Qabar Mein Namaziyon Ke Shaan Part 2

Part 2

हज़रत सलमान फ़ारसी (रज़ि०) फ़रमाते हैं तीन बातें मुझे दुखी कर देती हैं और मैं रोने लगता हूं पहली बात रसूले अकरम (सल्ल.) की सहाबा (रज़ि०) से जुदाई का दुख, दूसरी बात अज़ाब क़ब्र और तीसरी बात क़यामत का डर । हज़रत मालिक बिन दीनार (रह०) मौत और क़ब्र को याद करके इतना रोते कि बेहोश हो जाते।

रसूले अकरम (सल्ल०) ने उम्मत को क़ब्र की ज़ियारत की इजाज़त ही केवल इसलिए दी है कि उससे आख़िरत की याद आएगी। (हदीस : तिर्मिज़ी) मुस्नद अहमद के शब्द ये हैं “कब्रों की ज़ियारत करो कि उसमें इबरत का सामान है।” अर्थात इंसान दुनिया को भूल कर आख़िरत की तरफ़ मुतवज्जह होता है। दुनिया की बेसबाती पर सोच विचार का मौक़ा मिलता है दूसरों की क़बें देखकर अपनी क़ब्र का ख्याल आता है। अस्थाई दुनिया की ख़ातिर अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा पर पशेमानी और शर्मिन्दगी का एहसास पैदा होता है। अपने गुनाहों पर तौबा व इस्तग़फ़ार की रग़बत पैदा होती है। लेकिन हमारे यहां जो कुछ हो रहा है उसका नतीजा उसके बिल्कुल विपरीत है। गौर फ़रमाइए जिन क़ब्रों पर इश्क़िया और शिर्किया मज़ामीन पर आधारित क़व्वलियों की मज्लिसें लगी हों वहां आख़िरत की याद किसे आएगी? जहां ढोल ढमके की थाप पर नौजवान मलंग और मलंगनियां धमालें डाल रही हों वहां मुंकर नकीर का ख्याल किसे आएगा? जहां आराइशे हुस्न और नुमाइश जिस्म की दिलदादा तवाइफ़ों के मुजरे हो रहे हों, वहां अज़ाबे क़ब्र या सवाबे क़ब्र की फ़िक्र कौन करेगा? जहां थियेटरों, फ़िल्मों और हयासूज़ नाच गानों का बेहंगम शोर बरपा हो वहां मौत की याद किसे आएगी? जहां बेपर्दा नव जवान औरतों का गैर मेहरम मर्दो से खुले आम मेल-मिलाप हो वहां तौबा व इस्तग़फ़ार की रग़बत किसे मिलेगी? जहां सुबह व शाम मुजाविरों और मुरीदों की भीड़ में भंग और चरस के दौर चल रहे हों वहां आख़िरत के सफ़र की बात कौन करेगा? जहां दिन

रात नज़राने वुसूल करने और दौलते दुनिया जमा करने का कारोबार उरूज पर हो वहां फ़िक्रे आख़िरत का उपदेश कौन सुने और सुनाएगा?

__ याद रहे अप्रैल 2001 ई० में बाबा फ़रीद के मज़ार स्थित पाक पट्टन में उर्स के मौके पर बेहश्ती दरवाज़े से गुज़रने की ख़ाहिशमंद भीड़ में से साठ (60) आदमी अचानक भगदड़ मच जाने से हलाक हो गए, उसकी वजह यह बताई गई कि दरबार के सज्जादा नशीन को हुकूमत दरबार की “ख़िदमत” के लिए डेढ़ लाख सालाना गाँट देती है जबकि सज्जादा नशीन बेहेश्ती दरवाज़ा खोलने से पहले प्रशासन से कई घंटे बहस करते रहे कि उनकी ग्रांट डेढ़ लाख से बढ़ाकर पंद्रह लाख की जाए तब वह दरवाज़ा खोलेंगे। अतएव दरवाज़ा खोलने में बहुत देर हो गई और दरवाज़े के क़रीब भीड़ बढ़ने की वजह से यह घटना हुई।’ ‘

क़ब्र परस्ती का शिर्क आख़िरत में इंसानों की हलाकत और बर्बादी का सबब तो है ही, दुनिया में उसके समाजी बुराइयों, अख़्लाक़ी बिगाड़ और दूसरे ज़ेहरीले असरात का अंदाज़ा निम्न अख्बारी ख़बरों से लगाया जा

सकता है :

___ 1. ज़िला बहावलपुर में ख्वाजा मुहकमुद्दीन मीराई के सालाना उर्स पर आने वाली बहावलपुर यूनीवर्सिटी की दो छात्राओं का सज्जादा नशीन के बेटे ने अपहरण कर लिया जबकि मुल्ज़िम का बाप सज्जादा नशीन नशीले पदार्थ बेचते हुए पकड़ा गया।

  1. रायवंड में बाबा रहमत शाह के मज़ार पर उर्स में वैराइटी प्रोग्राम के नाम पर लगाए गए सात कैम्पों में मुजरों की महफ़िलें जारी हैं, दर्जनों नई उम्र लड़कियां फ़हश डांस करके तमाश बीनों से दाद ऐश हासिल कर रही हैं। तमाश बीन नए नोटों की गठियां लेकर यहां पहुंच जाते हैं और रात दो बजे तक धुंघरुओं की झंकार पर शराबियों का शोर सुनाई देता रहता है। साइकिल शूज़ प्रोग्राम में नई उम्र लड़के, लड़कियों के रूप में डांस करके हम
  2. तफ़्सील के लिए देखें, मुजल्ला अदावाः, सफ़र 1422 हि०, मई 2001 ई०, लाहौर, पाकिस्तान।
  3. दैनिक, “ख़बरें” लाहौर, 15 अक्टूबर 1992 ई० ।

जिन्स परस्ती की दावत दे रहे हैं। उर्स में जुआ, शराबनोशी और अस्लहा की नुमाइश सरे आम है। शहरियों के इहतिजाज के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई। ____ 3. दाता मेले की आड़ में मुजरे, फ़हश गानों पर गर्मा गर्म डांस, पुलिस

और प्रशासन के सहयोग से दर्जनों तवाइफ़ों का मुजरा ज़ोरो शोर से जारी है, फ़हश गानों पर उत्तेजनापूर्ण डांस देखने के लिए 10 साला बच्चे से लेकर 70 साला बूढ़े सैकड़ों की तादाद में आते हैं, चरस का धुआं, फ़हश फ़िक़रे बाज़ी और भंगड़ा माहौल को और अधिक गर्मा देता है। सौ सौ के नोट निछावर किए जाते हैं, एक तवाइफ़ और गायका ने एक दूसरे को देर तक गले लगाए रखा। नोजवानों ने अपनी अपनी तवाइफ्रें बांट रखी थीं, वे नाम पुकारते तो तवाइफ़ स्टेज पर आकर उनका दिल लुभाना शुरू कर देती । एक अवसर पर डांस करती तवाइफ्रें कमर के बल ज़मीन पर लेट गईं तो तमाशाई उठ खड़े हुए और उस हंगामे में सैकड़ों कुर्सियां टूट गईं।

  1. डब्बा पीरों ने विदेशी ऐजेन्टों का कारोबार भी संभाल लिया। सरकारी हल्कों से गहरे संबंध, पुलिस अधिकतर जराइम पेशा लोगों को पीरों के सियासी और सरकारी असर व संबंधों की बिना पर पकड़ने से घबराती रहती है जो पीरी मुरीदी की आड़ में नशीले पदार्थ और बदकारी के अड्डों की सरपरस्ती करते हैं। दाता दरबार में फिरने वाले दुर्वेश सियासी जलसों में बाक़ायदगी से शिरकत करते हैं। ____5. औरतों के नंगे जिस्मों पर तावीज़ लिखने वाला रास्पोटेन पकड़ा गया। मुल्जिम व्यभिचार, क़त्ल, डकेती और हेरा फेरी की वारदातों में कई ज़िलों की पुलिस को अपेक्षित था। मुलतान के बाद शैखूपुरा के निकट “पीर ख़ाना” खोलकर धंधा करता रहा।

प्रिय पाठको! यह एक संक्षिप्त परिचय है मज़ारों, ख़ानक़ाहों और

  1. दैनिक “नवाए वक़्त”, लाहौर, 6 अगस्त 2001 ई० । 2. ख़बरें रिपोर्ट, बहावाला शाहराह बहिश्त पर. अमीर हमज़ा, सफ़ा 79, 3. ख़बरें रिपोर्ट, बहावाला शाहराह बहिश्त पर, अमीर हमज़ा, सफ़ा 79, 4. खबरें रिपोर्ट, बहावाला शाहराह बहिश्त पर, अमीर हमज़ा, सफ़ा 67,

आस्तानों की दुनिया का, जो हमारी दुनिया से कहीं ज़्यादा रंगीन, कहीं ज़्यादा दिलफ़रेब और कहीं ज़्यादा पुरकशिश है ऐसी क़ब्रों और मज़ारों पर जाकर मौत किसे याद आएगी? आख़िरत का ख्याल किसे आएगा? अज़ाब या सवाब की फ़िक्र किसे होगी? अल्लाह का भय किसके दिल में पैदा होगा? . दुनिया से बेरग़बती क्योंकर पैदा होगी? यही वजह है कि इस्लाम में क़ब्रों पर मेले ठेले लगाना, महफ़िलें आयोजित करना, मुजाविरी करना, मज़ार तामीर करना, उर्स लगाना, चिराग़ां करना, फूलों की चादरें चढ़ाना, क़ब्र या मज़ार को बोसा देना, क़ब्र या मज़ार पर झुकना या सज्दा करना, क़ब्र की परिक्रमा करना, क़ब्र पर क़ुरबानी करना, खाना तक़सीम करना, साहिबे क़ब्र के सामने अपनी मुश्किलात और हालात पेश करना। बिलकुल मना और हराम है, शिर्क अकबर का दर्जा रखता है। फिर भी जिन उलमा किराम के मस्लक में ये तमाम उमूर जाइज़ हैं उनकी सेवा में हम बड़ी दर्दमंदी और निष्ठा से यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि बराहे करम! सोचिए कि चढावे चढाने. उर्स मनाने, नज़र व नियाज़ देने, मन्नतें मानने, सदक़ा खैरात करने और मुरादें मांगने के बहाने मज़ारों, ख़ानक़ाहों और आस्तानों पर तशरीफ़ लाने वाले मर्द

और औरतें समाज में जिस बेहयाई, फ़हाशी, बदकारी और दूसरे जुर्मों के हयासूज़ (लज्जाजनक) कल्चर को जन्म दे रहे हैं उसका ज़िम्मेदार कौन है? क़यामत के दिन उसकी जवाबदेही और मस्ऊलियत किसके ज़िम्मे होगी? – दूसरे हम उन उलमा किराम का ध्यान एक और बात की तरफ़ भी करवाना चाहते हैं कि यह एक सर्वमान्य हक़ीक़त है कि खैर और भलाई से खैर और भलाई के स्रोत फूटते हैं जबकि बुराई और गुनाह से बुराई और गुनाह के स्रोत फूटते हैं, ऐसा कभी नहीं हुआ कि आम का पेड़ बोया जाए तो उस पर थूहर का फल लगे या थूहर का पेड़ बोया जाए और उस पर आम का फल लगे। अगर मज़ारों और ख़ानक़ाहों पर नज़रें नियातें देना, चढ़ावे चढ़ाना, मुरादें मांगना, उर्स और मेले लगाना, वास्तव में शरीअत इस्लामिया में वैध और नेकी का काम है तो फिर उस खैर और नेकी के काम से फ़हाशी, बेहयाई, बदकारी और जुर्म का कल्चर क्यों जन्म ले रहा है? इस्लामी जमहरिया पाकिस्तान के समाज को जुआ, ज़िना (व्यभिचार), शराब, नशीले

पदार्थ और दूसरे जुर्मों से पाक करने का इरादा रखने वाले उलमा किराम क्या हमारे इस सवाल परं संजीदगी से ग़ौर करना पसन्द फ़रमाएंगे? … मौत का पैगाम हमारे नाम :

निःसंदेह मौत एक बड़ी घटना है घर के एक आदमी की मौत से कभी-कभी जिंदगी के कितने ही मामले दरहम बरहम हो जाते हैं कितने ही मंसूबे अधूरे रह जाते हैं, कितने ही हसीन व जमील ख्वाब परेशान हो जाते हैं। कहीं मासूम बच्चे अनाथ हो जाते हैं, कहीं बूढ़े मां बाप बेसहारा हो जाते हैं, कहीं सुहागनें अपने सुहाग से वंचित हो जाती हैं, कहीं बहन भाइयों के हाथ कट जाते हैं। दर्दो अलम की इस विचलित कर देने वाली हालत में आम तौर पर सोगवारों में दो तरह की प्रतिक्रिया पैदा होती हैं :

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