Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 4

ज़मीमा

बरज़खी ज़िंदगी कैसी है?

___ बरज़ख़ी ज़िंदगी कैसी है? इसका संक्षिप्त और सीधा सा जवाब तो यह है कि अल्लाह और उसका रसूल (सल्ल०) ही बेहतर जानते हैं जिस चीज़ का इंसान ने कभी मुशाहिदा (अवलोकन) ही नहीं किया, या जिस बात का इंसान को अनुभव ही नहीं उसके बारे में यक़ीनी तौर से कोई बात कहना संभव ही नहीं, इसके बावजूद कुछ हज़रात बरज़ख़ी ज़िंदगी के बारे में ऐसे ऐसे दावे करते हैं जो किताब व सुन्नत से बिलकुल मेल नहीं रखते। जैसे :

  1. “औलिया-ए-किराम अपनी क़ब्रों में हयात अबदी के साथ जिंदा हैं उनके इल्म, फ़हम व समझ व देखने व सुनने की ताक़त पहले के मुकाबले में बहुत ज़्यादा हो गई है।”
  2. “शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी (रह०) हर समय देखते हैं और हर एक की पुकार सुनते हैं।”
  3. “मुर्दे सुनते हैं और महबूबीन की मौत के बाद मदद करते हैं।”
  4. “या अली और या ग़ौस कहना. वैध (जाइज़) है क्योंकि अल्लाह के प्यारे बन्दे बरज़न में सुन लेते हैं।”
  5. “औलिया विसाल (मरने) के बाद भी जिंदा हैं और उनके अधिकार व करामात पाइंदा और उनके फ़ैज़ बदस्तूर जारी और हम गुलामों, ख़ादिमों, मुहिब्बों, मोतक़िदों के साथ उनकी इमदाद तआवुन जारी है।”

6 “अल्लाह के वली मरते नहीं बल्कि एक घर से दूसरे घर मुंतक़िल (स्थानांतरित) होते हैं उनकी रूहें केवल एक दिन के लिए निकलती हैं फिर

  1. बहारे शरीअत, अमजद अली, सफ़ा 58, 2. इज़ालतुल जलाला, मुफ़्ती अब्दुल क़ादिर, सफ़ा 7, 3. इल्मुल कुरआन, मौलाना अहमद यार, सफ़ा 189, 4. फ़तावा रिज़विया, नूरुल्लाह क़ादरी, सफ़ा -537, 5. फ़तावा रिज़विया, अहमद यार ख़ान बरेलवी, जिल्द 4, सफ़ा 23, उसी तरह जिस्म में होती हैं जिस तरह पहले थीं।
  2. मशाइख़ की रूहानियत से फ़ायदा और उनके सीनों और क़ब्रों से बातिनी फुयूज़ पहुंचना बेशक सही है।
  3. हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की अपने मुर्शिद मियां हाजी नूर मुहम्मद की मौत के समय उनके पास मौजूद थे आप फ़रमाते हैं “मर्जुल मौत में जब आपने ये कलिमात कहे कि ‘प्याम सफ़रे आखिरत आ गया है’ तो मैं पालकी की पट्टी को पकड़ कर रोने लगा। हज़रत ने तसल्ली दी और फ़रमाया “फ़क़ीर मरता नहीं बल्कि एक मकान से दूसरे मकान में मुंतक़िल होता है फ़क़ीर की क़ब्र से वही लाभ होगा जो ज़ाहिरी जिंदगी में होता

था।”

____10. हज़रत (मौलाना अहमद यार) (रह०) दारे फ़ानी (नष्ट होने वाली दुनिया) से पर्दा फ़रमा गए ‘इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन’ मगर याद रहे कि हज़रत सिलसिला नक़्शबन्दिया उवेसिया के उस दौर के बानी (संस्थापक) शैख़ थे, हैं और रहेंगे। निस्बत उवेसिया रूह से रूह के मुस्तफ़ीद होने का नाम है दुनिया हो या बरज़न, रूह से इस्तफ़ादा एक जैसा होता है। फ़र्क यह है कि दुनिया में हर व्यक्ति ख़िदमत आलिया में उपस्थित हो सकता था और बरज़न में किसी ऐसे आदमी की ज़रूरत पेश आ जाती है जो बरज़ख़ तक उसकी रहनुमाई करे और वहां तक आदमी को पहुंचाए और ऐसा वही व्यक्ति करता है जो इन हज़रात का सेवक या नुमाइंदा हो, फ़ैज़ उन्ही का होता है मगर उस (फ़ैज़) की तक़्सीम उस एक वजूद के ज़रिए होती है जिसे ख़लीफ़ा कहा जाता है।”

  1. हज़रत जी (रह०) (मौलाना अल्लाह यार ख़ान) की मौत हो गई। मुबारक शरीर अपने हुजरे (कमरे) में हालते आराम में था और रूह मुबारक आला इल्लिय्यीन में मुतवज्जह इलल्लाह, फ़ज्र की नमाज़ दारुल इरफ़ान में अदा की और यहां मैंने रूह पुर फुतूह को दारुल इरफ़ान की तरफ़ मुतवज्जह
  2. फ़तावा नईमिया, इक़ितदार बिन अहमद यार बरेलवी, सफा 225, 2. अलमहंद अलल मुंफ़द खलील अहमद सहारनपुरी, सफ़ा 39, 3. तारीख मशाइखे चिश्त, मौलाना जकरिया, सफ़ा 234, . 4. इरशादुस्सालिकीन, हिस्सा अव्वल, मौलाना मुहम्मद अकरम, सफ़ा 25,

पाया। बिरादस्म करनल मतलूब हुसैन निरंतर इसरार कर रहे थे कि हज़रत जी से इजाज़त क्यों नहीं हासिल करते कि जिस्म मुबारक को दारुल इरफ़ान में दफ़न किया जाए मैंने (इजाज़त हासिल करने की) पूरी कोशिश की। कहा कि जरत आपके अहले खाना को यहां घर बनाकर पेश कर देंगे और वे हर तरह से आराम में होंगे। इंशाअल्लाह। मगर नहीं. फ़रमाया “ज़िंदगी में बेशुमार लोगों को मुझ पर भरोसा था और अल्लाह ने मुझे उनका आसरा बना दिय था तुम सबको यहां नहीं ला सकते अब मेरी क़ब्र उनके लिए ऐसी ही आसर होगी जिस तरह ज़िंदगी में मेरी ज़ात थी।’

  1. अबू सईद फ़राज़ बयान करते हैं कि मैं मक्का मुअज़्ज़मा में था कि बाब बनी शैबा पर एक नवजवान को मरे हुए देखा जब मैंने उसकी तरफ़ नज़र की तो मुझे देखकर मुस्कुराया और कहने लगा “ऐ अबू सईद ! क्या तू नहीं जानता कि अल्लाह के महबूब ज़िंदा होते हैं अगरचे वे ज़ाहिर में मर जाते हैं लेकिन हक़ीक़त में एक घर से दूसरे घर की तरफ़ पलटते हैं।’

उपरोक्त अक़ीदों की असल बुनियाद अक़ीदा समा मोती (अर्थात मुर्दो का सुनना) है। अतः किताब व सुन्नत की रौशनी में हमें देखना है कि क्या समा मोती सही अक़ीदा है या ग़लत? समा मोती (मुर्दो का सुनना), किताब व सुन्नत की रोशनी में : – इंसानी ज़िंदगी के सफ़र को शुरू से लेकर आखिर तक हम निम्न पांच दौर में बांट सकते हैं :

  1. आलमे अरवाह : हज़रत आदम अलैहि० की पैदाइश के बाद अल्लाह तआला ने उनकी पुश्त से क़यामत तक आने वाली तमाम नस्ले इंसानी की रूहें पैदा फ़रमाईं उन्हें अक़्ल और कुव्वते गोयाई (बोलने की शक्ति) अता फ़रमाकर अपने ‘रब’ अर्थात् ख़ालिक़, मालिक व हाकिम होने का इक़रार इन शब्दों में लिया “अलस्तु बिरब्बिकुम?” तमाम रूहों ने जवाब
  2. इरशादुस्सालिकीन, हिस्सा 1, मौलाना मुहम्मद अकरम, सफ़ा 20, 2. रिसाला अहकामुल कुबूर मोमिनीन, जिल्द 2, सफ़ा 243,

दिया “बला” (बेशक) क्यों नहीं। आप ही हमारे रब हैं।’ इसी आलमे अरवाह से इंसानी जिंदगी के सफ़र की शुरुआत होती है।

  1. आलमे रहम मादर : मां के रहम (गर्भ) में रूह के साथ इंसान के शरीर की पैदाइश भी होती है, इस आलम में इंसान कम व बेश नौ माह की मुद्दत गुज़ारता है। अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में जा बजा रहम मादर में इंसान की पैदाइश का उल्लेख फ़रमाया है। इरशाद बारी तआला है “इंसान की मां ने उसे तकलीफ़ बर्दाश्त करके (पेट में) उठाए रखा और तकलीफ़ बर्दाश्त करके उसको जना। (सूरह अहक़ाफ़, आयत 15) इंसानी जिंदगी के सफ़र का यह दूसरा दौर है। ____3. आलमे हयात : जिंदगी के सफ़र का यह तीसरा दौर है जिसमें “‘ इंसान संक्षिप्त मुद्दत के लिए क़याम करता है। अल्लाह के रसूल का इरशाद मुबारक है “मेरी उम्मत के लोगों की उमें साठ और सत्तर साल के बीच हैं।” (हदीस : तिर्मिज़ी) कम व ज़्यादा लोग इतने ही समय तक इस दुनिया में रहते हैं और उसके बाद अपने सफ़र के अगले मरहले पर रवाना हो जाते हैं। . 4. आलमे बरज़ख्न : आलमे बरज़ज़ हमारे सफ़र का (दुनिया के मुक़ाबले में) दीर्घकालिक दौर है। कहा जाता है कि हज़रत आदम (अलैहि०) से लेकर अब तक कम व ज़्यादा छः हज़ार साल का समय बीत चुका है। लोग अपनी क़ब्रों में पड़े हैं सफ़र जारी है और मालूम नहीं कब तक यह सफ़र जारी रहेगा। अपने अपने समय पर हममें से हर एक कारवाने बरज़न में शरीक होता चला जाएगा और यह सफ़र क़यामत तक जारी रहेगा। ____5. आलमे आख़िरत : यह हमारे सफ़र की आख़िरी मंज़िल है जिसमें इंसान इस दुनिया वाले शरीर व जान के साथ उठाया जाएगा। हिसाब किताब होगा और लोग अपनी अपनी हक़ीक़ी क़यामगाह….जन्नत या जहन्नम….में हमेशा हमेशा के लिए क़याम करेंगे।

उपरोक्त पांचों दौरों का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए तो यह बात 1. और अधिक व्याख्या के लिए देखें सूरह आराफ़, आयत 172,

  1. मज़ीद तफ़सील के लिए देखें सूरह नल, आयत 78; सूरह मोमिनून, आयत 14; सूरह लुक़मान, आयत 14 आदि ।

मालूम होती है कि हर दौर की हालत, दूसरे दौर की हालतों से एक दम अलग है। जैसे पहले दौर अर्थात आलमे अरवाह में अल्लाह तआला ने तमाम रूहों से सवाल किया “अलस्तु बिरब्बिकुम?” रूहों ने सुना, सोचा, समझा और जवाब दिया “बला’…आलमे अरवाह में सुनना और सोचना और बोलना क्या ऐसा ही था जैसा कि इस दुनिया में सुनना, सोचना और बोलना है? ज़ाहिर है वह ऐसा कदापि नहीं था क्योंकि वहां हमारी रूहें उन माद्दी जिस्मों के बिना थीं अतः वहां का सुनना, सोचना और बोलना इस माद्दी दुनिया के बोलने, सोचने और सुनने से अलग होना चाहिए। आलमे अरवाह में रूहों के सुनने, सोचने और बोलने पर हमारा ईमान है लेकिन उसकी हालत केवल अल्लाह तआला ही को मालूम है।

अब आइए दूसरे दौर (अर्थात रहम मादर) की तरफ़ जिसमें इंसानी शरीर की पैदाइश होती है। रूह और जिस्म दोनों मिलते हैं, दिल, दिमाग़, आंखें, नाक, कान सब कुछ होता है लेकिन रहम (गर्भ) की दुनिया बाहर की दुनिया से इतनी अलग होती है कि अगर बच्चे को बताया जाए कि कुछ समय के बाद तुम एक ऐसी दुनिया में आने वाले हो जहां हज़ारों मील बुलन्द व बाला विशाल लम्बा चौड़ा आसमान है, हद नज़र तक फैली हुई ज़मीन है। ज़मीन से भी बड़ा एक दिखता हुआ आग का गोला…सूरज…रोज़ाना आसमान की एक दिशा से निकलता है और सारी दुनिया को रौशन कर देता है कुछ घंटों के बाद दूसरी दिशा में अस्त हो जाता है जिससे सारी दुनिया पर अंधेरा छा जाता है। रात के समय आसमान पर खूबसूरत चमकता दमकता चांद निकलता है, जिसके साथ करोड़ों की तादाद में छोटे छोटे सितारे टिमटिमाते हैं। बताइए रहम मादर की छोटी सी दुनिया में बसने वाला इंसान क्या इन सच्चाइयों को सच मानेगा?

हक़ीक़त यह है कि रहम मादर की छोटी सी दुनिया में रहते हुए इस माद्दी दुनिया की हक़ीक़तों को जानना संभव ही नहीं। अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में इंसान की इस हालत पर कुछ शब्दों में बड़ा खूबसूरत तबसिरा फ़रमाया है। इरशाद बारी तआला है : “ओर अल्लाह तआला ने तुम्हें तुम्हारी माओं के पेटों से (इस हाल में) निकाला कि तुम कुछ भी न जानते थे।”

(सूरह नल, आयत 78) अब आइए चौथे दौर अर्थात आलमे बरज़ख़ की तरफ़, किताब व सुन्नत से आलमे बरज़ख़ के बारे में हमें जो हक़ीक़तें मालूम होती हैं वे निम्न

  1. मुर्दे बोलते हैं : आप (सल्ल.) का इरशाद मुबारक है “मरने के बाद नेक आदमी की मय्यित अपने अहले खाना से मुखातिब होकर कहती है “मुझे जल्दी ले चलो, मुझे जल्दी ले चलो।” और बुरे आदमी की मय्यित “हाय अफ़सोस मुझे कहां लिए जा रहे हो।” (हदीस : बुखारी) इस हदीस से मरने के बाद मय्यित का बोलना साबित होता है। मुंकर नकीर के सवालों के जवाब में नेक आदमी अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान की गवाही देता है जबकि काफ़िर और कपटी आदमी (हाय अफ़सोस) कहता है।

(हदीस : बुख़ारी, अबू दाऊद आदि) इन हदीसों से जहां यह बात साबित होती है कि मुर्दे बोलते हैं वहां यह बात भी साबित होती है कि बोलने की इस ख़ासियत में किसी की बुजुर्गी या विलायत का कोई दखल नहीं, मुर्दा चाहे मोमिन या काफ़िर, नेक हो या गुनाहगार, सब ही बोलते हैं।

  1. मुर्दे सुनते हैं : रसूले अकरम (सल्ल०) का इरशादे मुबारक है “जब (मोमिन या काफ़िर) बन्दा अपनी क़ब्र में दफ़न किया जाता है तो वह वापस पलटने वाले अपने साथियों के जूतों की आवाज़ सुनता है।”

(हदीस : मुस्लिम) क़ब्र में मुंकर नकीर का सवाल मय्यित सुनती है और अपने अपने ईमान के अनुसार उसका जवाब भी देती है। (देखें मसला न० 74)

जंगे बद्र के बाद रसूलुल्लाह (सल्ल0) ने बद्र में मरने वालों को सम्बोधित करके इरशाद फ़रमाया “तुम्हारे साथ तुम्हारे रब ने जो वायदा किया था क्या तुमने उसे सच पा लिया? मेरे रब ने मेरे साथ जो वायदा किया था मैंने उसे सच पा लिया।” हज़रत उमर रज़ि० ने कहा “या रसूलुल्लाह (सल्ल०)! क्या ये सुनते हैं या जवाब देते हैं? हालांकि ये तो मुर्दार हो चुके हैं।” आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “उस ज़ात की क़सम! जिसके हाथ

में मेरी जान है, मैं जो कुछ उनसे कह रहा हूं, तुम उनसे ज़्यादा नहीं सुनते, हां अलबत्ता यह (हमारी तरह) जवाब नहीं दे सकते।” (हदीस : मुस्लिम)

_इन हदसों से भी यह बात स्पष्ट होती है कि मुर्दे सुनते हैं और यह कि मुर्दे का सुनना किसी विलायत या बुजुर्गी का प्रमाण नहीं बल्कि हर मुर्दा, चाहे मोमिन हो या काफ़िर, नेक हो या बद, सुनता है।

  1. मुर्दे देखते हैं : रसूले अकरम (सल्ल०) का इरशाद मुबारक है “क़ब्र में मुंकर नकीर के सवालों के जवाब में कामयाब होने के बाद मोमिन आदमी को पहले जहन्नम दिखाई जाती है फिर जन्नत में उसे उसका ठिकाना दिखाया जाता है, इसी तरह काफ़िर आदमी के नाकाम होने पर पहले उसे जन्नत दिखाई जाती है फिर उसे जहन्नम और उसमें उसका ठिकाना दिखाया जाता है। (हदीस अहमद, अबू दाऊद आदि) इससे यह बात स्पष्ट है कि मुर्दा चाहे मोमिन हो या काफ़िर देखता भी है।
  2. मुर्दे उठते और बैठते हैं : आप (सल्ल०) का इरशाद मुबारक है “जब मुंकर नकीर क़ब्र में आते हैं तो मय्यित को (उठाकर) बिठा देते हैं।”

(हदीस : बुख़ारी, मुस्लिम, अहमद आदि) 5. मुर्दे तकलीफ और राहत महसूस करते हैं : आप (सल्ल०) का इरशाद मुबारक है “जब मुंकर नकीर काफ़िर आदमी को उठाते हैं तो वह बहुत ही घबराया हुआ और भयभीत होता है जबकि मोमिन आदमी बिना किसी घबराहट और भय के उठकर बैठ जाता है।” (हदीस : अहमद) और

आप (सल्ल.) का इरशाद मुबारक है “जहन्नम में अपना ठिकाना देखने के बाद काफ़िर आदमी की हसरत और नदामत में वृद्धि होती है जबकि जन्नत में अपनी क़यामगाह देखने के बाद मोमिन आदमी की ख़ुशी और लज़्ज़त में वृद्धि हो जाती है।

(हदीस : तबरानी, इब्ने हिबान, हाकिम) 6. मुर्दे तमन्ना और इच्छा करते हैं : रसूले अकरम (सल्ल.) का इरशाद मुबारक है “मोमिन आदमी को जब क़ब्र में जन्नत दिखाई जाती है तो वह इच्छा करता है मुझे ज़रा छोड़ दो मैं अपने घर वालों को इस नेक अंजाम की खुशखबरी दे दूं।” दूसरी हदीस में है “मोमिन आदमी इच्छा करता है “ऐ मेरे रब! क़यामत जल्द क़ायम फ़रमा” जबकि काफ़िर आदमी

यह इच्छा करता है “ऐ मेरे रब ! क़यामत क़ायम न करना।” (हदीस : अहमद, अबू दाऊद) इन हदीसों से मुर्दे का तमन्ना और इच्छा करना साबित होता है।

  1. मुर्दे सोते और जागते हैं : आप (सल्ल.) का इरशाद मुबारक है “क़ब्र में मोमिन मय्यित से सवाल जवाब के बाद कहा जाता है “दुल्हन की तरह सोजा जिसे उसके घर वालों में से महबूबतरीन हस्ती की अलावा कोई नहीं जगाता।” (हदीस : तिर्मिज़ी) इससे मुर्दे का सोना और क़यामत के दिन जागना साबित होता है।
  2. मुर्दे पहचानते हैं : आप (सल्ल०) का इरशाद मुबारक है “कब्र में मोमिन आदमी के पास एक खूबसूरत चेहरे वाला आदमी आता है। खूबसूरत कपड़े पहने हुए बेहतरीन खुश्बू लगाए हुए और मोमिन आदमी को अच्छे अंजाम की खुशखबरी देता है। मोमिन आदमी पूछता है तू कौन है? तेरा चेहरा कितना खूबसूरत है तू खैर व बरकत लेके आया है। वह आदमी. कहता है मैं तेरे सद कर्म हूं। काफ़िर आदमी के पास एक बदसूरत, गंदे कपड़ों वाला बदबूदार व्यक्ति आता है और कहता है तुझे बुरे अंजाम की ख़ुशखबरी हो, यह वह दिन है जिसका तुझसे वायदा किया गया था। काफ़िर कहता है तू कौन है? तेरा चेहरा बड़ा भद्दा है तू बुराई लेकर आया है। वह आदमी कहता है मैं तेरे बुरे कर्म हूं। (हदीस : अहमद, अबू दाऊद,) इन हदीसों से मुर्दे का पहचानना साबित होता है।
  3. मुर्दे चीखते और चिल्लाते हैं : इरशाद नबवी (सल्ल०) है “क़ब्र में काफ़िर पर अंधा और बेहरा फ़रिश्ता (या फ़रिश्ते) मुसल्लत कर दिए जाते हैं जो उसे लोहे के गुर्जी (हथौड़ों) से मारते और पीटते हैं और वह बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगता है काफ़िर के चीखने और चिल्लाने की आवाज़ जिन्न व इन्सान के अलावा हर जानदार मख्लूक़ सुनती है। (हदीस : अहमद, अबू दाऊद) इस हदीस से मुर्दे का चीखना और चिल्लाना भी साबित होता है।
  4. नेक मुर्दे जिंदा हैं और खाते पीते हैं : इरशाद बारी तआला है “और जो लोग अल्लाह की राह में मारे गए उन्हें मुर्दा न समझो, वे (बरज़न में) ज़िंदा हैं और अपने रब के यहां से रिज़्क़ पाते हैं।”

(सूरह आले-इमरान, आयत 169)

किताब व सुन्नत के उपरोक्त दलीलों से यह बात स्पष्ट हो रही है कि बरज़ख़ की जिंदगी एक पूर्ण जिंदगी है जिसमें मुर्दा खाता पीता भी है, सुनता बोलता भी है, देखता और पहचानता भी है, सोचता और समझता भी है, राहत और खुशी भी महसूस करता है। मुर्दा काफ़िर हो तो हसरत और नदामत महसूस करता है। रोता पीटता और चीख़ता चिल्लाता भी है लेकिन बरज़ख़ में मुर्दे का सुनना दुनिया की जिंदगी के सुनने से अलग है। बरज़ख़ में मुर्दे का बोलना दुनिया की ज़िंदगी के बोलने से जुदा है। बरज़ख़ में मुर्दे का देखना और पहचानना दुनिया की ज़िंदगी में देखने और पहचानने से भिन्न है। बरज़ज़ में मुर्दे का खाना पीना दुनिया की ज़िंदगी में खाने पीने से अलग है। बरज़ख़ में मुर्दे का सोचना समझना दुनिया की जिंदगी में सोचने समझने से अलग है, बरज़ख़ में मुर्दे का राहत और खुशी महसूस करना दुनिया की जिंदगी में राहत और ख़ुशी महसूस करने से अलग है। काफ़िर मुर्दे का बरज़ख़ में नदामत और हसरत महसूस करना दुनिया की जिंदगी में हसरत और नदामत महसूस करने से अलग है। बरज़ख़ में मुर्दे का रोना पीटना और चीखना चिल्लाना दुनिया की जिंदगी में रोने, पीटने और चीखने चिल्लाने से भिन्न है। जिसे आज इस माद्दी दुनिया में हम समझ नहीं सकते। हक़ीक़त यह है कि जिस तरह आलमे अरवाह की कैफ़ियत का इदराक मुश्किल है इसी तरह इस माद्दी दुनिया में रहते हुए बरज़ज़ की हालत को समझना और उसका इदराक करना हमारे लिए असंभव है। कुरआन मजीद इस हालत की बड़े स्पष्ट और साफ़ शब्दों में पुष्टि करता है । इरशाद बारी तआला है “और जो लोग अल्लाह की राह में मारे जाएं उन्हें मुर्दा न कहो बल्कि वे (बरज़ज़ में) ज़िंदा हैं लेकिन तुम्हें (उनकी जिंदगी का) शऊर नहीं।

(सूरह बक़रा, आयत 154) __ अल्लाह तआला के इस स्पष्ट इरशाद के बावजूद जिन लोगों को इस बात पर इसरार है कि वह बरज़ख़ी ज़िंदगी का शऊर रखते हैं और जानते हैं कि मुर्दे वैसा ही सुनते हैं जैसा दुनिया की ज़िंदगी में सुनते थे, मुर्दे वैसा ही बोलते हैं जैसा दुनिया की जिंदगी में बोलते थे, वैसा ही खाते पीते हैं जैसा दुनिया की ज़ंदगी में खाते पीते थे, उनका मौक़िफ़ (दृष्टिकोण) न केवल यह

कि अक़लन सही नहीं बल्कि वे हज़रात कुरआन मजीद की उपरोक्त आयत में “ला तशउरून” के शब्द का खुल्लम खुल्ला इंकार भी करते हैं।

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