Namaze Eid ke masail

NAMAZ-E-EID KE MASAIL

صلاة العيد

नमाज़ ईद के मसाइल

मसला 159. ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के लिए जाने से पहले कोई मीठी चीज़ खाना सुन्नत है।

। हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि० फ़रमाते हैं कि “रसूलुल्लाह सल्ल० ईदुल फ़ित्र के दिन खजूरें खाए बिना ईदगाह की तरफ नहीं जाते थे और नबी अकरम सल्ल० खजूरें ताक (अर्थात 1, 3, 5 या 7) खाते थे।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।’ | मसला 160. नमाज़ ईद के लिए पैदल जाना और वापस आना सुन्नत

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० फ़रमाते हैं नबी अकरम सल्ल० ईदगाह पैदल जाते और पैदल ही वापस तशरीफ़ लाते। इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है।

मसला 161. ईदगाह जाने और आने का रास्ता बदलना सुन्नत है।

हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि० फ़रमाते हैं “नबी करीम सल्ल० ईद के रोज़ ईदगाह में आने जाने का रास्ता तब्दील फ़रमाया करते थे।” इसे

  1. किताबुल ईदैन अध्याय अकल यौमुल फ़ित्र क़ब्ल खुरूज।
  2. सहीह सुनन इब्ने माजा, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 1071 ।

बुख़ारी ने रिवायत किया है।

मसला 162. नमाज़ ईद बस्ती से बाहर खुले मैदान में पढ़ना सुन्नत है।

मसला 163. नमाज़ ईद के लिए औरतों को भी ईदगाह में जाना चाहिए।

हज़रत उम्मे अतिया रज़ि० से रिवायत है कि “रसूलुल्लाह सल्ल० ने हुक्म दिया कि दोनों ईदों के दिन हम हैज़ वाली और पर्दा नशीन (अर्थात तमाम) औरतों को ईदगाह में लाएं ताकि वह मुसलमानों के साथ नमाज़ और दुआ में शिरकत करें। अलबत्ता हैज़ वाली औरतें नमाज़ न पढ़ें।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

मसला 146. नमाज़ ईद के लिए अज़ान है न इक़ामत।

हज़रत जाबिर बिन समरा रज़ि० कहते हैं “मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० के साथ एक दो बार नहीं कई बार ईदैन की नमाज़ अज़ान और इक़ामत के बिना पढ़ी।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

मसला 165. ईंदैन की नमाज़ में पहले नमाज़ और खुतबा देना मसनून

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० फ़रमाते हैं रसूलुल्लाह सल्ल० हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ि० और हज़रत उमर फ़ारुक रज़ि० नमाज़ ईदैन,

  1. किताबुल ईदैन अध्याय मन ख़ालिफ़ तरीक़ इज़ा रजा यौमुल ईद ।
  2. लुअलुउ वल मरजान, भाग 1, हदीस 511।
  3. मुख़्तसर सहीह मुस्लिम, लिल अलबानी, हदीस 427। ।

खुतबा से पहले अदा फ़रमाते थे। इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया

मसला 166. ईदैन की नमाज़ में बारह तकबीरें मसनून हैं पहली रकअत में क़िरात से पहले सात और दूसरी रकअत में क़िरात से पहले पांच तकबीरें कहनी चाहिएं।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० के आज़ाद करदा गुलाम हज़रत नाफ़ेअ रज़ि० कहते हैं “मैंने हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० के साथ ईदुल फ़ित्र व ईदुलअज़हा दोनों की नमाज़ पढ़ीं । हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० ने पहली रकअत में क़िरात से पहले सात तकबीरें और दूसरी रकअत में क़िरात से पहले पांच तकबीरे कहीं।” इसे मालिक ने रिवायत किया है।

मसला 167. नमाज़ ईद की ज़ाइद तकबीरों में हाथ उठाने चाहिएं।

हज़रत वाईल बिन हुजर रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० हर तकबीर के साथ हाथ उठाते थे। इसे अहमद ने रिवायत किया है।

मसला 168. खुतबा के दौरान ख़तीब का थोड़ी देर बैठना मसनून है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उबैदुल्लाह बिन अब्दुल्लाह बिन उतबा फ़रमाते हैं ईदैन में इमाम के दो खुतबे पढ़ना और बैठकर उन्हें अलग करना सुन्नत

  1. लुअलुउ वल मरजान, भाग 1, हदीस 509 ।
  2. किताबुस्सलात, अध्याय माजा फ़ी तकरीम वल कुरआन फ़ी सलातुल ईंदैन । .
  3. अरवाहुल गलील, लिल अलवानी, भाग 3, हदीस 641।

है। इसे शाफ़ी ने रिवायत किया है। – मसला 169. नमाज़ ईद से पहले या बाद कोई (नफ़िल या सुन्नत) नमाज़ नहीं।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ि० फ़रमाते हैं कि “नबी अकरम सल्ल० ने ईदुलअज़हा या ईदुल फ़ित्र के दिन (घर से निकलने) दो रकअत नमाज़ ईद अदा फ़रमाई और उससे पहले या बाद में कोई नमाज़ नहीं पढ़ी।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

मसला 170. ईदैन की नमाज़ देर से पढ़ना नापरन्दीदा है।

मसला 171. ईदुल फ़ित्र की नमाज़ का समय इशराक़ की नमाज़ का समय है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन बुसर रज़ि० से रिवायत है कि वह स्वयं ईदुल फ़ित्र या ईदुलअज़हा की नमाज़ के लिए लोगों के साथ ईदगाह रवाना हुए तो इमाम के देर करने पर नापसन्दगी व्यक्त की और फ़रमाया “हम तो इस समय नमाज़ पढ़कर फ़ारिग भी हो जाया करते थे और वह इशराक़ को समय था।” इसे अबू दाऊद और इब्ने माजा ने रिवायत किया है।

| मसला 172. ईदुल अज़हा की नमाज़ जल्द और ईदुल फ़ित्र की नमाज़ निसबतन देर से पढ़ना मसनून है।

  1. किताबुस्सलात, अध्याय फ़ी सलातुल ईदैन, हदीस 463।
  2. मुख़्तसर सहीह मुस्लिम, लिल अलबानी, हदीस 430 ।।
  3. सहीह सुनन इब्ने माजा, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 1005 ।

हज़रत अबुल हुवैरिस रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने नजरान के गवर्नर अम्र बिन हज़म रज़ि० को लिखित तौर पर यह हिदायत फ़रमाई ‘‘ईदुलअज़हा की नमाज़ जल्दी पढ़ लो और ईदुल फ़ित्र की नमाज़ देरी से पढ़ो और लोगों को खुतबा में नेकी की नसीहत करो।” इसे शाफ़ी ने रिवायत किया है।’

मसला 173. ईदगाह आते जाते अधिकता से तकबीरें पढ़ना सुन्नत है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० ईद के दिन सुबह सुबह सूरज निकलते ही ईदगाह तशरीफ़ ले जाते और ईदगाह तक तकबीरें कहते जाते। फिर ईदगाह में भी तकबीरें कहते रहते यहां तक कि जब इमाम खुतबे के लिए मिंबर पर बैठ जाता तो तकबीरें पढ़ना छोड़ देते। इसे शाफ़ी ने रिवायत किया है।

मसला 174. मसनून तकबीर के शब्द दर्जे जेल हैं।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० इमाम तशरीक़ (11-12-13 ज़िल हिज्जा) में यह तकबीरें पढ़ा करते अल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर लाइलाहाइल्लल्लाहु वल्लाहुअकबर अल्लाहुअकबर वलिल्लाहिलहम्द। इसे , इब्ने अबी शैबा ने रिवायत किया है।

मसला 175. ईदुल फ़ित्र की नमाज़ के लिए जाने से पहले और ईदुलअज़हा की नमाज़ पढ़ने के बाद कोई चीज़ खाना सुन्नत है।

  1. किताबुस्सलात, अध्याय फ़ी सलातुल ईंदैन, हदीस 442।।
  2. किताबुस्सलात, अध्याय फ़ी सलातुल ईंदैन, हदीस 445 ।।
  3. अरवाहुल गलील, लिल अलबानी 3/125।।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन बरीदा रज़ि० अपने बाप से रिवायत करते हैं कि नबी करीम सल्ल० ईदुल फ़ित्र के मौके पर नमाज़ के लिए जाने से पहले ज़रूर कुछ खा लिया करते और ईदुल अज़हा के मौके पर नमाज़े ईद पढ़ने से पहले कोई चीज़ नहीं खाया करते थे। इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। | मसला 176. अगर जुमे के रोज़ ईद आ जाए तो दोनों पढ़नी बेहतर हैं लेकिन ईद पढ़ने के बाद अगर जुमे की बजाए केवल नमाज़ ज़ोहर अदा की जाए तो भी सही है।

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० ने रसूलुल्लाह सल्ल० से रिवायत की है कि नबी अकरम सल्ल० ने फ़रमाया “तुम्हारे आज के दिन में दो ईदें (एक ईद दूसरा जुमा) इकट्ठी हो गई हैं जो चाहे उसके लिए जुमे के बदले ईद ही काफ़ी है लेकिन हम दोनों (अर्थात जुमा और ईद) अदा करेंगे। इसे अबू । दाऊद और इब्ने माजा ने रिवायत किया है। | मसला 177. बादल की वजह से शव्वाल का चांद दिखाई न दे और रोज़ा रख लेने के बाद मालूम हो जाए कि चांद नज़र आ चुका है तो रोज़ा खोल देना चाहिए।

मसला 178. अगर चांद की ख़बर ज़वाल से पहले मिले तो नमाज़े ईद इसी रोज़ अदा कर लेनी चाहिए। अगर ज़वाल के बाद ख़बर मिले तो नमाज़े ईद दूसरे रोज़ अदा की जाएगी।

हज़रत अबू उमैर बिन अनस रज़ि० अपने चचाओं से जो कि असहाब

  1. सहीह सुनन तिर्मिज़ी, लिल अलवानी, भाग 1, हदीस 447।।
  2. सहीह सुनन इब्ने माजा, लिल अलवानी, भाग 1, हदीस 1083 ।

नबी में से थे, रिवायत करते हैं कि कुछ सवार नबी अकरम रन्ल० की सेवा में हाज़िर हुए और गवाही दी कि उन्होंने पिछले दिन (शव्वाल का) चांद देखा है, अतएव रसूले अकरम सल्ल० ने सहाबा किराम रज़ि० को हुन्म दिया वह

रोज़ा तोड़ दें और फ़रमाया “कल सुबह (नमाज़े ईद के लिए) ईदगाह | आएं।’ इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।’

मसला 179. अगर किसी को ईद की नमाज़ न मिल सके या बीमारी की वजह से ईदगाह न जा सके तो इसे दो रकअत अकेले अदा कर लेना चाहिए। | मसला 180. गांव में नमाज़ ईद पढ़नी चाहिए।

$ 15; । हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि० ने अपने गुलाम इब्ने अबी ग़निया को ज़ाविया गांव में नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दिया तो इब्ने अबी गुनिया, ने हज़रत अनस रज़ि० के घर वालों और बेटों को जमा किया और सब ने शहर वालों की तकबीर की तरह तकबीर और नमाज़ की तरह नमाज़ पढ़ी।

इकरिमा रज़ि० ने कहा “गांव के लोग ईद के रोज़ जमा हों और दो रकअत नमाज़ पढ़े जिस तरह इमाम पढ़ता है।” और अता रहिम० ने कहा

जब किसी की नमाज़े ईद छूट जाए तो वह दो रकअत नमाज़ अदा कर ले।’ इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

मसला 181. ईदुल अज़हा की नमाज़ पढ़ने और खुतबा सुनने के बाद ताक़त रखने वाले पर कुर्बानी सुन्नत मोअक्किदा ह

  1. सहीह सुनन अबी दाऊद, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 1026।।
  2. किताबुल ईदैन ।

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया “जो आदमी कुर्बानी की ताक़त रखता हो फिर भी कुर्बानी न करे वह हमारी मस्जिद में न आए।” इसे हाकिम ने रिवायत किया है।’

मसला 182. कुर्बानी करने के शिष्टाचार।

हज़रत अनस रज़ि० फ़रमाते हैं रसूलुल्लाह सल्ल० ने दो सफेद और काले रंग के और सींगों वाले मैंढे ज़बह किए। मैंने देखा कि आप सल्ल० . अपना पांव उसकी गर्दन पर रखे हुए थे और “बिस्मिल्लाह अल्लाहुअकबर” पढ़कर अपने हाथ से ज़बह फ़रमा रहे थे। इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० कहते हैं नबी अकरम सल्ल० ने हुक्म दिया है कि “(जब कुर्बानी करो तो) छुरियां खूब तेज़ करो। जानवर से छिपाकर रखो। और जब ज़बह करने लगो तो जल्दी ज़बह करो।” इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया. है।

| मसला 183. एक साल की उम्र का भेड़ (या बकरी) का बच्चा कुर्बानी के लिए जाइज़ है।

हज़रत उक़बा बिन आमिर रज़ि० फ़रमाते हैं हमने रसूले अकरम सल्ल० के साथ भेड़ के एक साल के बच्चे की कुर्बानी दी। इसे नसाई ने

  1. तब वत्तहब, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 10791
  2. मिश्कातुल मसाबीह, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 1453।
  3. तग़ब वत्तहब, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 1083।

रिवायत किया है।’

मसला 184. गाय या ऊंट की कुर्बानी में सात आदमी शरीक हो सकते

हज़रत जाबिर रज़ि० फ़रमाते हैं कि हमें रसूलुल्लाह ने हुक्म दिया कि एक ऊंट या एक गाय में सात हिस्सेदार शरीक हो सकते हैं। इसे बुख़ारी.

और मुस्लिम ने रिवायत किया है। | मसला 185. घर के संरक्षक की तरफ़ से दी गई कुर्बानी सारे घर वालों की तरफ से काफ़ी है।

हज़रत अता बिन यसार रह० कहते हैं मैंने अबू अय्यूब अन्सारी रज़ि० से मालूम किया कि नबी अकरम सल्ल० के ज़माने में तुम लोग कुर्बानी किस तरह किया करते थे तो उन्होंने कहा कि रिसालत काल में हर आदमी अपनी तरफ से अपने घर वालों की तरफ से एक ही क़र्बानी किया करता था। इसे इब्ने माजा और तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

मसला 186. ईदुल अज़हा की नमाज़ से पहले अगर किसी ने जानवर ज़बह कर दिया तो वह कुर्बानी शुमार नहीं होगी

हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं नबी अकरम सल्ल० ने ईदुल अज़हा के रोज़ फ़रमाया ‘‘जिसने नमाज़ से पहले जानवर ज़बह कर दिया। उसे दोबारा

  1. सहीह सुनन नसाई, लिल अलबानी, भाग 3, हदीस 4080 ।।
  2. नैलुल औतार, किताबुल हज।
  3. सहीह सुनने इब्ने माजा, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 2546 ।

dckZनी देनी चाहिए।’ इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।’ । मसला 187. जिसने कुर्बानी देना हो वह ज़िल हिज्जा का चांद देखने के बाद कुर्बानी करने तक नाखून और बाल आदि न काटे।

हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० कहती हैं रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया जब कोई आदमी ज़िल हिज्जा की दसवीं (ईदुलअज़हा) को कुर्बानी देने का इरादा रखता हो तो अपने जिस्म के किसी भी हिस्से से बाल न काटे और न ही नाखून काटे।” इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है। । मसला 188. कुर्बानी का गोश्त जमा करना जाइज़ है।

हज़रत जाबिर रज़ि० फ़रमाते हैं कि हम कुर्बानी का गोश्त मिना में तीन दिनों से ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करते थे। बाद में रसूलुल्लाह सल्ल० ने हमें रुखसत दे दी और फ़रमाया “खाओ जमा करके भी रखो।” इसे बुख़ारी और मुस्लिम ने रिवायत किया है।

मसला 189. कुर्बानी से पहले कुर्बानी के जानवर को किसी कब्र या मज़ार का तवाफ़ करवाना सुन्नत से साबित नहीं। , मसला 190. नमाज़े ईद के बाद गले मिलना सुन्नत से साबित नहीं।

  1. लुअलुउ वल मरजान, भाग 2, हदीस 1282 ।
  2. सहीह सुनन इब्ने माजा, लिल अलबानी, भाग 1, हदीस 2548 ।
  3. लुअलुउ वल मरजान, भाग 2, हदीस 1289 ।

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