नबियों, वलियों और बुजुर्गों की क़ब्रों या मज़ारों पर चढ़ावा चढ़ाना, नज़र व नियाज़ या मन्नत मानना मना है

मसला 199. नबियों, वलियों और बुजुर्गों की क़ब्रों या मज़ारों पर चढ़ावा चढ़ाना, नज़र व नियाज़ या मन्नत मानना मना है।

عن طارق بن شهاب رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال : دخل الجنة رجل في ذباب ودخل النار رجل في ذباب ، قالوا : و كيف يا رسول الله صلى الله عليه وسلم ؟ قال : مر رجلان على قوم لهم صنم لا يجاوزه أحد حتى يقرب له شيئا . فقالوا لأحدهما قرب ، قال : ليس عندي شيء أقرب ، قالوا له : رب ولو ذبابا ، فقرب ذبابا فخلوا سبيله فدخل النار ، و قالوا : للاخر قرب ، فقال : ما كنت الأقرب لأحد شيئا دون الله عزوجل فضربوا عنقه فدخل الجنة . رواه أحمد

हज़रत तारिक़ बिन शहाब रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया “एक आदमी केवल मक्खी की वजह से जन्नत में चला गया और दूसरा जहन्नम में ।” सहाबा किराम रज़ि० ने अर्ज़ किया “या रसूलल्लाह सल्ल० !वह कैसे?” नबी अकरम सल्ल० ने फ़रमाया “दो आदमी एक क़बीले के पास से गुज़रे उस क़बीले का एक बुत था जिस पर चढ़ावा चढ़ाए बिना कोई आदमी वहां से नहीं गुज़र सकता था, अतएव उनमें से एक को कहा गया कि इस बुत पर चढ़ावा चढ़ाओ। उसने कहा “मेरे पास ऐसी । कोई चीज़ नहीं।” क़बीले के लोगों ने कहा “तुम्हें चढ़ावा ज़रूर चढ़ाना होगा, चाहे मक्खी ही पकड़कर चढ़ाओ ।” मुसाफ़िर ने मक्खी पकड़कर उसकी नज़र की। लोगों ने उसे जाने दिया और वह जहन्नम में दाख़िल हो गया। कबीले के लोगों ने दूसरे आदमी से कहा “तुम भी कोई चीज़ इस बुत की नजर करो।” उसने कहा “मैं अल्लाह तआला के नाम के अलावा किसी दूसरे के नाम का चढ़ावा नहीं चढ़ाऊंगा।” लोगों ने उसे क़त्ल कर दिया और वह जन्नत में चला गया।” इसे अहमद ने रिवायत किया है।1

मसला 200. नबियों, वलियों और बुजुर्गों की क़ब्रों के सामने सर झुकाकर खड़े होना या नमाज़ की तरह हाथ बांधकर खड़े होना, सज्दा करना या कोई और इबादत जैसे तवाफ़ आदि करना मना है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم أللهم لا تجعل قبري وثنا لعن الله قوما إتخذوا قبور أنبيائهم مساجد . رواه أحمد

हजरत अब हरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया या अल्लाह! मेरी क़ब्र को बुंत न बनाना। अल्लाह ने उन लोगों पर लानत की जिन्होंने अपने अंबिया की क़ब्रों को इबादतगाह बना लिया।” इसे अहमद ने रिवायत किया है।

عن قيس بن سعد رضی الله عنه قال أتيت الحيرة فرأيتهم يسجدون لمرزبان لهم فقلت لرسول الله صلى الله عليه وسلم أحق أن يسجد له فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت إني رأيت الحيرة فرأيتهم يسجدون لمرزبان لهم فأنت أحق أن يسجد لك، فقال لي: أرأبت لو مررت بقبري أ كنت تسجد له؟ فقلت: لا ، فقال : لا تفعلوا .رواه أبوداؤد

हजरत कैस बिन साअद रज़ि० कहते हैं मैं हैरा (यमन का शहर) आया तो वहां के लोगों को अपने हाकिम के सामने सज्दा करते देखा। मैंने ख्याल किया कि उसलल्लाह सल्ल० (इन हाकिमों के मुक़ाबले में) सज्दा के ज़्यादा हक़दार हैं। अतएव जब रसूलुल्लाह सल्ल० की ख़िदमत अक़दस में हाज़िर हुआ, तो अर्ज़ किया “या रसूलल्लाह सल्ल०! मैंने हैरा के लोगों को अपने हाकिम के सामने सज्दा करते देखा है यद्यपि आप सज्दा के ज़्यादा हक़दार हैं (अर्थात क्या हम आपको सज्दा न किया करें?)” रसूलुल्लाह सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया “अच्छा बताओ अगर मेरी क़ब्र पर तुम्हारा गुज़र हो तो क्या मेरी क़ब्र पर सज्दा करोगे?” मैंने अर्ज़ किया “नहीं।” नबी अकरम सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया ‘‘फिर अब भी मुझे सज्दा न करो।’ इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।

मसला 201. किसी नबी, वली या बुजुर्ग की क़ब्र या मज़ार पर उर्स या मेला आदि लगाना मना है।

मसला 202. मस्जिदे नबवी में हर नमाज़ के बाद दुरूद पढ़ने के लिए रसूलुल्लाह सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर हाज़िरी देने का आयोजन करना सही नहीं।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لا تتخذوا قبرى عيدا ولا تجعلوا بيوتكم قبورا و حيثما كنتم صلوا على فإن صلاتكم تبلغني. رواه أحمد وأبوداؤد

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया “मेरी क़ब्र को ईदगाह न बनाओ और अपने घरों को क़ब्रिस्तान न बनाओ और तुम जहां कहीं भी मुझ पर दुरूद भेजोगे मुझे पहुंचाया जाएगा। इसे अहमद, अबू दाऊद ने रिवायत किया है।

मसला 203. क़ब्रों या मज़ारों का मुजाविर बनना बरकत हासिल करने के लिए उन पर बैठना मना है।।

मसला 204. क़ब्र या मज़ार की तरफ़ मुंह करके या क़ब्रिस्तान में नमाज़ पढ़ना मना है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأن يجلس أحدكم على جمرة فتحرق ثيابه فتخلص إلى جلده خير له من أن يجلس على قبر . رواه مسلم

हुरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘किसी कब्र पर  बैठने से यह बेहतर है कि आदमी आग के अंगारे पर बैठ जाए जो उसके कपड़े कपड़े जलाकर खाल तक जला डाले।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

عن جابر رضي الله عنه قال نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجصص القبر و أن يبني عليه و أن يقعد عليه . رواه مسلم

हज़रत जाबिर रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने क़ब्र पक्की बनाने और क़ब्र पर बैठने से मना फ़रमाया है। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

मसला 205. कब्र या मज़ार पर जानवर ज़बह करना, खाना, मीठा, दूध या चावल आदि बांटना मना है।

عن أنس رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لا عقر في الإسلام. رواه أحمد و أبوداؤد قال عبد الرزاق : كانوا يعقرون عند القبر بقرة أو شاة

हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘इस्लाम में क़ब्र पर जानवर ज़बह करना मना है।” इसे अहमद और अबू दाऊद ने रिवायत किया है। अब्दुर्रज़ाक़ ने कहा “(अज्ञानता काल में) लोग क़ब्र के निकट गाय या बकरी ज़बह किया करते थे।”

मसला 206. बरकत हासिल करने, औलाद या शिफ़ा आदि हासिल करने की नीयत से क़ब्र या मज़ार पर बाल या धागा आदि बांधना मना है।

عن عبد الله بن حكيم رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من علق شيئا وكل إليه . رواه أحمد والحاكم

हज़रत अब्दुल्लाह बिन हकीम रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया “जिस व्यक्ति ने (जिस चीज़ से) कोई चीज़ लटकाई उस व्यक्ति की ज़िम्मेदारी उसी चीज़ के हवाले कर दी जाती है। इसे अहमद और हाकिम ने रिवायत किया है।

मसला 207. किसी नबी, वली या बुजुर्ग की क़ब्र या मज़ार की ज़ियारत करने के इरादे से सफ़र करना जाईज़ नहीं।

मसला 208. मस्जिदे हराम, मस्जिद अक़सा और मस्जिद नबवी की ज़ियारत करने या इन मसाजिद में नमाज़ पढ़कर ज़्यादा सवाब हासिल करने की नीयत से सफ़र करना जाइज़ है।

عن أبي سعيد ن الخدري رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لا تشد الرحال إلا إلى ثلاثة مساجد ، مسجد الحرام و مسجد الاقصی و مسجدي هذا . متفق عليه

हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया “तीन मसाजिद अर्थात मस्जिदे हराम, मस्जिद अक़सा और मस्जिदे नबवी के अलावा किसी जगह का सफ़र न किया जाए।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة في مسجدي هذا خير من ألف صلاة فيما سواه إلا المسجد الحرام . متفق عليه

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया मस्जिदे हराम के अलावा बाक़ी तमाम मसाजिद के मुक़ाबले में मेरी मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का सवाब हज़ार दर्जे ज़्यादा है। इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

عن قزعة رضي الله عنه قال أردت الخروج إلى الطور فسألت ابن عمر رضى الله عنهما فقال : أما علمت أن النبي صلى الله عليه وسلم قال : لا تشد الرحال إلا ثلاثة مساجد ، المسجد الحرام و مسجد النبي و المسجد الاقصی و دع عن الطور فلا تأته . رواه الطبرانی

हज़रत कुज़आ रज़ि० कहते हैं मैंने तूर (पहाड़) की ज़ियारत का इरादा लया, तो अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० से मसला मालूम किया, कहने लगे। या तुम्हें मालूम नहीं नबी अकरम सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया है कि अस्जिदे हराम, मस्जिदे नबवी और मस्जिद अक़सा के अलावा किसी दूसरी गह का (ज़ियारत के इरादे से) सफ़र न करो।” अतः “तूर” पर जाने का सादा छोड़ दो और वहां मत जाओ।” इसे तबरानी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : मदीना मुनव्वरा का सफ़र ज़ियारत मस्जिद नबवी ल०.के इरादे से करना चाहिए। अलबत्ता मदीना मुनव्वरा पहुंच कर क़ब्र बारक की ज़ियारत की नीयत करना जाइज़ है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *