Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 7

एक दिन सामने खुली जगह पर क़ब्रिस्तान दिखाई दिया पच्चीस तीस क़लें होंगी। एक क़ब्र से मुर्दे की लगभग आधी लाश बाहर निकली हुई, कुछ गली सड़ी और कुछ बची हुई दिखाई दी। उस पर एक छोटे साइज़ के कछुवे के बराबर बिच्छू बैठा उसे बार बार डंक मारता था और लाश से भयानक चीजें निकलती थीं बिल्कुल ऐसे ही जैसे वह भयानक बिच्छू किसी जीते जागते इंसान को काटता तो उसकी शिद्दते दर्द से चीखें निकलतीं जो जिंदा इंसानों और जानवरों को दहलाने बल्कि बेहोश करने के लिए काफ़ी होतीं। यह एक ख़ासा दहशतनाक और दहशत अंग्रेज़ मंज़र था। मेजर निहाल सिंह ने मेरे मना करने के बावजूद बिच्छू पर गोली चला दी। एक शौला सा निकला लेकिन बिच्छू पर कोई असर न हुआ। निहाल सिंह ने गोली चलाने की नीयत से दोबारा निशाना लिया तो मैंने उसे सख्ती से मना किया और अपनी राह लेने के लिए कहा, लेकिन मेजर निहाल सिंह आख़िर सिख था उसने मेरी बात सुनी अनसुनी कर दी और ज़ाहिर में क़ब्रिस्तान के एक मुर्दे को बिच्छू से बचाने के लिए दोबारा गोली दाग़ दी। फिर एक शोला सा निकला लेकिन बिच्छू पर कोई असर न हुआ। उस पर बिच्छू लाश को छोड़कर हमारी तरफ़ बढ़ा। मैंने निहाल सिंह से कहा कि अब भागो यहां से बिच्छू का लाश छोड़कर हमारी तरफ़ बढ़ना ख़तरे से खाली नहीं।

हमने घोड़े दौड़ा दिए। ख़ासी दूर आगे जाकर पीछे नज़र डाली तो बिच्छू हमारा पीछा करते हुए तेज़ी से चला आ रहा था हमने घोड़ों को फिर ऐड़ लगाई। कुछ मील आगे जाकर एक नदी सामने आ गई जो ख़ासी गहरी मालूम होती थी। हम थोड़ी देर के लिए रुककर सोचने लगे कि नदी में घोड़े डाल दें या किनारे किनारे चलकर कोई पुल, घाट आदि तलाश किया जाए, लेकिन अभी कोई फैसला न कर पाए थे कि देखा वही बिच्छू हमारे क़रीब पहुंचने ही वाला है सच तो यह है कि जंग आज़मूदा और शस्त्रधारी फ़ौजी होने के बावजूद हम पर सख्त घबराहट तारी हो गई और हमारे घोड़े टापू मारने लगे जैसे वे भी बिच्छू से भयभीत हो गए हों। बिच्छू का रुख निहाल सिंह की तरफ़ था। निहाल सिंह ने ख़ौफ़ और घबराहट के आलम में अपना घोड़ा नदी में डाल दिया उसके पीछे बिच्छू भी नदी में उतर गया। ख़ुदा जाने बिच्छू ने उसे पांव या टांग या जिस्म के किस हिस्से पर काटा कि घोड़े ने भी उस गैर मामूली क़िस्म की बला बे रहम बिच्छू के आने से ख़ौफ़ महसूस किया। उस पर कपकपी सी तारी हो गई। निहाल सिंह ने कर्बनाक चीज़ के साथ मुझे पुकारा “तुफेल ! मैं डूब रहा हूं, जल रहा हूं, मुझे बिच्छू से बचाओ, बचाओ।” मैंने भी घोड़े को नदी में डाल दिया और सहारे के लिए बायां हाथ निहाल सिंह की तरफ़ बढ़ाया जिसे उसने मज़बूती से पकड़ लिया लेकिन मुझे ऐसा महसूस हुआ कि वहां नदी का आम पानी नहीं बल्कि आग का ज़ेहरीला लावा बह रहा है जो न केवल मेरे हाथ को जला डालेगा बल्कि मेरे बाक़ी ज़िस्म को भी मकई के भुट्टे की तरह उबाल कर रख देगा मैंने होश व हवास बहाल रखे और जल्दी से फ़ौजी ककरी निकाली और अपना बायां बाजू काट कर फेंक दिया। मैंने अपने आपको निहाल सिंह की पकड़ से छुड़ा लिया था, अतः जल्दी से घोड़े समेत किनारे का रुख किया। मेजर निहाल सिंह मुझे आवाजें देते देते और दर्द से चीखते कराहते घोड़े समेत खोलते पानी की देग में डूब चुका था और पानी की सतह पर बड़े बड़े ऊंचे आतिशी बुलबुले उट रहे थे। किनारे के क़रीब पानी का तापमान नॉर्मल मालूम हुआ। _ वह क़हरे ख़ुदावंदी…..बिच्छू…..अपना काम करके जा चुका था मुझे कहीं दिखाई न दिया। अल्लाह के लश्करों में से वह अकेला एक गैबी लश्कर के मानिन्द था। उसने मुझसे कोई हस्तक्षेप नहीं किया। शायद जिधर से आया था उधर ही को अपने असल काम की तरफ़ लौट गया। 3. टेड़ी क़ब्र :

एक दिन एक पुलिस अफ़सर को दफनाया जाने लगा तो उसकी क़ब्र टेड़ी हो गई जब नई क़ब्र खोदी गई तो वह भी टेड़ी हो गई, शुरू में लोगों ने उसे गोरकुन (क़ब्र खोलने वाले) का कुसूर समझा मगर जब एक के बाद एक पांच बार क़ब्र खोदी गई और बार बार टेड़ी होती रही तो जनाज़े में शरीक लोगों ने मिलकर मय्यित के लिए मग़फ़िरत की दुआ की और पांचवीं

  1. क़ब्र का बिच्छू, उर्दू डाइजेस्ट, अप्रैल 1992 ई० ।

वार ज़बरदस्ती मय्यित क़ब्र में उतार दी गई हालांकि क़ब्र पहले की तरह ही टेडी थी। यह घटना रावलपिंडी के मशहूर क़ब्रिस्तान इत्र-अमराल में पेश आई। . 4. क़ब्र में सांप और बिच्छू :

नारंग मंडी (ज़िला शैखूपुरा) के निकट क़स्बा जयसिंह वाला में दो झगड़ने वाले ग्रुपों के बीच फ़ाइरिंग हुई जिससे तीन आदमी मर गए उनमें से एक आदमी को उसके रिश्तेदार ताबूत में बन्द करके दफ़न करने के लिए लाए और क़ब्र खोदी तो उससे सांप और बिच्छू निकल आए रिश्तेदारों ने भयभीत होकर दूर से ही क़ब्र पर मिट्टी डाल दी और ताबूत वापस ले गए। 5. क़व्र में कपकपी :

गूजरां वाला के पास वाले क़स्बे खयाली के क़ब्रिस्तान में दफ़न की जाने वाली औरत की क़ब्र में कपकपी ने इलाके में ख़ौफ़ व हिरास फैला दिया। तफ़्सीलात के अनुसार औरत को जब क़ब्र में दफ़न किया गया तो वहां मौजूद लोगों ने महसूस किया कि मरहूमा की क़ब्र लरज़ रही है कुछ लोगों ने क़ब्र के साथ कान लगाकर आवाज़ सुनी तो क़ब्र के अंदर से ठक ठक की आवाजें और धमक सुनाई दी अतएव एक मशहूर विद्वान से पूछा गया तो उन्होंने मय्यित को किसी दूसरी जगह दफ़न करने का मशवरा दिया जिस पर लोगों ने उस आलिम की मौजूदगी में ही क़ब्र खोद डाली जूं ही तख्ने हटाए गए तो विचित्र सी तेज़ क़िस्म की बू से गोरकुन (क़ब्र खोदने वाले) को के के दौरे आने लगे, जिस पर क़ब्र दोबारा बन्द कर दी गई और मय्यित के लिए मग़ाफ़िरत की दुआ की गई जिसके बाद आहिस्ता आहिस्ता कपकपी ख़त्म हो गई।

___ 1. साप्ताहिक जंग, लाहौर, 17 दिसम्बर 1990, 28 जमादी ऊला, 1411 हिजरी, कोज़ पीर

  1. दैनिक नवाए वक़्त, लाहौर, 9 अगस्त 2000 ई० । । दैनिक नवाए वक़्त, लाहौर, 23 जून 1993 ई०।

सांप, सांप :

एक ज़मींदार घराने की साहिबे हैसियत मां बाप की इकलौती बेटी को विरासत में बहुत बड़ी जायदाद, ढेरो सोना और नक़द रुपये मिले। रुपये अल्लाह की राह में खर्च करने से उसे सख्त तकलीफ़ होती अगर कोई औरत उसे मस्जिद, मदरसा आदि बनवाने या किसी यतीम और बेवा की मदद करने को कहती तो उसका चेहरा नापसंद हो जाता। मैंने आख़िरी बार उसे 1968 ई० में बिस्तर मर्ग पर बेहोशी की हालत में सिविल हॉस्पिटल लाहौर के इंतिहाई निगहदाश्त (I.C.U) वार्ड में देखा। उसकी नब्जे डूब चुकी थीं, सांस रुक रुक कर वक़्फ़ों वक़्फ़ों से आ रही थी, आंखें पथरा चुकी थीं। डॉक्टर साहब क़रीब खड़े थे ताकि उसकी मौत का सर्टिफिकेट देकर रुख्सत हों। अचानक उसके बदन ने हरकत शुरू कर दी, उसके चेहरे पर ख़ौफ़ के आसार ज़ाहिर हुए रोंगटे खड़े हो गए जिस्म से पसीना बह निकला उसके होंठ हिलने लगे। सब लोगों ने सुना कि वह थर्राई हुई आवाज़ में “सांप, सांप’ कहकर उससे बचने के अंदाज़ में हाथ पांव हिला रही थी। मैं यह नज़ारा देखकर भयभीत हो गया और डॉक्टर साहब से पूछा कि तिब्बी दृष्टिकोण से आप इसकी आख़िरी हरक़त को क्या नाम देंगे? डॉक्टर साहब ने भी हैरत का इज़हार करते हुए कहा कि मेरे लिए यह नज़ारा किसी तिब्बी मोजिज़े से कम नहीं। यह हरकत और सांप सांप की आवाजें बिला शुब्ह एक मय्यित के मुंह से निकली हैं इस गहरी बेहोशी के आलम में वह बोल सकती थी न ‘हरकत कर सकती थी।’ __ ये कुछ घटनाएं अज़ाबे क़ब्र (या बरज़ख़) से संबंधित थीं अब कुछ घटनाएं सवाबे क़ब्र से संबंधित भी पढ़ लीजिए। 1. क़ब्र से ख़ुश्बू : .

डॉक्टर सय्यद ज़ाहिद अली वास्ती रावी हैं “मैं वन यूनिट के ज़माने

__ 1. दौलत से मुहब्बत का अंजाम, मुहम्मद अकरम, रांझा साप्ताहिक अल-ऐतसाम, लाहौर दिसम्बर 1999 ई० ।

में रितू डेरो ज़िला लाडकाना में मेडिकल आफ़िसर की हैसियत से तैनात था एक दिन एक पुलिस कर्मचारी काग़ज़ात लेकर आया कि क़ब्र खोलनी है। सिविल सर्जन ज़िला के तमाम अस्पतालों का प्रबंधक होता था। जिला मजिस्ट्रेट ने क़ब्र खोलने के लिए बोर्ड गठित किया तो डॉक्टर मुहम्मद शफ़ीअ साहब सिविल सर्जन के साथ मैं भी शामिल था। यह क़ब्रिस्तान रितू डेरो से दो मील दूर एक गांव में था जिसका नाम अब ज़ेहन से निकल गया है। पुलिस काग़ज़ात से मालूम हुआ कि यह एक औरत की लाश है जो तक़रीबन दो माह पहले दफ़न की गई थी। उसके शौहर ने इस वजह से उसे क़त्ल कर दिया था कि उसके किसी आदमी से अवैध संबंध थे।

मुक़र्ररा दिन, मैं उस गांव के वडेरे के डेरे पर पहुंच गया। सिविल सर्जन लाडकाना भी आ गए थे। डेरा दार का इसरार था कि चाय पीकर रवाना हों मजिस्ट्रेट साहब आ गए। पुलिस क़ब्रिस्तान पहुंच चुकी थी। जब चाय आई तो मालूम हुआ कि यह चाय नहीं मुकम्मल लंच था। इस दौरान अजीब इंकिशाफ़ हुए। मालूम हुआ कि यह औरत बहुत नेक थी जिसकी उम्र मुश्किल से सत्ताइस साल थी। नमाज़ रोज़े की पाबन्द थी। पांच साल शादी को हो गए थे मगर औलाद नहीं थी। शौहर के संबंध किसी और औरत से हो गए और वह इस बीवी को रास्ते से हटाना चाहता था और उलटा इल्ज़ाम लगाकर कि तेरे सम्बन्ध फ़लां आदमी से हैं, रोज़ मारता था, वह व्यक्ति जिससे ताल्लुक़ात का आरोप लगाया गया था, उस औरत के बाप से भी बड़ा

था। एक दिन सुबह के समय वह बदनसीब औरत बिस्तर पर मुर्दा पाई गई। जितनी मुंह इतनी बातें। कोई कुछ कहता कोई कुछ, मगर हालात से महसूस होता था कि औरत बेगुनाह थी।

क़ब्र खोलना हर एक के बस की बात नहीं होती। हम डॉक्टर लोग तो इसके आदी होते हैं। क़ब्र के अंदर की घमस और लाश की हालत बड़े बड़े दिल वालों से नहीं देखी जाती। मैंने सौ के क़रीब क़ब्रे खोलीं, मगर कभी मजिस्ट्रेट या पुलिस वालों को क़रीब आने की हिम्मत न हुई। वह ड्यूटी पर लाज़मी होते, मगर दूर जाकर बैठ जाते।

उस दिन हस्बे मामूल क़ब्र खोदने वाले ने क़ब्र खोदी और मिट्टी हटाई। हम लोग सरहाने खड़े थे और आने वाले क्षणों से मुक़ाबले के लिए मानसिक रूप से तैयार थे। एक दम क़ब्र के अंदर से इत्र के जैसी महक निकली जैसे हम किसी चमेली के बाग़ में खड़े हों। मैंने क़ब्र के अंदर झांक कर देखा कि दफ़नाते समय किसी ने फूल तो नहीं रख दिए, हालांकि यह ख़ाम ख्याली थी। अगर फूल रखे भी होते तो लाश की विशेष बू फूलों से ज़्यादा तेज़ होती है। बाद में सिविल सर्जन ने बताया कि यही ख्याल उन्हें आया। जूं तूं मय्यित बाहर निकाली तो ख़ुश्बू की लपटों से दिल व दिमाग़ महक गए। इतनी देर में ख़ुश्बू दूर तक फेल गई। थानेदार और मजिस्ट्रेट भी उठकर क़रीब आ गए। वहां पुलिस न होती तो एक मज्मा लग जाता। डॉक्टर शफ़ीअ बोले “साईं! देखो ख़ुश्बू ऐसी है जैसे हम जन्नत के बाग़ में खड़े हों।” सुब्हानल्लाह, सुब्हानल्लाह, कहते उनकी ज़बान थक रही थी। लाश देखी तो इंतिहाई तरो ताज़ा, चेहरा चमकता व दमकता हुआ दिखाई दे रहा था। मालूम होता था मक़्तूला आराम से सो रही है। पुलिस वाले बोले “रब की शान! यह साबित हो गया कि माई पर झूठा आरोप लगाया गया था।” मैं पीछे हटा तो सिविल सर्जन भी हट गए। हमारा दिल नहीं चाह रहा था कि उस लाश का पोस्ट मार्टम करें। . इतने में उसका पति, जो पत्नी की हलाकत के बाद भाग गया था, चीखें मारता न मालूम कहां से आ गया और पुलिस वालों से कहने लगा “मुझे गिरफ़्तार कर लो, मेरी पत्नी बेगुनाह थी। इस पर झूठा आरोप था” पुलिस और मजिस्ट्रेट मौजूद थे। उसका बयान लिया गया जिसमें उसने इक़बाले जुर्म कर लिया, मगर पोस्ट मार्टम न होने दिया।’ 2. मय्यित से ख़ुश्बू :

हमारे दादा मरहूम नूर इलाही (रह०) के छोटे भाई हाफ़िज़ अब्दुल हय्य (रह०) हाफ़िज़े कुरआन थे बहुत ही नेक मुत्तक़ी और सालेह बुज़ुर्ग थे, नव्वे साल के लगभग उम्र पाई। उम्र भर किताब व सुन्नत की दावत और तब्लीगं

___ 1. मेडिकल ऑफ़िसर की रहस्यपूर्ण डायरी, डॉक्टर सय्यद ज़ाहिद अली वास्ती, उर्दू डाइजेस्ट, लाहौर, नवम्बर 1996 ई० ।

का काम अंजाम दिया। रिज़्क हलाल का इतना ख्याल रखते कि एक बार लाहौर से अपने गांव मंडीवार बरटन (ज़िला शेखूपुरा) आ रहे थे जेब में पैसे नहीं थे ट्रेन पर बैठकर मंडीवार बरटन पहुंच गए। स्टेशन पर ही किसी से पैसे उधार लिए और मंडीवार बरटन लाहौर का टिकट ख़रीदकर फाड़ दिया ताकि हुकूमत के ख़ज़ाने की वाजिबुल अदा रकम अदा हो जाए। कुरआन मजी की तिलावत से इतना लगाव था कि कहीं जाना होता तो पैदल सफ़र को ‘वारी पर केवल इसलिए वरीयता. देते कि पैदल सफ़र में तिलावत अधिक होती है।

अल्लाह से ताल्लुक़ का यह हाल था कि दिल के मरीज़ थे एक बार दिल का शदीद दौरा पड़ा घर में मौजूदा अफ़राद रोने धोने लगे, तबीअत बहाल हु, तो पूछने लगे तुम लोग क्यों रो रहे थे? बच्चों ने कहा कि हम समझ रहे थे कि अब आप का आखिरी समय है और आप बच नहीं सकेंगे। फ़रमाने लगे इसमें फ़िक्र की कौन सी बात हैं। “मैं अपने दोस्त के पास ही जा रहा था किसी दश्मन के पास तो नहीं जा रहा था।”

मरहूम के बेटे शैखुल हदीस अल्लामा अब्दुस्सलाम कीलागी (फ़ाज़िल जामिया इस्लामिया, मदीना मुनव्वरा) बयान करते हैं कि उनकी तदफ़ीन के समय इतनी तेज़ ख़ुश्बू आई कि क़ब्र पर मौजूद तमाम लोगों के दिल व दिमाग़ महक गए। कुछ लोगों का गुमान यह था कि शायद किसी ने क़ब्र । में स्वयं ख़ुश्बू डाली है हालांकि ऐसा नहीं था। 3. क़ब्र में रौशनी :

सोहदरह (ज़िला गूजरां वाला) के मशहूर आलिमे दीन मौलाना हाफ़िज़ मुहम्मद यूसुफ़ (रह०) बयान करते हैं कि एक रात मैं सोया हुआ था एक बजे के क़रीब कुछ लोग आए, दरवाज़ा खटखटाया मैंने दरवाज़ा खोला तो उन्होंने बताया कि हमारा एक दोस्त मर गया है बीमारी की वजह से लाश ज़्यादा देर रखने के क़ाबिल नहीं हम इसी समय उसे दफ़नाना चाहते हैं। आप आकर नमाज़े जनाज़ा पढ़ा दें। मैंने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई गोरकुन (क़ब्र खोदने वाला) तदफ़ीन के लिए क़ब्र तैयार करने लगा तो अचानक साथ वाली

क़ब्र खुल गई जिससे इतनी तेज़ रौशनी आ रही थी जैसे सूरज चढ़ा हुआ हो। मैंने मशवरा दिया कि फ़ौरन इस क़ब्र की दीवार बना दें कोई अल्लाह का नेक बन्दा आराम कर रहा है। चुनांचे उसकी दीवार बना दी गई और साथ की क़ब्र में दूसरी मय्यित दफ़न कर दी गई। 4. मय्यित से ख़ुश्बू : __इस घटना के बयान करने वाले वालिद मुहतरम हाफ़िज़ मुहम्मद इदरीस कीलानी (रह०) हैं। फ़रमाते हैं कि तक़सीमे हिन्द से पहले दिल्ली में उस्ताद उलमा शैखुल हदीस सय्यद मियां मुहम्मद नज़ीर हुसैन मुहद्दिस देहलवी (रह०) के मदरसे का एक छात्र मर गया तो उसकी मय्यित से इतनी मस्हूरकुन (मन मोहक) ख़ुश्बू आई कि सारा माहौल महक गया। लोगों ने हज़रत मियां मुहम्मद नज़ीर हुसैन (रह०) से पूछा क्या आपके ज्ञान में इस छात्र का कोई ऐसा अमल है, जिसकी वजह से अल्लाह तआला ने इसे यह इज़्ज़त अता फ़रमाई है तो मियां साहब ने यह घटना सुनाई : ___“दूसरे छात्रों की तरह इस छात्र का खाना भी एक घर में लगा हुआ था (याद रहे कुछ अर्से पहले आज की तरह तलबा के लिए खाने का इंतिज़ाम मदारिस में नहीं होता था बल्कि शहर के विभिन्न मुखय्यर हज़रात अपने ज़िम्मे एक एक या दो दो तलबा का खाना ले लेते और घर बुलाकर उन्हें खिला देते) उस घर में एक नोजवान लड़की थी जो उस छात्र से मुहब्बत करने लगी, एक दिन अहले खाना को किसी रिश्तेदार की ताज़ियत के लिए जाना था, लड़की घर में अकेली थी हस्बे मामूल लड़का खाने के लिए गया तो लड़की ने घर के दरवाज़े बन्द कर लिए और दावते गुनाह दी। लड़के ने इंकार किया तो लड़की ने धमकी दी कि अगर तुमने मेरी बात न मानी तो तुम्हें बदनाम कर दूंगी। छात्र ने रफ़ा हाजत के लिए बेतुल खला में जाने की इजाज़त मांगी तो लड़की ने मकान की छत पर जाने की इजाजत दे दी। तालिबे इल्म बैतुल खला में गया और अपने तमाम जिस्म को गन्दगी और निजासत से आलूदा कर लिया, जब वापस आया तो लड़की ने उसे देखते ही शदीद नफ़रत का इज़हार किया और फ़ौरन घर से निकाल दिया। सर्दी का मौसम था तालिबे इल्म ने मस्जिद में आकर गुस्ल किया, कपड़े धोए, बाहर निकला तो शदीद सर्दी के सबब कांप रहा था इसी दौरान नमाज़े तहज्जद के लिए मैं मस्जिद पहुंच गया। तालिबे इल्म को इस हाल में देखकर ताज्जुब हुआ उससे पूछा तो उसने कुछ झिझक के बाद सारी बात सुना दी तब मैंने अल्लाह तआला से दआ की “या अल्लाह! करआन व हदीस के इस तालिबे इल्म ने तेरे डर और ख़ौफ़ की वजह से अपने जिस्म को गन्दगी से आलूदा करके अपने आपको गुनाह से बचाया है तू अपने फ़ज़्ल व करम से दुनिया व आख़िरत में इसकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई फ़रमा और इसे आला मक़ाम और मर्तबा अता फ़रमा।” हो सकता है कि अल्लाह तआला ने इस तालिबे इल्म के इसी अमल के नतीजे में इसकी यह इज़्ज़त अफ़ज़ाई फ़रमाई हो।’

उपरोक्त घटना जहां अज़ाबे क़ब्र और सवाबे क़ब्र का स्पष्ट सुबूत हैं। वहां हमारे लिए बाइसे इबरत भी हैं फिर है कोई इबरत हासिल करने वाला।

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