Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 5

आख़िर में हम मरने के बाद का सुनना कि विचार धारा वालों से यह पूछना चाहेंगे कि बरज़ख़ में हर मुर्दे का (चाहे वह मुसलमान हो या काफ़िर, नेक हो या बद, वली हो या गैर वली) सुनना, बोलना, देखना, पहचानना, मोमिन हो तो उसका राहत और ख़ुशी महसूस करना, क़यामत क़ायम होने की दुआ मांगना सब कुछ साबित है। फिर आख़िर क्या वजह है कि केवल औलिया के सुनने को ही हमेशा बहस में लाया जाता है गैर औलिया का सुनना कभी ज़ेरे बहस नहीं लाया जाता? दूसरा सवाल यह है कि औलिया-ए-किराम के केवल “सुनने” पर ही बहस क्यों की जाती है। उनका बोलना. देखना. पहचानना, ख़ुशी और राहत महसूस करना, खाना पीना और दूसरे कामों को क्यों ज़ेरे बहस नहीं लाया जाता?

कारण स्पष्ट है कि औलिया और नेक लोगों के बरज़ख में सुनने को ही बुनियाद बनाकर उनके मज़ारों पर हाज़िरी देने, मुरादें मांगने, हाजात तलब करने, मुसीबत और मुश्किल में उन्हें पुकारने और उनसे गुनाह बख्रश्वाने का विश्वास कायम होता है और फिर इसी अक़ीदे की बुनियाद पर लोगों से चढ़ावे और नज़राने वसूल किए जाते हैं। अगर लोगों को यह स्पष्टतः बता दिया जाए कि मुर्दे केवल बरज़ख़ में सुनते ही नहीं बोलते भी हैं। देखते भी हैं, पहचानते भी हैं, खाते पीते भी हैं, राहत और खुशी भी महसूस करते हैं लेकिन ये सब कुछ इस दुनिया की जिंदगी जैसा नहीं बल्कि उससे बिल्कुल अलग है, तो उसका नतीजा यही निकलेगा कि दीने ख़ानक़ाही का सारा कारोबार ख़त्म हो जाएगा। मज़ारों की रौनकें और महफ़िलें वीरान हो जाएंगी, दरगाहों के भारी हुकूमती वज़ाइफ़, ग्रांटें और ठेके ख़त्म हो जाएंगे। “सज्जादा नशीन”, “गद्दी नशीन”, “मख्दूम”, “दुर्वेश” और “मुजाविर” आम इंसानों की तरह पेट पालने के लिए मेहनत मज़दूरी करने पर मजबूर हो जाएंगे और यह मुशक़्क़त और मुसीबत आख़िर कौन मौल ले :

बाबर बऐश कोश कि दुनिया दोबारा नीस्त

शोहदा की बरज़ख़ी जिंदगी : … कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने दो जगह पर शहीदों को जिंदा कहा है और साथ ही उन्हें मुर्दा कहने से मना फ़रमाया है। ये दोनों आयतें मरने के बाद सुनने की विचारधारा रखने वालों के नज़दीक शोहदा (और फिर उसके साथ दूसरे औलिया और नेक लोगों) के अपनी क़ब्रों में जिंदा होने का बहुत बड़ा सुबूत हैं । इमाम अहले सुन्नत आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी ने अपनी एक किताब में निम्नलिखित घटना नक़ल की है “दो भाई अल्लाह के रास्ते में शहीद हो गए। उनका तीसरा भाई भी था जो ज़िंदा था जब उसकी शादी का दिन आया तो दोनों शहीद भाई उसकी शादी में शिरकत के लिए तशरीफ़ लाए, तीसरा भाई बहुत हैरान हुआ और कहने लगा कि तुम तो मर चुके थे। उन्होंने फ़रमाया, अल्लाह तआला ने हमें तुम्हारी शादी में शिरकत के लिए भेजा है। अतएव उन दोनों भाइयों ने अपने तीसरे भाई का निकाह पढ़ा और वापस (आलमे बरज़ज़ में) चले गए।

शोहदा और औलिया, सुल्हा को अपनी क़ब्रों में ज़िंदा साबित करने के बाद उनसे हाजात तलब करना, मुरादें मांगना, मुश्किल और मुसीबत में उन्हें पुकारना, उनके नाम की नज़र व नियाज़ देना, उनके मज़ारों पर चढ़ावे चढ़ाना और उर्स लगाना सब कुछ जाइज़ और सही साबित हो जाता है। यहां भी मरने के बाद सुनने की विचारधारा रखने वालों को वही ग़लतफ़हमी हुई है जिसका उल्लेख इससे पहले हम पिछले पृष्ठों में कर आए हैं कि उन्होंने शोहदा की बरज़ख़ी ज़िंदगी को दुनिया की ज़िंदगी जैसा समझ लिया। बरज़न में उनके खाने पीने को दुनिया के खाने पीने जैसा समझ लिया, उनके बरज़ख में सुनने और बोलने को दुनिया में सुनने और बोलने जैसा समझ लिया। इस बात का स्पष्टीकरण हम पहले कर चुके हैं कि बरज़ख़ की जिंदगी एक मुकम्मल ज़िंदगी है जिसमें मुर्दो का खाना पीना, बोलना, सुनना, देखना, पहचानना, सोचना, ख़ुश होना, सब कुछ साबित है लेकिन यह सब दुनिया के खाने, पीने, बोलने, सुनने, देखने, पहचानने, सोचने, खुश होने से अलग

  1. मज्मूआ रसाइल आला हज़रत जिल्द 1, सफ़ा 175,

है, फिर भी उपरोक्त दोनों आयात के अवतरण से भी असल हक़ीक़त को समझने में बहुत मदद मिलेगी अतः हम यहां दोनों उपरोक्त आयतों का शाने नुजूल बयान करना चाहेंगे।सूरह बक़रा की आयत यह है :

“और जो लोग अल्लाह की राह में मारे जाएं उन्हें मुदा न कहो बल्कि वे ज़िंदा हैं लेकिन तुम्हें (उनकी बरज़ख़ी ज़िंदगी का) शऊर नहीं।”

(सूरह बक़रा, आयत 154) सूरह बक़रा की इस आयत में शोहदा को “ज़िंदा’ कहने का शाने नुजूल यह है कि जंगे बद्र में शहीद होने वाले सहाबा किराम (रजि०) के बारे में कुफ़्फ़ार ने यह कहा कि फलां फलां मर गया है और जिंदगी के ऐश व आराम से महरूम हो गया है जिसके जवाब में अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई “शहीदों को मुर्दा न कहो बल्कि वे ज़िंदा है’ रसूले अकरम (सल्ल.) से इस आयत का मतलब मालूम किया गया तो आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “शहीद की रूहें सब्ज़ परिन्दों की शक्ल में एसी कंदीलों में । रहती हैं, जो अर्श इलाही से लटकी हुई हैं जब चाहती हैं जन्नत में सैर के . लिए चली जाती हैं। फिर उन कंदीलों में वापस आ जाती है । एक बार उनके रब ने उनकी तरफ़ ध्यान फ़रमाया और पूछा “तुम्हारी कोई इच्छा है?” शोहदा की रूहों ने जवाब दिया “हम जहां चाहें जन्नत की सैर करती हैं हमें

और क्या चाहिए।” अल्लाह तआला ने तीन बार उनसे यही सवाल मालूम किया। फिर जब शोहदा की रूहों ने देखा कि जवाब दिए बिना छुटकारा नहीं तब उन्होंने जवाब दिया “ऐ हमारे रब! हम चाहती हैं कि हमारी रूहों को हमारे जिस्मों में लौटा दे यहां तक कि हम तेरी राह में दोबारा क़त्ल की जाएं।’ जब अल्लाह तआला ने देखा कि उनकी कोई इच्छा नहीं तो उन्हें छोड़ दिया।”

___ (हदीस : मुस्लिम) सूरह आले इमरान की आयत यह है :

“और जो लोग अल्लाह की राह में मारे गए उन्हें मुर्दा न समझो, वे (बरज़ज़ में) ज़िंदा हैं और अपने रब के यहां से रिक पाते हैं।”

(सूरह आले-इमरान, आयत 169)न इस आयत में शोहदा को जिंदा कहने का शाने नुज़ूल यह है कि जंगे उहुद में रसूले अकरम (सल्ल०) ने मुश्किीन मक्का से मदीना के बाहर खुले मैदान में जंग करने का फैसला फ़रमाया तो कपटियों का गिरोह यह कहते हुए जिहाद से वापस आ गया कि मदीना के अंदर रहते हुए कुफ़्फ़ारे मक्का से जंग करने की हमारी राय कुबूल नहीं की गई अतः हम जंग में शरीक नहीं होंगे। जंग के बाद कपटियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अगर हमारी राय मान ली जाती. तो मुसलमान यूं जंग में न मरते। कपटियों के इस तबसिरे का जवाब अल्लाह तआला ने इन शब्दों में दिया कि “अल्लाह की राह में क़त्ल होने वाले मुर्दा नहीं बल्कि ज़िंदा हैं और अपने रब के यहां से रिज़्क़ पाते हैं।”

सूरह आले इमरान की उपरोक्त आयत के हवाले से जंगे उहुद में शहीद होने वाले एक सहाबी हज़रत अब्दुल्लाह बिन अमरु (रजि०) की घटना भी हदीस में आती है कि हज़रत अब्दुल्लाह (रजि०) के बेटे हज़रत जाबिर (रजि०) को रसूले अकरम (सल्ल०) ने फ़रमाया “ऐ जाबिर ! क्या मैं तुझे वह बात न बताऊं जो अल्लाह तआला ने तुम्हारे बाप से की है?” हज़रत जाबिर (रज़ि०) ने कहा “क्यों नहीं?” आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “अल्लाह तआला ने किसी व्यक्ति से बिना हिजाब के बात नहीं फ़रमाई लेकिन तेरे बाप से बिना हिजाब के (अर्थात बराहे रास्त) बातचीत फ़रमाई है और कहा. है, ऐ मेरे बन्दे ! जो चाहते हो मांगो मैं तुम्हें दूंगा।” तुम्हारे बाप ने कहा “ऐ मेरे रब! मुझे दोबारा ज़िंदा फ़रमा ताकि मैं दोबारा तेरी राह में मारा जाऊं।” अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया “यह बात तो हमारी ओर से पहले ही तै हो चुकी है कि मरने के बाद दुनिया में वापसी नहीं होगी।” तेरे बाप ने फिर कहा “ऐ मेरे रब! मेरी तरफ़ से (अहले दुनिया को) मेरा यह पैग़ाम (अर्थात दोबारा ज़िंदा होकर शहीद होने की इच्छा करना) पहुंचा दीजिए।” तब अल्लाह तआला ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई “जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल हो जाएं उन्हें मुर्दा न समझो बल्कि वे ज़िंद हैं और अपने रब. के यहां रिक पाते हैं।” (सूरह आले इमरान, आयत 169) (इब्ने माजा)

सूरह बक़रा और सूरह आले इमरान को दोनों आयात की टीका से निम्नलिखित बातें मालूम होती हैं : ___1. शोहदा के जिस्म क़ब्र में होते हैं लेकिन उनकी रूह को शहादत के बाद सीधा जन्नत में पहुंचा दिया जाता है।

  1. शोहदा की रूहों का जन्नत में जाने के बाद दुनिया में वापस आना असंभव है। – किताब व सुन्नत के उपरोक्त तर्कों के साथ साथ शरीअत के निम्न

आदेशों पर भी एक नज़र डाल लीजिए, जो इस नज़रये की मज़ीद पुष्टि करते हैं कि शोहदा की बरज़ख़ी ज़िंदगी इस दुनिया की ज़िंदगी जैसी नहीं है।

  1. शोहदा, औलिया और सुल्हा (नेक लोगों) के मरने के बाद उनकी बेवाओं को उसी तरह दूसरा निकाह करने की इजाज़त है जिस तरह आम मुसलमानों के मरने के बाद उनकी बेवाओं को दूसरा निकाह करने की इजाज़त है। अगर शोहदा, औलिया और सुल्हा जिंदा हैं तो उनकी बेवाओं को दूसरे निकाह करने की इजाज़त क्यों दी गई है?
  2. शोहदा, औलिया और सुल्हा के मरने के बाद उनकी मीरास भी उसी तरह बांटी जाती है जिस तरह आम मुसलमानों के मरने के बाद उनकी मीरास तक़्सीम की जाती है। अगर शोहदा, औलिया और सुल्हा जिंदा हैं तो उनकी मीरास बांटने का हुक्म क्यों दिया गया है?
  3. शोहदा, औलिया और सुल्हा के मरने के बाद उनके लिए इसी तरह नमाज़े जनाज़ा में दुआएं मग़फ़िरत की जाती है जिस तरह आम मुसलमानों के मरने के बाद उनकी नमाज़े जनाज़ा में दुआए मग़फ़िरत की जाती है।
  4. शोहदा, औलिया और सुल्हा को मरने के बाद इसी तरह क़ब्र में दफ़न किया जाता है जिस तरह आम मुसलमानों को मरने के बाद क़ब्र में दफ़न किया जाता है। अगर शोहदा, औलिया और सुल्हा मरने के बाद इस दुनिया जैसी ज़िंदगी की तरह ही जिंदा हैं तो फिर उन्हें दफ़न करने का हुक्म क्यों दिया गया? … शोहदा की बरज़ख़ी ज़िंदगी के बारे में किताब व सुन्नत का मौक़िफ़ (नज़रया) इतना स्पष्ट और बिला शक व शुब्हा है कि एक आम पढ़ा लिखा मुसलमान भी यह समझ सकता है कि अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०)

के इरशादात के अनुसार शोहदा, औलिया और सुल्हा की रूहें क़ब्रों में नही हैं, बल्कि जन्नत में या इल्लिय्यीन में हैं और वे जन्नत या इल्लिय्यीन से वापस दुनिया में आ सकती हैं न किसी पुकारने वाले की पुकार सुन सकती हैं, न किसी मुरादें मांगने वाले की मुरादें पूरी कर सकती हैं न किसी को मुराक़बे (ध्यानमग्नता) से या मुकाशिफ़े से मिल सकती हैं न किसी से बातचीत कर सकती हैं। ऐसा बातिल बेबुनियाद और गुमराहकुन दावा करने की हिम्मत केवल वही व्यक्ति कर सकता है जिसके सामने सिर्फ और सिर्फ़ दुनियावी मफ़ादात, दुनियावी माल व दौलत और इज़्ज़त व जाह जैसी चीजें हों और वह अल्लाह के सामने जवाबदेही को बिल्कुल ही भूला हुआ हो। रसूले अकरम (सल्ल0) की बरजजी जिंदगी :

रसूले अकरम (सल्ल.) की बरज़ख़ी ज़िंदगी के बारे में मुसलमानों में दो गिरोह पाए जाते हैं। एक गिरोह के नज़दीक रसूले अकरम (सल्ल०) अपनी क़ब्र में उसी तरह ज़िंदा हैं जिस तरह इस दुनिया में ज़िंदा थे। दूसरे गिरोह का अक़ीदा यह है कि रसूले अकरम (सल्ल०) को इसी तरह मौत आई जिस तरह दूसरे इंसानों को आती है अतः अब वह ज़िंदा नहीं बल्कि मर चुके हैं।

__ पहले गिरोह के अक़ीदों की कुछ झल्कियां देखिए : ___ 1. अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम की हयात (बरज़ख़ी) हक़ीक़ी, हिस्सी व दुनियावी है उन पर तस्दीक़ वायदा अलहिया के लिए मात्र एक आन की आन मौत तारी होती है। फिर फ़ौरन उनको वैसे ही ज़िंदगी अता फ़रमा दी जाती है।

  1. हुजूर (अलैहि०) की जिंदगी और मौत में कोई अन्तर नहीं, अपनी उम्मत को देखते हैं और उनके हालात, नियतों, इरादों और दिल की बातों को जानते हैं। ___3. अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम की कुबूरे मुतहरा में अज़वाज
  2. मल्फ़्ज़ात अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी, हिस्सा 3, सफ़ा 276, 2. खालिस ऐतक़ाद, सफ़ा 39,मुतहरा (पवित्र पत्नियां) पेश की जाती हैं और वे उनसे फ़ायदा हासिल करते हैं।’
  1. इमाम व कुतुब सय्यदना अहमद रफ़ाई (रह०) रसूले अकरम (सल्ल0) के रोज़ा अक़दस के सामने खड़े हुए और कहा मुबारक हाथ अता हो कि मेरे लब उससे बेहरा पाएं चुनांचे नबी अकरम (सल्ल0) का मुबारक हाथ रोज़ा शरीफ़ में से ज़ाहिर हुआ और इमाम रफ़ाई ने उस पर बोसा दिया।
  2. यह साढ़े छः बजे (शाम) का समय था कि बारगाह नुबूवत सजी थी, मुझे लगभग पच्चीस साल हुए हैं कि बारगाहे नुबूवत की हाज़िरी से मुस्तफ़ीद हूं। शैखेन करीमीन अमीरुल मोमिनीन सय्यदना हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) और सय्यदना हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि०) को बहुत ज़्यादा मुतवज्जह पाया। ख़ास एहतिमाम में हज़रत जी (मौलाना अल्लाह यार खान) को घिरा पाया में बेनवा हमरिकाब (अजनबी मुसाफ़िर) था बहुत शानदार और अजीब तरह का लिबास हज़रत के ज़ैबतन था। सर पर ताज जगमगा रहा था। खुसूसी निशस्त (बैठने की जगह) बनी श्री। नबी रहमत तबस्सुम कुनां (मुस्कुराहटों से) अबरे रहमत बरसा रहे थे और मैं सोच रहा था कि इज्ज़त अफ़ज़ाई जो एक बिल्कुल अनोखी तर्ज पर है शायद हज़रत जी को कोई बहुत ही ख़ास मंसब अता हो रहा था यह हालत साढ़े छः बजे से पोने आठ बजे तक रही।
  1. मेरी बैअत बातिन, बिला वास्ता स्वयं रसूल (सल्ल०) से इस तरह हुई कि मैंने देखा हुजूर एक बुलन्द जगह पर बैठे हैं और सय्यद अहमद शहीद का हाथ आप (सल्ल.) के मुबारक हाथ में है और मैं भी इसी मकान में बवजह अदब दूर खड़ा हूं। हज़रत सय्यद ने मेरा हाथ पकड़ कर हुजूर के हाथ में दे दिया।
  2. मल्फ़ज़ात अहमद रज़ा खान बरेलवी, हिस्सा 3, सफ़ा 276, 2. मज्मूआ रसाइल अहमद रज़ा खान बरेलवी, जिल्द 1, सफ़ा 173, 3. इरशादुस्सालिकीन, हिस्सा 1, हज़रत मौलाना मुहम्मद अकरम, सफ़ा 19, 4. शमाइम इमदादिया हाजी इमदादुल्लाह, सफ़ा 108,
  3. हज़रत जी (मौलाना अल्लाह यार ख़ान) आम मज्लिस में ज़िक्र फ़रमाया करते थे कि मुझे नबी (सल्ल०) ने मुंढी हुई दाढ़ी वाले किसी व्यक्ति को (दरबार नबवी में) साथ लाने से मना फ़रमाया हालांकि हज़रत जी भी बिल इरादा यह नहीं करते थे मगर उसके बाद तो यह हाल हो गया कि दरबार नबवी की हाज़िरी के समय ख़ास ख्याल रखा जाता था और रखा जाता है कि कोई ऐसा साथी साथ न चला जाए जिसकी दाढ़ी मुंढी हो।’ ___इयातुन्नबी (सल्ल०)’ का अक़ीदा रखने वाले हज़रात के दुआवी की ये चन्द मिसालें हैं जो हमने यहां नक़ल की हैं। अब आइए किताब व सुन्नत की रोशनी में विश्लेषण अर्थात तज्ज़िया करें कि ये अक़ीदे सही हैं या ग़लत?

आप (सल्ल0) की वफ़ात मुबारक (मृत्यु) के बारे में किताब व सुन्नत के हक़ाइक़ निम्नलिखित हैं :

  1. सूरह जुमर में इरशादे मुबारक है “ऐ मुहम्मद ! बेशक तुम भी मरने वाले हो और ये भी मरने वाले हैं।”

(आयत 30) ____ इस आयते मुबारका में अल्लाह तआला ने मरने के लिए जो शब्द आम लोगों के लिए प्रयोग किया है वही शब्द नबी अकरम (सल्ल0) के लिए भी इस्तेमाल फ़रमाया है जिसका मतलब यह है कि जैसी मौत दूसरे लोगों की हुई है वैसी ही मौत रसूले अकरम (सल्ल0) की हुई।

  1. सूरह अंबिया में इरशाद बारी तआला है “तुमसे पहले भी हमने किसी इंसान को हमेशा की ज़िंदगी नहीं दी क्या तुम मर जाओगे तो ये हमेशा ज़िंदा रहेंगे?”

. (आयत 34) इस आयते करीमा में अल्लाह तआला ने दो बातें स्पष्ट फ़रमाई हैं पहली यह कि आपसे पहले जो अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम गुज़र चुके हैं उन पर भी मौत आई। दूसरी यह कि तुम पर भी मौत आने वाली है, अबदी जिंदगी न हमने तुमसे पहले अंबिया को दी न तुम्हें देंगे।

  1. जंगे उहुद में आप (सल्ल0) की शहादत की खबर फैल गई तो सहाबा किराम मैदाने जंग में मायूस होकर बैठ गए जिस पर अल्लाह रब्बे
  2. इरशादुस्सालिकीन, हिस्सा 1, सफ़ा 80,

करीम ने यह आयत नाज़िल फ़रमाई “क्या अगर मुहम्मद (सल्ल०) (तबई मौत) मर जाएं या (मैदाने जंग में) क़त्ल कर दिए जाएं तो तुम लोग उलटे पांव फिर जाओगे? (सूरह आले इमरान, आयत 144) अगर कुछ क्षण मरने के बाद फिर नबी-ए-अकरम (सल्ल०) को वही दुनिया वली ज़िंदगी मिलने वाली थी तो फिर इरशाद मुबारक यूं होना चाहिए था कि फ़िक्र न करो, मरने या क़त्ल होने के बावजूद मुहम्मद (सल्ल०) तुम्हारे बीच मौजूद रहेंगे। तुम्हें मायूस होने की ज़रूरत नहीं। लेकिन ऐसा नहीं फ़रमाया गया। ___4. सूरह आले इमरान की आयत में अल्लाह पाक ने पहले अंबिया का हवाला देते हुए इरशाद फ़रमाया कि उन्हें भी मौत आई अतः तुम्हें भी आएगी। पहले अंबिया में से दो की मौत की घटना स्वयं कुरआन मजीद में बयान फ़रमाई गई है जो सराहतन (वज़ाहत के तौर पर) अंबिया की मौत की पुष्टि करती है। सूरह सबा में हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के बारे में अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि वह लाठी के सहारे खड़े थे कि उन्हें मौत आ गई और वे जिन्नात जिन्हें परोक्ष ज्ञान का दावा था (या जिनके बारे में लोगों को गुमान था कि उन्हें इल्म गैब है) को लम्बी अवधि तक यह मालूम ही न हो सका कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम मर चुके हैं। इरशाद बारी तआला है “फिर जब हमने सुलैमान अलैहिस्सलाम पर मौत का हुक्म भेजा तो जिन्नात को उसकी मौत का पता देने वाली चीज़ उस घुन के सिवा कोई न थी जो उसके असा को खा रही थी फिर जब सुलैमान गिर पड़ा तो जिन्नों पर यह बात खुल गई कि अगर वे रौब (परोक्ष) जानने वाले होते तो इस ज़िल्लत भरे अज़ाब का शिकार न रहते।” (सूरह सबा, आयत 14)

कुछ विद्वानों के निकट हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की मौत के बाद घुन को असा खाने में एक साल का अर्सा लगा अगर उसे छः माह भी शुमार करें तब भी अंबिया-ए-किराम पर क्षण भर के लिए मौत आने और फिर दुनियावी जिंदगी दिए जाने का दावा ग़लत साबित करने के लिए यह अर्सा काफ़ी है। फ़रमाने इलाही के अनुसार हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम मरने के बाद जब तक खड़े रहे अपने असा के सहारे खड़े रहे अगर वे ज़िंदा न थे तो असा के सहारे की क्या ज़रूरत थी? जब असा को घुन ने ख़त्म कर दियातो हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम नीचे गिर गए, अगर वे ज़िंदा थे तो नीचे क्यों गिर गए

सूरह बक़रा में अल्लाह तआला ने हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम की मौत का ज़िक्र करते हुए इरशाद फ़रमाया कि जब उनकी मौत का समय क़रीब आया तो अपने बेटों को बुलाया और पूछा “मेरे बाद तुम किसकी इबादत करोगे?” बेटों ने जवाब दिया “हम उसी एक इलाह (अल्लाह) की बन्दगी करेंगे जो आपका और आपके पूर्वजों इबराहीम, इस्माईल और इसहाक़ का इलाह है।” (सूरह बक़ग, आयत 133) अगर अंबिया अलैहिमुस्सलाम क्षण भर की मौत के बाद दोबारा हयाते दुनियावी के साथ ज़िंदा कर दिए जाते हैं तो फिर हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम अपनी मौत के बाद औलाद के बारे में चिंतित क्यों हुए और उनसे यह सवाल पूछने की ज़रूरत क्यों महसूस फ़रमाई कि मेरे बाद तुम किसकी बन्दगी करोगे? अगर अंबिया मरने के बावजूद ज़िंदा होते हैं तो फिर बेटों को जवाब तो यह देना चाहिए था कि अब्बा जान! आप हमारे बारे में चिंतित क्यों हैं आप दोबारा हयाते दुनियावी के साथ वापस आने ही वाले हैं आकर देख ही लेंगे कि हम किसकी बन्दगी कर रहे हैं। मालूम होता है न बाप का यह अक़ीदा था न बेटों का कि मरने के बाद अंबिया को दोबारा दुनियावी ज़िंदगी दी जाती है बल्कि उनका ईमान उसी मौत पर था जो पहले अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम पर आई जिसके बाद इस दुनियावी ज़िंदगी के साथ कभी कोई वापस नहीं आता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *