख्तियां सहन करना, बच्चा होने के बाद अनेक शारीरिक बीमारियों के कारण मुर्दा जैसी हालत से दोचार होना, इसके बाद कमज़ोरी की हालत में दो साल तक अपने शरीर का खून निचोड़ कर बच्चे को दूध पिलाने का बोझ उठाना

और फिर एक लम्बे समय तक रातों की नींद हराम करके बच्चे की पैदाइश, देखभाल और प्रशिक्षण की ज़िम्मेदारियां पूरी करना, क्या ये सारे मेहनत व परिश्रम वाले काम औरत को वास्तव में इस बात की इजाज़त देते हैं कि वह घर की चार दीवारी से बाहर निकले और उस मर्द के कांधे से कांधा मिलाकर जीवन की दौड़ में हिस्सा ले जिसे मानव जाति की प्रगति व वजूद में सिवाए बीज डाल देने और भरण पोषण दे देने के कोई ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी है।

भौतिक गुणों की दृष्टि से मर्द को अल्लाह ने शासन, अधिकार, नेतृत्व, श्रेष्ठता, मेहनत, प्रतिरोध, जंग व लड़ाई और ख़तरों का सामना करने जैसी विशेषताओं से नवाज़ा है जबकि औरत को अल्लाह ने त्याग, बलिदान, निष्ठा, अताह सहनशक्ति, लचक, नर्मी, सुन्दरता, और दिल लुभाने के गुणों से सुशोभित किया है।

. मर्द और औरत की शारीरिक बनावट और दोनों को अलग अलग प्रदान किए गए गुण क्या इस बात का स्पष्ट सबूत नहीं है कि औरत का कार्य क्षेत्र घर के अन्दर, मानव जाति के अस्तित्व, बच्चों के प्रशिक्षण, घरदारी और घर के अन्य कामों की देखभाल पर आधारित है जबकि मर्द का कार्यक्षेत्र अपने बीवी बच्चों के लिए रोज़ी कमाना, अपने परिवार को समाज की बुराइयों से बचाना, राष्ट्रीय मामलों में भाग लेना और ऐसे ही अन्य कामों पर आधारित है। मर्द और औरत का प्राकृतिक कार्यक्षेत्र निर्धारित करने के बाद इस्लाम दोनों के अधिकारों को निश्चित भी करता है अतएव घर की व्यवस्था में मर्द को अल्लाह ने मुखिया का । दर्जा प्रदान किया है। अल्लाह का इर्शाद है

  1. मानव जाति के वजूद में औरत की इस महान सेवा को देखते हुए इस्लाम ने औरत को जिहाद जैसी महान इबादत से मुक्त करके हज को औरत के लिए जिहाद का दर्जा प्रदान किया

“मर्द औरतों पर मुखिया है इसलिए कि अल्लाह ने उनमें से एक को दूसरे पर वरीयता दी है और इसलिए कि मर्द अपने माल खर्च करते हैं।"

(सूरह निसा-34) . जिसका मतलब यह है कि मर्द को अल्लाह ने उसके भौतिक गुणों के आधार पर घर का रक्षक और चौकीदार बनाया है जबकि औरत को उसके भौतिक गुणों के आधार पर मर्द की सुरक्षा और देखभाल का मोहताज बनाया है। मर्द को ख़ानदान का रक्षक या मुखिया नियुक्त करने के बाद उसे यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी कि वह अपने घर वालों का आर्थिक बोझ सहन करे, उनकी सारी ज़रूरतों को पूरा करे, उनके साथ सदव्यवहार करे। जबकि औरत पर यह ज़िम्मेदारी डाली गयी कि वह मर्द की सेवा में कोई कसर न उठा रखे, उसके माल

और सम्मान (इज्जत) की रक्षा करे और हर जायज़ काम में उसकी मदद करे व उसका पालन करे। 2. ग़ल्ती से हत्या करने में आधा दैत (हत्या के बदले जुर्माना) ___ जीवन चक्र में इस्लाम मर्द की ज़िम्मेदारियों को औरत की ज़िम्मेदारियों की तलना में ज़्यादा अहम समझता है। परिवार का आर्थिक बोझ सहना, पत्नी व बच्चों को सामाजिक बुराइयों से बचाना, समाज में बुराई के खात्मे और भलाई के फैलाने का काम करना, इस उद्देश्य के लिए आज़माइशें और तकलीफें सहन करना कि जान की बाज़ी तक लगा देना, देश व क़ौम की दुश्मनों से रक्षा करना आदि ये सारे काम शरीअत ने मर्दो को ही सौंपे हैं।

ज़िम्मेदारियों के इसी अन्तर को सामने रखते हुए शरीअत ने मर्द और औरत के पैमाने में भी अन्तर रखा है अतः ग़लती से की जाने वाली हत्या में औरत की दैत (हत्या का जुर्माना) मर्द की दैत से आधी रखी है। स्पष्ट रहे कि जान बूझ कर हत्या करने में मर्द व औरत की दैत बराबर है लेकिन दैत के आधा होने का मतलब यह नहीं कि मानव जाति की हैसियत से दोनों में कोई फ़र्क है। ___ मानव जाति की हैसियत से इस्लाम ने दोनों में कोई अन्तर नहीं रखा (इसके बारे में हम बता चुके हैं) दैत के अन्तर को हम इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि दो फ़ौजों के बीच होने वाली जंग के अन्त में दोनों पक्ष जब कैदियों का तबादला करते हैं तो सिपाही के बदले सिपाही का तबादला होता है लेकिन

जरनैल के बदले में सिपाही का तबादला कभी नहीं होता यद्यपि इन्सान होने के नाते दोनों बराबर हैं लेकिन जंग के मैदान में दोनों का पैमाना एक जैसा नहीं अतः एक जरनैल का तबादला कभी कभी कई सौ या कई हज़ार सिपाहियों के साथ होता है। यही अन्तर शरीअत ने मर्द और औरत के कार्यक्षेत्र को सामने रखते हुए रखा है जो पूरी तरह न्याय के तक़ाज़ों को पूरा करता है। 3. विरासत

शरीअत ने औरत को हर हाल में सुरक्षा उपलब्ध की है। यदि वह पत्नी है तो उसका सारा ख़र्च पति के ज़िम्मे है, मां है तो बेटे के ज़िम्मे है, बहन है तो भाई के ज़िम्मे है, बेटी है तो बाप के ज़िम्मे है। पत्नी होते हुए वह न केवल मेहर की हक़दार है बल्कि यदि कोई औरत जागीर की मालिक है और पति फ़ाक़ा कर रहा हो तब भी शरी रूप से पत्नी घर पर एक पैसा तक ख़र्च करने की पाबन्द नहीं। मर्द की इन ज़िम्मेदारियों और औरत के इन अधिकारों को सामने रखते हुए इस्लाम ने औरत को विरासत में मर्द के मुक़ाबले आधा हिस्सा दिया है। अल्लाह का इर्शाद है____ “मर्द का हिस्सा दो औरतों के हिस्से के बराबर है।" (सूरह निसा-11) 4. स्मण शक्ति और नमाज़ों की कमी

एक बार नबी अकरम सल्ल० ने औरतों को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया“औरतो! सदक़ा करो और इस्तगफ़ार किया करो। मैंने जहन्नम में मर्दो की तुलना में औरतों को अधिक देखा है।" ___ एक औरत ने कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल! इसका कारण क्या है?" आपने फ़रमाया- “तुम फटकार अधिक करती हो और पतियों की नाशुक्री करती हो। कम अक़्ल और दीन की कमी रखने के बावजूद मर्दो की मत मार देती हों।" इस औरत ने फिर कहा- “ ऐ अल्लाह के रसूल ! औरत के कम अक्ल

और उसके दीन में कमी किस तरह से है?" आपने इर्शाद फ़रमाया- “ उसकी अक़्ल (स्मण शक्ति) में कमी का सबूत तो यही है कि दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही के बराबर है और दीन में कमी (का सबूत) यह है कि (हर माह) तुम कुछ दिन नमाज़ नहीं पढ़ सकतीं और रमज़ान में (कुछ दिन) रोज़े भी नहीं रख सकतीं।"

(सही मुस्लिम)

हदीस शरीफ़ में औरतों की अक़्ल (अर्थात स्मण शक्ति) और दीन में कमी की जो दलील दी गयी है उससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता। यह बात भी याद रखनी चाहिए कि अल्लाह ने कुरआन में जगह जगह इन्सान की प्राकृतिक कमजोरियों का ज़िक्र किया है जैसे “इन्सान बड़ा ही ज़ालिम और नाशुक्रा है" (सरह इबराहीम-34) “इन्सान बड़ा जल्दबाज़ है।" (सरह बनी इसराइल-11) “इन्सान थुईला पैदा किया गया है।" (सूरह मआरिज-19) “बेशक इन्सान बड़ा ज़ालिम और जाहिल है।" (सूरह अहज़ाब-72)

इन आयतों में इन्सान का अपमान या तुच्छ मानना तात्पर्य नहीं है बल्कि उसकी प्राकृतिक कमजोरियों का बयान अपेक्षित है। इसी तरह औरत के भूलने का उल्लेख अल्लाह ने औरत के अपमान या तिरस्कार के लिए नहीं किया बल्कि उसकी प्राकृतिक कमजोरियों को बतलाने के लिए किया है।

उपरोक्त हदीस से किसी को यह ग़लत फ़हमी नहीं होनी चाहिए कि औरत को सम्पूर्ण रूप से पूरी तरह नाक़िस व अक्ल व दीन में अल्प कहा गया है जैसा कि स्वयं रसूलुल्लाह सल्ल० ने इसे स्पष्ट कर दिया है कि अक्ल में कम केवल स्मण शक्ति के मामले में है और दीन में कम केवल नमाज़ों के मामले में है वर्ना कितनी ही औरतें ऐसी हैं जो शरीअत के आदेशों को समझने में मर्दो से अधिक बुद्धिमान और चालाक होती हैं और कितनी ही औरतें ऐसी हैं जिनका दीन ईमान, नेकी और तक़वा हज़ारों मर्दो के दीन, ईमान, नेकी और तक़वा पर भारी है। नबी सल्ल० के काल में पाक पत्नियां और सहाबियात के उदाहरण इसका सबसे बड़ा सबूत है।

  1. अक़ीक़ा

अक़ीक़े के मामले में भी इस्लाम ने मर्द और औरत में फ़र्क रखा है। अधिक संभावना यही है कि यह फ़र्क भी मर्द और औरत की महत्वकांक्षा को देखते हुए रखा गया है। जैसा कि इससे पहले हम दैत के तहत विस्तार से बहस कर चुके हैं। अल्लाह के नबी का इर्शाद है- “लड़के की ओर से (अक़ीक़ा में) दो बकरियां ज़िबह की जाएं और लड़की की ओर से एक बकरी।" (तिर्मिज़ी) 6. निकाह में वली का अधिकार

औरत को शरीअत ने न तो स्वयं निकाह करने की इजाज़त दी है न ही

औरत को किसी दूसरी औरत के निकाह में वली बनने की इजाजत दी है। नबी सल्ल० का इर्शाद है- “कोई औरत किसी दूसरी औरत का निकाह करे न ही कोई औरत अपना निकाह स्वयं करे। जो औरत अपना निकाह स्वयं करेगी वह ज़ानिया है।" (इब्ने माजा)

  1. तलाक का हक़ – इस्लाम ने तलाक़ देने का हक़ मर्दो को दिया है औरतों को नहीं (देखें सूरह अहज़ाब-49) शरीअत के हर हुक्म में कितनी हिक्मत (युक्ति) है इसका पता पश्चिमी सामाजिक व्यवस्था से लगाया जा सकता है जहां मर्दो के साथ औरतों को भी तलाक़ का हक़ हासिल है वहां तलाकें इतनी अधिकता से दी जाती हैं कि लोगों ने सिरे से निकाह ही को छोड़ दिया है जिसका नतीजा यह है कि ख़ानदानी व्यवस्था पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। ख़ानदानी व्यवस्था को सुरक्षा देने के लिए ज़रूरी था कि तलाक़ का हक़ दोनों पक्षों में से किसी एक को ही दिया जाता चाहे मर्द को या औरत को। मर्द को उसकी ज़िम्मेदारियों और भौतिक गुणों के आधार पर इस बात का हक़दार समझा गया है कि तलाक़ का हक़ केवल उसी को दिया जाए। अलबत्ता ज़रूरत पड़ने पर

औरत को शरीअत ने “खुलअ" का हक़ दिया है। . 8. नुबूवत, जिहाद, इमामते कुबरा व इमामते सुगरा- नुबूवत का काम, तलवार द्वारा जिहाद और मुल्की सरबराही व मार्ग दर्शन (इमामते कुबरा) तीनों काम बड़े मुश्किल, मुसीबत और आज़माइश वाले हैं जिसके लिए बड़ी ताक़त, साहस, दृढ़ता और फ़ोलादी आसाब (फ़ौलादी स्नायु) की ज़रूरत है। अतएव शरीअत ने ये तीनों काम केवल मर्दो के ज़िम्मे लगाए हैं औरतों को इनसे मुक्ति दे दी है यहां तक कि नमाज़ में मर्दो की इमामत (छोटी इमामत) से भी औरतों को अलग रखा गया है।

उपरोक्त आठ कामों में इस्लाम ने मर्द को औरत पर श्रेष्ठता (नेकी और तक़वा) की दृष्टि से नहीं बल्कि उसकी प्राकृतिक क्षमताओं और भौतिक गुणों की दृष्टि से प्रदान की है। ज़रूरी मालूम होता है कि इस्लाम ने मर्द के मुकाबले में

औरत को जिस मामले में श्रेष्ठता प्रदान की है उसका उल्लेख भी यहां कर दिया जाए जो कि इस प्रकार है

औरत मां के रूप में- एक सहाबी नबी सल्ल० की सेवा में हाज़िर हुए और कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० मेरे सदव्यवहार का सबसे अधिक हक़दार कौन है?" आपने फ़रमाया- तेरी मां।" उसने दोबारा पूछा- “फिर

कौन?" आपने फ़रमाया- “तेरी मां।" उसने तीसरी बार पूछा- “फिर कौन?" आपने फ़रमाया- “तेरी मां।" उसने चौथी बार पूछा- “फिर कौन?" आपने फ़रमाया- “तेरा बाप।” (बुख़ारी)

पारिवारिक व्यवस्था में औरत को मर्द पर तीन दर्जो की यह श्रेष्ठता इस्लाम की ओर से दिया गया वह सम्मानित और इज्जत का मक़ाम है कि दुनिया भर की “महिला अधिकार’ संस्थाएं सदियों तक संघर्ष करती रहें तब भी उन्हें दुनिया का कोई देश, कोई धर्म और कोई क़ानून यह मक़ाम देने के लिए तैयार नहीं होगा। मुसलमान घराने में औरत निकाह के बन्धन में बन्ध कर अपने व्यवहारिक जीवन में क़दम रखती है तो उसे मर्द का शक्तिशाली सहारा मिल जाता है। उसके सन्तान होती है तो उसकी इज़्ज़त और मान सम्मान में कई गुना वृद्धि हो जाती है और जब पोते पोतियां हो जाती हैं तो वह सही अर्थों में एक राज्य की “शासक" बन जाती है।

एक ओर अपने पति की निगाहों में उसका महत्व बढ़ जाता है तो दूसरी ओर चालीस या पचास साला “बेटा" अपनी अम्मी जान के सामने बोलने का साहस नहीं कर पाता। घर के बड़े बड़े मामलों में फ़ैसले मुसल्ले पर बैठी बड़ी अम्मी के इशारों से तै हो जाते हैं। नवासे पोते हर समय सेवकों की तरह दादी अम्मी और नानी अम्मी को खुश करने के लिए तैयार रहते हैं कहीं बड़ी अम्मी नाराज़ न हो जाएं। और बड़ी अम्मी भी अपने गुलशन के फूलों और कलियों को देख देखकर सदने और निछावर होती रहती हैं कि उनका जीवन निरुद्देश्य और बेकार नहीं था। प्रकृति की सौंपी गयी ज़िम्मेदारियों को उन्होंने पूरा किया और अपने सामने जीवन की यह गाड़ी देखकर बड़ी अम्मी के चेहरे पर सुख शान्ति का नूर बरसने लगता है काश महिला अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली संस्थाओं को इस्लाम की ओर से औरत को प्रदान किए गए इस उच्च स्थान व दर्जे के बारे में भी सोचने का समय मिल जाए?

  1. क्षण भर के लिए पश्चिम की चमक दमक से भरपूर सामाजिक व्यवस्था में दिन रात बसर करने वाली की कल्पना कीजिए जो निकाह को मर्द की गुलामी मानती है। अविवाहित रहकर जवानी का आकर्षक समय महफ़िलों की शोभा बनती हैं आज यहां कल वहां । जब जवानी ढलने लगती है तो सुन्दरता भी फ़ीकी पड़ जाती है महफ़िलें सूनी सूनी दिखायी देती हैं, अचानक उसे महसूस होता है कि वह रौनक़ तो केवल एक सपना था दाएं बाएं आगे पीछे कोई हमदर्द है न साथी। जीवन के विस्तृत रेगिस्तान में पतझड़ों का शिकार हुए पेड़ों की भान्ति अकेली अकेली। तब बुढ़ापा गुज़ारने के लिए उसे किसी बिल्ली या कुत्ते का चयन करना पड़ता है।

हम न तो यह मानने में कोई शर्म महसूस करते हैं कि इस्लाम ने औरत को मां के रूप में मर्द पर तीन गुना श्रेष्ठता प्रदान की है न ही यह लिखने में कोई झिझक है कि इस्लाम ने मर्दो को औरत पर आठ मामलों में उसके भौतिक गुणों के आधार पर श्रेष्ठता प्रदान की है जहां तक उन लोगों की बात है जिन्हें इस्लाम के हवाले से हर क़ीमत पर औरत को मर्द के समान साबित करने की बीमारी हो गयी है उनसे हम यह पूछना चाहते हैं कि आखिर दुनिया के कौन से धर्म और कौन से क़ानून में औरत को व्यवहारिक रूप से मर्द के समान अधिकार हासिल

… यदि ऐसा नहीं (और वास्तव में ऐसा नहीं) तो फिर हम उनसे निवेदन करेंगे कि दुनिया के अन्य धर्मों की भान्ति यदि इस्लाम ने भी औरत को मर्द के समान दर्जा नहीं दिया तो इसमें शर्म या मुंह छुपाने की आख़िर बात ही क्या है। मर्द

और औरत के अधिकारों के बारे में इस्लाम का विभाजन अन्य समस्त धर्मों के मुक़ाबले में वही अधिक न्याय और सन्तुलन पर आधारित है। इस्लाम ने आज से चौदर सौ साल पहले औरत को जो अधिकार प्रदान किए हैं अन्य धर्म और क़ानून हज़ार कोशिशों के बावजूद वे अधिकार आज भी औरत को देने के लिए तैयार नहीं? 5. ससुर और सास के अधिकार __हमारे देश की नव्वे प्रतिशत आबादी या इससे भी अधिक उन घरानों पर आधारित है जो शादी के तुरन्त बाद अपने बेटे और बहु को अलग घर बनाकर देने की हैसियत नहीं रखते। कुछ न कुछ समय और कुछ हालतों में लम्बी अवधि तक बहु बेटे को अपनी ससुराल (या मां-बाप) के यहां रहकर गुज़ारा करना पड़ता है। ऐसे उदाहरण भी हमारे समाज में मौजूद हैं कि बेटे की शादी केवल इस उद्देश्य के लिए की जाती है कि घर में बूढ़े मां-बाप की सेवा करने वाला दूसरा कोई नहीं है। बहु की सूरत में घर को एक सहारा मिल जाएगा। यही कारण है कि कुछ साल पहले तक पुराने तौर तरीक़े वाले बुजुर्ग लोग अपने बच्चों के रिश्ते । तै करते समय नातेदारी व रिश्तेदारी को बड़ा महत्व देते थे। आम तौर पर ख़ाला, फूफी, चचा, मामूं आदि अपनी सन्तानों को आपस की शादी की लड़ी में पिरोने की कोशिश करते, मां-बाप अपनी बेटी को विदा करते समय नसीहत करते बेटी! जिस घर में तुम्हारी डोली जा रही है उसी घर से तुम्हारा जनाज़ा उठना चाहिए।

मतलब यह होता कि अब उम्र भर के लिए तुम्हारा मरना जीना दुख सुख, खुशी और गमी उसी घर से जुड़ी है। इस नसीहत का नतीजा यह निकलता है कि बहु अपने पति के मां-बाप को अपने मां-बाप जैसा आदर सम्मान देती और उनकी सेवा में कोई कमी न होने देती और इस तरह सास बहु की पारम्परिक नोक झोंक के बावजूद लोग शान्ति और सुख का जीवन बसर करते थे जब से पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण का शौक़ पैदा हुआ है तब से एक नयी सोच ने जन्म लेना शुरू कर दिया है वह यह कि शरी तौर पर औरत पर सुसराल की सेवा करना वाजिब नहीं और यह कि पति के लिए खाना पकाना कपड़े धोना और अन्य काम (घरेलू) करना भी पत्नी पर वाजिब नहीं, न ही पति इन बातों की मांग कर सकता है। क्या वास्तव में ऐसा ही है? आइए नक़ली और अक़ली दलीलों की रोशनी में जायज़ा लें कि यह “फ़तवा" इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार है या शरीअत के नाम पर पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण का शौक़।

जहां तक पति की सेवा का संबंध है इस बारे में रसूले अकरम सल्ल० के इशोदात इतने स्पष्ट हैं और इतनी अधिक संख्या में हैं कि इस पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है। हम यहां केवल तीन हदीसें सार में नक़ल कर रहे हैं

  1. पति पत्नी की जन्नत और और जहन्नम है। (तबरानी, हाकिम, अहमद)
  2. यदि मैं किसी को सज्दा करने का हुक्म देता तो औरत को हुक्म देता कि वह अपने पति को सज्दा करे। (तिर्मिज़ी) .

— 3. औरतों की जहन्नम में अधिकता इसलिए होगी कि वह अपने पतियों की नाशुक्री करती हैं। (बुख़ारी)

यह बात मालूम है कि पाक पत्नियां नबी सल्ल० के लिए खाना पकाती, आपके लिए बिस्तर बिछातीं, आपके कपड़े धोतीं यहां तक कि आपके सर मुबारक में कंघी करतीं। रसूले अकरम सल्ल० के कथनों और पाक पत्नियों की सेवा के बाद आख़िर वह कौन सी शरीअत है जिससे यह साबित किया जाएगा कि पति के लिए खाना पकाना, कपड़े धोना और अन्य घरेलू काम करना पत्नी पर वाजिब नहीं।

जहां तक सुसराल (ससुर और सास) की सेवा करने की बात है इस बारे में कुछ कहने से पहले यह बात समझ लेनी चाहिए कि दीन इस्लाम सरासर भाइचारे, हमददी, मुहब्बत, रहमत व स्नेह और सम्मान का दीन है। एक बूढ़ा व्यक्ति नबी सल्ल० से मुलाक़ात की मन्शा से सेवा में हाज़िर हुआ। लोगों ने उस बूढ़े को

रास्ता देने में कुछ देरी कर दी तो नबी सल्ल० ने फ़रमाया

“जो व्यक्ति हमारे छोटों पर दया नहीं करता और हमारे बड़ों का हक़ नहीं पहचानता वह हम से नहीं।” (अबू दाऊद) . इमाम तिर्मिज़ी ने अपनी सुनन में एक हदीस रिवायत की है कि हज़रत कबशह बिन्त काअब बिन मालिक रज़ि० अपने ससुर हज़रत अबू क़तादा रजि० के लिए वुजू का पानी लायीं ताकि उन्हें वुजू कराएं। हज़रत कबशह रजि० ने वुजू कराना शुरू किया तो एक बिल्ली आयी और बर्तन से पानी पीने लगी। हज़रत अबू क़तादा रज़ि० ने बर्तन बिल्ली के आगे कर दिया और कहा रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया

__ “बिल्ली नापाक (गन्दी) नहीं है।" (तिर्मिज़ी) इस हदीस से यह बात स्पष्ट होती है कि सहाबियात में सुसराल की सेवा की धारणा मौजूद थी।

सुसराल की सेवा का एक अत्यन्त नाजुक और कमज़ोर पहलू यह है कि रसूले अकरम सल्ल० ने औलाद के लिए उसके मां-बाप को उसकी जन्नत या जहन्नम क़रार दिया है (इब्ने माजा) जिसका मतलब यह है कि औलाद पर मां-बाप की सेवा करना, आज्ञा पालन करना और हर हाल में उन्हें राज़ी रखना वाजिब है। इसके साथ ही औरत के लिए उसके पति को उसकी जन्नत या जहन्नम क़रार दे दिया मानो पूरे परिवार मां-बाप (ससुर और सास) बेटा (पति) पत्नी (बहु) को आपस में इस तरह एक दूसरे के साथ बांध दिया गया है कि उनके सांसारिक और पारलौकिक मामले एक दूसरे से अलग करना संभव ही नहीं। बेटा अपने मां-बाप की सेवा करने का पाबन्द है। पत्नी अपने पति की सेवा करने की पाबन्द है फिर यह कैसे संभव है कि बेटा तो दिन रात मां-बाप की सेवा में लगा रहे और पत्नी “शरी तौर पर सुसराल की सेवा वाजिब नहीं’ के फ़तवे की चादर ओढ़कर मज़े की नींद सोती रहे? यदि यह मान लिया जाए कि चूंकि शरीअते इस्लामिया में ससुर और सास के अलग अधिकारों का उल्लेख नहीं मिलता अतः बहु पर ससुर और सास की सेवा करना वाजिब नहीं तो आप अन्दाज़ा कर सकते हैं कि यह फ़लसफ़ा ख़ानदान को बर्बाद करने में कितना अहम रोल निभाएगा?

इसकी सबसे पहली प्रतिक्रिया यह होगी कि पति अपने सास ससुर (अर्थात पत्नी के मां-बाप) की अवहेलना करेगा और आखिरकार दोनों घरों में आपसी प्यार मुहब्बत, हमदर्दी, रहमत, आदर सम्मान के बदले अपमान, गुस्ताख़ी, नाराज़

होना, अनादार और नफ़रत की भावना पैदा होगी। इससे न केवल बुजुर्गों का जीना हराम हो जाएगा बल्कि स्वयं पति पत्नी के बीच एक मुस्तकिल झगड़े की सूरत पैदा हो जाएगी। यह फ़लसफ़ा पश्चिमी सामाजिक व्यवस्था में व्यवहार में लाने योग्य हो सकता है जहां औलाद को अपने मां-बाप का पता ही नहीं होता। दूसरे यदि पता भी है तो बेटा भी अपने मां-बाप से इतना ही बे ताल्लुक़ होता है जितनी बहु। लेकिन इस्लामी जीवन व्यवस्था में इस फ़लसफ़े के व्यवहार में लाने की कल्पना कैसी की जा सकती है? इस्लाम की प्रशिक्षण व्यवस्था

___ व्यक्ति के समूह का नाम समाज है और व्यक्ति समाज का एक अट अंग है। इस्लाम समाज के सुधार का आरंभ करता है ताकि चरित्रवान और भले लोग तैयार होकर एक पाकीज़ा व स्वस्थ समाज का निर्माण हो सके। व्यक्ति के सुधार के लिए इस्लाम की प्रशिक्षण व्यवस्था को समझने के लिए मानव जीवन को चार दौरों में विभाजित किया जा सकता है।

.1. पहला दौर-गर्भ ठहरने से लेकर जन्म तक 2. दूसरा दौर- जन्म से लेकर व्यस्क होने तक 3. तीसरा दौर-व्यस्क आयु से निकाह तक 4. चौथा दौर-निकाह के बाद से अन्तिम सांस तक

पहला दौर- गर्भ ठहरने से लेकर जन्म तक ___ यह एक ठोस हक़ीक़त है कि औलाद का सौभाग्य या दुष्टता बड़ी हद तक मां-बाप की दीनदारी, ईशभय, सदाचार, चरित्र एवं शिष्टाचार पर निर्भर होती है मां-बाप में से भी मां-बाप के दृष्टिकोण, भावनाएं, बुद्धिमानी, आचरण की छाप

औलाद पर बाप की तुलना में अधिक गहरी होती है। इस तथ्य को सामने रखते हुए इस्लाम ने निकाह के समय औरत की दीनदारी को बड़ा महत्व दिया है। ____ अल्लाह के नबी सल्ल० का इर्शाद है कि “औरत में चार चीज़ों को देखकर निकाह किया जाता है- 1. माल व दौलत 2. हसब व नसब 3. सुन्दरता 4. दीनदारी । तुम्हारे हाथ धूल में अटें तुम्हें दीनदार औरत से निकाह करने से कामयाबी हासिल करना चाहिए।"

(बुख़ारी) हम यहां हज़रत उमर रजि० की शिक्षा प्रद घटना बयान करना चाहते हैं जो

नबी करीम सल्ल० के इस इर्शाद की सबसे अच्छी व्यवहारिक टीका है। हज़रत उमर रजि० का तरीक़ा था कि रात को शहर में जनता का हाल मालूम करने के लिए गश्त किया करते थे। एक रात गश्त करते करते थक गए और एक मकान की दीवार से टेक लगाकर बैठ गए। इतने में मकान के अन्दर से एक औरत के बोलने की आवाज़ आयी जो अपनी बेटी से कह रही थी- “उठो और दूध में थोड़ा-सा पानी डाल दो।" लड़की ने कहा- “मां! अमीरुल मोमिनीन ने दूध में पानी मिलाने से मना कर रखा है।" मां ने जवाब दिया- “यहां कौन से अमीरुल मोमिनीन देख रहे हैं उठकर पानी मिला दो।" बेटी ने कहा- “मां! अमीरुल मोमिनीन तो नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो देख रहा है।"

सुबह होते ही हज़रत उमर रजि० ने अपनी पत्नी से कहा “जल्दी से फ़लां घर में जाओ और देखो कि उनकी बेटी विवाहित है या अविवाहित।" मालूम हुआ कि बेटी विधवा है। आपने बिना किसी संकोच अपने बेटे हज़रत आसिम से उसकी शादी कर दी। इसी लड़की की औलाद से पांचवे ख़लीफ़ा राशिद हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ पैदा हुए।

___ गर्भ के दौरान मां के दृष्टिकोण और आदतों के अलावा मां की दैनिक कार्रवाई और काम काज जैसे आपस में की जाने वाली बातचीत अध्ययन में रहने वाली पत्र पत्रिकाएं, सुनी जाने वाली कैसिटें या अन्य पसन्दीदा या नापसन्दीदा आवाजें, बहस में रहने वाली चीजें, खाके और चित्र आदि सब कुछ गर्भ के ज़माने में बच्चे पर प्रभाव डालते हैं अतएव इस्लाम पहले ही दिन से इस बात की व्यवस्था करता है कि मर्द और औरत दोनों को जिन्सी तूफ़ान की उमड़ती भावनाओं में भी शैतान के हमले से सुरक्षित रखा जाए। और अल्लाह से रिश्ता व संबंध किसी भी समय टूटने न पाए। अतएव अल्लाह का इर्शाद है कि शादी के बाद पहली रात में मुलाक़ात पर पति को पत्नी के लिए यह दुआ मांगनी चाहिए- “ऐ अल्लाह मैं तुझसे इस (पत्नी) की भलाई का सवाल करता हूं और जिस प्रकृति पर तूने इसे पैदा किया है उसकी भलाई का सवाल करता हूं और तुझसे इस (पत्नी) के शर से पनाह मांगता हूं और जिस प्रकृति पर तूने इसे पैदा किया है उसके शर से पनाह मांगता हूं।" (अबू दाऊद)

संभोग से पहले जब पति पत्नी भावनाओं की दुनिया में हर चीज़ से बेनिाज़ हो जाते हैं उस समय भी इस्लाम यह चाहता है कि उनकी भावनाएं व इच्छाएं बेलगाम न हों और पत्नी से जिन्सी कार्य करने को केवल एक आनन्द हासिल

करने का साधन न समझें बल्कि उनकी निगाह इस जिन्सी कार्य के मूल उद्देश्य एक नेक और भली औलाद पर होना चाहिए। ___ अतएव रसूले अकरम सल्ल० ने निर्देश दिया है कि जब कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के पास आने का इरादा करे तो उसे यह दुआ मांगनी चाहिए- “अल्लाह के नाम से ऐ अल्लाह! हमें शैतान से दूर रख और उस चीज़ से भी शैतान को दूर रख जो तू हमें प्रदान करे।” (बुख़ारी) ___ गर्भ ठहरने से पहले ही पति पत्नी को अल्लाह की ओर ध्यान लगाने, अल्लाह से भलाई चाहने और शर से पनाह मांगने की शिक्षा देकर इस्लाम दोनों पति पत्नी की भावनाओं, विचारों और इच्छाओं को शर से खैर (भलाई) की ओर, गुनाह से नेकी की ओर और बुराई से अच्छाई की ओर मोड़ देना चाहता है ताकि गर्भ के दौरान पति पत्नी के कामों पर नेकी और भलाई छायी रहे और आने वाली रूह (बच्चा) नेकी और भलाई के गुणों को लेकर इस दुनिया में आए। दूसरा दौर- जन्म से लेकर व्यस्क होने तक

बच्चे की पैदाइश पर सबसे पहले उसके दाएं कान में अज़ान और बाएं कान में इक़ामत कहने की हिदायत की गयी है और फिर किसी नेक व दीन का ज्ञान रखने वाले से तहनीक’ और बरकत की दुआ कराना मसनून है। सातवें दिन बच्चे की ओर से अल्लाह के नाम पर जानवर ज़िब्ह करना (अक़ीक़ा करना) और अच्छा नाम रखना मसनून है। ये सारे काम बच्चे को एक पाकीज़ा, भाग्यवान और भला जीवन प्रदान कराने में बड़ा अहम रोल अदा करते हैं।

नबी सल्ल० का इर्शाद है- “जब बच्चा सात साल का हो जाए तो उसे नमाज़ पढ़ने का हक्म दो। दस साल की उम्र में नमाज़ न पढे तो उसे मार कर नमाज़ पढ़ाओ और उनके सोने की जगह (अर्थात बिस्तर या कमरा) अलग अलग कर दो।" (बुख़ारी) ज़रा सोचिए रसूले अकरम सल्ल० के इस छोटे से हुक्म में बच्चे के प्रशिक्षण के कितने अहम सूत्र मौजूद हैं। नमाज़ पढ़ने से पहले बच्चे को पेशाब पाखाना से फ़रागत, गुस्ल और वुजू की प्रारम्भिक बातें बतायी जाएंगी।

  1. कोई मीठी चीज़ जैसे खजूर आदि चबाकर बच्चे के मुंह में डालने को तहनीक कहते हैं। 2. मनो वैज्ञानिकों के निकट अच्छे नाम इन्सान के व्यक्तित्व और चरित्र पर बड़े गहरे प्रभाव डालते हैं। आप सल्ल० का इर्शाद है- “अल्लाह के निकट सबसे अधिक पसन्दीदा नाम अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान है।" (मुस्लिम)

कपड़ों की पाकी और पाक जगह का महत्व बताया जाएगा। मस्जिद और मुसल्ला का परिचय करा दिया जाएगा। इमामत और संगठनात्मक वाला जीवन बसर करने की सूझ बूझ पैदा होगी।

उपरोक्त हदीस शरीफ़ के अन्तिम भाग में यह निर्देश दिया गया है कि दस साल की उम्र में बच्चों के बिस्तर (या हो सके तो कमरे) अलग अलग कर दो। हर आदमी जानता है कि नींद की हालत में इन्सान किस हाल में होता है। कमरे अलग करने में हिक्मत यह है कि बच्चों के अन्दर अल्लाह ने स्वाभाविक रूप से लाज की जो भावना रखी है वह न केवल क़ायम रहे बल्कि और अधिक बढ़ती जाए। आराम के समयों में नाबालिग बच्चों को भी अपने मां-बाप के पास इजाज़त लेकर आने का हुक्म देकर इस्लाम ने सतीत्व व लोक लाज का ऐसा ऊंचा पैमाना निर्धारित कर दिया है जिसकी दूसरे धर्म कल्पना तक नहीं कर सकते। – अल्लाह का इर्शाद है- “ऐ लोगों जो ईमान लाए हो ज़रूरी है कि तुम्हारे गुलाम और नाबालिग बच्चे तीन समयों में इजाज़त लेकर तुम्हारे पास आएं- 1. सुबह की नमाज़ से पहले 2. दोपहर को जब तुम (आराम के लिए) कपड़े उतार कर रख देते हो 3. इशा की नमाज़ के बाद (जब तुम सोने के लिए बिस्तर पर चले जाओ।) (सूरह नूर-59)

व्यस्क की उम्र से पहले ये सारे आदेश बच्चे के अन्दर जिन्सी भावना पैदा होने के अवसर कम से कम कर देते हैं और बच्चा स्वभाविक रूप से एक पाकीज़ा. साफ़ सुथरे माहौल का आदी बन जाता है। तीसरा दौर-व्यस्क आयु से निकाह तक

व्यस्क आयु की हदों में दाखिल होते ही मर्द औरत पर वे सारे क़ानून लागू हो जाते हैं जो इससे पहले नाबालिग होने की वजह से लागू नहीं थे। व्यस्क आयु के बाद मर्द और औरत में जिन्सी भावनाएं जागने लगती हैं। लड़की के लिए प्राकृतिक तौर पर आकर्षण का एहसास होने लगता है। इस्लाम इन भावनाओं को धीरे धीरे विभिन्न आदेशों द्वारा बड़ी सूझ बूझ और बा कमाल तरीक़ से निकाह के होने तक जिन्सी बुराइयों व गन्दगी से पाक साफ़ रखने की व्यवस्था

  1. स्पष्ट रहे लड़कों के लिए बालिग होने की पहचान स्वप्नदोष का होना है और लड़कियों के लिए मासिक धर्म का आना है।

करता है इस सिलसिले में दिए गए अहम आदेश इस प्रकार हैं1. मेहरम और गैर मेहरम रिश्तों का विभाजन

मुसलमान घराने में आंख खोलने वाला बच्चा सोचने समझने की उम्र तक पहंचने से पहले यह जान चका होता है कि उसके साथ घर के अन्दर रहने वाले तमाम लोग जैसे दादा दादी, मां-बाप और बहन भाई ऐसे मुक़द्दस और आदर सम्मान वाले रिश्ते हैं जहां जिन्सी भावनाओं के बारे में सोचना भी गनाह है। मां-बाप और बहन भाइयों के बाद कुछ दूसरे रिश्तेदार जिनसे ज़िन्दगी में बहुत अधिक मेल जोल रहता है और किसी हद तक इन्सान उनके साथ घुल मिलकर रहने पर मजबूर होता है जैसे चचा, मामू, फूफी, ख़ाला आदि इनको भी हराम रिश्ते क़रार देकर शरीअत ने हर मर्द व औरत के चारों ओर रिश्तेदारों का एक ऐसा हलका बना दिया है जिसमें इन्सान की जिन्सी भावनाओं में आवेश पैदा होने के अवसर न होने के बराबर रह जाते हैं। हराम रिश्तों के इस हलके से बाहर गैर मेहरम रिश्तेदारों या अजनबियों के लिए जहां जिन्सी भावनाओं में आवेश पैदा होने के अवसर हर क्षण मौजूद रहते हैं वहां शरीअत ने कुछ दूसरी तदबीरें अपनायी हैं जिनका उल्लेख आगे आ रहा है। 2. सातिर लिबास पहनने का हुक्म

घर के आम चौबीस घंटों के जीवन में इस्लाम ने मर्दो और औरतों को यह हुक्म दिया है कि वे ऐसा लिबास इस्तेमाल करे कि जिससे उनका सतर (शरीर का विशेष भाग) खुलने न पाए। स्पष्ट रहे कि मर्द का सतर नाड़ी से घुटनों तक है। नबी सल्ल० का इर्शाद है- “मर्द का नाड़ी के नीचे और घुटने से ऊपर (का हिस्सा) सब छुपाने योग्य है जबकि औरतों का सतर हाथ पांव और चेहरे के अलावा सारा शरीर है। औरतों को नबी सल्ल० ने यह हुक्म दिया है कि " जब औरत व्यस्क हो जाए तो उसके शरीर का कोई अंग नज़र नहीं आना चाहिए सिवाए चेहरे और कलाई के जोड़ तक।" (अबू दाऊद) ___सातिर लिबास में यह बात भी शामिल है कि लिबास इतना तंग और बारीक या छोटा न हो जिससे शरीर के अंग ज़ाहिर हो रहे हों। नबी सल्ल० का इर्शाद है कि ऐसी औरतें जो कपड़े पहनने के बावजूद नंगी रहती हैं जन्नत में दाखिल न होंगी, न ही जन्नत की ख़ुश्बू पाएंगी।" (मुस्लिम) याद रहे कि सातिर

लिबास का यह हुक्म घर के अन्दर मेहरम रिश्तेदारों (दादा, बाप, या भाई आदि) के लिए है। गैर मेहरम रिश्तेदारों या अजनबियों से पर्दे का हुक्म दिया गया है जिसका उल्लेख आगे किया जाएगा। 3. घर में इजाज़त लेकर दाखिल होने का हुक्म

व्यस्क होने के बाद घर के मर्दो (बाप या भाई या बेटे) को यह हुक्म भी दिया गया है कि जब वे अपने घर में दाखिल हों तो इजाज़त लेकर दाखिल हों ख़ामोशी के साथ अचानक दाखिल न हों। कहीं ऐसा न हो कि घर की औरतें (पत्नी के अलावा) ऐसी हालत में हों जिससे उन्हें देखने से मना किया गया है। अल्लाह का इर्शाद है कि- “जब तुम्हारे लड़के बालिग हो जाएं तो उनको चाहिए कि घर में इसी तरह इजाज़त लेकर आएं जिस तरह उनसे पहले (घर के दूसरे बालिग) लोग इजाज़त लेकर आते हैं।" (सूरह नूर-159) अपने ही घर से बाहर गैर मेहरम औरतों और मर्दो का एक दूसरे के साथ खुले रूप से बातचीत और मुलाक़ात करने का स्वभाव ही न बनने पाए। 4. पर्दे का आदेश

घर के अन्दर औरतों को यह हुक्म है कि वे अपने सतर के हिस्सों (हाथ पांव और चेहरे के अलावा बाकी सारा शरीर) को पूरी तरह छुपा कर रखें। घर से बाहर निकलते हुए मुसलमान औरतों को यह हुक्म दिया गया है कि वे अपने चेहरे को भी ढांप कर रखें। नबी करीम सल्ल० के मुबारक ज़माने में सहाबियात इस पर सख्ती से अमल करती थीं। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा अपने हज का ज़िक्र करते हुए फ़रमाती हैं कि हज के दौरान क़ाफ़िले हमारे सामने से गुज़रते तो हम अपनी चादरें मुंह पर लटका लेतीं। जब वे आगे चले जाते तो चादरें मुंह से हटा लेतीं।" (अहमद, अबू दाऊद, इब्ने माजा)

याद रहे एहराम की हालत में औरतों को चेहरे का पर्दा न करने का हुक्म है जो कि अपने आप में स्वयं चेहरे के पर्दे का बड़ा स्पष्ट सबूत है। हज़रत आइशा रजि० की रिवायत की गयी हदीस में नहनु (अर्थात हम सहाबियात

  1. घर में दाखिल होने के लिए इजाज़त हासिल करने का तरीका यह है कि दरवाजे पर खड़े होकर “अस्सलामु आलयकुम" कहा जाए। अन्दर से “वाअलयकुमुस्सलाम" की आवाज़ आ जाए तो आदमी अन्दर चला जाए वर्ना इन्तिज़ार करे।

(रजि०)) के शब्द इस बात पर गवाह हैं कि नबी सल्ल० के ज़माने में चेहरे का पर्दा केवल पाक पत्नियों ही में नहीं बल्कि सारी सहाबियात में पूरी तरह प्रचलित हो चुका था।

पश्चिमी सभ्यता के मतवाले लोगों ने चेहरे के पर्दे से जान छुड़ाने के लए कुरआनी आयतों और पवित्र हदीसों पर बड़ी लम्बी बहसें की हैं हमारे निकट असल मसला दलीलों का नहीं बल्कि ईमान का है अतः हम इल्मी बहस से हटकर यहां तक जापानी नव मुस्लिम “खौला लुकाला" जो कि जापान मैं पैदा हुई फ्नांस में शिक्षा प्राप्त की और वहीं मुसलमान हुई। मिन, सऊदी अरब के दौरे ज्ञान प्राप्ती के लिए किए, उसके पर्दे के शीर्षक पर प्रकाशित उद्गारों के कुछ हिस्से • उसी के शब्दों में यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं

. “इस्लाम कुबूल करने से पहले चुस्त पैन्ट और मिनी स्कर्ट पहनती थी लेकिन अब मेरी लम्बी पोशाक ने मुझे प्रसन्न कर दिया। मुझे यूं लगा जैसे मैं एक राजकुमारी हूं। पहली बार मैंने पर्दे में रहने के बाद अपने आपको पाक साफ़ और सुरक्षित समझा। मुझे एहसास हुआ कि मैं अल्लाह से अधिक निकट हो गयी हूं। मेरा पर्दा करना केवल अल्लाह की आज्ञा का पालन करना ही नहीं था बल्कि मेरे अक़ीदे का खुला प्रदर्शन भी था। पर्दा करने वाली मुसलमान औरत भीड़ भाड़ में भी पहचानी जाती है (कि वह मुसलमान है) जबकि गैर मुस्लिम का अक़ीदा केवल शब्दों के द्वारा ही मालूम हो सकता है।

मिनी स्कर्ट का मतलब यह है कि यदि आपको मेरी ज़रूरत है तो मुझे ले जा सकते हैं। पर्दा साफ़ बताता है कि मैं आपके लिए प्रतिबन्ध हूं।

गर्मी के मौसम में हर व्यक्ति गर्मी महसूस करता है लेकिन मैंने पर्दे को अपने सर पर गर्दन पर सीधी पड़ने वाली सूरज की किरनों से बचने का प्रभावी साधन पाया। पहले मुझे हैरत होती थी कि मुस्लिम बहनें बुरले के अन्दर कैसे आसानी से सांस ले सकती हैं इसका दारोमदार आदत पर है जब औरत उसकी आदी हो जाती है तो कोई परेशानी नहीं रहती। पहली बार मैंने नक़ाब लगाया तो मुझे बड़ा अच्छा लगा बड़ा ही आश्चर्यजनक। ऐसा लगा कि मैं एक महत्वपूर्ण प्राणी हूं। मुझे एक ऐसी दुनिया की मलिका होने का आभास हुआ जो अपनी छुपी खुशियों से आनन्द उठाए। मेरे पास एक ख़ज़ाना था जिसके बारे में किसी को मालूम न था जिसे अजनबियों को देखने की इजाज़त न थी।

जब मैंने सर्दियों का बुरका बनाया तो उसमें आंखों का बारीक नक़ाब भी

लगाया। अब मेरा पर्दा पूर्ण हो गया था इससे मुझे बड़ा आराम मिला अब मुझे भीड़ में कोई परेशानी न थी। मुझे महसूस हुआ कि मैं मर्दो के लिए अछूती सी हो गयी हूं आंखों के पर्दे से पहले मुझे उस समय बड़ी परेशानी होती थी जब अचानक मेरी नज़र किसी मर्द की नज़रों से टकरा जाती थी। इस नए नक़ाब ने काली ऐनक की तरह मुझे अजनबियों की घूरती निगाहों से बचा दिया।"

सम्मान योग्य जापानी नवमुस्लिम महिला के उपरोक्त विचारों में पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करने वालों की आपत्तियों का जवाब मौजूद है वहीं उन मुसलमान औरतों के लिए शिक्षा भी है नसीहत भी है जिन्हें दोपट्टे का बोझ उठाना भी किसी भारी बोझ से कम मालूम नहीं होता।

हक़ीक़त तो यह है कि समाज में अश्लीलता, नग्नता और बुराई का कैंसर फैलाने, औरत के अन्दर जिन्सी आवेश उभारने और भावनाओं में आग लगाने का सबसे बड़ा कारण बे पर्दगी और नग्नता ही है जबकि पर्दा न केवल मुस्लिम समाज के कल्चर का महत्वपूर्ण अंश है बल्कि चोरी छुपे मुलाक़ातों से लेकर खुले आम आप प्रेम प्रसंगों तक हर फ़िल्ने का प्रभावी निवारण भी है लेकिन दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि समाज के आम आदमी से लेकर ख़ास लोगों में भी बे पर्दगी की बीमारी आम हो चुकी है कि पर्दादार औरतें अब ढूंडने से भी नहीं मिलतीं।

  1. ग़स्से बसर (नज़रें मिलाना)

समाज को जिन्सी आवेश और बिखराव से पाक साफ़ रखने के लिए पर्दा

  1. यहां हम एक पाकिस्तानी महिला शहनाज़ लुगारी का ज़िक्र करना चाहेंगे जो पिछले 9 सालों से पाकिस्तान में बुरक़ा पहनकर पायलेट और इन्सटरक्टर का काम कर रही हैं और “पाकिस्तान वीमेन्स पाइलेट एसोसिएशन" की चेयर परसन और “इन्टरनेश्नल हिजाब तहरीक" की मुखिया भी हैं। उन्होंने एक दैनिक समाचार पत्र को इन्टरव्यू देते हुए बताया “जब मैं पांचवी कक्षा में थी तो मुझे मां-बाप ने पर्दा करना शुरू कराया। लड़कियां मेरा उपहास उड़ाती पर मैंने पर्दे को नहीं छोड़ा। आज सारी दुनिया की लड़कियां मेरा हवाला देती हैं कि यदि शहनाज़ बुर्का पहन कर जहाज उड़ा सकती है तो हम बुरक़ा पहनकर कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर सकतीं? शहनाज़ ने आगे बताया कि उसे विभिन्न मुस्लिम देशों से बड़ी अच्छी आफ़र आ चुकी हैं कि मैं उन देशों में बुर्का पहनकर हवाई जहाज़ उड़ाऊं। इस उदाहरण से यह आपत्ति भी ख़त्म हो जाती है कि पर्दा प्रगति की राह में रुकावट का कारण है।

एक ज़ाहिरी तदबीर है जबकि “गस्से बसर" का हुक्म एक बातिनी तदबीर है जिस पर सारे मर्द व औरतें अपने अपने ईमान और तक़वा के अनुसार अमल करते हैं। ग़स्से बसर का मतलब यह है कि मर्द औरतों से और औरतें मर्दो से आंखें मिलाएं न लड़ाएं। एक दूसरे को ताड़ें न ताकें न झांकें। कहा जाता है आंखें शैतान के तीरों में से एक ज़हरीला तीर है। इश्क व मुहब्बत की दास्तानों में निगाहों के मिलाप निगाहों में इशारों और निगाहों ही निगाहों में पैगाम व सन्देशों

और बोलचाल के स्वाद का अन्दाज़ा हर व्यस्क मर्द और औरत को हो सकता है। निगाहों के इसी मिलाप के स्वाद को अल्लाह के रसूल सल्ल० ने आंख का ज़िना करार दिया है जिससे बचने के लिए मर्दो को यह हुक्म दिया गया है

“(ऐ मुहम्मद!) मुसलमान मर्दो से कहो कि अपनी निगाहें (औरतों को देखने से) बचा कर रखें, अपनी शर्मगाहों की रक्षा करें (अर्थात शर्मगाहों को नंगा न होने दें और ज़िना न करें) यही तरीक़ा पाकीज़गी वाला है।" (सूरह नूर-30) औरतों को गस्से बसर का हुक्म इन शब्दों में दिया गया है- “ऐ नबी! मोमिन औरतों से कह दो कि वे अपनी निगाहें (मर्दो को देखने से) बचा कर रखें और अपनी शर्मगाहों की रक्षा करें।" (सूरह नूर-30)

स्पष्ट रहे कि अचानक गैर इरादा तौर पर पड़ने वाली नज़र को शरीअत ने माफ़ रखा है। दोबारा इरादे से देखना मना फ़रमाया गया है। रसूलुल्लाह सल्ल० ने हज़रत अली रजि० को नसीहत फ़रमायी “ऐ अली! औरत पर पहली नज़र (अर्थात गैर इरादा) के बाद दूसरी नज़र न डालना क्योंकि पहली माफ़ है दूसरी नहीं।" (अबू दाऊद) 6. मर्द व औरत के घुलने मिलने की मनाही. . .

औरत और मर्दो का आपस में घुलना मिलना दोनों में सुन्दरता का प्रदर्शन और एक दूसरे के प्रति आकर्षक जैसी प्राकृतिक कमजोरियों को जगाने का बहुत बड़ा प्रेरक है मुख्य रूप से व्यस्क आयु में दाखिल होने के बाद मिली जुली महफ़िलों और कार्यक्रमों में आकर्षक चेहरे नज़रों ही नज़रों में कितना सफ़र तै कर लेते हैं और फिर इसके बाद चोरी छुपे सन्देशों का आदान प्रदान, ख़ुफ़िया मुलाक़ातें, प्यार करने के वायदों का क्रम शुरू हो जाता है जो घर से भागने, अपहरण, मुक़दमा बाज़ी, कोर्टमेरिज से होता हुआ बदले और हत्या तक जा पहुंचता है। यह सारी खराबियां बे पर्दगी और मिली जुली महफ़िलों की पैदावार

हैं अतः इस्लाम समाज में अश्लीलता और बेहयायी फैलाने और सोसाइटी की सुखशान्ति अस्त व्यस्त करने वाले इस प्रेरक पर जीवन के हर विभाग में प्रतिबन्ध लगाता है। ___ मर्द व औरत का घुलना मिलना रोकने के लिए शरीअत ने औरतों के लिए कुछ इस्लामी आदेश तक बदल डाले हैं जैसे मर्दो के लिए जमाअत से नमाज़ पढ़ना वाजिब है औरतों से यह सब निकाल दिया गया है। मर्दो के लिए मस्जिद में नमाज़ पढ़ना सर्वश्रेष्ठ है जबकि औरतों के लिए घर में नमाज़ पढ़ना सर्वश्रेष्ठ है। मर्दो के लिए जुमा की नमाज़ वाजिब है जबकि औरतों पर नहीं, मर्दो पर जिहाद वाजिब है औरतों पर नहीं। जनाज़े की नमाज़ मर्दो के लिए फ़र्ज़ (किफ़ाया) है औरतों के लिए नहीं।

इस्लाम के इन अहकाम को सामने रखकर यह अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि जो शरीअत समाज को जिन्सी आवेश और जिन्सी बिखराव से बचाने के लिए मिली जुली इबादतों व इबादतगाहों की इजाजत देने के लिए तैयार नहीं वह शरीअत समाज में मिली जुली महफ़िलों, मिले जुले ड्रामों, लड़कों लड़कियों के खेलों, शिक्षा, नौकरियों और राजनीति की इजाज़त कैसे दे सकती है? विडम्बना यह है कि हमारे यहां जीवन के समस्त स्थलों में जिस दुस्साहस के साथ सरकारी व असरकारी सतह पर शरीअत के इस आदेश की अवज्ञा की जा रही है वह सारी क़ौम को अल्लाह के अज़ाब का शिकार बना देने के लिए काफ़ी है। औरत मर्द के घुलने मिलने की बुराई समाज में इतनी फैल चुकी है कि बीमारी का इलाज करने वाले स्वयं इस बीमारी का शिकार हो चुके हैं। पतन और गिरावट के इस स्थान से क़ौम की वापसी का दूर दूर तक कोई रास्ता नज़र नहीं आता। 7. कुछ अन्य आवेश बढ़ाने वाले कामों की मनाही

इस्लाम चूंकि समाज को यथा संभव जिन्सी आवेश और जिन्सी बिखराव से पाक और साफ़ रखना चाहता है। अतः जहां शरीअत अश्लीलता और बे हयायी फैलाने वाली बड़ी बड़ी बुराइयों का निवारण करती है वहां प्रत्यक्ष में छोटी छोटी लेकिन अत्यन्त ख़तरनाक बुराइयों पर पाबन्दी लगा कर हर प्रकार के चोर दरवाज़ों को बन्द कर देती है। यहां हम ऐसी ही कुछ बातों का उल्लेख कर रहे

  1. खुश्बू लगाकर घर से निकलने की मनाही- नबी सल्ल० का इर्शाद

है- “जो औरत नमाज़ के लिए मस्जिद जाना चाहे वह (खुश्बू का असर ख़त्म करने के लिए इसी तरह) गस्ल करे जिस तरह जनाबत से गस्ल करती है।"

(नसाई) 2. गैर मेहरम से साथ मिलने की मनाही- नबी सल्ल० का इर्शाद है"कोई मर्द किसी औरत के साथ कदापि तन्हाई में न मिले या यह कि उसका मेहरम साथ हो न ही औरत मेहरम के बिना सफ़र करे।" (मुस्लिम) ___ नबी सल्ल० का इर्शाद है- “पतियों की गैर मौजूदगी में औरतों के पास न जाओ क्योंकि शैतान तुममें से हर किसी के अन्दर इस प्रकार गर्दिश कर रहा है जिस तरह खून करता है।"

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(तिर्मिज़ी) __3. और मेहरम को छूने की मनाही- नबी सल्ल० का इर्शाद है- “कोई मर्द दूसरे मर्द का और कोई औरत किसी दूसरी औरत का सतर न देखे।"

(मुस्लिम) 4. इकट्ठा सोने की मनाही- नबी सल्ल० का इर्शाद है- “कोई मर्द दूसरे मर्द के साथ या कोई औरत दूसरी औरत के साथ एक चादर में न लेटे न सोए।"

(मुस्लिम) 5. गैर मेहरमों के सामने शोभा के प्रदर्शन की मनाही- अल्लाह का इर्शाद है- “ऐ नबी! मोमिन औरतों से कहो अपनी निगाहें (मर्दो की निगाहों में

ने से) बचा के रखें। अपने सतीत्व की रक्षा करें और अपनी शोभा का प्रदर्शन करें सिर्फ़ उस शोभा के जो आप से आप ज़ाहिर हो जाए। और अपने पांव पीन पर मारती हुई न चलें। ऐसा न हो कि वह शोभा जो उन्होंने छुपा रखी है सका लोगों को पता लग जाए (सरह नर-31) याद रहे सिवाय हाथों और चेहरे के जो आप स्वयं ज़ाहिर होने वाले हैं औरत का बाक़ी सारा शरीर सर से लेकर पांव तक सतर है जिसे घर के अन्दर मेहरमों से भी (सिवाए पति के) छुपाना ज़रूरी है। शोभा से तात्पर्य घर के अन्दर रोज़ की तरह वे कार्य हैं जिनमें कंघी करना, ख़ुश्बू लगाना, सुर्मा लगाना, मेंहदी लगाना या अच्छे ज़ेवर और कपड़े पहनना शामिल हैं जिसका प्रदर्शन केवल मेहरमों के सामने जायज़ है।

  1. जिन रिश्तेदारों के सामने शोभा का प्रदर्शन करना जायज़ है वे यह हैं- बाप, दादा, परदादा, नाना, परनाना, पति का बाप, दादा, परदादा, नाना, परनाना आदि। बेटे, पोते, पड़पोते, नवासे, पड़नवासे आदि भाई और उनके बेटे, पोते पड़पोते, नवासे और पड़नवासे, बहनों के पोते, पड़पोते, नवासे और पड़नवासे।

गैर मेहरमों के अलावा शरीअत ने निर्लज्ज और बदकार औरतों के सामने भी शोभा के प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी ताकि वह समाज में फ़िल्ने न फैलाती फिरें।

  1. गैर मेहरम मर्दो को बिना ज़रूरत आवाज़ सुनाने की मनाहीअल्लाह के नबी सल्ल० का इर्शाद है- “नमाज़ के दौरान किसी ज़रूरत के लिए (जैसे इमाम की भूल आदि) मर्द सुबहानल्लाह कहें लेकिन औरतें ताली बजाएं।" (बुख़ारी व मुस्लिम) इसी कारण औरत को अज़ान देने की इजाज़त भी नहीं दी गयी।
  2. गाने बजाने की मनाही- मर्दो और औरतों की जिन्सी भावनाओं को भड़काने का सबसे प्रभावी साधन गाना बजाना और संगीत है। यदि इस गाने के साथ चलती फिरती तस्वीरें भी हों तो यह एक ऐसा दो धारी शैतानी हथियार बन जाता है जो जिन्सी भावनाओं में आग लगा कर इन्सान को हैवान बना देने के लिए काफ़ी है अतएव नबी सल्ल० ने हर तरह के संगीत और गाना सुनने से मना किया है और ऐसा करने वाले को अल्लाह की कठोर यातना की खबर सुनाई है.। नबी सल्ल० का इर्शाद है- “इस उम्मत के लोगों पर ज़मीन में धंसने, शक्लें बिगड़ने और (आसमान से) पत्थरों की बारिश बरसने का अज़ाब आएगा" किसी सहाबी ने कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल०! यह कब होगा?" आपने इर्शाद फ़रमाया- “जब गाने बजाने वाली औरतें ज़ाहिर होंगी, संगीत के संयत्र आम इस्तेमाल होंगे और शराबें पी जाएंगी।" (तिर्मिज़ी)
  3. दुराचारी साहित्य- औरत की नंगी और अर्ध नंगी रंगीन तस्वीरों पर आधारित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और साहित्य के नाम पर अश्लील गन्दे और ग़लीज़ नाविल और अन्य चरित्र से गिरा हुआ साहित्य समाज में अश्लीलता व निर्लज्जता फैलाने का एक बहुत बड़ा शैतानी हथियार है। अल्लाह ने ऐसे चरित्र को बिगाड़ने वाले साहित्य के प्रकाशन पर क़ुरआन मजीद में दर्दनाक अज़ाब की ख़बर दी है। अल्लाह का इर्शाद है- “जो लोग चाहते हैं कि ईमान वालों में अश्लीलता फैले वे दुनिया व आख़िरत में दर्दनाक यातना के हक़दार । हैं।"

(सूरह नूर-19) 8. निकाह का हुक्म

व्यक्ति के नफ़्स के सुधार और पाकी की विभिन्न तदबीरें अपनाने के साथ

साथ इस्लाम निकाह करने का हुक्म भी देता है जो कि न केवल पारिवारिक व्यवस्था की शक्तिशाली और सदृढ़ बुनियाद बनता है बल्कि इन्सान के अन्दर शर्म व लज्जा और सतीत्व की भावना भी पैदा करता है। अल्लाह के नबी का इर्शाद है- “निकाह आंखों को नीचा करता है और शर्मगाह को बचाता है।"

(मुस्लिम)

और आप (सल्ल०) ने इर्शाद फ़रमाया- “निकाह आधा दीन है।" (बैहेकी) निकाह के महत्व को देखते हुए इस्लाम ने निकाह का तरीका बड़ा सरल व सहज रखा है न मेहर की हद न दहेज की पाबन्दी न बारात का झंझट न ज़बान, रंग व नस्ल, क़ौम, क़बीला की कैद, बस केवल मुसलमान होने की शर्त

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रजि० ने मदीना में शादी की और नबी सल्ल० को पता तक न चला। आपने हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रजि० के कपड़ों पर जाफ़रान का रंग देखकर पूछा- “यह क्या है?" हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने कहा- “मैंने अन्सार की एक औरत से निकाह किया है।"

(बुख़ारी) – हज़रत जाबिर रज़ि० ने एक जंगी मुहिम से वापसी पर नबी अकरम सल्ल० को बताया- “ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने नयी नयी शादी की है।" पूछा"कुंवारी से या विधवा से?" हज़रत जाबिर रजि० ने बताया- “विधवा से।" आपने फ़रमाया- “कुंवारी से शादी क्यों न की? वह तुझसे खेलती तू उससे खेलता।"

(मुस्लिम) .. मतलब यह कि न तो सहाबा किराम रजि० अपने निकाह की समय रहते

ख़बर देना नबी सल्ल० को ज़रूरी समझते थे न नबी सल्ल० ने कभी इस बात पर अपनी नाराज़गी प्रकट की कि मुझे दावत क्यों नहीं दी गयी? एक सहाबी के पास निकाह के लिए कुछ भी नहीं था कि मेहर में देने के लिए लोहे की अंगूठी भी उपलब्ध नहीं थी। आपने उसका निकाह कुरआन की आयतों पर ही कर दिया। (बुख़ारी) न मेहर न दहेज़ न बारात, इन तमाम सुविधाओं के बावजूद यदि कोई निकाह न करे तो उसके बारे में इर्शाद मुबारक है- “वह मुझसे नहीं।"

(मुस्लिम

  1. रोज़ा- निकाह का विकल्प

जब तक निकाह के लिए हालात ठीक न हों उस समय तक रसूल अकरम शर्म व लज्जा और सतीत्व की भावना भी पैदा करता है। अल्लाह के नबी का सल्ल० ने (यथा सामथ) रोज़े रखने का हुक्म दिया है। कुरआन मजीद में अल्लाह इर्शाद है- “निकाह आंखों को नीचा करता है और शर्मगाह को बचाता है।" ने रोज़े का उद्देश्य बयान करते हुए यह बताया है- “ताकि तुम लोग परहेज़गारबन जाओ।" (सूरह बक़रा) नबी सल्ल० ने भी रोज़े का उद्देश्य बयान करते हुए और आप (सल्ल०) ने इर्शाद फ़रमाया- “निकाह आधा दीन है।" इर्शाद फ़रमाया है- “रोज़ा खाने पीने से रुकने का नाम नहीं बल्कि बेकार के (बैहेकी) निकाह के महत्व को देखते हुए इस्लाम ने निकाह का तरीका बड़ा सरल और गन्दे कामों से रुकने का नाम है।" (इब्ने ख़ज़ीमा) जिसका मतलब यह हैकिं रोज़ा एक ऐसी इबादत है जो इन्सान के अन्दर मौजूद वासना संबंधी और व सहज रखा है न मेहर की हद न दहेज की पाबन्दी न बारात का झंझट न

हैवानी भावनाओं को सख्ती से ख़त्म कर देता है। अतएव नबी सल्ल० का इर्शाद ज़बान, रंग व नस्ल, क़ौम, क़बीला की कैद, बस केवल मुसलमान होने की शर्त

है- “नमाज़ बुराई और अश्लील कामों से रोकती है।" (सूरह अन्कबूत-45)

नमाज़ के इन लाभों के साथ रोज़ा के हुक्म की वृद्धि मानो इन्सान को जिन्सी ___ हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रजि० ने मदीना में शादी की और नबी

बिखराव से सुरक्षित रखने के लिए दोहरी मदद देता है।

  1. अन्तिम रास्ता बिन औफ़ ने कहा- “मैंने अन्सार की एक औरत से निकाह किया है।"

नफ़्स के सुधार एवं पाकीज़गी की सारी बाहरी और आन्तरिक तदबीरों के

बावजूद यदि कोई व्यक्ति अपनी वासना संबंधी भावनाओं को कन्ट्रोल नहीं करता । हज़रत जाबिर रज़ि० ने एक जंगी मुहिम से वापसी पर नबी अकरम सल्ल०

और वह कुछ कर गुज़रता है जिसे इस्लाम हर सूरत में रोकना चाहता है अर्थात को बताया- “ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने नयी नयी शादी की है।" पूछा

ज़िना, तो इसका मतलब यह है कि वह मर्द या औरत इस्लामी समाज में रहने “कुंवारी से या विधवा से?" हज़रत जाबिर रज़िक ने बताया- “विधवा से।"

के योग्य नहीं। उन पर मानवता की बजाए जानवरपन छाया हुआ है। ऐसे आपने फ़रमाया- “कुंवारी से शादी क्यों न की? वह तुझसे खेलती तू उससे

अपराधियों को सीधे रास्ते पर लाने के लिए इस्लाम ने अन्तिम रास्ता के तौर पर खेलता।" लोगों की भीड़ के सामने बिना किसी रिआयत सौ कौड़े मारने का आदेश दिया

अल्लाह का इर्शाद है- “जिना र पर अपनी

बात की कि मझेदावत क्यों नही दी गयी? एक सहाबा का मर्द दोनों में से हरेक को सौ कोड़ें मारो और अल्लाह के कानन के लाग करते पास निकाह के लिए कुछ भी नहीं था कि मेहर में देने के लिए लाह का

कि मेहर में देने के लिए लोहे की अंगूठी समय तुम्हें उनपर दया नहीं आनी चाहिए यदि तुम वास्तव में अल्लाह और भी उपलब्ध नहीं थी। आपने उसका निकाह कुरआन की आयतों पर ही कर आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो और जब उनको सजा दी जाए तो दिया। (बखारी) न मेहर न दहेज़ न बारात, इन तमाम सुविधाओं के बावजूद यदि मुसलमानों में से एक जमाअत उनको देखने के लिए मौजद रहे।" (सरह नर-1) का निकाह न करे तो उसके बारे में इशाद मुबारक है- “वह मुझसे नहीं।" जिना के अलावा किसी बेगनाह औरतके लिए भी शरीअत ने अस्सी कोड़ों की सज़ा मुक़र्रर की है जिसे हदे क़ज़फ़ कहा

जाता है। ऐसे अवज्ञाकारी दुष्ट स्वभाव लोगों को और अधिक अपमानित करने के लिए यह हुक्म भी दिया गया है कि आगे उनकी किसी भी मामले में गवाही न मानी जाए। अल्लाह का इर्शाद है- “और जो लोग पाक दामन औरतों पर (बदकारी का) आरोप लगाएं और फिर चार गवाह पेश न करें उन्हें अस्सी कोड़े मारो और आगे कभी उनकी गवाही कुबूल न करो। ऐसे लोग स्वयं ही बदकार हैं।"

(सूरह नूर-1) – स्पष्टीकरण- निकाह के बाद ज़िना की सज़ा संगसार करना है जिसका ज़िक्र अगले पन्नों में आएगा। इन्शाअल्लाह 4. चौथा दौर- निकाह के बाद से अन्तिम समय तक – निकाह के बाद जिन्सी दृष्टि से इन्सान के अन्दर सुकून, शान्ति और सन्तोष की स्थिति पैदा हो जानी चाहिए फिर भी इसका दारोमदार पति पत्नी के आपसी रवैयों पर है इसलिए इस अवसर पर भी इस्लाम दोनों पक्षों की जिन्सी भावनाओं को बिगड़ने व भटकने से बचाने के लिए पूरी पूरी रहनुमाई करता है। निकाह के बाद पति पत्नी के लिए इस्लामी शिक्षाएं निम्न हैं____ 1. पति की जिन्सी भावनाओं का सम्मान- औरत को यह हुक्म दिया गया है कि वह अपने पति की जिन्सी भावनाओं का सम्भावित हद तक सम्मान करे और उसकी नफ़सानी इच्छा पूरी करे। अल्लाह के रसूल सल्ल० का इर्शाद है- “उस ज़ात की क़सम! जिसके हाथ में मेरी जान है जब पति पत्नी को अपने बिस्तर पर बुलाए और वह इन्कार कर दे तो वह ज़ात जो आसमानों में है नाराज़ रहती है यहां तक कि उसका पति उससे राज़ी हो जाए।" (मुस्लिम) इस्लाम ने

औरत को पति की जिन्सी भावनाओं का ख्याल रखने की इस हद तक ताकीद की है कि यदि औरत नफ़्ली रोज़ा रखना चाहे तो वह भी पति से इजाज़त लेकर रखे।

(बुख़ारी) 2. चार शादियों की इजाजत- इस्लाम चूंकि हर समय पर समाज से जिन्सी अराजकता और जिन्सी बिखराव रोकना चाहता है अतः उसने मर्दो को स्वेच्छा से एक से अधिक एक साथ चार शादियां करने की इजाजत दी है। अल्लाह का इर्शाद है___ “यदि तुमको शंका हो कि यतीमों के साथ न्याय न कर सकोगे तो जो औरतें तुमको पसन्द आएं उनमें से दो दो, तीन तीन या चार चार से निकाह कर

लो लेकिन यदि तुम्हें शंका हो कि इन (विधवाओं) के बीच न्याय न कर सकोगे तो फिर एक ही करो।”

(सूरह निसा-3) ___ अर्थात इस्लाम को यह तो पसन्द है कि न्याय को कायम रखते हुए कोई व्यक्ति दो या तीन यहां तक कि चार औरतों से निकाह करके आनन्दित हो जाए लेकिन यह कदापि पसन्द नहीं कि मर्द गैर मेहरम औरतों से चोरी छुपे आंखे लडाते फिरें। गैर मेहरम औरतों से दिल बहलाएं या उनसे आंखें लड़ाएं। न ही यह पसन्द है कि मर्द नाइट कल्बों, वैश्यालयों और वैश्याओं के डेरों को आबाद करें, न ही यह पसन्द है कि समाज में छोटी उम्र की बच्चियां जिन्सी हिंसा का शिकार हों। ज़िना की अधिकता हो और ऐसे हरामी बच्चे पैदा हों जिन्हें अपनी मां का पता हो न बाप का।

एक से अधिक शादियों के हवाले से हम यहां इस बात का ज़िक्र करना भी आवश्यक समझते हैं कि हिन्द व पाक के प्राचीन रस्म व रिवाज और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार हमारे यहां आज भी दूसरे निकाह के बारे में सख्त नफ़रत और घणा की भावना पायी जाती हैं यहां तक कि कभी कभी उचित कारण (जैसे औरत की निरन्तर बीमारी या सन्तान न होना आदि) के बावजूद मर्द के दूसरे निकाह को निंदा योग्य और मलामत योग्य समझा जाता है। इसी रस्म व रिवाज को देखते हुए सरकार ने यह क़ानून लागू कर रखा है कि मर्द के लिए दूसरे निकाह से पहले पहली पत्नी से इजाज़त हासिल करना ज़रूरी है जो कि सरासर गैर इस्लामी है। इस्लाम में दूसरी, तीसरी या चौथी शादी के लिए न्याय की शर्त के अलावा कोई दूसरी शर्त नहीं और इसकी मसलेहत व हिक्मत का ज़िक्र पिछली पंक्तियों में हो चुका है। यहां हम केवल इतना कहना चाहेंगे कि अल्लाह के उतारे गए आदेशों के बारे में दिल में कराहत या नापसन्दीदगी महसूस करते हुए सौ बार डरना चाहिए। कहीं इस वजह से उम्र भर की सारी मेहनत और कमाई बर्बाद न हो जाए। ___अल्लाह का इर्शाद है- “चूंकि उन्होंने इस चीज़ को नापसन्द किया जिसे अल्लाह ने भेजा है अतः अल्लाह ने उनके सारे कर्मों को बर्बाद कर दिया।" .

(सूरह मुहम्मद-9) 3. पति के सामने गैर मेहरम औरतों का उल्लेख करने की मनाहीअल्लाह के रसूल सल्ल० का इर्शाद है- “कोई व्यक्ति किसी दूसरी औरत के पाथ इस तरह (भेद भरी बातें करके) न रहे कि फिर (जाकर) अपने पति से

उसका हाल यूं बयान करे जैसे वह उसे देख रहा है।" (बुख़ारी).

____4. जिन्सी जीवन के भेद खोलने की मनाही- नबी सल्ल० का इर्शाद है- “क़ियामत के दिन अल्लाह के निकट सबसे बुरा व्यक्ति वह होगा जो अपनी पत्नी के पास जाए और पत्नी उसके पास आए और फिर वह अपनी पत्नी की राज़ की बातें दूसरों को बताए।"

  1. पति के रिश्तेदारों से पर्दे का हुक्म- एक बार नबी सल्ल० ने सहाबा किराम (रज़ि०) को नसीहत की- “औरतों के पास एकान्त में न जाओ।" एक सहाबी ने कहा- “ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल०! पति के रिश्तेदारों के बारे में क्या हुक्म है?" आपने इर्शाद फ़रमाया- “वह तो मौत है।"

(तिर्मिज़ी) – याद रहे कि पति के रिश्तेदारों से तात्पर्य उसके भाइयों के अलावा निकटतम रिश्तेदार भी हैं जैसे चचाज़ाद, फूफीज़ाद, ख़ालाज़ाद, मामूज़ाद । (तिर्मिज़ी) … 6. अन्तिम रास्ता- जो व्यक्ति निकाह के बावजूद ज़िना जैसे घिनौने अपराध को करे उसके लिए शरीअत ने वास्तव में ऐसी कड़ी सज़ा रखी है कि वह दूसरों के लिए शिक्षा प्रद बन जाता है। देखने वाले ज़िना की कल्पना से ही कांपने लगते हैं। असल में शरीअत ने इतनी कड़ी सज़ा (संगसार) मुक़र्रर ही इसलिए की है कि एक आध अपराधी को सज़ा देकर पूरे समाज को इसकी गन्दगी और नापाकी से पूरी तरह और साफ़ कर दिया जाए।

. सामाजिक जीवन के बारे में इस्लाम के वे आदेश जिनपर अमल करके समाज को न केवल जिन्सी आवेश और जिन्सी बिखराव से बचाया जा सकता है बल्कि औरत पर होने वाले जुल्म व अत्याचार को ख़त्म करके सम्मान व इज़्ज़त का स्थान भी दिलाया जा सकता है। जब तक हम व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर नेक नीयती से किताब व सुन्नत के इन आदेशों पर अमल नहीं करते हमारा समाज जटिल समस्याओं की आग में निरन्तर जलता रहेगा। इस आग को ठंडा करने का केवल एक ही रास्ता है कि पूरी विनम्रता और विनय के साथ अल्लाह और उसके रसूल के आगे सर झुका दिया जाए।

प्रिय पाठक गण! विगत पृष्ठों में हम पश्चिमी जीवन व्यवस्था और इस्लामी समाज का विस्तार से अवलोकन कर चुके हैं। एक नज़र में दोनों सभ्यताओं का तुल्नात्मक विवरण निम्न चार्ट में देखा जा सकता हैक्रसं० सामाजिक प्रणाली पश्चिम

इस्लाम

  1. निकाह! मर्दो की गुलामी ! सुन्नते रसूल, पारिवारिक व्यवस्था का आधार 2. पति का आज्ञापालन! महिला की आज़ादी में रुकावट! वाजिब है 3. परिवार में मर्द की हैसियत! औरत के बराबर! परिवार का मुखिया 4. घर दारी! आयाओं के ज़िम्मे! औरत के ज़िम्मे 5. आर्थिक ज़िम्मेदारी! मर्द की तरह औरत भी ज़िम्मेदार! केवल मर्द ज़िम्मेदार है 6. औरत का कार्य क्षेत्र! मर्द के साथ साथ! केवल घर के अन्दर 7. बहुपत्नी विवाह! हास्यस्पद धारणा! चार तक इजाज़त है 8. गर्ल फ्रेन्ड/ब्वाय फ्रेन्ड! जीवन का अंश! पूरी तरह हराम 9. घर के अन्दर सतर! कल्पना ही एक बोझ है! सर से पांव तक सिवाए हाथ ।

और चेहरे के . 10. घर से बाहर पर्दा! रुढ़िवाद! सतीत्व की निशानी 11. नंगापन! रोशन सोच! जिहालत की रस्म 12. मर्द औरत का मिलना जुलना! समाज का अनिवार्य अंश! पूरी तरह हराम 13. ज़िना! आनन्द का साधन और दिल्लगी का शौक़! पूरी तरह हराम 14. शराब! जीवन का अंश! पूरी तरह हराम । 15. बिन ब्याही औलाद! क़ानूनी औलाद के मुक़ाबले में वरीयता योग्य! जीवन भर के लिए शर्म व नदामत की निशानी 16. सन्तान का लालन पालन! जीवन की रंगीनी में एक बड़ी रुकावट! मां-बाप के ज़िम्मे है 17. मां-बाप की सेवा! एक बोझ! इबादत व सौभाग्य की बात 18. तलाक़! मर्द की तरह औरत भी दे सकती है! केवल मर्द दे सकता है।

इस चार्ट को देखकर यह अन्दाज़ा करना मुश्किल नहीं कि दोनों सभ्यताएं एक दूसरे की विलोम हैं। दोनों में पूरब पश्चिम का फ़र्क है। जो बात एक सभ्यता में अच्छी निगाह से देखी जाती है वही बात दूसरी सभ्यता में बुरी निगाह से देखी जाती है। जो चीज़ एक सभ्यता में रोशन ख्याल मानी जाती है दूसरी सभ्यता में वह निरी जिहालत है। पश्चिम वालों की गवाहियां

___ मुसलमानों की इस्लामी सामाजिक प्रणाली के बारे में सकारात्मक राय रखना एक स्वभाविक बात है कि यह उनके ईमान व अक़ीदे में शामिल है। यहां

हम कुछ ऐसे लोगों की राय पेश कर रहे हैं जिन्होंने पश्चिमी सामाजिक प्रणाली

भाख खाला, लालन पालन पाया, उसी प्रणाली में शिक्षा प्राप्त की और बरसों र सामाजिक प्रणाली का हिस्सा बन कर रहे लेकिन जब इस्लामी सामाजिक अणाला का गभीरता से अवलोकन किया तो उन्हें इस नतीजे पर पहुंचने में कोई

२कल पश नहीं आयी कि इस्लामी सामाजिक प्रणाली ही असल में वह प्रणाली है जिसमें मानव जाति के लिए मुक्ति का मार्ग है।

  1. शहज़ादा चालिस इन दिनों कुरआन पाक की टीका व अनुवाद के लावा अन्य इस्लामी पस्तकों का अध्ययन कर रहे हैं और अधिकांश मुसलमानों दाना कायक्रमों में भी भाग ले रहे हैं। इन कार्यक्रमों में वे मुसलमानों से अपील कर रह है कि इस्लाम की शाश्वत शिक्षाओं को आम किया जाए और अन्य धर्म पाला म उसके बारे में भ्रम को दर करने का काम बड़े पैमाने पर किया जाए। 19 मार्च 1996 ई० को महम्मदी पार्क लन्दन की मस्जिद की एक सभा में उन्होंने डेढ़

। मुसलमानों के बीच गज़ारा। याद रहे शहज़ादा चार्लिस 1993 ई० से • माक्सफ़ाड यूनीवर्सिटी के इस्लामिक स्टडीज़ सेन्टर के संरक्षक भी हैं।

  1. आक्सफ़ोर्ड के इस्लामिक स्टडीज़ सेन्टर में साउथ अफ्रीका के राष्ट्रपति नेलसन मंडेला ने तक़रीर करते हुए कहा

“इस्लाम सम्पूर्ण मार्ग दर्शन करने वाला एक मात्र जीवन दर्शन है। महाद्वीप अफ्रीका में लोग ज्यों ज्यों इस्लाम का अध्ययन कर रहे हैं इस्लाम स निकट हात जा रहे हैं। यदि पश्चिमी लोग भी इस महान अन्तर्राष्ट्रीय धर्म का

नजर स अध्ययन करें तो उनके दिलों में इस्लाम के बारे में पायी जाने वाली प्रान्तिया का निवारण हो जाएगा। मैं दावे से कह रहा हूं कि अब यहां (पश्चिम १ मा इस्लाम का धीरे धीरे विकास होना निश्चित हो गया है।

  1. मराकश में नियक्त जर्मनी दूत वेल फ़रेड हाफ़ मेन ने इस्लाम कुबूल जनक बाद इस्लामी दंड विधान पर एक किताब लिखी है जिसमें चोरी की सज़ा काय काटना, हत्या का बदला क़त्ल और ज़िना की सज़ा संगसार करने पर मुख्य १५ स प्रकाश डाला है। और यह साबित किया है कि मानवता को शान्ति का स्थल बनाने के लिए इन सजाओं के बिना कोई रास्ता नहीं।

__ 4. राष्ट्रपति निक्सन के राजनीतिक सलाहकार डेनिस क्लारक ने एक बार राष्ट्रपति का मश्विरा दिया कि अमेरिका को इस्लाम के बारे में अपनी राय में सुखद पारवर्तन लाने होंगे। राष्ट्रपति के कहने पर श्री डेनिस को ही यह सुखद

परिवर्तन, लाने के लिए इस्लाम का अध्ययन करना पड़ा जिसके बाद डेनिस क्लारक मुसलमान हो गए।

  1. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन के पड़ पौते जान अशफून को पत्रकारिता से संबंधित कुछ काम पूरे करने के लिए बेरूत, मराकश, अरटीरिया, अफ़गानिस्तान और बोसनिया जाना पड़ा। जहां उसकी मुलाक़ातें मुसलमान डाक्टरों और पत्रकारों से हुई। इस्लाम के विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श के बाद जार्ज अशफून ने कुरआन का अध्ययन शुरू कर दिया। अध्ययन के बाद उसने स्वीकारा कि कुरआन पढ़ने के बाद मुझे अपने उन तमाम सवालों का सन्तोष जनक जवाब मिल गया है जिनके लिए मैं बरसों से परेशान था और जिनके लिए मुझे इंजील और उसके विद्वानों ने निराश कर दिया था। . ___कुछ दिनों के बाद जार्ज अशफून अमेरिका में ही थे एक मुसलमान की मौत हो गयी। उसके जनाज़े में शिर्कत के लिए गया। दफ़न कफ़न के अमल से वे इतने प्रभावित हुए कि मय्यित के गुस्ल के दौरान ही उसने कलिम-ए-शहादत पढ़कर अपने इस्लाम लाने का ऐलान कर दिया। ___6. अमेरिका कांग्रेस कमेटी के सदस्य जेम मोरन का कहना है कि “मैं अपने बच्चों को इस्लामी शिक्षाओं का अध्ययन करने की हिदायत करता रहता हूं। दीन इस्लाम के आवाहक हज़रत मुहम्मद सल्ल० एक ऐसी महान हसती थे कि इतिहास में उन जैसी कोई मिसाल नहीं मिलती मगर दुख की बात है कि उनकी शिक्षाओं को न पढ़ने की दो वजह हैं। एक गैर मुस्लिमों की हठधर्मी, दूसरे मुसलमानों की कोताही।"
  2. अमेरिका के पूर्व अटारनी जनरल रेम्ज़ क्लारक ने अपने एक इन्टरव्यू में माना है कि इस्लाम दुनिया की एक अत्यन्त प्रभावी आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति है। अमेरिकी जेलों में हज़ारों की संख्या में ऐसे बच्चे हैं जिनके घर बार हैं, मां-बाप, शिक्षा से अनभिज्ञ, नशे के आदी, भ्रष्टाचार और अपराध उनके जीवन का ओढ़ना बिछौना है लेकिन इन कैदियों ने जब इस्लाम की दावत कुबूल कर ली तो अचानक वे बुलन्दियों को छूने लगे। जेल में हंगामें होते हैं तो यही लोग दूसरों की जानें बचाते नज़र आते हैं। ____ 8. जापानी नो मुस्लिमा “ख़ौला लुकाता’ जापान में इस्लाम की तेज़ी से बढ़ते हुए रुझान पर विचार प्रकट करते हुए कहती हैं कि “अब अधिक से अधिक जापानी औरतें इस्लाम कुबूल कर रही हैं। मुश्किल हालात के बावजूद

सरों तक को छुपा रही हैं। वे सब यह मानती हैं कि वे अपने पर्दे पर गर्व करती है और इसी से उनके ईमान को ताक़त मिलती है। मैं पैदइशी रूप से मुसलमान नहीं हूं मैंने तथा कथित आज़ादी (निसवां) और आधुनिक जीवन व्यवस्था की लुभाने वाली लज़्ज़तों को छोड़कर इस्लाम का चयन किया है। य कि इस्लाम ऐसा धर्म है जो औरतों पर जुल्म कर रहा है तो आज यूरोप, अमेरिका, जापान और दूसरे देशों में बहुत सी महिलाएं क्यों कुबूल कर रही हैं? काश कि लोग इस पर रोशनी डालते।"

उपरोक्त मिसालों से यह हक़ीक़त खुल कर सामने आती है कि इस्लाम कि आफ़ाक़ी शिक्षाएं इन्सान के स्वभाव और प्रकृति के ठीक ठीक अनुसार हैं उनमें दिल व दिमाग को बस में करने की बहुत अधिक ताक़त मौजूद है। पश्चिम वालों क इन बयानों व गवाहियों में ईमान वालों के लिए बड़ा ही शिक्षा प्रद का सामान है। हमें विचार करना चाहिए कि जब गैर मुस्लिम क़ौमें सदियों तक कुफ़र के अधरों में भटकने के बाद नजात के लिए इस्लाम की ओर पलट रही हैं तो फिर हम पहल करते हुए खुले दिल के साथ इस्लाम की ओर पलट आना चाहिए। काश हमारे बड़े, संरक्षक, बुद्धिजीवी वर्ग को भी इस हक़ीक़त को समझने का सौभाग्य प्रदान हो? मां-बाप की सेवा में कुछ महत्वपूर्ण बातें

नबी करीम सल्ल० का मुबारक इर्शाद है_ “हर बच्चा प्रकृति (इस्लाम) पर पैदा होता है लेकिन उसके मां-बाप उसे यहूदी या ईसाई या मजूसी बना देते हैं।" (बुख़ारी) इस हदीस शरीफ़ से औलाद के प्रशिक्षण की अहमियत का अन्दाज़ा किया जा सकता है। औलाद के प्रशिक्षण के बारे में वैसे तो मां-बाप पर बड़ी भारी ज़िम्मेदारी आती हैं लेकिन हम यहां कवल दाम्पत्य जीवन के हवाले से कुछ बातें पेश करना चाहते हैंप्रौढ़ अवस्था के मसाइल

प्रौढ़ अवस्था की सीमाओं में दाखिल होने वाले लड़के और लड़कियों को प्रौढ अवस्था के मसलों से अवगत होना ज़रूरी है। हमारे यहां इस बारे में दो भिन्न राएं पायी जाती हैं। एक वर्ग तो वह है जो अपनी व्यस्क औलाद के सामने न स्वयं ऐसे मसाइल का ज़िक्र करना पसन्द करता है न ही बच्चों की ज़बान से

उनका ज़िक्र सुनना पसन्द करता है।

दूसरा वर्ग वह है जो पश्चिम जीवन प्रणाली का इस हद तक मतवाला है कि उन्हीं की तरह स्कूलों में बाक़ायदा जिन्सी शिक्षा पर बल देता है। ये दोनों एक दूसरे से भिन्न सोच हैं। सन्तुलित रास्ता यह है कि व्यस्क होने के करीब पहुंचते हुए बच्चों के मसाइल का मां-बाप स्वयं एहसास करें और इस्लामी शिक्षाओं की रोशनी में उनका मार्ग दर्शन करें वर्ना मीडिया के फ़िल्ने, रेडियो, टी वी, वी सी आर, बाज़ारी नाविल, अश्लीलता फैलाने वाले दैनिक, साप्ताहिक पत्रिकाएं, मैगज़ीन और अन्य साहित्य का सैलाब अधकचरे ज़हन और उठती हुई जवानी की उम्र में बड़ी आसानी से बच्चों को गलत रास्ते पर डाल सकता है। याद रखिए कभी कभी मामूली सी कोताही और ग़लती की पूर्ति उम्र भर के संघर्ष से भी संभव नहीं रहती।

सहाबा किराम रजि० और सहाबियात प्रौढ़ अवस्था के मसाइल, पाकी, नजासत, जनाबत, मासिक धर्म, निफ़ास, इस्तिहाज़ा आदि के मसाइल नबी करीम सल्ल० से आकर मालूम करते थे और अल्लाह के रसूल सल्ल० सारी मानवता में सबसे अधिक शर्म व हया वाले और स्वाभिमान थे लेकिन आपने कभी मसाइल बताने में शर्म या झिझक महसूस नहीं की। न सहाबा किराम को ऐसे मसाइल मालूम करने से कभी रोका या टोका बल्कि कभी कभी अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी के हवाले से मसाइल बताकर सहाबा किराम का साहस बढ़ाया।

हज़रत आइशा रजि० अन्सारी महिलाओं की इस बात पर बड़ी प्रशंसा किया करती थीं कि वे दीनी मसले मालूम करने में झिझक महसूस नहीं करतीं।

(मुस्लिम) निकाह में लड़कियों की रजामंदी

इससे पूर्व हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि इस्लाम औरत को भी मर्द की तरह अपना जीवन साथी चुनने की पूरी पूरी आज़ादी देता है लेकिन हमारे यहां रिवाज यह है कि लड़के की पसन्द या नापसन्द को तो बड़ा महत्व दिया जाता है कभी कभी लड़के स्वयं भी ज़िद करके या किसी न किसी तरह अपनी प्रतिक्रिया को स्पष्ट कर देते हैं और अपनी बात मनवा लेते हैं लेकिन इसके मुक़ाबले में लड़कियों की पसन्द या नापसन्द को कोई महत्व नहीं दिया जाता। कुछ तो लड़कियों में कुदरती तौर पर लड़कों की तुलना में झिझक अधिक होती है और

वे अपनी पसन्द या नापासन्द का इज़हार भी नहीं कर पातीं। कुछ पूर्वी रस्म व रिवाज भी ऐसा है कि इस मामले में लड़की का कुछ कहना बेशर्मी की बात समझी जाती है और मां-बाप अपनी बेटियों से यह आशा रखते हैं कि वे जहां कहीं उनके रिश्ते कर दें, बेटियों को ज़बान बन्द करके वहां चली जाना चाहिए। . शरी रूप से यह तरीक़ा ठीक नहीं। लड़की की मर्जी के बिना किए गए निकाह के मामले में नबी करीम सल्ल० ने लड़की को पूरा अख्तियार दिया है कि वह चाहे तो निकाह को बाक़ी रखे चाहे तो ख़त्म कर दे। (अबू दाऊद) . अतः निकाह से पहले लड़कों की तरह लड़कियों को भी अपनी पसन्द या नापसन्द की बात कहने का पूरा पूरा मौक़ा देना चाहिए। यदि मां-बाप लड़की के चयन को किसी वजह से गलत समझते हैं तो उसे जीवन के उतार चढ़ाव से अवगत करके यह तो कह सकते हैं कि उसकी पसन्द को बदल दें लेकिन यह नहीं कर सकते कि उसकी मर्जी के बिना ज़बरदस्ती किसी जगह उसका निकाह कर दें। यह तरीक़ा व अमल न केवल शरी तौर पर बल्कि सांसारिक दृष्टि से भी इसके नतीजे कष्टदायक और परेशान करने वाले निकल सकते हैं। बे जोड़ रिश्ते

रसूले अकरम सल्ल० का इर्शाद मुबारक है- “औरत से चार चीज़ों की बुनियाद पर निकाह किया जाता है। उसके माल व दौलत के कारण, उसके हसब व नसब के कारण, उसकी सुन्दरता की वजह से या उसकी दीनदारी की वजह से। तेरे हाथ ख़ाक में हों दीनदार औरत से निकाह करने मे कामयाबी हासिल कर।"

(बुख़ारी) इस हदीस शरीफ़ में स्पष्ट रूप से इस बात का हुक्म दिया गया है कि रिश्ता तें करते समय दीनदारी का ज़रूर ख्याल रखना चाहिए। अच्छा ख़ानदान, अच्छी शक्ल, अच्छा कारोबार देखना शरी तौर पर मना है न ऐब। यदि ये सब या इनमें से कुछ मिल जाएं तो बहुत अच्छा है लेकिन शरीअत जिस चीज़ को इन सब पर मुक़द्दम रखने का हुक्म देती है वह दीनदारी है। दुर्भाग्य से जब से भौतिकवाद की दौड़ शुरू हुई है। कितने ही दीनदार घराने ऐसे हैं जो अपनी बेटियों को किताब व सुन्नत की शिक्षा दिलाते हैं पाकीज़ा और साफ़ सुथरे माहौल में उनका प्रशिक्षण करते हैं लेकिन निकाह के समय दुनिया की चमक दमक से प्रभावित होकर बेटी के अच्छे भविष्य की तमन्ना में बेदीन या बिदअती या

मुश्रिक घरानों में अपनी बेटियां ब्याह देते हैं और यह कल्पना कर लेते हैं कि बेटी नए घर में जाकर स्वयं अपना माहौल बना लेगी। कुछ साहसी, सुशील और भाग्यशाली महिलाओं के कुछ उदाहरणों से इन्कार नहीं किया जा सकता लेकिन आम तथ्य यही बतलाते हैं कि ऐसी महिलाओं को बाद में बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्वयं मां-बाप भी जीवन भर हाथ मलते रहते हैं। हमें इस हक़ीक़त को भुलाना नहीं चाहिए कि अल्लाह तआला ने औरत के स्वभाव में दूसरों को ढालने की बजाए स्वयं ढलने की विशेषता ग़ालिब रखी है। यही कारण है कि किताब वालों की औरतें लेने की इजाज़त है देने की नहीं।

__ कम से कम दीनदार घरानों को कफू दीन का उसूल (हसब व नसब व सामाजिक स्तर पर समानता का उसूल) किसी कीमत पर भी नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहिए। रिश्ता तै करते समय यह बात भी याद रखनी चाहिए कि नेक मर्द व औरत का यही सांसारिक निकाह क़यामत के दिन जन्नत में हमेशा के ताल्लुक़ की बुनियाद बनेगा। लेकिन यदि दोनों पक्षों में से एक तौहीद पर कायम रहने वाला और अल्लाह से डरने वाला हो और दूसरा पक्ष इसके विपरीत हो तो इस दुनिया में ताल्लुक़ निभाने के बावजूद आख़िरत में यह ताल्लुक़ टूट जाएगा और जन्नत में जाने वाले मर्द या औरत का किसी दूसरे तौहीद परस्त और नेक औरत या नेक मर्द से निकाह कर दिया जाएगा अतः निकाह के समय अल्लाह का यह इर्शाद याद रखना चाहिए___"दुष्ट औरतें दुष्ट मर्दो के लिए हैं और दुष्ट मर्द दुष्ट औरतों के लिए, पवित्र औरतें पवित्र मर्दो के लिए हैं और पवित्र मर्द पवित्र औरतों के लिए हैं।"

(सूरह नूर-26) – दहेज की रस्म- दहेज जो असल में “जहेज़" है इसकी उत्पत्ति “जहज़’ जिसका मतलब है सामान की तैयारी। इसी शब्द से तजहीज़ का शब्द बना है जो मय्यित के लिए तकफ़ीन की वृद्धि के साथ इस्तेमाल होता है जिसका मतलब है मय्यित को क़ब्र में पहुंचाने के लिए सामान तैयार करना। जहेज़ उस सामान को कहते हैं जो दुल्हन को नया घर बनाने या बसाने के लिए मां-बाप की ओर से दिया जाता है।

विगत पन्नों में आप पढ़ चुके हैं कि परिवार की व्यवस्था को बनाने में अल्लाह तआला ने मर्दो को रक्षक या मुखिया बनाने की वजह यह बतायी है कि मर्द अपने परिवार (अर्थात पत्नी बच्चों) पर अपने माल ख़र्च करते हैं। (देखिए

सूरह निसा-33) जिसका मतलब यह है कि निकाह के बाद पहले दिन से ही घर बनाने और चलाने के सारे खर्च मर्द के ज़िम्मे हैं। नबी सल्ल० ने पति पत्नी के अधिकार निर्धारित करते हुए यह बात पत्नी के अधिकारों में शामिल कर दी है कि उसका भरण पोषण हर हाल में मर्द के जिम्मे है चाहे औरत कितनी ही मालदार क्यों न हो। ____ निकाह के समय शरीअत ने मर्द पर यह अनिवार्य किया है कि वह यथा सामर्थ औरत को “मेहर" अदा करे। यह भी इस बात का स्पष्ट सबूत है कि इस्लाम की निगाह में मर्द औरत पर खर्च करने का पाबन्द है और खर्च करने की पाबन्द नहीं।

ज़कात की अदाएगी में भी शरीअत ने इसी उसल को समक्ष रखा है। पति चूंकि क़ानूनी रूप से पत्नी के भरण पोषण का ज़िम्मेदार है अतः मालदार पति अपनी पत्नी को ज़कात नहीं दे सकता जबकि मालदार पत्नी अपने पति को इसलिए ज़कात दे सकती है कि वह क़ानूनी रूप से मर्द के खर्चों की ज़िम्मेदार नहीं। (बुख़ारी बाबुज़्ज़कात अलज्ज़ोज)

नबी करीम सल्ल० ने अपनी चार बेटियों की शादी की। इनमें से हज़रत उम्मे कुलसूम और हज़रत रुक़य्या रजि० को किसी प्रकार का दहेज देना साबित नहीं अलबत्ता हज़रत जैनब रजि० को हज़रत खदीजा रजि० ने अपना एक हार दिया था जो बदर वापस भिजवा दिया। हज़रत फ़ातिमा रजि० को हज़रत अली रज़िक ने मेहर में एक ढाल दी थी जिसे बेचकर नबी सल्ल० ने हज़रत फ़ातिमा रजि० को घर का ज़रूरी सामान पानी की मश्क, तकिया, एक चादर आदि बनाकर दिया। आपके इस काम से अधिक से अधिक यह बात साबित होती है कि यदि कोई व्यक्ति ग़रीब है तो औरत के मां-बाप यथा सामर्थ दामाद से सहयोग करने के लिए घर का बुनियादी और ज़रूरी सामान दे सकते हैं।

आजकल जिस प्रकार निकाह से पहले दहेज के लिए मांग होती है और फिर निकाह. के अवसर पर जिस प्रकार उसकी नुमाइश की जाती है शरअन इसके हराम होने में कोई सन्देह नहीं। अल्लाह का इर्शाद है- “अल्लाह किसी इतराने वाले और गर्व करने वाले व्यक्ति को पसन्द नहीं करता।” (लुक़मान-8) हदीस शरीफ़ में है नबी सल्ल० ने एक बड़ी शिक्षा प्रद घटना बयान की है जिसे इमाम मुस्लिम (रहिम०) ने रिवायत की है। नबी सल्ल० फ़रमाते हैं- “एक आदमी दो चादरें पहन कर अकड़ कर चल रहा था और दिल ही दिल में (अपने लिबास पर)

इतरा रहा था अल्लाह ने उसे धरती से धंसा दिया अब वह क़ियामत तक ज़मीन में धंसता चला जा रहा है।"

मां-बाप की अपनी इच्छा व ख़ुशी के बिना मजबूर करके उनसे दहेज़ बन वाना निश्चय ही असत्य तरीके से माल खाने के जैसा आता है जिसके बारे में अल्लाह का मुबारक इर्शाद है

“ऐ लोगो! जो ईमान लाए हो! एक दूसरे के माल ग़लत तरीकों से न खाओ।" (सूरह निसा-29) यदि किसी ने ज़बरदस्ती दहेज हासिल किया हो तो इस आयत के अनुसार वह पूरी तरह हराम है जिसे वापस लौटाना चाहिए या माफ़ कराना चाहिए।

एक हदीस शरीफ़ में नबी सल्ल० ने स्पष्ट रूप से यह इर्शाद फ़रमाया है“एक मुसलमान का खून उसका माल उसकी इज़्ज़त और आबरू दूसरे मुसलमान पर हराम है।"

__(मुस्लिम) ___ एक रिवायत में है कि- “जुल्म क़ियामत के दिन अंधेरा बन कर आएगा।"

(बुखारी) बेटी के मां-बाप से ज़बरदस्ती दहेज हासिल करना खुला जुल्म है। ऐसा जुल्म करने वालों को डरना चाहिए कि कहीं दुनिया के इस मामूली लालच के बदले में आख़िरत का बड़ा घाटा मोल न लेना पड़ जाए जहां अधिकारों की अदाएगी माल से नहीं कर्मों से होगी। कुरआन व हदीस के इन आदेशों के अलावा ऐसे दहेज़ की सांसारिक खराबियां इतनी अधिक हैं कि उनकी गणना संभव नहीं।

गरीब मां-बाप जो एक बेटी का दहेज़ बनाने की हैसियत न रखते हों उनके यहां यदि तीन या चार बेटियां हो जाएं तो उनके लिए वे एक बड़ा मसला बन जाती हैं मां-बाप की नींद हराम हो जाती है। मां-बाप क़र्ज़ लेकर दहेज़ बनाने पर मजबूर हो जाते हैं और वही निकाह जिसे शरीअत दो परिवारों के बीच मुहब्बत

और रहमत का साधन बनाना चाहती है आपसी नफ़रत, दुश्मनी और लड़ाई का कारण बन जाता है। यही बेटियां जिनके लालन पालन और निकाह पर जहन्नम से रुकावट की शुभ सूचना दी गयी है समाज की इस घृणित रस्म के कारण अशुभ और मुसीबत की निशानी बन जाती हैं। बेटियां अपनी जगह स्वयं यातना और हीन भावना का शिकार रहती हैं। एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार देश में एक करोड़ से अधिक लड़कियां शादी की प्रतीक्षा में बैठी हैं जिनमें

से चालीस लाख लड़कियों की शादी की उम्र गुज़र चुकी है मां-बाप अपनी बच्चियों के हाथ पीले करने की चिंता में बूढ़े हो चुके हैं।

जो लोग अधिक दहेज़ देने की स्थिति में हैं वे अधिक दहेज़ देने के बदले पति से उसकी हैसियत से अधिक मेहर का हक़ लिखा लेते हैं और यह समझते हैं कि इस तरह उनकी बेटी का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा यद्यपि पति पत्नी के रिश्ते की असल बुनियाद आपसी निष्ठा, वफ़ादारी और विश्वास है यदि यह न हो तो करोड़ों रुपया व माल भी इसका विकल्प नहीं बन सकते और यदि यह चीज़ मौजूद हो तो फ़ाक़ाकशी भी इस नाजुक रिश्ते को हिला नहीं सकती। अधिक दहेज़ देना और फिर अधिक मेहर लिखवाना पति पत्नी के आपसी रिश्ते को मज़बूत तो नहीं बनाता अलबत्ता दोनों के संबंधों में बाल अवश्य आ जाता है जो कभी कभी भविष्य में परेशानी का कारण बनता है।

दहेज़ की इस घृणित रस्म पर मुसलमानों को इस पहलू से भी विचार करना चाहिए कि हिन्दुओं के यहां बेटियों को विरासत में हिस्सा देने का क़ानून नहीं है अतः वे शादी के अवसर पर दहेज़ के रूप में अपनी बेटियों को अधिक सामान देकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश करते हैं। हिन्दुओं की देखा देखी मुसलमानों ने भी न केवल दहेज़ के मामले में बल्कि विरासत के मामले में भी हिन्दुओं जैसा तरीक़ा अपनाना शुरू कर दिया है। बहुत से लोग बेटियों को दहेज़ देने के बाद यह समझ लेते हैं कि उनका हक़े विरासत भी अदा कर दिया गया है यद्यपि यह सरासर शरीअत का उल्लंघन है और काफ़िरों का अनुसरण भी जिससे मुसलमानों को बचना चाहिए। . हम लड़कों के मां-बाप से यह विनती करना चाहते हैं कि समाज में इस ख़तरनाक नासूर को समाप्त करने के लिए पहला क़दम वही उठा सकते हैं और उन्हीं को उठाना चाहिए। कोई संदेह नहीं कि अल्लाह की प्रसन्नता के लिए दहेज़ की रस्म के विरुद्ध जिहाद करने वालों को अल्लाह अपने करम से दुनिया और आख़िरत में अपने अताह इनामों से नवाज़ दे और यह भी हो सकता है कि जुल्म से दहेज़ हासिल करने वालों को कल कलां स्वयं अपनी बेटियों के मामले में बहुत अधिक परेशानी का सामना करना पड़ जाए क्योंकि ख़ुदा का इर्शाद है- “ये तो ज़माने के उतार चढ़ाव हैं जिन्हें हम लोगों के बीच गर्दिश देते रहते हैं।"

(सूरह आले इमरान-140) निकाह के मसाइल हमारे व्यवहारिक जीवन में बड़ा महत्व रखते हैं। हमने

संभावित हद तक मसाइल और हदीस के ठीक होने के सिलसिले में विभिन्न उलमाए किराम से रहनुमाई हासिल करने का पूरा पूरा एहतेमाम किया है। फिर भी यदि कोई ग़लती रह गयी हो तो हमें अवश्य बताया जाए। ___ शुरू में यह किताब दो भागों में बंटी थी। निकाह के मसाइल 2. तलाक़ के मसाइल । किताब के पृष्ठ अधिक होने के कारण दोनों भागों को अलग अलग करना पड़ा। आशा है कि इससे किताब के लाभकारी होने पर इन्शाअल्लाह कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

___ सम्मान योग्य उलमाए किराम और अन्य हज़रात जिन्होंने खुले दिल से किताब की तैयारी में सहयोग दिया उन सबका दिल की गहराई से शुक्र अदा करता हूं और दुआ करता हूं कि अल्लाह उनको दुनिया और आख़िरत में अपने इनाम प्रदान करे। आमीन।

रब्बना तक़ब्बल मिन्ना इन्न क अन्तस्समीउल अलीम व तुब अलै न इन्न क अन्तत्तव्वाबुर्रहीम० ____ “ऐ हमारे पालनहार! हमारी सेवाएं कुबूल कर, बेशक तू सुनने वाला और जानने वाला है और हम पर करम की नज़र कर, बेशक तू बड़ा तौबा कुबूल करने वाला और दया करने वाला है।"

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