Qabar Namaziyon Ke Shaan Part 3

  1. मरने वाले की जुदाई का दुख : यह एक बिल्कुल फ़ितरी चीज़ है . शरई हुदूद के अंदर रहते हुए दुख और सदमे का इज़हार ऐब है न मना।
  2. मरने वाले के कारोबारे दुनिया की चिंता : घर के किसी अहम व्यक्ति के रुख्सत होने पर वारिसीन के वसाइल जिंदगी का कट जाना, उसके मुतबादिल इंतिज़ाम की फ़िक्र करना, उसकी विरासत बांटना ऐसे मामले हैं जिनसे इंसान को हर हाल में सामना करना ही पड़ता है शरी हुदूद की पाबन्दी करते हुए दुनिया के मामलांत की फ़िक्र करना और उन्हें चलाना भी कोई ऐब नहीं बल्कि ज़रूरी है।

अफ़सोसनाक बात यह हैं कि रिश्तेदार की मौत की यह प्रतिक्रिया शरी हुदूद को,पार करके पसमांदगान के दिल व दिमाग़ पर कुछ इस तरह छा जाता है कि मौत का असल पैग़ाम किसी के ज़ेहन में नहीं आता। मौत व जिंदगी के इन हंगामों में किसी को यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिलती कि इन दो मामलों के अलावा भी कोई सोचने की बात है या नहीं? हालांकि परिवार के सदस्यों के लिए मौत का असल पैग़ाम ही यह होता है “आज इसकी कल तुम्हारी बारी है।”

फ़रिश्ता-ए-अजल (अर्थात मौत का फ़रिश्ता) हर इंसान के पीछे लगा है हमारे आस-पास कितनी ऐसी मिसालें हैं कि अच्छे भले सेहतमंद लोग रात

को अपने बिस्तर पर सोते हैं लेकिन सुबह उठने की मोहलत नहीं मिलती, कितने लोग अपने घरों से उमरा या हज के इरादे से निकलते हैं लेकिन वापस घर पहुंचना नसीब नहीं होता, कितनी बारातें शहनाइयों की गूंज में घरों से निकलती हैं लेकिन वापसी सफ़े मातम के साथ होती है, कितने लोग अपने मामूल के कामों में व्यस्त होते हैं अचानक दिल का दौरा पड़ता है और सारे काम धरे के धरे रह जाते हैं ज़िंदगी और मौत में अन्तर तो बस इतना ही है जितना आज और कल में है। रसूले अकरम (सल्ल०) ने यह हक़ीक़त कितने खूबसूरत अंदाज़ में बयान फ़रमाई है : आज अमल का दिन है हिसाब नहीं और कल हिसाब का दिन होगा अमल का नहीं। (हदीस : बुख़ारी)

रसूले अकरम (सल्ल0) ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि०) को यह नसीहत फ़रमाई “अब्दुल्लाह ! दुनिया में मुसाफ़िर या राह चलने वाले की तरह ज़िंदगी बसर करो।” अतएव हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि०) कहा करते थे “लोगो! अगर शाम कर लो तो सुबह का इंतिज़ार न करो और अगर सुबह कर लो तो शाम का इंतिज़ार न करो। सेहत को बीमारी से पहले और जिंदगी को मौत से पहले ग़नीमत जानो।” (हदीस : बुख़ारी)

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) फ़रमाते हैं एक दिन रसूले • अकरम (सल्ल०) चटाई पर नंगे बदन सोए हुए थे। आप (सल्ल0) के जिस्म मुबारक पर चटाई के निशान पड़ गए। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रज़ि०) ने कहा “या रसूलल्लाह (सल्ल०)! अगर आप फ़रमाते तो हम आपके लिए अच्छा सा बिस्तर उपलब्ध कर देते।” आप (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया “मेरा दुनिया से क्या संबंध? मेरा दुनिया से संबंध तो बस इतना ही है जितना एक मुसाफ़िर पेड़ के साय में सुस्ताता है और फिर चल देता है और पेड़ को छोड़ देता है। (हदीस : अहमद, तिर्मिज़ी, इब्ने माजा)

इस दुनिया में इंसान के अस्थाई क़याम (निवास) को इस मिसाल से बेहतर किसी दूसरी मिसाल से समझाना मुमकिन ही नहीं। यह दुनिया केवल एक सराए (आरामगाह) है जिसमें हर मुसाफ़िर कम या ज़्यादा समय के लिए रुकता है और फिर अगले सफ़र पर रवाना हो जाता है। सराय में कुछ घंटों के लिए सुस्ताने वाला मुसाफ़िर कभी वहां ज़मीन ख़रीदने या मकान बनाने

या कारोबार चलाने की चिंता नहीं करता, बल्कि आस-पास से निस्पृह होकर कुछ क्षण गुज़ारता और चलता बनता है, यह कुछ घंटों की ज़िंदगी इंसान के लिए कितनी पुरफ़रेब है माह व साल गुज़रते हैं तो इंसान खुश होता है मैं जवान हो रहा हूं हालांकि हर गुज़रने वाला क्षण उसे उसकी मंज़िल….मौत. …के क़रीब किए दे रहा होता है :

ग़ाफ़िल, तुझे घड़ियाल यह देता है मुनादी

गर्दो ने घड़ी उम्र की इक और घटा दी जूं जूं ज़िंदगी गुज़रती जाती है उम्मीदें जवान होती जाती हैं इंसान अपनी इच्छाओं की प्राप्ती के लिए दिन रात एक कर देता है ज़िंदगी बड़ी हसीन व जमील लगने लगती है। इंसान निरंतर अठारह अठारह बीस बीस घंटे काम में गुज़ार देता है दिन रात काम करते करते बालों में सफ़ेदी आने लगती है। इंसान तब भी यही सोचता है

। अभी तो मैं जवान हूं समय का दरिया कामयाबियों, नाकामियों, खुशियों और दुखों की ऊंच नीच के साथ निरंतर बेहता रहता है, आहिस्ता आहिस्ता इंसान अपने शारीरिक अंगों की कमजोरी महसूस करने लगता है। बुढ़ापा मौत के दरवाज़े पर दस्तक देने लगता है, लेकिन मौत से ग़ाफ़िल इंसान शाहराहे जिंदगी पर फिर भी वैसे ही रवां दवां (आगे बढ़ता) रहता है और यही समझता है कि अभी बहुत समय है। बड़ी ख़ाहिशात, बड़ी उम्मीदों और बड़े मंसूबों के प्राप्त करने का सफ़र जारी व सारी रहता है। डॉलर, रियाल, दीनार, रुपये, प्लॉट, फ़्लेट, फेक्ट्री, कोठी, कार के चक्कर में जिंदगी बसर होती रहती है। बुलन्दतर मैयारी जिंदगी हासिल करने की दौड़ में रात-दिन बसर होते रहते हैं। दाएं बाएं और आगे पीछे रिश्ते-नाते के लोगों की मौतें होती रहती हैं इंसान रस्मे ताज़ियत अदा करके फिर जिंदगी की गहमा गहमी में जज़्ब हो जाता है और उसे यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिलती कि मौत का रिश्ता मेरे लिए भी कोई पैग़ाम छोड़ गया है, चेतावनी सामने होती है किन जिंदगी की दिलफ़रेबियां पढ़ने की फुरसत ही नहीं देतीं।

कहते हैं किसी व्यक्ति की हज़रत इज़राईल (अलैहि०) से दोस्ती हो गई

तो उसने हज़रत इज़राईल से कहा कि आपको जब मेरे पास आना हो तो साल भर पहले बता दें ताकि मैं मौत के लिए कुछ तैयारी कर लूं। हज़रत इजराईल ने वायदा कर लिया लेकिन एक दिन अचानक फ़रमाने शाही लेकर

च गए। हज़रत इज़राईल को यूं अचानक सामने देखकर वह व्यक्ति हैरान रह गया। कहा हज़रत! आपने तो मुझे साल भर पहले बताने का वायदा किया था लेकिन अब आप अचानक तशरीफ़ ले आए? हज़रत इज़राईल अलैहि०) ने जवाब दिया कि इस साल के दौरान मैं तुम्हारे फ़लां फ़लां

जीज के यहां आया, तुम्हारे फ़लां फ़लां रिश्तेदार के पास आया, फ़लां फ़ला दोस्त के पास आया, और तुम्हें यही बताने के लिए आता रहा कि तैयारी कर नो तम्हारे पास आने ही वाला हूं। मेरा ख्याल था कि तुम काफ़ी अक्लमंद और समझदार हो, समझ जाओगे। अगर तुम इतने ही अहमक और बेवकूफ़ कि समझ नहीं सकते तो इसमें मेरा क्या कुसूर?

जब मौत का फ़रिश्ता सर पर आ खड़ा हुआ तो दमे वापसी इंसान सोचता है साठ सत्तर साल की ज़िंदगी तो बस यूं ही आंख झपकने में गुज़र गई। बचपन अभी कल की बात है, जवानी एक हसीन ख्वाब से ज़्यादा कुछ नहीं लगती। खोने और पाने का ख़ाक़ा बनाने की फुरसत ही नहीं मिली.. इतनी लम्बी और इतनी कम ज़िंदगी…तब इंसान हसरत मायूसी की तस्वीर बने ज़बाने हाल से यह कहता हुआ इस दुनिया से वापसी का सफ़र बांधता

चार दिन की ज़िंदगी लाए थे मांग कर

दो आरजू में कट. गई, दो इंतिज़ार में काश! हमें कभी अपने दाएं बाएं और आगे पीछे होने वाली मौतों पर मौत के फ़रिश्ते का पैग़ाम सुनने की फुरसत मयस्सर आ सके? . प्रिय पाठको! यह अल्लाह सुब्हानहू व तआला का बेहद व हिसाब फाल व एहसान है कि उसने मुझ जैसे नाकारा, गुनाहगार, कम इल्म और

अमल इंसान को “तफ़्हीमुस्सुन्नह’ के सतरा हिस्से मुकम्मल करने का सौभाग्य प्रदान किया। इस पर अल्लाह सुब्हानहू व तआला का जितना भी शक अदा किया जाए कम है। इस कारे खैर में, मैं अपने हम सफ़र मुख़्लिस

दोस्तों और साथियों का भी शुक्रगुज़ार हूं कि उन्होंने किसी भी अवसर पर मुझे अपने सहयोग से वंचित नहीं किया। अल्लाह तआला के सामने दुआ है कि वह इस कारे खैर में हिस्सा लेने वाले तमाम दोस्तों की दुनिया व आख़िरत में इज़्ज़त अफ़ज़ाई फ़रमाए। आमीन! ___ पहले की तरह इस बार भी अहादीस की सेहत के मामले में पूरी एहतियात से काम लिया गया है फिर भी अगर कहीं ख़ता हो तो अहले इल्म की सेवा में विनती है कि वे बराहे करम! ज़रूर आगाह फ़रमाएं हम उनके मम्नून व शुक्र गुज़ार होंगे।

अगली किताब “अलामाते क़यामत का बयान” होगी।

तफ़हीमुस्सुन्नह का क़रीबन आधा काम अभी बाक़ी है। कितना मुकम्मल होता है कितना नहीं, इसका इल्म अल्लाह सुब्हानहू व तआला के पास है अगर अल्लाह तआला अपने फ़ज़ल व करम से बाक़ी काम मुकम्मल करने का सौभाग्य भी अपने गुनाहगार बन्दे को अता फ़रमा दें तो यह उनकी शाने समदी और रहीमी है “वमा ज़ालि-क अलल्लाहि बि-अज़ीज़’ प्रिय पाठकों से मुख़्लिसाना दुआओं की प्रार्थना है

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