Paigambar Ke Sadvaiwahaar Ke Kuch Darshan Part 5

पैग़म्बर

के सद्व्यवहार के कुछ दर्शन

पस पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अबू-जन्दल से फरमायाः “अबू-जन्दल! धीरज से काम लो और इस पर अल्लाह से पुण्य (अज्र व सवाब) की आशा रखो। अल्लाह तुम्हारे लिए और तुम्हारे साथ जो अन्य कमज़ोर मुसलमान हैं उन सब के लिए कुशादगी (आसानी) और कोई रास्ता अवश्य पैदा करेगा। हम ने इन लोगों से सुलह कर ली है और हमारे और इनके बीच अह्द व पैमान (प्रतिज्ञा) लागू हो चुका है और हम प्रतिज्ञा भंग (अहद शिकन) नहीं कर सकते” । (मुसनद अहमद) फिर पैगम्बर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम मदीना वापस तश्रीफ ले आए, तो कुरैश का अबू-बसीर नामी एक आदमी मुसलमान हो कर आ गया, तो कुरैश ने उसको वापस लेने के लिए दो आदमियों को भेजा, उन्हों ने कहाः आप ने हम से जो वादा किया था उसको पूरा कीजिये। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अबू-बसीर को उन दोनों आदमियों के हवाले कर दिया। 25. वीरता और बहादुरीः अली रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं ने बद्र के दिन देखा है कि हम पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आड़ लेते थे, और हमारे बीच आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बढ़ कर दुश्मन के करीब कोई नहीं था, उस दिन आप सब से अधिक बलवान और शक्तिशाली थे। (मुसनद अहमद) लड़ाई के मैदान से बाहर आप की बहादुरी और दिलेरी के बारे में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सब से अच्छे और सब से बड़े वीर-बहादुर थे। एक रात मदीना वाले घबराहट और दहशत के शिकार होगए और आवाज़ (शोर) की ओर निकले, तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन्हें रास्ते में वापस आते हुए मिले। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों से पहले ही आवाज़ की ओर पहुंच कर यह निरीक्षण कर चुके थे कि कोई खतरा नहीं है। उस समय आप अबू-तल्हा के बिना जीन के घोड़े पर सवार थे और गर्दन में तलवार लटकाए हुए थे,

और कह रहे थे: “डरो नहीं, डरो नहीं”। फिर आप ने कहाः “हम ने इस (घोड़े) को समुद्र पाया”, या आप ने यह कहा कि : “यह (घोड़ा) समुद्र है”। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) मदीना वाले आवाज़ का शोर सुनकर घबराहट के आलम में हक़ीक़त का पता लगाने के लिए बाहर निकलते हैं, तो रास्ते में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अकेले आवाज़ की ओर से वापस लौटते हुए मिलते हैं। आप उन्हें इतमिनान दिलाते हैं। आप एक ऐसे घोड़े पर सवार हैं जिसकी ज़ीन नहीं कसी गई थी; क्योंकि स्थिति का तकाज़ा था कि जल्दी की जाए। आप अपनी तलवार लटकाए हुए थे; क्योंकि उसके इस्तेमाल की आवश्यकता पड़ सकती थी। और आप ने उन्हें बताया कि आपके पास जो घोड़ा था वह समुद्र अर्थात बहुत तेज़ था, इसलिए आप ने मामले का पत लगाने के लिए अपने साथ लोगों के निकलने की प्रतीक्षा नहीं की। उहुद की लड़ाई में पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा किराम से परामर्श (सलाह-मशवरा) किया तो उन्हों ने लड़ाई करने की सलाह दी, और स्वयं पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की राय दूसरी थी, किन्तु आप ने उनके मशवरा को स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद में सहाबा को इस पर पछतावा हुआ क्योंकि आपकी चाहत दूसरी थी। अन्सार ने (आपस में ) कहा हम ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की राय को ठुकरा दिया। चुनाँचे वह लोग आप के पास आए और कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! आप को जो पसन्द हो वही कीजिए, उस समय आप ने फरमायाः “कोई नबी जब अपना हथियार पहन ले तो मुनासिब नहीं कि उसे उतारे यहाँ तक कि वह लड़ाई न कर ले”। (मुसनद अहमद) 26. दानशीलता और सखावतः इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं: अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सब से बढ़ कर सखावत का दरिया -अति दानी- थे, और आपकी सखावत का दरिया रमज़ान में उस समय सब से अधिक उफान पर होता था जब जिब्रील आप से मुलाकात करते थे, और जिब्रील आप से रमज़ान की हर रात में मुलाकात करते थे

और कुआन का दौर कराते थे, उस समय पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खैर की सखावत में तेज़ हवा से भी आगे होत थे। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) अबू-ज़र रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं: मैं मदीना के हर्रा (काले रंग की पत्थरेली ज़मीन ) में चल रहा था कि हम उहुद पहाड़ के सामने आगए, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहाः “ऐ अबू-ज़र”! मैं ने कहाः मैं हाज़िर हूँ ऐ अल्लाह के पैग़म्बर! आप ने फरमायाः “मुझे यह पसन्द नहीं है कि उहुद पहाड़ मेरे लिए सोना बन जाए और एक या तीन रात बीत जाए और उस में से मेरे पास एक दीनार भी बाकी रह जाए, सिवाए इसके कि मैं उसे कर्ज के लिए रख लूँ, सिवाए इसके कि मैं उसे अपने दायें, बायें और पीछे अल्लाह के बन्दों में बांट दूं।” (सहीह बुखारी) जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि : ऐसा कभी न हुआ कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कोई चीज़ मांगी गई हो और आप ने नहीं कह दिया हो। (सहीह बुखारी व सहीह मुस्लिम) 27. हया (शर्म): अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर्दे में रहने वाली कुंवारी औरत से भी अधिक हयादार (शर्मीले) थे, अगर आप कोई अप्रिय (नापसन्दीदा ) चीज़ देखते तो हमें आपके चेहरे से उसका पता चल जाता। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) 28. आजिज़ी व खाकसारी (नम्रता व विनीतता): पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सब से बढ़ कर ख़ाकसार (विनीत ) थे। आप की ख़ाकसारी और इकिसार का यह हाल था कि मस्जिद में दाखिल होने वाला आप को आपके साथियों के बीच पहचान नहीं पाता था। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु बयान करते हैं कि एक बार हम पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ मस्जिद में बैठे थे कि एक आदमी अपने ऊँट पर सवार अन्दर प्रवेश किया और उसे मस्जिद में बैठा कर बाँध दिया, फिर उन लोगों से कहाः तुम में से मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम कौन हैं? उस समय पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उनके बीच टेक लगाए हुए बैठे थे। तो हम ने कहाः यह टेक लगाए हुए गोरा आदमी..।” (सहीह बुख़ारी) इसलिए म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मिस्कीन, कमज़ोर और ज़रूरतमन्द के साथ जाकर उनकी ज़रूरतों को पूरी करने से उपेक्षा (घृणा ) नहीं करते थे, अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: मदीना की एक औरत जिसकी बुद्धि बराबर नहीं थी, उसने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आप से मेरी एक ज़रूरत है, आप ने कहाः “ऐ फलाँ की माँ ! तू जिस गली में चाहे मैं चल कर तेरी ज़रूरत पूरी करने के लिए तैयार हूँ।” चुनाँचे आप उसके साथ किसी गली (रास्ते ) में एकांत में मिले यहाँ तक कि वह अपनी ज़रूरत से फारिग हो गई। (सहीह मुस्लिम)

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