नीयत के मसाइल

Niyat Ke MAsail

मसला 1 : आमाल के अज्र व सवाब का दारोमदार नीयत पर है।

عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول إنما الأعمال بالنيات وإنما لكل امرئ ما نوى فمن كانت هجرته إلى دنيا يصيبها أو إلى امرأة ينكحها فهجرته إلى ما هاجر إليه ۔ رواه البخاری

हज़रत उमर बिन ख़त्ताब रज़ि० कहते हैं मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० को फरमाते हुए सुना है कि “आमाल का दारोमदार नीयतों पर है हर व्यक्ति को आमाल का बदला नीयत के मुताबिक़ मिलेगा जिसने दुनिया हासिल करने की नीयत से हिजरत की उसे दुनिया मिलेगी और जिसने किसी औरत से निकाह के लिए हिजरत की (उसे औरत ही मिलेगी) तो मुहाजिर की हिजरत का सिला वही है जिसके लिए उसने हिजरत की।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

عن أبي عبيدة بن محمد بن عمار بن ياسر عن أبيه قال أخذ المشرکون عمار بن یاسیر فلم يتركوه حتى سب النبي صلى الله عليه وسلم وذكر الھتهم بخير تركوه فلما اتی رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ما وراءك قال شر يا رسول الله ما ترکت حتى نلت منك و ذكرت الهتهم بخير قال كيف تجد قلبك قال مطمئنا بالإيمان قال إن عادوا فعد ۔ رواه البيهقي

हज़रत अबू उबैदा बिन मुहम्मद बिन यासिर रज़ि० अपने बाप से रिवायत करते हैं कि हज़रत अम्मार बिन यासिर रज़ि० को मुश्रिकों ने पकड़ लिया और उस वक़्त तक न छोड़ा (यानी सज़ा देते रहे) जब तक उन्होंने नबी अकरम सल्ल० को गाली न दी और उनके माबूदों का भलाई से उल्लेख न किया। जब हज़रत अम्मार रज़ि० रसूले अकरम सल्ल० की ख़िदमत में हाज़िर हए तो आपने पूछा, “क्या हुआ?’ हज़रत अम्मार रज़ि० ने अर्ज़ किया “बहुत बुरा हुआ या रसूलल्लाह! मुझे उस वक़्त तक नहीं छोड़ा गया जब तक मैंने

आप सल्ल० के बारे में नाज़ेबा कलिमात न कहे और उनके माबूदों की तारीफ़ नहीं की।” आप सल्ल० ने पूछा, “ अपने दिल की क्या कैफ़ियत महसूस करते हो?” हज़रत अम्मार रज़ि० ने अर्ज़ किया, “ईमान पर पूरी तरह मुत्मइन है तब आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया “अगर यह मुश्रिक दोबारा ऐसा करें तो तब भी ऐसा ही करना।” इसे बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم إن الله لا ينظرإلى صور کم وأموالكم ولكن ينظر إلى قلوبكم وأعمالكم ۔ رواه مسلم

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं रसूले अकरम सल्ल० ने फ़रमाया अल्लाह तआला तुम्हारी सूरतों और मालों को नहीं देखता बल्कि तुम्हारे दिलों (की नीयत) और आमाल देखता है।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

عن أبي الدرداء رضي الله عنه بلغ به النبي صلى الله عليه وسلم قال من أتى فراشه وهو ينوي أن يقوم يصلي من الليل فغلبته عيناه حتى أصبح كتب له ما نوى وكان نومه صدقة عليه من ربه عز وجل ۔ رواه النسائي

हज़रत अबू दाऊद रज़ि० को नबी अकरम सल्ल० की बात पहुंची कि आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया “जो व्यक्ति (रात को) अपने बिस्तर पर इस नीयत से लेटा कि उठकर तहज्जुद की नमाज़ पढ़ेगा। लेकिन उसकी आंखों पर नींद इस क़दर गालिब आ गई कि सुबह हो गई तो उसे उसकी नीयत का सवाब मिल जाएगा और उसकी नींद उसके रब की तरफ़ से उस पर सदक़ा शुमार होगी।” इसे नसाई ने रिवायत किया है।

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