Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 6

  1. हज़रत जुबैर बिन मुतअम (रज़ि०) रावी हैं कि एक औरत रसूलुल्लाह (सल्ल०) की सेवा में हाज़िर हुई और कुछ बात कही, आप (सल्ल०) ने उसे दोबारा किसी समय आने का हुक्म दिया। औरत ने कहा “या रसूलल्लाह (सल्ल0)! अगर मैं आऊं तो आप मौजूद न हों? (रावी कहते हैं) मानो उस औरत का इशारा आप (सल्ल0) की मौत की तरफ़ था। आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया, अगर मुझे न पाओ तो अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) से बात कर लेना।”

. (बुख़ारी व मुस्लिम) • उपरोक्त हदीस से दो बातें साफ़ साफ़ मालूम हो रही हैं।

अहदे नबी (सल्ल०) में सहाबा किराम और सहाबियात (रज़ि०) का अक़ीदा यह था कि रसूले अकरम (सल्ल0) के मरने के बाद न हम उन्हें अपनी बात सुना सकते हैं न उनकी सुन सकते हैं और न वह हमारी रहनुमाई या मदद कर सकते हैं।

। रसूले अकरम (सल्ल०) ने भी उम्मत को यह तालीम कभी नहीं दी कि अंबिया मरते नहीं अगर मैं मर जाऊं तो मेरी क़ब्र पर आकर बात कर लेना या मरने के बाद भी मैं दुनियावी ज़िंदगी की तरह ज़िंदा रहूंगा अतः आकर तुम्हारी बात सुनूंगा बल्वि फ़रमाया मेरी मौत की सूरत में अबूबक्र (रज़ि०) से बात कर लेना।

  1. रसूले अकरम (सल्ल0) की मृत्यु के मौके पर सहाबा-ए-किराम (रज़ि०) के बीच भी यह बहस पैदा हो गई थी कि आप (सल्ल०) पर मौत वालेअ हुई या नहीं? हज़रत उमर (रज़ि०) जैसा किताब व सुन्नत का आलिम, दूर अंदेश और फ़हम व फ़िरासत रखने वाला सहाबी भी इस ग़लतफ़हमी का शिकार हो गया था कि “अल्लाह की क़सम ! अल्लाह के रसूल फ़ौत नहीं हुए और न ही उन्हें मौत आएगी यहां तक कि आप (सल्ल०) कपटियों का ख़ातमा कर दें।” (इब्ने माजा) इस अवसर पर हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) ने वह महान ऐतिहासिक ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया जिसने क़यामत तक के लिए “हयातुन्नबी’ का मसला हल कर दिया। आप (रज़ि०) के अल्फ़ाज़ मुबारक ये थे “अर्थात जो व्यक्ति अल्लाह तआला की इबादत करता था उसे मालूम होना चाहिए कि अल्लाह तआला ज़िंदा है उसके लिए मौत नहीं और जो व्यक्ति मुहम्मद (सल्ल०) की इबादत करता था उसे मालूम होना चाहिए कि मुहम्मद (सल्ल०) मर चुके हैं।” (इब्ने माजा) हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) का ख़ुत्बा सुनने के बाद हज़रत उमर (रज़ि०) फ़रमाते हैं “वल्लाह ! अबूबक्र (रजि०) का ख़ुत्बा सुनकर मेरी तो कमर ही टूट गई है मुझसे मेरे पांव नहीं उठाए जा रहे थे मैं ज़मीन की तरफ़ लुढ़क कर रह गया क्योंकि अब मुझे यक़ीन हो चुका था कि नबी अकरम (सल्ल०) मर चुके हैं।”

. (हदीस : बुख़ारी) __7. रसूले अकरम (सल्ल.) की मृत्यु से अहले बैअत और सहाबा किराम

(रज़ि०) पर दुख व सदमे का भारी पहाड़ आ पड़ा। हज़रत फ़ातिमा (रज़ि०) ने बड़े दुखी लहजे में हज़रत अनस (रज़ि०) से मालूम किया, अनस ! तुम लोगों ने रसूले अकरम (सल्ल०) पर मिट्टी डालना कैसे गवारा कर लिया? हज़रत साबित (रज़ि०) आप (सल्ल०) की वफ़ात के मौके पर हज़रत फ़ातिमा (रजि०) का दुख बयान करते स्वयं ज़ारो क़तार रोने लगते। हज़रत अनस (रज़ि०) फ़रमाते हैं कि आप (सल्ल0) की मृत्यु से मदीना की हर चीज़ पर अंधेरा छा गया आप (सल्ल0) की तदफ़ीन के साथ ही हमने अपने दिलों को नूरे नुबूवत से महरूम पाना शुरू कर दिया। सवाल यह है कि अगर रसूले अकरम (सल्ल0) की मृत्यु क्षण भर के लिए थी तो अहले बैअत, शैख्नेन और सहाबा किराम (रज़ि०) की दुनिया क्यों अंधेर हो गई। मज़बूत व कठोर जिस्म के मालिक हज़रत उमर (रज़ि०) की कमर क्यों टूट गई? .

कुरआन व हदीस के उपरोक्त तर्कों से हटकर आइए एक और पहलू से इस मसले का जाइजा (विश्लेषण) लें।

आप (सल्ल०) के मरने के बाद सक़ीफ़ा बनी साअदा में ख़िलाफ़त के बारे में झगड़ा होता रहा अहदे सिद्दीक़ी (रज़ि०) में मुनकिरीन ज़कात और इरतिदाद (इस्लाम से फिर जाने वालों) के फ़ितने उठे, हज़रत उसमान (रज़ि०) की मज़लूमाना शहादत हुई, सहाबा किराम (रज़ि०) के बीच जंगे जमल और जंगे सिफ़्फ़ीन जैसी खू रेज़ जंगें हुईं। करबला में आप (सल्ल०) का प्यारा नवासा इंतिहाई बेदर्दी के आलम में शहीद कर दिया गया, आज भी दुनिया के विभिन्न भागों में मिल्लते इस्लामिया पर कैसी कैसी क़यामतें टूट रही हैं फिर यह कैसी “हयात’ है कि आप (सल्ल०) ने न तो ख़िलाफ़त के मसले पर सहाबा किराम (रज़ि०) की रहनुमाई फ़रमाई न मुनकिरीने ज़कात और इरतदाद के फ़ितनों में हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) को कोई हिदायात दीं, न अपने क़ाबिले फ़ख्न दामाद अमीर उसमान (रज़ि०) की मदद फ़रमाई न जंगे जमल और जंग सिफ़्फ़ीन रुकवाई न करबला में अपने प्यारे नवासे को बचाया और आज भी जा बजा मिल्लते इस्लामिया काफ़िरों के सितम का तख्ता-ए-मुश्क़ बनी हुई है लेकिन आप (सल्ल०) सब कुछ जानते बूझते ख़ामोश हैं और अपनी उम्मत की रहनुमाई फ़रमाते हैं न मदद फ़रमाते

हैं। ज़ालिमों को रोकते हैं न उनके ख़िलाफ़ कोई हुक्म सादिर फ़रमाते हैं जबकि दूसरी तरफ़ औलिया-ए-किराम और सूफ़िया अज़्ज़ाम के साथ महफ़िलें आयोजित फ़रमा रहे हैं, उन्हें मनासिब और ख़िलअतों से नवाज़ रहे हैं और पूरी दुनिया में होने वाली मजालिस दुरूद व सलाम में शिरकत फ़रमा रहे हैं?

हम पूरी निष्ठा और दर्दमंदी के साथ हयातुन्नबी के मानने वाले हज़रात की सेवा में गुज़ारिश करेंगे कि बराहे करम ! गौर फरमाएं “हयातुन्नबी’ का अक़ीदा पेश करके वे रसूले रहमत (सल्ल.) की अज़्मत और इज़्ज़त में वृद्धि कर रहे हैं या आप (सल्ल0) की इज़्ज़त और अज़्मत की कोई दूसरी ही धारणा पेश फ़रमा रहे हैं?

हक़ीक़त यह है कि आप (सल्ल0) की बरज़ख़ी जिंदगी के बारे में जो बात किताब व सुन्नत से साबित है वह यह है कि आप (सल्ल०) की बरज़ख़ी ज़िंदगी दूसरे तमाम अंबिया, शोहदा और औलिया से बढ़कर उच्च, श्रेष्ठ और अकमल है जो न इस दुनिया की जिंदगी जैसी है न आख़िरत की ज़िंदगी जैसी है बल्कि उसकी असल हालत केवल अल्लाह तआला ही जानते हैं। आप (सल्ल०) का शरीर मदीना मुनव्वरा की क़ब्र मुबारक में उसी तरह तरो ताज़ा मौजूद है जिस तरह आज से चौदह सौ साल पहले दफ़नाते समय था और क़यामत तक उसी तरह तरो ताज़ा और बेदाग़ रहेगा आप (सल्ल०) की रूह मुबारक जन्नतुल फ़िरदौस के आलातरीन मक़ाम पर इर्श इलाही के क़रीब मौजूद है। अल्लाह तआला जो चाहता है उन्हें खिलाता और पिलाता

एक ग़लतफ़हमी का निवारण :

क़ब्र में रसूले अकरम (सल्ल0) की दुनियावी ज़िंदगी जैसी ज़िंदगी साबित करने के लिए कुछ लोग निम्नलिखित हदीसें पेश फ़रमाते हैं :

  1. जब कोई व्यक्ति मुझे सलाम कहता है तो अल्लाह तआला मेरी रूह वापस लौटाता है और मैं जवाब देता हूं। (हदीस : अबू दाऊद)
  2. मुझ पर कसरत से दुरूद भेजा करो अल्लाह तआला मेरी क़ब्र पर

क़ब्र का बयान एक फ़रिश्ता मुक़र्रर फ़रमाएगा जब मेरा कोई उम्मती मुझ पर दुरूद भेजेगा तो यह फ़रिश्ता मुझे कहेगा “ऐ मुहम्मद ! फ़लां बिन फ़ला ने फलां समय आप पर दुरूद भेजा है।”

(हदीस : देलमी) __- 3. जुमा के दिन कसरत से मुझ पर दुरूद भेजा करो जो आदमी जुमा के दिन मुझ पर दुरूद भेजता है वह मेरे सामने पेश किया जाता है।

(हदीस : हाकिम, बैहेक़ी) शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी (रह०) ने पहली दोनों हदीसों को हसन और तीसरी हदीस को सहीह क़रार दिया है। इन अहादीस से “हयातुन्नबी’ साबित करने वाले हज़रात उसी ग़फ़तफ़हमी का शिकार हैं जिसका उल्लेख हम इससे पहले “बरज़ख़ी ज़िंदगी कैसी है?” के उनवान (शीर्षक) से कर चुके हैं। इस हक़ीक़त से इंकार की तो कोई गुंजाइश ही नहीं कि रसूले अकरम (सल्ल.) बरज़ज़ में तमाम अंबिया, शोहदा और औलिया से आला, अफ़ज़ल और अकमल जिंदगी गुज़ार रहे हैं लेकिन बरज़ख़ी ज़िंदगी इस दुनिया की जिंदगी से चूंकि बिल्कुल भिन्न है अतः इसका इस दुनिया की जिंदगी से मुक़ाबला करना ही ग़लत है। इंसान को वह फ़हम और शऊर ही नहीं दिया गया जिससे वह इस दुनिया में रहकर बरज़ख़ी ज़िंदगी के मामलात को समझ सके।

(देखें सूरह बक़रा, आयत 154) – गौर फरमाइए! लोगों के सलाम का जवाब देने के लिए आप (सल्ल०) की रूह मुबारक को जिस्म में लौटाने की कई सूरतें हो सकती हैं। जैसे हर व्यक्ति के सलाम पर आप (सल्ल.) की रूह मुबारक जिस्म में लौटाई जाए या दिन में एक बार किसी समय लौटाई जाए या हफ़्ते में एक बार या महीने में या साल में एक बार और तमाम लोगों का इकट्ठा सलाम आप (सल्ल०) को पहुंचा दिया जाए। और आप (सल्ल०) उन सबको इकट्ठा जवाब इरशाद फ़रमा दें। रूह जिस्म मुबारक में लौटाने की इनमें से कोई एक सूरत है या इन सबके अलावा कोई और ही सूरत है यह हक़ीक़त केवल अल्लाह तआला ही जानते हैं यही मामला दरूद शरीफ़ का है क्या वह रोज़ाना आप (सल्ल०) तक पहुंचाए जाते हैं या जुमा के दिन जैसा कि आप (सल्ल.) का इरशाद मुबारक है। हक़ीक़त यह है कि ये सारे मामलात ऐसे हैं जिनका इल्म अल्लाह के सिवा किसी को नहीं। हमारे लिए इन तमाम बातों पर ईमान लाना वाजिब है, लेकिन उनकी हालत को समझना हमारे लिए मुमकिन ही नहीं और ज़रूरी भी नहीं। किसी बात पर ईमान लाना उसकी हालत को समझने की कोई शर्त नहीं है कितनी ही बातें ऐसी हैं जिन पर हमारा ईमान है लेकिन उनकी कैफ़ियत को हम इस दुनिया की ज़िंदगी में समझने से बिल्कुल बेबस हैं। जैसे रात के आख़िरी हिस्से में अल्लाह तआला के पहले आसमान पर नाज़िल होने पर हमारा ईमान है लेकिन उसकी कैफ़ियत मालूम नहीं। किरामन कातिबीन के कर्म पत्र तैयार करने पर हमारा ईमान है लेकिन उसकी कैफ़ियत हमें मालूम नहीं । क़यामत के दिन कर्मों के तुलने पर हमारा ईमान है लेकिन उसकी कैफ़ियत हमें मालूम नहीं। रसूले अकरम (सल्ल०) के मेराज पर हमारा ईमान है लेकिन उसकी कैफ़ियत मालूम नहीं। ऐसी कुछ एक नहीं बल्कि सैकड़ों मिसालें दी जा सकती हैं जिन पर हमारा ईमान है लेकिन उनकी कैफ़ियत हमें मालूम नहीं। बरज़ख़ी ज़िंदगी में रसूले अकरम (सल्ल0) की रूह मुबारक का शरीर में लौटाया जाना, आप (सल्ल०) का लोगों के सलाम का जवाब देना, फ़रिश्तों का आप (सल्ल०) तक लोगों का दुरूद पहुंचाना, जुमा के दिन का दुरूद आप (सल्ल.) के सामने पेश किया जाना ये सारे उमूर भी उन्हीं में से हैं जिनकी कैफ़ियत और हक़ीक़त को समझना हमारे लिए संभव नहीं लेकिन उन पर ईमान रखना वाजिब है, अतः उन अहादीस से न तो रसूले अकरम (सल्ल०) का अपनी क़ब्र मुबारक में ज़िंदा होना साबित होता है और न ही उन अहादीस से यह क़यास (अनुमान) सही है कि चूंकि आप (सल्ल०) हमारा सलाम सुनते और उसका जवाब देते हैं अतः हमारी दीगर दाद फ़रियाद और दुआ पुकार भी सुनते हैं और उसका जवाब देते हैं या हमारी मुरादें और हाजतें पूरी फ़रमाते हैं या हमारे लिए इस्तग़फ़ार करते हैं या क़ब्र से बाहर तशरीफ़ लाकर औलिया किराम के साथ मजालिस आयोजित फ़रमाते हैं। ये तमाम क़यासात (अनुमान) बिलकुल ग़लत और गुमराहकुन हैं। किताब व सुन्नत की शिक्षाओं से उनका कोई संबंध नहीं जितनी बात अल्लाह और उसके रसूल (सल्ल०) ने बताई है वह बिला झिझक कहनी चाहिए और उस पर ईमान लाना चाहिए जो बात अल्लाह और उसके रसूल ने नहीं फ़रमाई अपने अनुमान से कोई बात बनाकर अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ मंसूब (जोड़ना) करने से हज़ार बार पनाह मांगनी चाहिए। इरशाद नबवी (सल्ल०) है “जिसने जान बूझकर मेरी तरफ़ झूठ मंसूब किया वह अपना ठिकाना जहन्नम में बना ले।”(हदीस : बुख़ारी व मुस्लिम) अज़ाबे क़ब्र रूह को होता है या जिस्म को?

क़ब्र में सवाब या अज़ाब की तफ़सीलात पढ़ने के बाद क़ुदरती तौर पर । यह सवाल ज़ेहन में आता है कि आलमे बरज़न में सवाब या अज़ाब जिस्म को होता है या रूह को या दोनों को?

विद्वानों ने इस विषय पर बड़ी बहसें की हैं, कुछ हज़रात का ख्याल है कि जिस्म को कुछ अर्से के बाद मिट्टी खा जाती है जबकि सवाब या अज़ाब तो क़यामत तक बाक़ी रहता है अतः यह सवाब या अज़ाब रूह को होता है। कुछ लोगों का ख्याल यह है कि बरज़ज़ में सवाब या अज़ाब का संबंध चूंकि क़ब्र से है क़ब्र मोमिन पर कुशादा की जाती है क़ब्र में रौशनी की जाती है। काफ़िर पर अज़दहे क़ब्र में ही मुसल्लत किए जाते हैं, क़ब्र की दीवारें बार बार मय्यित को जकड़ती हैं और क़ब्र में केवल जिस्म ही होता है अतः सवाब या अज़ाब जिस्म को होता है चाहे उसका कोई एक ज़र्रा ही बाक़ी रह गया हो। कुछ लोगों का विचार यह है कि अलग अलग होने के बावजूद रूह और जिस्म के बीच एक गैर मुरई संबंध क़ायम रहता है अतः सवाब या अज़ाब दोनों को होता है।

हमारे नज़दीक यह मसला भी उन्हीं मसाइल में से है जिन पर ईमान लाना वाजिब है लेकिन उनकी कैफ़ियत को समझना संभव नहीं अल्लाह तआला इस बात पर पूरी तरह क़ादिर हैं कि चाहें तो मिट्टी में रिल मिल जाने वाले जिस्म को सवाब या अज़ाब दें चाहें तो रूह को दें और चाहें तो

रूह और जिस्म दोनों को दें। हमारे नज़दीक यह एक बेमक़सद और लाहासिल बहस है जिसमें पड़कर न हम अपना समय नष्ट करना चाहते हैं न पाठकों का। अगर इस बहस का हमारी हिदायत के साथ कुछ भी संबंध होता तो रसूले रहमत (सल्ल0) इसका ज़रूर स्पष्टीकरण फ़रमा देते अतः हमें इतनी बात पर ही इक्तफ़ा करना चाहिए जितनी अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने बताई कि अज़ाबे क़ब्र हक़ है उससे पनाह मांगा करो।

आँखें रखने वालो! इबरत हासिल करो (अज़ाबे क़ब्र और सवाबे क़ब्र की कुछ शिक्षाप्रद घटनाएं)

अज़ाबे क़ब्र या सवाबे क़ब्र की कुछ घटनाएं कभी कभी अख्बारों और जराइद में प्रकाशित होती रहती हैं या सुनने में आती रहती हैं। ऐसी घटनाओं की पुष्टि या तीद करना चूंकि मुश्किल होता है अतः उन्हें तहरीर करने में मुझे संकोच था इसी दौरान बुख़ारी शरीफ़ में हज़रत अनस (रज़ि०) की बयान की हुई घटना नज़र से गुज़री जिससे इस बात का कुछ इत्मीनान हो गया कि ख़िलाफ़े आदत वाक़िआत का ज़ाहिर होना कम से कम नामुमकिन नहीं। शायद बन्दों पर रहम फ़रमाने वाली ज़ात ऐसे वाक़िआत के ज़रिए कल्बे सलीम रखने वाले लोगों के लिए सामाने इबरत मुहैया करना चाहती हो। निम्न घटनाएं इसी उद्देश्य के लिए शामिले इशाअत किए जा रहे हैं। उम्मीद है कि उन्हें पढ़ने के बाद सईद रूहें इनसे इबरत हासिल करेंगी फिर भी इन घटनाओं की सेहत की ज़िम्मेदारी रावियों पर है या उन रिसालों व जरीदों पर जिनका साथ में हवाला दिया गया है। 1. अहदे नबवी सल्ल० की घटना :

हज़रत अनस (रजि०) रिवायत करते हैं कि एक ईसाई आदमी मुसलमान हुआ और उसने सूरह बक़रा और सूरह आले इमरान पढ़ ली और . रसूले अकरम (सल्ल0) के लिए वह्य की किताबत करने लगा, बाद में . इस्लाम से फिर गया और कहने लगा “मुहम्मद (सल्ल०) को तो किसी बात का पता ही नहीं जो कुछ मैं लिख देता हूं बस वही कह देते हैं।” अल्लाह तआला ने जब उसे मौत दी तो ईसाइयों ने उसे दफ़न कर दिया। सुबह हुई तो लोगों ने देखा कि क़ब्र ने उसे बाहर निकाल फेंका है। ईसाइयों ने कहा

यह मुहम्मद (सल्ल0) और उनके साथियों का काम है क्योंकि यह उनके दीन से भाग कर आया है अतः उन्होंने इसकी ऊब खोदकर लाश बाहर फेंकी है। अगले दिन ईसाइयों ने नई क़ब्र खोदकर उसे पहले की निस्वत ज़्यादा गहरा दफ़न किया, लेकिन जब सुबह हुई तो लोगों ने देखा कि क़ब्र ने फिर उसे बाहर निकाल फेंका है। ईसाइयों ने फिर आरोप लगाया कि यह मुहम्मद (सल्ल०) और उनके साथियों का काम है चूंकि यह उनके दीन से भाग कर आया है अतः उन्होंने इसकी क़ब्र खोदकर लाश बाहर निकाल फेंकी है। ईसाइयों ने फिर उसकी क़ब्र बनाई और उसे इतना गहरा खोदा जितना खोद सकते थे अगली सुबह क़ब्र ने फिर उसे निकाल बाहर फेका! तब ईसाइयां को यक़ीन हो गया कि यह मुसलमानों का काम नहीं और उन्होंने उसकी लाश ऐसे ही छोड़ दी। 2. क़ब्र का बिच्छू :

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान महवरी ताक़तों की हिन्दुस्तान पर बमबारी के दौरान अंग्रेज़ी फ़ौज को सिंगापुर और बरमा में हथियार डालने पड़े। अंग्रेज़ जरनल ने हथियार डालते समय फौजियों को इजाज़त दे दी कि जो फ़ौजी फ़रार होकर जानें बचा सकते हैं वे फरार हो जाएं। फ़ौज के एक मेजर तुफ़ैल अपने एक साथी मेजर निहाल सिंह के साथ फ़रार हुए। मेजर तुफेल बयान करते हैं कि हम दोनों अंधेरी रात में घोड़ों पर सवार होकर निकले और बरमा के महाज़ से सरपट भागे, बरमा घने, गुंजान, तारीक और ख़तरनाक जंगलों का देश है जिनमें से गुज़रना बड़ा मुश्किल काम था। बहरहाल हमने अंदाज़े से हिन्दुस्तानी प्रदेश आसाम का रुख किया जहां जापानी बमबारी के बावजूद हनूज़ अंग्रेज़ी तसल्लुत बरक़रार था। घने जंगलों में हम कंकरियों से रास्ता काटते छांटते चले जा रहे थे। ‘दनों की गिनती न रातों का शमार याद रहा। खाने पीने का सामान ख़त्म होता जा रहा था। जंगली फलों और नदी नालों के पानी पर गुज़ारा होने लगा। कई बार दरिन्दों और ख़तरनाक सांपों से भी वास्ता पड़ा मगर उनसे बच बचाकर निकलते गए।

1. बुख़ारी, किताबुल मनाकिब, बाब अलामात नुबुव्वह फ़िल इस्लाम ।

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