Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 1

क़ब्र में नमाज़ी की शान :

नमाज़ इस्लाम का दूसरा रुक्न है और उसकी श्रेष्ठता के बारे में रसूले अकरम (सल्ल.) से बहुत सी अहादीस मरवी हैं। आप (सल्ल.) का इरशादे मुबारक है : “दिन में पांच बार गुस्ल करने वाला आदमी जिस तरह मेल कुचेल से साफ़ हो जाता है उसी तरह पांच बार नमाज़ पढ़ने वाला आदमी गुनाहों से पाक साफ़ हो जाता है।” (हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम) दूसरी हदीस मे है कि पांच नमाजें पढ़ने वालों से अल्लाह तआला ने जन्नत का वायदा फ़रमाया है। (हदीस : अहमद, अबू दाऊद) रसूले अकरम (सल्ल0) ने नमाज़ को अपनी आँखों की ठंडक क़रार दिया है। (हदीस : अहमद, नसाई) कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने कामयाब लोगों की निशानी यह बताई है कि वे अपनी नमाज़ों की हिफ़ाज़त करने वाले हैं। (सूरह मोमिनून, आयत 9) नमाज़ की एहमियत को देखते हुए आप (सल्ल0) की हयाते तय्यिबा (पवित्र जीवन) की आखिरी वसीयत नमाज़ ही के बारे में थी…..कि “लोगो! नमाज़ की हिफ़ाज़त करना और अपने गुलामों का ख्याल रखना।” .

(हदीस : इब्ने माजा) बरज़ख़ी ज़िंदगी में नमाज़ की श्रेष्ठता का एक बड़ा ही मुनफ़रद और अहम पहलू हमारे सामने आता है। रसूले अकरम (सल्ल0) ने फ़रमाया कि जब मुंकर नकीर मोमिन को क़ब्र में उठाकर बिठा देते हैं तो उसे सूरज अस्त होता दिखाया जाता है और उसके बाद मुंकर नकीर और मोमिन आदमी के बीच नीचे लिखा दिलचस्प मुकालिमा होता है :

मुंकर नकीर : जो व्यक्ति तुम्हारे बीच भेजे गए थे उनके बारे में तुम्हारा अक़ीदा क्या है?

मोमिन : ज़रा हटो, (पहले) मुझे नमाज़ पढ़ने दो। मुंकर नकीर : नमाज़ फिर पढ़ लेना, पहले हमारे सवालों का जवाब दो।

मोमिन : उस व्यक्ति (अर्थात हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) के बारे में तुम मुझसे क्या पूछना चाहते हो?

मुंकर नकीर : जो कुछ हम पूछ रहे हैं उसका जवाब दो।

मोमिन : ज़रा हटो, (पहले) मुझे नमाज़ पढ़ने दो। मुंकर नकीर : नमाज़ फिर पढ़ लेना, पहले हमारे सवालों के जवाब दो। मोमिन : तुम मुझसे (बार-बार) किस चीज़ के बारे में पूछ रहे हो?

मुंकर नकीर : हमें बताओ, जो व्यक्ति तुम्हारे बीच थे (अर्थात हज़रत मुहम्मद सल्ल०) उनके बारे में तुम्हारा अक़ीदा क्या था, उनके बारे में तुम्हारी गवाही कैसी है?

मोमिन : मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद (सल्ल०) अल्लाह के बन्दे हैं और मैं गवाही देता हूं कि वह अल्लाह की तरफ़ से हक़ लेकर आए।

मुंकर नकीर : तुमने इसी अक़ीदे पर ज़िंदगी गुज़ारी, इसी पर मरे और इंशाअल्लाह इसी पर (क़यामत के दिन) उठोगे।’ ___ मुंकर नकीर और मोमिन आदमी की आपसी बातचीत के शब्द ध्यान से पढ़िए और फिर अंदाज़ा लगाइए कि एक तरफ़ नामानूस ग़ैर इंसानी मख्लूक, डरावनी शक्लें, कड़कती गरजती आवाज़, एकान्त, अंधेरा, बन्द जगह और दूसरी तरफ़ नमाज़ी की यह शान कि घबराहट का नाम व निशान तक नहीं, गुफ़्तुगू में इत्मीनान और वक़ार उस ग़ज़ब का जैसे किसी आक़ा के सामने उसके नौकर खड़े हों जो बार बार कोई बात पूछ रहे हों और आका उनकी परवा किए बिना किसी दूसरे अहम काम में मग्न हो!

सुब्हानल्लाह! क़ब्र में नमाज़ी आदमी का यह वक़ार, इत्मीनान और बेख़ौफ़ी सिर्फ और सिर्फ़ नमाज़ की बरकत से होगी जिस पर दुनिया में वह उस सख्ती से पाबन्द रहा होगा कि क़ब्र में सूरज अस्त होता देखते ही हर प्रकार के भय और घबराहट से बेनियाज़ होकर नमाज़ की फ़िक्र में लग जाएगा और फ़रिश्तों के बार बार इसरार के बावजूद उनकी तरफ़ ध्यान नहीं देगा। नमाज़ी आदमी स्वयं जब यह महसूस करेगा कि यह आलमे बरज़न है और यह नमाज़ की जगह नहीं तो फिर फ़रिश्तों की तरफ़ मुतवज्जह होकर इत्मीनान से उनके सवाल का जवाब देगा।

इससे पहले आप क़ब्र के अज़ाब से बचाने वाले कर्मों में यह तो पढ़

  1. मुस्तदरक हाकिम (1/1443)।

ही चुके हैं कि नमाज़ भी उन कर्मों में से है जो क़ब्र में इंसानों की हिफ़ाज़त करेंगे इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि क़यामत से पहले ही नमाज़ अपने पढ़ने वालों के लिए कितनी बाइसे रहमत और आराम व सुकून साबित होगी। हुवल अज़ीजुल जब्बारुल मुतकब्बिर :

किताब व सुन्नत से लाइल्मी और जिहालत ने हमारे यहां कमज़ोर अक़ाइद का इतना बड़ा जाल फेला रखा है कि दाएं बाएं आगे पीछे हर तरफ़ शिर्क ही शिर्क नज़र आता है। बुजुर्गों और वलियों के नाम से ऐसे ऐसे अक़ीदे और घटनाएं मंसूब कर दी गई हैं कि सारी कायनात में अल्लाह सुब्हानहू व तआला की तौहीद और अंबिया की रिसालत की तो कहीं गुंजाइश ही नज़र नहीं आती।

इन अक़ीदों के मुताबिक़ बुजुर्गों और वलियों का दखल, मुश्किलकुशाई और हाजतरवाई का सिलसिला केवल इस दुनिया में ही नहीं बल्कि आलमे बरज़न और आख़िरत में भी कायम है आलमे बरज़ज़ तक पहुँच से मुताल्लिक़ अक़ाइद की कुछ मिसालें पेश हैं :

(1) महीउद्दीन इब्ने अरबी को बादशाह ने कहला जा “मेरी लड़की बीमार है आप आकर इयादत करें तो शायद आपकी बरकत से शिफ़ा हो।’ महीउद्दीन इब्ने अरबी ने आकर कहा “इज़राईल तो रूह क़ब्ज़ करने आ गया है।’ बादशाह आपके क़दमों पर गिर पड़ा और कहा “इसका इलाज आपके हाथ में है।” इब्ने अरबी ने इज़राईल से कहा “ठहरो! हम अपनी लड़की

म्हारे साथ र मना कर देते हैं।” चुनांचे घर आए, दरवाज़े की तरफ़ मुंह करके फ़रमाया “इज़राईल ! यह लड़की हाज़िर है लड़की उसी समय ज़मीन पर गिरी और मर गई। बादशाह की लड़की अच्छी हो गई।

इस घटना से निम्न बातें मालू. होती हैं : 1. हज़रत इज़राईल अल्लाह तआला के बजाए औलिया-ए-किराम के

__1. मुर्शिद कामिल, तर्जुमा हदाइक़ अख्बार अज़ सादिक़ ख़ानी, स० 23 ।

अहकाम पर अमल करने के पाबन्द हैं।

  1. ज़िंदगी और मौत पर औलिया किराम का पूरा पूरा इख्तियार है। — 3. औलिया किराम अल्लाह तआला के फैसलों को बदलने की पूरी कुदरत रखते हैं।

(2) हज़रत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के पड़ोसियों में से किसी ने इंतिक़ाल किया आप जनाज़े के साथ गए लोग दफ़न करके वापस पलट गए ‘और ख्वाजा वहां ठहर गए। शैखुल इस्लाम क़ुतबुद्दीन फ़रमाते हैं मैं आपके साथ था मैंने देखा कि अचानक आपका रंग मुतग़य्यर हुआ फिर उसी समय बरक़रार हो गया जब आप वहां से खड़े हुए तो फ़रमाया “अलहम्दुलिल्लाह! बैअत बड़ी अच्छी चीज़ है।” शैखुल इस्लाम क़ुतबुद्दीन ने वजह पूछी तो आपने फ़रमाया “जब लोग इसको दफ़न करके चले गए तो मैंने देखा कि अज़ाब के फ़रिश्ते आए और चाहा कि उसको अज़ाब दें उसी समय शैख़ उसमान हारूनी (ख्वाजा साहब के मरहूम पीर) हाज़िर हुए और (फ़रिश्तों से). कहा यह व्यक्ति मेरे मुरीदों में से है इधर फ़रिश्तों को फ़रमान हुआ (कहो) कि “यह तुम्हारे ख़िलाफ़ था।” ख्वाजा ने फ़रमाया “बेशक ख़िलाफ़ था लेकिन अपने आपको इस फ़क़ीर के पल्ले बांध रखा था मैं नहीं चाहता कि

इस पर अज़ाब किया जाए।” फ़रमान हुआ “ऐ फ़रिश्तो! शैख़ के मुरीद से – हाथ उठाओ मैंने इसको बख़्श दिया।”

इस घटना से निम्न बातें मालूम होती हैं : 1. अज़ाब देने या न देने का इख्तियार औलिया किराम के पास है। 2. गुनाह बख्शने का इख्तियार भी औलिया किराम के पास है।

  1. औलिया किराम के हाथ पर बैअत कर लेना ही सारे गुनाह . बख़्शवाने के लिए काफ़ी है।

(3) ग़ौस पाक के ज़माने में एक व्यक्ति बहुत ही गुनाहगार था लेकिन उसे ग़ौस पाक से मुहब्बत ज़रूर थी उसके मरने के बाद जब मुंकर नकीर ने उससे सवालात किए तो उसने हर सवाल का जवाब “अब्दुल क़ादिर”

__ 1. राहतुल कुलूब, मल्फ़्ज़ात ख्वाजा फ़रीदुद्दीन शकर गंज अज़ निज़ामुद्दीन औलिया, सफ़ा 132,

कहते हुए दिया। मुंकर नकीर को अल्लाह की तरफ़ से हुक्म आया “यह बन्दा हालांकि फ़ासिक़ है मगर इसे अब्दुल कादिर से मुहब्बत है मैंने इसे बख्श दिया।”

इस घटना से सीधी सी बात यह मालूम होती है कि औलिया-ए-किराम से मुहब्बत करने वाला चाहे गुनाहगार ही क्यों न हो ज़रूर बख्शा जाएगा। याद रहे कि अहले इल्म के नज़दीक फ़ासिक वह है जो गुनाहे कबीरा का मुर्तकिब हो जैसे नमाज़ छोड़ने वाला, व्यभिचारी, शराबी आदि।

(4) “जब शैख़ अब्दुल कादिर जीलानी (रह०) दुनिया-ए-फ़ानी से आलमे जावेदानी में तशरीफ़ ले गए तो एक बुजुर्ग को ख़्वाब में बताया कि गुंकर नकीर ने जब मुझसे मन रब्बुका? (अर्थात तेरा रब कौन है?) पूछा तो मैंने कहा इस्लामी तरीक़ा यह है कि पहले सलाम और मुसाफ़ा करते हैं।

चुनांचे फ़रिश्तों ने नादिम होकर मुसाफ़ा किया तो शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह०) ने हाथ मज़बूती से पकड़ लिए और कहा कि आदम की पैदाइश के समय तुमने “क्या तू पैदा करता है उसे जो ज़मीन में फ़साद : बरपा करे’ कहकर अपने ज्ञान को अल्लाह तआला के ज्ञान से ज़्यादा समझने की गुस्ताखी क्यों की और तमाम नस्ले आदम की तरफ़ फ़साद और खून रेज़ी को निस्बत क्यों की? तुम मेरे इन सवालों का जवाब दोगे तो छोडूंगा वरना नहीं, मुंकर नकीर हक्का बक्का एक दूसरे का मुंह तकने लगे अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की मगर उस दिलावर, तन्हा मैदाने ज़ोर आवर और ग़ौस बहर लाहूत के सामने कुव्वते मलकूती क्या काम आती, मजबूरन फ़रिश्तों ने कहा “हुजूर! यह बात सारे फ़रिश्तों ने की थी अतः आप हमें छोड़ दें ताकि बाक़ी फ़रिश्तों से पूछकर जवाब दें, हज़रत गौस सकलैन (रह०) ने एक फ़रिश्ते को छोड़ा दूसरे को पकड़े रखा, फ़रिश्ते ने जाकर सारा हाल बयान किया तो सब फ़रिश्ते उस सवाल के जवाब से आजिज़ रह गए तब बारी तआला की तरफ़ से हुक्म हुआ कि मेरे महबूब की सेवा में हाज़िर होकर अपनी ख़ता माफ़ करवाओ, जब तक वह माफ़ न

___ 1. सीरत गौस, पृ० 214,

करेगा रिहाई न होगी, अतएव तमाम फ़रिश्ते महबूब सुब्हानी (रह०) की सेवा में हाज़िर होकर उज्ज़ ख़्वाह हुए, हज़रत समदियत (अर्थात अल्लाह तआला) की तरफ़ से भी शफ़ाअत का इशारा हुआ, उस समय हज़रत ग़ौस आज़म ने उनाब बारी तआला में कहा “ऐ ख़ालिक़े कुल ! रब अकबर ! अपने रहम व कप से मेरे मुरीदीन को माफ़ कर दे और उनको मुंकर नकीर के सवालों से बर फ़रमा दे तो मैं इन फ़रिश्तों का कुसूर माफ़ करता हूं।” फ़रमाने इलाही पहुंचा, मेरे महबूब ! मैंने तेरी दुआ कुबूल की फ़रिश्तों को माफ़ कर, तब जनाट गौसियत मआब ने फ़रिश्तों को छोड़ा और वह आलमे मलकूत (अर्थात रिश्तों के रहने की जगह) को चले गए।

उपरोक्त घटना से निम्न बातें मालूम होती हैं : , 1. फ़रिश्ते औलिया अल्लाह के सामने जवाबदेह हैं।

  1. फ़रिश्ते औलिया अल्लाह के सामने विवश हैं। 3. औलिया अल्लाह के सामने अल्लाह तआला भी सिफ़ारिशी हैं।
  2. अब्दुल कादिर जीलानी के तमाम मुरीद फ़ितना क़ब्र से सुरक्षित रहेंगे।

औलिया किराम और सूफ़िया अज़्ज़ाम की घटनाओं के बाद अब दो घटनाएं नबी (सल्ल0) के ज़माने में मरने वाले महान मर्तबे वाले जलीलुल क़द्र सहाबा किराम के भी पढ़ लीजिए।

(1) क़बीला औस के सरदार हज़रत साअद बिन मुआज़ (रज़ि०) का इन्तिक़ाल हुआ तो रसूले रहमत (सल्ल०) तशरीफ़ लाए हज़रत साअद (रज़ि०) का सर अपने ज़ानू मुबारक पर रखा और अल्लाह के सामने दुआ फ़रमाई “या अल्लाह ! साअद ने तेरी राह में बड़ी तकलीफ़ उठाई, तेरे रसूल की पुष्टि की, इस्लाम के हक़ अदा किए। या अल्लाह! इसकी रूह के साथ वैसा ही मामला फ़रमा जैसा तू अपने दोस्तों के साथ फ़रमाता है।” हज़रत साअद (रजि०) की मौत पर रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया “साअद की मौत पर रहमान का अर्श कांप गया है।” (हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम) हज़रत

  1. मुख़्तसर मजालिस, हज़रत रियाज़ अहमद गौहर शाही, सफ़ा 8-10,

साअद (रज़ि०) का जनाज़ा उठाया गया तो हल्का महसूस किया गया आप (सल्ल0) ने इरशाद फ़रमाया “साअद (रजि०) का जनाज़ा तो फ़रिश्तों ने उठा रखा है।” आप (सल्ल०) ने स्वयं जनाज़े की नमाज़ पढ़ाई और अपने जांनिसार सहाबी के लिए मग़फ़िरत की दुआ फ़रमाई। जनाज़े की नमाज़ के बाद आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “साअद (रज़ि०) के जनाज़े में सत्तर हज़ार फ़रिश्ते शरीक हुए हैं। सादिकुल मस्दूक़ ने यह भी इरशाद फ़रमाया कि साअद (रज़ि०) की रूह के लिए आसमान के सारे दरवाज़े खोल दिए गए हैं ताकि जिस दरवाज़े से चाहे उसकी रूह ऊपर जा सके। जन्नतुल बक़ीअ (भदीना मुनव्वरा का क़ब्रिस्तान) में दफ़न हुए। हज़रत अबू सईद ख़ुदरी (रजि०) ने क़ब्र खोदी और गवाही दो “अल्लाह की क़सम ! मुझे इस क़ब्र से मुश्क की ख़ुश्बू आ रही है।” रसूले रहमत (सल्ल०) ने अपने मुबारक हाथ से मय्यित क़ब्र में रखी । क़ब्र पर मिट्टी डालने के बाद आप देर तक “सुब्हानल्लाह सुब्हानल्लाह” इरशाद फ़रमाते रहे। सहाबा किराम (रज़ि०) भी आप (सल्ल0) को देखकर यही कलिमात दोहराने लगे। उसके बाद आप (सल्ल०) ने अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर फ़रमाना शुरू किया। सहाबा किराम (रज़ि०) ने भी आप (सल्ल.) के साथ यही कलिमात दोहराने शुरू कर दिए। दुआ से फ़ारिश होने के बाद सहाबा. किराम ने कहा “या रसूलल्लाह! आप (सल्ल०) ने तस्बीह और तकबीर क्यों की?” आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “तदफ़ीन के बाद क़ब्र ने साअद को दबा लिया था मैंने अल्लाह तआला से दुआ की तो अल्लाह तआला ने क़ब्र को खोल दिया। एक अवसर पर नबी अकरम (सल्ल०) ने यह बात भी इरशाद फ़रमाई “अगर क़ब्र के दहाने से कोई व्यक्ति निजात पा सकता तो वह साअद बिन मुआज़ (रज़ि०) होते।’

हज़रत साअद (रज़ि०) की मौत की घटना से निम्न बातें मालूम होती

  1. गुनाह माफ़ करने का इख्तियार केवल अल्लाह के पास है। रसूले
  2. तफ़्सील के लिए मुलाहिज़ा हो मुस्तदरक हाकिम (4981-4983/4)।

अकरम (सल्ल0) ने हज़रत साअद (रज़ि०) के ईमान की गवाही तो दी लेकिन मग़फ़िरत के लिए अल्लाह तआला के समक्ष दुआ फ़रमाई।

  1. हज़रत साअद (रजि०) की जनाज़े की नमाज़ आप (सल्ल०) ने स्वयं पढ़ाई सत्तर हज़ार फ़रिश्ते हज़रत साअद (रज़ि०) की नमाज़े जनाज़ा में शरीक हुए। उनकी रूह के लिए आसमान के सारे दरवाज़े खोल दिए गए, मय्यित को रसूले रहमत (सल्ल०) ने अपने मुबारक हाथों से क़ब्र में उतारा उसके बावजूद क़ब्र ने हज़रत साअद (रज़ि०) को दबाया। मालूम हुआ कि अल्लाह अपने तमाम बन्दों के मामलात पर ग़ालिब है उसके हुक्म को अल्लाह का रसूल टाल सका न सत्तर हज़ार फ़रिश्ते। – 3. रसूले अकरम (सल्ल.) ने जब देखा क़ब्र हज़रत साअद (रज़ि०) को दबा रही है तो घबराहट के आलम में अल्लाह तआला की प्रशंसा व स्तुति

और पाकी व बड़ाई बयान करना शुरू कर दी और उस समय तक करते रहे जब तक हज़रत साअद (रज़ि०) को क़ब्र की तकलीफ़ से निजात न मिल गई। मालूम हुआ कि अल्लाह के सामने विनय व विनम्रता के साथ मन्नत समाजत और प्रार्थना तो की जा सकती है ज़बरदस्ती अल्लाह के रसूल (सल्ल०) भी अपनी बात नहीं मनवा सकते।

(2) दूसरी घटना हज़रत उसमान बिन मज़ऊन (रज़ि०) की है। हज़रत उसमान बिन मज़ऊन (रज़ि०) मक्का मुकर्रमा से हिजरत करके मदीना मुनव्वरा आए तो निज़ाम मुवाख़ा (भाई चारा) के अन्तर्गत हज़रत उम्मुल उला अंसारिया (रज़ि०) के घर ठहरे, जब इन्तिक़ाल हुआ तो हज़रत उम्मल उला (रज़ि०) ने रसूलुल्लाह (सल्ल0) की मौजूदगी में कहा “ऐ अबू साइब! (हज़रत उसमान बिन मज़ऊन (रज़ि०) की कुन्नियत) तुझ पर अल्लाह की रहमत हो मैं गवाही देती हूं कि अल्लाह ने (मरने के बाद) तुझे इज़्ज़त बख़्शी।” रसूले अकरम (सल्ल०) ने फ़रमाया “तुझे कैसे मालूम हुआ कि अल्लाह तआला ने उसे इज़्ज़त बख़्शी है?” हज़रत उम्मुल उला (रज़ि०) ने कहा “या रसूलल्लाह (सल्ल०)! मेरे मां बाप आप पर क़ुरबान फिर अल्लाह

और किसको इज़्ज़त देगा?” आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “बेशक उसमान को मौत आ गई और अल्लाह की क़सम मैं भी उसके लिए (अल्लाह

से) खैर और भलाई की उम्मीद रखता हूं, लेकिन अल्लाह की क़सम मैं नहीं जानता (क़यामत के दिन) मेरा क्या हाल होगा हालांकि मैं अल्लाह का रसूल

(हदीस : बुख़ारी) ____ याद रहे कि हज़रत उसमान बिन मज़ऊन (रज़ि०) को दो बार हिजरत हब्शा और तीसरी बार मदीना की हिजरत का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनकी मौत पर रसूले अकरम (सल्ल0) ने तीन बार उनकी पेशानी को चूमा और फ़रमाया “तुम दुनिया से इस तरह विदा हुए कि तुम्हारा दामन ज़र्रा बराबर दुनिया से आलूदा न होने पाया।”

हज़रत उसमान बिन मज़ऊन (रज़ि०) की घटना से निम्न बातें मालूम होती हैं :

  1. कोई व्यक्तिं यह नहीं जानता कि अल्लाह तआला के यहां किसका क्या मर्तबा है।
  2. गुनाह बलशने या न बख्शने का इख्तियार केवल अल्लाह तआला के पास है। ___ 3. अल्लाह तआला की महानता, बड़ाई और जलाल के सामने रसूले अकरम (सल्ल०) भी आजिज़ और बेबस हैं।

प्रिय पाठकों जैसा कि आपको मालूम है दीने इस्लाम की बुनियाद किताबुल्लाह व सुन्नत रसूल (सल्ल०) पर है। दोनों चीज़े हमें यही शिक्षा देती हैं कि अल्लाह तआला अपने तमाम बन्दों के मामलों पर ग़ालिब है किसी के गुनाह क्षमा करना या न करना केवल उसी के अधिकार में है, किसी को अज़ाब से पनाह देना न देना केवल उसी के इख्तियार में है, वह जो चाहता है करता है सारी दुनिया के अंबिया और फ़रिश्ते मिलकर भी उसके हुक्म को न बदल सकते हैं न टाल सकते हैं, वह अपने तमाम फैसले लागू करने की पूरी क्षमता रखता है। इस कायनात में केवल वही एक “अज़ीज़’ अर्थात ग़ालिब है। केवल वही एक “जब्बार” अर्थात कुव्वत से अपने फैसले नाफ़िज़ करने वाला है। केवल वही एक “मुतकब्बिर” है जो तमाम सृष्टि के सामने बड़ा होकर रहने वाला है। उसकी ज़ात इस बात से बहुत ही बुलन्द व बाला है कि उसे किसी नबी या वली के सामने सिफ़ारिशी बनाया जाए।

यही शिक्षा दौरे नबी बुज़ुर्गों और वलियों तालीमात और दौर हक़ीक़त यह है कि अल्लाह सुब्हानह व ज़मीन फट जाए या बात की गवाही देने

क़ब्र का बयान दौरे नबवी (सल्ल०) की उपरोक्त दोनों घटनाओं से मिलती है। । वलियों के नाम से मंसूब की गई घटनाएं किताब व सुन्नत की और दौरे नबवी की घटनाओं के बिल्कुल बरअक्स (विपरीत) हैं। ट है कि बुजुर्गों और वलियों के बारे में बयान की गई ये घटनाएं डानहू व तआला की शान में इतनी बड़ी गुस्ताख़ी हैं कि उन पर जाए या आसमान गिर पड़े तो अचरज की बात नहीं। हम इस नाही देते हैं कि अल्लाह सुब्हानहू व तआला की ज़ात पाक और बाला है उन मुश्रिकाना बातों से जो मुश्रिक लोग कहते हैं। (पाक जत वाला रब, उन बातों से जो मुश्रिक लोग कहते हैं।)

. बुलन्द वब

है तेरा इज्जत वाला एक.गलतफ़हमी

मुसलमानों में उनके तर्कों में से एक क़यामत का है, उस अतः कंब्र में अजा

मानों में से एक गिरोह अज़ाबे क़ब्र या सवाबे क़ब्र का मुंकर है 3 में से एक तर्क यह भी है कि इनाम और सज़ा का दिन, तो

जा है, उससे पहले इनाम या सज़ा न्याय के तक़ाज़ों के ख़िलाफ़ है – में अज़ाब या सवाब नहीं हो सकता। गलतफ़हमी की एक वजह तो यह है कि बरज़ख़ी ज़िंदगी, हमारी गी से बिल्कुल भिन्न है और आख़िरत की जिंदगी से भी बिल्कुल तः बरज़ख़ी ज़िंदगी के तमाम मामलों की असल हालत को मौजूदा समझना हमारे लिए सम्भव नहीं, इस विषय पर हमने भूमिका के

की शक्ल में “बरज़ख़ी ज़िंदगी कैसी है?” के शीर्षक से विस्तृत दी है उसे पढ़ने के बाद इस किस्म की बहुत सी उलझनें इंशाअल्लाह

मौजूदा जिंदगी से बिल भिन्न है अतः बरज़वी ज़िंदगी में समझना बाद ज़मीमा की शव व्याख्या की है उसे पट दूर हो जाएंगी।

गलतफ़हमी की दूसरी वजह अज़ाबे क़ब्र या सवाबे क़ब्र की का सही स्पष्टीकरण न होना भी है बरज़ख़ी ज़िंदगी में अज़ाब या की सही हैसियत को हम एक मिसाल से स्पष्ट करने की कोशिश

हैसियत का सही स्पाई सवाब की सही है

करेंगे।

न लीजिए कि पुलिस अधिकारी किसी आदमी को आला अधिकारियों पर गिरफ़्तार करते हैं आला अधिकारी साथ ही पुलिस को यह भी

बता देते हैं कि यह आदमी वास्तव में मुजरिम पेशा गिरोह से संबंध रखता है। पुलिस इसे अदालत के बाक़ायदा फ़ैसले से पहले किसी क़िस्म की सज़ा देने की मजाज़ तो नहीं होती, लेकिन हवालात के सारे अधिकारी उसकी मुजरिमाना हालत से सूचित होने की बिना पर उससे शदीद नफ़रत करते हैं, डांट डपट करते रहते हैं, उसे डराते और धमकाते भी रहते हैं कि ज़रा अदालत से फ़ैसला होने दो फिर देखो हम तुम्हारा क्या हश्र करते हैं। हवालात में अमलन उसके साथ इंतिहाई घटिया और रुसवाकुन सुलूक करते हैं। न उसे कुर्सी पर बैठने की इजाज़त दी जाती है न चारपाई पर लेटने की इजाज़त दी जाती है। उधर से गुज़रने वाला हवालात का हर कर्मचारी उसे ग़ज़बनाक निगाहों से घूरता हुआ गुज़रता है जैसे उसकी जान ही निकाल डालेगा। ज़ाहिर है ऐसा आदमी कदापि यह इच्छा नहीं करेगा कि उसका मुक़दमा कभी अदालत में जाए और उसकी सज़ा सुनाने का बाक़ायदा फ़ैसला हो लेकिन जब कभी अदालत से उसके मुक़दमे का फ़ैसला होगा उसे जेल भेजा जाएगा तब अदालत के फैसले के अनुसार उसकी असल सज़ा, कोड़े, मुशक़्क़त या जुर्माना आदि का आरंभ होगा। जेल की सज़ा से पहले हवालात में मुलज़िम को जो जेहनी यातना पहुंचती है वह अगरचे जेल की जिस्मानी और मानसिक यातना से भिन्न है लेकिन है तो बहरहाल सज़ा ही। इसी तरह क़ब्र में सज़ा की हैसियत हवालात में बन्द मुलज़िम की तरह है जिसका अभी अदालत में फैसला होना और उस सज़ा पर अमल दरामद होना बाक़ी है जो वास्तव में क़यामत के दिन ही होगा, लेकिन क़यामत से पहले काफ़िर को उसके अंजाम से सूचित करना उसे ज़लील और रुसवा करना उसे उसका टिकाना दिखाना भी सज़ा ही है अगरचे उसकी हैसियत जहन्नम के अज़ाब से जुदा है।

इसी तरह क़ब्र में भोमिन और परहेज़गार आदमी के अज्र व सवाब की मिसाल उस आदमी से मिलती जुलती है जिसे पुलिस वाले आला अधिकारी के हुक्म पर गिरफ्तार करके ले आएं लेकिन आला अधिकारी पुलिस को यह बता दें कि गिरफ़्तार होने वाला आदमी बेगुनाह है। क़ानून पसन्द और शरीफ़ शहरी है अतः उसके साथ इज़्ज़त और एहतिराम का सुलूक किया

जाए। अदालत के फैसले से पहले पुलिस उसे बरी तो नहीं कर सकती लेकिन उसकी नेकी और शराफ़त की वजह से तमाम पुलिस अधिकारी उसे इज़्ज़त की निगाह से देखने लगते हैं, उसके आराम का ख्याल रखते हैं, उसकी तमाम ज़रूरतें पूरी करते हैं और उसे इत्मीनान भी दिलाते हैं कि आप किसी किस्म का ग़म और फ़िक्र न करें आप बेगुनाह हैं आप निश्चय ही अदालत से इज़्ज़त के साथ बरी कर दिए जाएंगे। ऐसा आदमी इच्छा करेगा कि उसका मुक़दमा फ़ौरन अदालत में पेश हो ताकि वह जल्द से जल्द आराम और चैन की जिंदगी बसर कर सके। अदालत में मुक़दमा पेश होने के बाद जब अंदालत उसे इज़्ज़त के साथ बरी कर देगी तो पुलिस पूरे सम्मान के साथ उसे उसके सुकून वाले और आराम देह घर में पहुंचा देगी। निःसंदेह हवालात में उसकी इज़्ज़त और आराम की वह हैसियत तो नहीं होती जो अपने घर पहुंचने के बाद हो सकती है लेकिन है तो वह भी उसकी नेकी और शराफ़त का इनाम व इकराम, बिल्कुल ऐसा ही मामला क़ब्र में मोमिन की इज़्ज़त अफ़ज़ाई का होगा, उसे जन्नत में घर की बशारत (खुश-खबरी) दी जाएगी जन्नत की दूसरी नेमतें दिखाई जाएंगी, हर तरह का आराम और राहत उपलब्ध किया जाएगा, लेकिन जन्नत की नेमतों और राहतों से अमलन मोमिन उसी दिन लुत्फ़अंदोज़ होगा जिस दिन अल्लाह तआला की अदालत से बरी होकर पूरे सम्मान व इकराम के साथ जन्नत में दाखिल होगा। क़ब्र इबरत की जगह या तमाशे की जगह?

जैसा कि हम इससे पहले लिख आए हैं क़ब्र वास्तव में बड़े भय और घबराहट की जगह है। रसूले अकरम (सल्ल०) ने स्वयं यह बात इरशाद फ़रमाई “मैंने क़ब्र से ज़्यादा घबराहट वाली जगह कोई नहीं देखी।” (हदीस : तिर्मिज़ी) एक जनाज़े के मौके पर रसूले अकरम (सल्ल.) क़ब्र के सरहाने तशरीफ़ फ़रमा थे। आप (सल्ल०) क़ब्र की भयावहता को याद फ़रमा कर इतना रोए कि आप (सल्ल.) के आंसुओं से क़ब्र की मिट्टी तर हो गई और आप (सल्ल०) ने फ़रमाया “मेरे भाइयो! इसके लिए कुछ तैयारी कर लो।” (हदीस : तिर्मिज़ी) आप (सल्ल०) ने स्वयं भी क़ब्र के फ़ितने से पनाह

मांगी और उम्मत को भी उससे पनाह मांगने की नसीहत फ़रमाई। आप (सल्ल.) के अमल का यह नतीजा था कि क़ब्र का उल्लेख आते ही सहाबा किराम (रज़ि०) आबदीदा और दुखी हो जाते।

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