Paigambar Ke Sadvaiwahaar Ke Kuch Darshan Part 6

पैग़म्बर

के सद्व्यवहार के कुछ दर्शन

बुर्दबारी (सहनशीलता) और क्षमाः अनस बिन मालिक कहते हैं: मैं पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ चल रहा था और उस समय आप एक मोटी किनारी वाली नजरानी चादर ओढ़े हुए थे कि एक दीहाती आदमी ने उसे पकड़ कर बहुत ज़ोर से खींचा यहाँ तक कि मैं ने देखा कि ज़ोर से खींचने के कारण आप की गर्दन पर चादर के निशान पड़ गये। फिर उसने कहाः हे मुहम्मद, तुम्हारे पास अल्लाह का जो माल है उस में से मुझे भी कुछ दो। आप ने उसकी ओर मुड़ कर देखा और मुसकुरा दिया। फिर आप ने उसे कुछ माल देने का आदेश दिया। (सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम) आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बुर्दबारी और तहम्मल की एह अनुपम मिसाल जैद बिन सअना -वह एक यहूदी आलिम था- की हदीस है, उसने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को कुछ उधार दिया था जिसकी आप को कुछ मोअल्लफतुल-कुलूब (यानी नौ-मुस्लिम ) की ज़रूरतों को निपटाने के लिए आवश्यकता पड़ गई थी। जैद का कहना हैः अभी कर्ज की अदायगी के नियमित समय में दो या तीन दिन बाक़ी थे कि पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम एक अन्सारी आदमी के जनाज़ा में निकले, आप के साथ अबू-बक्र, उमर, उसमान और आपके के अन्य सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम की एक जमाअत थी। जब आप जनाज़ा पढ़ चुके तो एक दीवार के पास जा कर बैठ गए, तो मैं ने आप की कमीस का दामन पकड़ लिया और आप को भयानक चेहरे के साथ देखा फिर कहाः हे मुहम्मद! क्या तुम मेरा हक़ (कर्ज़ ) नहीं लौटाओ गे? अल्लाह की कसम मैं बनू अब्दुल-मुत्तलिब को टाल मटोल करने वाला नहीं जानता और मुझे तुम्हारे मेल जोल (मामले दारी ) का पता है। जैद का कहना है: मैं ने उमर बिन खत्ताब को देखा कि उनकी दोनों आँखें उनके चेहरे में गोल आसमान के समान घूम रही हैं, फिर उन्होंने मेरी तरफ निगाह की और कहाः ऐ अल्लाह के दुश्मन! क्या तू अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से ऐसी बात कर रहा है जो मैं सुन रहा हूँ और आप के साथ ऐसा व्यवहार कर रहा है जो मैं देख रहा हूँ? उस ज़ात की कसम जिसने आप को हक़ के साथ भेजा है अगर मुझे एक चीज़ के छूट जाने का डर न होता तो मैं अपनी इस तलवार से तेरी गर्दन उड़ा देता। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सुकून व इतमिनान से उमर को देख रहे थे। फिर आप ने फरमायाः “ऐ उमर! हम इस से कहीं अधिक ज़रूरत मंद दूसरी चीज़ के थे कि तुम मुझे अच्छी तरह कर्ज की अदायगी के लिए कहते और उसे अपने हक़ को अच्छी तरह से मांगने का हुक्म देते। ऐ उमर! इसे ले जाओ और इसका कर्ज वापस कर दो और तुम ने जो इसे भयभीत किया है उसके बदले २० सा और अधिक दे दो।” । जैद ने बयान कियाः चुनांचे उमर मुझे लेकर गए और मेरा कर्ज़ अदा किया और बीस साअ खजूर और अधिक दिया। मैं ने कहाः यह अधिक क्यों दे रहे हैं? उन्हों ने कहाः अल्लाह के पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मुझे आदेश दिया है कि मैं ने जो आप को डराया-धमकाया है उसके बदले कुछ अधिक दे दूँ। मैं ने कहाः ऐ उमर! क्या तुम मुझे पहचानते हो? उन्हों ने कहाः नहीं, अच्छा बताओ तुम कौन हो? मैं ने कहाः मैं जैद बिन सना हूँ। उन्हों ने कहाः वही यहूदियों का आलिम? मैं ने कहाः हाँ, वही विद्वान। उन्हों ने कहाः तू ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जो कुछ कहा और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ जो कुछ तुम ने किया तुझे इस पर किस चीज़ ने उभारा? मैं ने कहाः ऐ उमर, मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखते ही आप के चेहरे में नुबुव्वत (ईश्दूतत्व–पैग़म्बरी ) की सारी निशानियाँ पहचान लीं, केवल दो निशानियाँ आप के अन्दर जांचनी रह गई थीं; उनका तहम्मुल और बुर्दबारी उनकी जहालत से बढ़ कर होगी और उनके साथ जितना अधिक जहालत से पेश आया जाए गा वह उतना ही अधिक बुर्दबारी और तहम्मुल से पेश आयेंगे। अब मैं ने इन दोनों निशानियों को भी जाँच लिया। ऐ उमर, मैं तुम्हें गवाह बनाता हूँ कि मैं अल्लाह को अपना रब (पालनहार ) मान कर, इस्लाम को अपना धर्म मान कर और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अपना ईश्दूत (पैग़म्बर ) मान कर प्रसन्न हो गया। और मैं तुम्हें गवाह बनाता हूँ कि मेरा आधा धन – और मैं मदीना में सबसे अधिक धनी हूँ- मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत (समुदाय ) पर खैरात है। उमर ने कहाः बल्कि उनमें से कुछ लोगों पर, क्योंकि तुम्हारा धन उन सब के लिए काफी (पर्याप्त) नहीं होगा। मैं ने कहाः बल्कि उन में से कुछ लोगों पर। फिर उमर और जैद पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास लौट कर आए तो जैद ने कहाः मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई इबादत का योग्य नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसके बन्दा (उपासक) और पैग़म्बर हैं। इस प्रकार वह ईमान ले आया, आप को सच्चा मान लिया और पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ बहुत सी जंगों में उपस्थित रहा, फिर तबूक के जंग में आगे बढ़ते हुए शहीद होगए,

अल्लाह तआला जैद पर रहमतों की वर्षा करे। (सहीह इब्ने हिब्बान) पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की क्षमा और माफी का सब से बड़ा उदाहरण यह है कि जब आप मक्का में विजेता बन कर दाखिल हुए और आप के सामने मक्का के वह लोग पेश हुए जिन्हों ने आपको नाना प्रकार की तकलीफें (यातनाएं ) पहुंचाई थीं और जिनके कारण आपको अपने शहर से निकलना पड़ा था, तो आप ने उस समय जब वह मस्जिद में एकत्र हुए उनसे कहाः “तुम्हारा क्या ख्याल है मैं तुम्हारे साथ क्या करने वाला हूँ? उन्होंने कहाः अच्छा ही, आप करम करने वाले भाई हैं और करम करने वाले भाई के बेटे हैं। आप ने फरमायाः “जाओ तुम सब आज़ाद हो !” (सुनन बैहक़ी अल-कुब्रा) 31. सब्र (धैर्य) : पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सब्र और तहम्मुल के पैकर थे। चुनांचे अपनी दावत शुरू करने से पहले आप की कौम जो काम करती थी और बुतों की पूजा करती थी उस पर सब्र करते थे, और अपनी दावत का आरम्भ करन के बाद अपनी क़ौम की ओर से मक्का में जो नाना प्रकार की कठिनाईयाँ और परेशानियाँ झेलनी पड़ी उन पर सब्र किया और उस पर अल्लाह के पास अच्छे बदले की आशा रखी। उसके बाद मदीना में मुनाफिकों (द्वय वादियों ) के साथ सब्र से काम लिया। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने रिश्तेदारों और प्रिय लोगों की वफात पर सब्र का आदर्श थे; आपकी बीवी ख़दीजा की मृत्यु होगई, फातिमा के सिवाय आपके सारे बाल-बच्चे आप के जीवन ही में मर गए, आपके चचा अबू-तालिब और हमज़ा का देहान्त हो गया; इन तमात हालतों में आप ने सब्र से काम लिया और अल्लाह तआला से पुण्य की आशा रखी। अनस बिन मालिक कहते हैं: हम पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ अबू-सैफ लोहार के पास गए। उसकी बीवी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बेटे इब्राहीम को दूध पिलाती थी। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इब्राहीम को लिया, उनको चुंबन किया और सँघा। इसके बाद फिर हम अबू-सैफ के पास गए, उस समय इब्राहीम की जान निकल रही थी। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आँखों से आँसू बहने लगे। इस पर अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर, आप भी (रो रहे हैं )!! आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “ऐ इब्ने औफ, यह रहमत और शफकत के आँसू हैं”। इसके बाद फिर उन्होंने कहा तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “आँख आँसू बहाती है, दिल दुखी है और हम केवल वही कहते हैं जो अल्लाह को पसन्द है। ऐ इब्राहीम, हम तेरी जुदाई पर दुखी है”। (सहीह बुख़ारी) 32. अद्ल और इन्साफ (न्याय) : पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने जीवन के तमाम मामलों में न्याय करने वाले थे, अल्लाह की शरीअत (कानून) को लागू और नाफिज़ करने में इन्साफ से काम लेते थे। आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं: मखजूमी औरत का मामला जिसने चोरी की थी कुरैश के लिए महत्वपूर्ण बन गया तो उन्हों ने आपस में कहाः इस के बारे में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कौन बात करेगा? उन्होंने कहाः पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चहेते उसामा बिन ज़ैद के सिवा इसकी हिम्मत कौन कर सकता है। उसामा ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इस बारे में बात की तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “क्या तुम अल्लाह के एक हद (धार्मिक दण्ड) के बारे में सिफारिश करते हो !!” फिर आप खड़े हुए और खुत्बा (भाषण) देते हुए फरमायाः “तुम से पहले के लोग इस कारण तबाह कर दिए गए कि जब उनके अन्दर कोई शरीफ (खानदान वाला) चोरी करता था तो उसे छोड़ देते थे और अगर उनके अन्दर कोई नीच आदमी चोरी करता था तो उस पर हद (दण्ड) लगाते थे। अल्लाह की कसम! अगर मुहम्मद की बेटी फातिमा भी चोरी करे तो मैं उसका हाथ काट दूंगा”। (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम ) पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने नफ्स से बदला लेने में भी न्याय करने वाले थे, उसैद बिन हुजैर कहते हैं: एक अन्सारी आदमी लोगों से बात कर रहा था और वह कुछ मनोरंजक आदमी था, इस बीच कि वह लोगों को अपनी बातों से हंसा रहा था पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसकी कमर पर एक लकड़ी से मार दिया, तो उसने कहा मुझे बदला दीजिए, आप ने कहाः “बदला ले लो” उसने कहाः आप कमीस पहने हुए हैं और मैं बिना कमीस के हूँ, इस पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी कमीस उठा दी, तो वह आप से चिमट गया और आपके पहलू (पेट ) को चूमने लगा, और कहाः ऐ अइल्लाह के पैग़म्बर! मैं यही चाहता था। (सुनन अबू दाऊद) 33. अल्लाह का डर और खौफः पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लोगों में सब से अधिक अल्लाह से डरने वाले और उसका खौफ रखने वाले थे। अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझ से फरमायाः “मुझे कुरआन पढ़ कर सुनाओ”। मैं ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर, मैं आप को कुरआन पढ़ कर सुनाऊँ जबकि वह आप ही पर उतरा है!? आप ने कहाः “हाँ,” तो मैं ने आप को सूरतुन-निसा पढ़ कर सुनाई यहाँ तक कि मैं इस आयत पर पहुँचाः

فكيف إذا جئنا من كل أمني بشهيد وجئنا بك على

 “पस क्या हाल होगा जिस समय कि हम हर उम्मत में से एक गवाह लायें गे और आप को इन लोगों पर गवाह बनाकर लायें गे।” (सूरतुन-निसाः४१ ) आप ने फरमायाः “बस अब काफी है”। मैं ने आप की ओर देखा तो आप की दोनों आँखों से आँसू बह रहे थे।

(सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम ) आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब आसमान पर गहरे बादल देखते तो कभी आगे होते कभी पीछे होते, कभी अन्दर दाखिल होते और कभी बाहर निकलते और आप का चेहरा बदल जाता। जब बारिश होजाती तो आप इत्मिनान की साँस लेते। आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने आप से इसका कारण पूछा तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “मुझे क्या मालूम कि शायद वह ऐसे ही हो जैसे कि एक कौम ने कहा थाः

فلما رأوه عارضا مستقبل أوديتهم قالوا ها عارض ممطرنا بل هو ما استعجلثم به ريح فيها عذاب أليم ) الأحقاف:۲۶]

“फिर जब उन्हों ने बादल के रूप में अज़ाब को देखा अपनी घाटियों की ओर आते हुए तो कहने लगे, यह बादल हम पर बरसने वाला है, (नहीं ) बल्कि दरअसल यह बादल वह (अज़ाब ) है जिस की तुम जल्दी मचा रहे थे, हवा है जिस में दर्दनाक (कष्ट दायक ) अज़ाब है”। (सूरतुल-अहकाफः२४) (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम) 34. कनाअत -सन्तोष- और दिल की बेनियाजीः उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: मैं पैगम्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया तो मैं ने आप को एक चटाई पर पाया जिसके और आपके बीच कोई चीज़ नहीं थी (चटाई पर कोई चीज़ नहीं बिछी थी) और आपके सिर के नीचे चमड़े का एक तकिया था जो खजूरके पेड़ की छाल से भरा हुआ था और आप के पैर के पास चमड़े का एक पानी का बर्तन था और आपके सिर के पास कुछ कपड़े टंगे हुए थे। मैं ने चटाई का निशान आप के पहलू में देखा तो रो पड़ा। आप ने कहाः तुम क्यों रो रहे हो? मैं ने कहाः ऐ अल्लाह के पैग़म्बर, कैसर और किस्रा इस दुनिया का आनन्द ले रहे हैं और आप अल्लाह के पैगम्बर हैं (और आपकी यह हालत है!) आप ने कहाः “क्या तुम्हें यह पसन्द नहीं कि उनके लिए दुनिया हो और हमारे लिए आख़िरत की नेमतें हों।” (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम) 35. तमाम लोगों यहाँ तक कि अपने दुश्मनों का भी भला चाहते थे: पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीवी आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा कहती हैं: मैं ने पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा कि क्या आप पर कोई ऐसा दिन भी आया है जो उहुद के दिन से भी अधिक कठिन रहा हो? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “मुझे तुम्हारी कौम की ओर से जिन जिन मुसीबतों का सामना हुआ वह हुआ ही, और उन में से सब से कठिन मुसीबत वह थी जिस से मैं घाटी के दिन दो चार हुआ, जब मैं ने अपने आप को अब्द-यालील पुत्र अब्द-कुलाल के बेटे पर पेश किया, किन्तु उसने मेरी बात न मानी तो मैं दुख से चूर, गम से निढाल अपनी दिशा में चल पड़ा और मुझे कर्नुस-सआलिब नामी स्थान पर पहुँच कर ही इफाका हुआ। मैं ने अपना सिर उठाया तो क्या देखता हूँ कि बादल का एक टुकड़ा मुझ पर छाया किए हुए है। मैं ने ध्यान से देखा तो उसमें जिबील थे। उन्हों ने मुझे पुकार कर कहाः आप की कौम ने आप से जो बात कही और आप को जो जवाब दिया अल्लाह ने उसे सुन लिया है। उसने आप के पास पहाड़ का फरिश्ता भेजा है ताकि आप उनके बारे में उसे जो आदेश चाहें, दें। उसके बाद पहाड़ के फरिश्ते ने मुझे आवाज़ दी और मुझे सलाम करने के बाद कहाः ऐ मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! बात यही है, अब आप जो चाहें, अगर आप चाहें कि मैं इन को दो पहाड़ों के बीच कुचल दूँ (तो ऐसा ही होगा )। पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “नहीं, बल्कि मुझे आशा है कि अल्लाह तआला इनकी पीठ से ऐसी नस्ल पैदा करे गा जो केवल एक अल्लाह की इबादत (उपासना ) करे गी और उसके साथ किसी चीज़ को साझी नहीं ठहराए गी।” (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम) इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा कहते हैं: जब अब्दुल्लाह बिन उबय बिन सलूल की मृत्यु होगई तो उसका बेटा अब्दुल्लाह, पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आया और आप से आप की कमीस मांगी ताकि उसमें अपने बाप को कफनाए तो आप ने उसे अपनी कमीस दे दी। फिर उसने आप से निवेदन किया कि उसका जनाज़ा पढ़ा दें तो पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसका जनाज़ा पढ़ाने के लिए तैयार हो गये। इस पर उमर रज़ियल्लाहु अन्हु खड़े हुए और आप के कपड़े को पकड़ कर कहाः ऐ अल्लाह के पैगम्बर! (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) आप उसका जनाज़ा पढ़ाये गे जबकि अल्लाह तआला ने आप को उस पर जनाज़ा पढ़ने से रोक दिया है? पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः “अल्लाह तआला ने मुझे छूट दिया है, फरमायाः

استغفر لهم أو تستغفر لهم إن تستغفر لهم سبعين

 “आप उनके लिए क्षमा याचना करें या क्षमा याचना न करें, अगर आप उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा याचना करें…” (सूरतुत-तौबाः८०) और मैं सत्तर से भी अधिक बार क्षमा याचना करूँगा”। उन्हों ने कहाः यह मुनाफिक है। चुनांचे आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसका जनाज़ा पढ़ा और इस पर अल्लाह तअला ने यह आयत उतारीः

ولا صل على أكبر منهم مات أبدا ولا تقم على قبره )

 “उन में से जो मर जाए आप उस पर कभी भी जनाज़ा न पढ़ें और न ही उसकी कब्र पर खड़े हों”। (सूरतुत-तौबाः८४) (सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम)

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