Paigambar Ke Sadvaiwahaar Ke Kuch Darshan Part 4

पैग़म्बर

के सद्व्यवहार के कुछ दर्शन

आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम अपने साथियों और अपने पास बैठने वालों से मुम्ताज़ और अलग-थलग होकर नहीं बैठते थे। आप के दुश्मनों तक ने भी आपकी सच्चाई की गवाही दी है। यह अबू-जल है जो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के सब से कट्टर दुश्मनों में से था, उसने एक दिन आप से कहाः ऐ मुहम्मद! मैं आप को झूठा नहीं कहता, किन्तु आप जो कुछ लेकर आए हैं और जिसकी दावत देते हैं, मैं उसका इन्कार करता हूँ। इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारीः

قد تعلم إنه يحتك الي يقولون فإنهم لا يكون ولكن الظالمين بآيات الله يجحدون » [الأنعام:۳۳)

“हम अच्छी तरह जानते हैं कि जो कुछ यह कहते हैं इससे आप दुखी होत हैं। सो यह लोग आप को नहीं झुठलाते, लेकिन यह ज़ालिम लोग तो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते हैं।” (सूरतुल-अन्आमः३३) २२. अल्लाह की हुर्मतों (धर्म-निषिध चीज़ों) का सम्मान : आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जब भी दो कामों की बीच चयन करने का अवसर दिया जाता तो आप वही काम चयन करते जो आसान हो, जब तक कि वह गुनाह का काम न होता। अगर वह गुनाह का काम होता तो आप उस से अति अधिक दूर रहते। अल्लाह की कसम आप ने कभी अपने नफ़्स (स्वार्थ ) के लिए बदला नहीं लिया, किन्तु अगर अल्लाह की हुर्मतों को पामाल किया जाता था तो आप अल्लाह के लिए अवश्य बदला लेते थे। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 23. प्रफुल्लता (हंसमुख चेहरा): अब्दुल्लाह बिन हारिस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अधिकतर तबस्सुम करने (मुसकुराने) वाला किसी को नहीं देखा। (सुनन त्रिमिज़ी) 24. अमानत दारी और प्रतिज्ञा पालनः पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अमानत दारी अपनी मिसाल आप (अनुपम ) थी। ये मक्का वाले जिन्हों ने उस समय जब आप ने अपनी दावत का एलान किया, आप से दुश्मनी का बेड़ा उठा लिया और आप पर और आप के मानने वालों पर अत्याचार किया, इनके और पैग़मगर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बीच इतनी दुश्मनी के बावजूद भी अपनी अमानतें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास ही रखते थे। यह अमानत दारी उस समय अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई जब इन्हीं मक्का वालों ने आप को हर प्रकार का कष्ट सहने के बाद मदीना की ओर हिज्रत करने पर विवश (मजबूर) कर दिया तो आपने अपने चचेरे भाई अली बिन अबू-तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु को यह आदेश दिया कि वह तीन दिन के लिए अपनी हिज्रत स्थगित कर दें ताकि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास (मक्का वालों की )जो अमानतें थीं उन्हें उनके मालिकों को वापस लौटा दें। (सीरत इब्ने-हिशाम ३/११) इसी प्रकार पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्रतिज्ञा पालन का एक प्रदर्शन यह है कि जब पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने सुहैल बिन अम्र से हुदैबिया के दिन सन्धि की अवधि (मुद्दत) पर समझौता कर लिया और सुहैल बिन अम्र ने जो शर्ते लगाई थीं उन में एक शर्त यह भी थी कि उसने कहाः हम में से जो भी आदमी – चाहे वह आप के दीन ही पर क्यों न हो – आपके पास जाता है तो आप उसे वापस कर देंगे और उसे हमारे हवाले कर देंगे। और इस शर्त के बिना सुहैल ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुलह करने से इन्कार कर दिया तो मोमिनों ने इसे नापसन्द किया और क्रोध प्रकट किया। चुनांचे उन्हों ने इसके बारे में बात चीत की। फिर जब सुहैल ने इस शर्त के बिना पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुलह करने से इन्कार कर दिया तो आप ने इस पर सुलह कर ली। अभी सुलह नामा लिखा ही जा रहा था कि सुहैल बिन अम्र के बेटे अबू-जन्दल बेड़ियों में जकड़े हुए आ गए। वह मक्का के निचले हिस्से से निकल कर आए थे। उन्हों ने अपने आप को मुसलमानों के बीच डाल दिया। यह देख कर अबू-जन्दल के बाप सुहैल ने कहाः ऐ मुहम्मद! यह पहला व्यक्ति है जिस के बारे में मैं आप से मामला करता हूँ कि आप इसे वापस कर दें। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहाः “इसको मेरे लिए छोड़ दो’। उसने कहाः मैं इसे आप के लिए नहीं छोड़ सकता। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने कहाः “नहीं इतना तो कर ही दो”। उसने कहाः मैं ऐसा नहीं कर सकता। अबु-जन्दल को इसका एहसास होगया, तो उन्हों ने मुसलमानों को उकसाते (जोश दिलाते) हुऐ कहाः “मुसलमानो! क्या मैं मुश्रिकों की ओर वापस कर दिया जाऊँ हालांकि मैं मुसलमान होकर आया हूँ? क्या तुम मेरी परेशानी नहीं देख रहे हो?” उन्हें अल्लाह के रास्ते में बहुत अधिक कष्ट दिया गया था। चुनाँचे पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने प्रतिज्ञा का पालन करते हुए उन्हें सुहैल बिन अम्र की ओर वापस कर दिया। (सहीह बुखारी)

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