Paigambar Ke Sadvaiwahaar Ke Kuch Darshan Part 3

पैग़म्बर के सद्व्यवहार के कुछ दर्शन

(14) अल्लाह का अधिक ज़िक्र करते थे, निरर्थक और बेकार बात नहीं करते थे, नमाज़ लम्बी करते थे और खुत्बा छोटा, और किसी विधवा या मिस्कीन के साथ चलकर उसकी आवश्यकता पूरी करने में कोई घृणा नहीं करते थे। (सुनन नसाई) 10. अधिक उपासनाः आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिव सल्लम रात को जाग कर नमाज़ पढ़ते थे यहाँ तक कि आपके दोनों पाँव फट जाते थे, इस पर आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने आप से पूछाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! आप ऐसा क्यों करते हैं? जबकि अल्लाह तआला ने आप के अगले और पिछले गुनाह माफ कर दिये हैं। आप ने फरमायाः “क्या मैं अल्लाह का शुक्र गुज़ार बन्दा न बनूँ?” (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 11. नम्रता और नर्म दिलीः अबू-हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: तुफैल बिन अम्र दौसी और उनके साथी पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आए और उन्हों ने कहाः ऐ अल्लाक के पैग़म्बर! कबीला दौस वालों ने अवहेलना और इन्कार किया है, आप उन पर बद्-दुआ (शाप ) कर दीजिए। इस पर कहा गया कि दौस क़बीला का अब सर्वनाश हुआ। तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहाः “ऐ अल्लाह तू दौस वालों को हिदायत (मार्ग दर्शन) प्रदान कर और उन्हें लेकर आ।” (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 12. अच्छी वेशभूषा : बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आकार दरमियाना था, दोनों कन्धों के बीच दूरी थी, बाल दोनों कानों की लुरकी तक पहुंचते थे। मैं ने आप को एक लाल जोड़ा पहने हुए देखा। मैं ने आप से अधिक सुन्दर कभी कोई चीज़ नहीं देखी। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 13. दुनिया से बे-रगबती (अरूचि): अब्दुल्लाह बिन मसूऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक चटाई पर सोए थे, आप उठे तो आप के पहलू में उसके निशानात थे, इस पर हम ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! क्या हम आप के लिए एक बिस्तर की व्यवस्था न कर दें? आप ने फरमायाः “मुझे दुनिया से क्या लेना देना, मैं तो दुनिया में उस सवार के समान हूँ जिसने एक पेड़ के नीचे विश्राम किया फिर उसे छोड़ कर चला गया।” (सुनन-त्रिमिज़ी) अम्र बिन हारिस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी वफात के समय न कोई दिर्हम छोड़ा न दीनार, न कोई गुलाम छोड़ा न कोई लौण्डी। आप ने केवल अपना सफेद खच्चर, हथियार और एक टुकड़ा ज़मीन छोड़ा जिसे आपने खैरात कर दिया। (सहीह बुखारी) 14. ईसार (परित्याग): अर्थात अपने ऊपर दूसरे को प्राथमिकता देना। सहल बिन सअद बयान करते हैं किः एक महिला एक बुर्दा (चादर ) लेकर आई। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने (सहाबा से ) कहाः “क्या तुम जानते हो कि बुर्दा क्या है?” आप से कहा गयाः जी हाँ, ये वह चादर होती है जिसके किनारे बेल बूटे बने होते हैं। उस महिला ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! मैं ने इसे

आप को पहनाने के लिए अपने हाथ से बुना है। चुनाँचे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे ले लिया, आप को इसकी आवश्यकता थी। कुछ देर बाद आप उसे पहने हुए हमारे पास आए तो कौम के एक आदमी ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! यह मुझे पहनने के लिए दे दीजिये। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “ठीक है”। इसके बाद कुछ देर आप मज्लिस में बैठे रहे, फिर घर वापस गए, चादर को लपेटा और उसे उस आदमी के पास भिजवा दिया। क़ौम के लोगों ने उस से कहाः तुम ने चादर माँग कर अच्छा नहीं किया, जबकि तुम अच्छी तरह जानते हो कि आप किसी साईल (मांगने वाले ) को खाली हाथ नहीं लौटाते हैं। उस आदमी ने कहाः अल्लाह की कसम मैं ने इसे केवल इस लिए माँगा है ताकि यह मेरे मरने के दिन मेरा कफन बन जाए। सहल कहते हैं, चुनाँचे वह चादर उनकी कफन बनी थी। (सहीह बुखारी) 15. ईमान की शक्ति और अल्लाह पर भरोसाः अबू-बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं: जब हम गार (सौर नामी गुफा ) में छुपे थे तो मैं ने मुश्रिकों के पावों को अपने सर के पास देखा और मैं बोल पड़ाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! अगर उन में से कोई आदमी अपने पावँ की तरफ निगाह करे तो हमें अपने पाँव के नीचे देख लेगा। इस पर आप ने फरमायाः “ऐ अबू-बक्र ऐसे दो आदमियों के बारे में तुम्हारा क्या विचार है जिनका तीसरा अल्लाह है”। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 16. कृपा और सहानुभूति (शफकत और रहम दिली) : अबू-कतादा बयान करते हैं: अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अबुल-आस की बेटी उमामा को अपने कन्धे पर उठाए हुए हमारे पास आए और नमाज़ पढ़ाई, जब आप रुकूअ में जाते तो उन्हें नीचे उतार देते और जब रुकूअ से उठते तो उन्हें दुबारा उठा लेते। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 17. सरलता और आसानीः अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि : पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमायाः “मैं नमाज़ शुरू करता हूँ और मेरा इरादा नमाज़ को लम्बी करने का होता है, लेकिन मैं बच्चे के रोने की आवाज़ सुन कर अपनी नमाज़ हल्की कर देता हूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ कि उसके रोने से उसकी माँ को कितनी परेशानी होगी”। (सहीह बुखारी व मुस्लिम ) 18. अल्लाह का डर और परहेज़गारी (संयम): अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “कभी-कभार मैं अपने घर वापस लौटता हूँ तो अपने बिछौने पर खजूर पड़ा हुआ पाता हूँ, मैं उसे खाने के लिए उठा लेता हूँ, फिर मैं डरता हूँ कि कहीं यह सदका (खैरात) का न हो, यह सोचकर मैं उसे रख देता हूँ।” (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 19. दानशीलता के साथ खर्च करनाः अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं किः इस्लाम लाने पर पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से जो कुछ भी मांगा गया आप ने उसे प्रदान कर दिया। वह कहते हैं: चुनांचे एक आदमी आप के पास आया तो आप ने उसे दो पहाड़ों के बीच चरने वाली बकरियों का रेवड़ प्रदान कर दिया, वह अपनी कौम के पास वापस लौट कर गया तो कहाः ऐ कौम के लोगो! इस्लाम ले आओ; क्योंकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इतनी बख्शिश (अनुदान ) देते हैं कि फाका का कोई डर नहीं होता है। (सहीह मुस्लिम) 20. आपसी सहयोग एंव सहायता प्रियताः आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से जब यह पूछा गया कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने घर में क्या किया करते थे? तो उन्हों ने कहाः अपने परिवार की सेवा-सहयोग में लगे रहते थे, और जब नमाज़ का समय हो जाता तो नमाज़ के लिए निकल पड़ते थे। (सहीह बुखारी) बरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने खन्दक के दिन पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप मट्टी ढो रहे थे यहाँ तक कि मट्टी से आपके सीने के बाल ढंक गये, और आप के बाल बहुत अधिक थे, इसी हालत में आप अब्दुल्लाह बिन रवाहा के यह रज्ज़ (लड़ाई में पढ़ी जाने वाली छंद) पढ़ रहे थेःऐ अल्लाह! अगर तू न होता तो हम हिदायत (मार्ग दर्शन) न पाते। न सदक़ा (खैरात) करते, न नमाज़ पढ़ते। अतः हम पर सकीनत (शान्ति ) नाज़िल कर।

और यदि हमारी मुठभेड़ हो तो हमारे पाँव जमा दे। दुश्मनों ने हम पर अत्याचार किया है। अगर वह हमें फितने में डालना चाहें गे तो हम इसका विरोध करें गे। बरा रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि आप इन्हें ज़ोर से पढ़ते थे। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 21. सच्चाई: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नी आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा आप के बारें में कहती हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नज़दीक झूठ से सर्वाधिक नापसन्दीदा (घृनास्पद ) कोई और आदत नहीं थी। एक आदमी अल्लाह के पैग़म्बर के पास झूठ बोलता था तो आप उसकी वह बात अपने दिल में लिए रहते थे यहाँ तक कि आप को यह पता न चल जाए कि उसने उस से तौबा कर ली है। (सुनन त्रिमिज़ी)

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