रसूलुल्लाह सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर सलाम पढ़ने के मसनून शब्द ये हैं।

मसला 209. रसूलुल्लाह सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर सलाम पढ़ने के मसनून शब्द ये हैं।

عن عبد الله رضي الله عنه قال : كنا نقول في الصلاة خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم السلام على الله السلام على فلان ، فقال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم : إن الله هو السلام فإذا قعد أحدكم في الصلاة فليقل : ألتحيات لله و الصلوات والطيبات ألسلام عليك أيها النبي ورحمة الله و بركاته السلام علينا و على عباد الله الصالحين . رواه مسلم

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० कहते हैं हम नबी अकरम ल० के पीछे नमाज़ पढ़ते हुए यूं कहा करते “अल्लाह पर सलाम, फ़लां पर सलाम’ एक दिन नबी अकरम सल्ल० ने फ़रमाया “अल्लाह तो स्वयं सलाम है अतः जब तुममें कोई नमाज़ में बैठे तो यहूं कहे, अत-त हिय्यातु लिल्लाहि वस्सलातु…..तर्जुमा “सारी ज़बानी, बदनी और माली इबादतें केवल अल्लाह के लिए हैं ऐ नबी! आप पर अल्लाह की सलामती, रहमतें और बरकतें नाज़िल हों, सलाम हो हम पर और अल्लाह के नेक बन्दों पर ।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

عن نافع رضی الله عنه أن ابن عمر رضي الله عنهما كان إذا قدم من سفر دخل المسجد ثم أتی القبر ، فقال : السلام عليك يا رسول الله السلام عليك يا أبا بكر السلام عليك يا أبتاه . رواه البيهقى

हज़रत नाफ़ेअ रज़ि० (अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० के आज़ाद करदा गुलाम) रिवायत करते हैं कि अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० जब सफ़र से वापस आते, तो मस्जिद में हाज़िर होते, क़ब्र मुबारक पर आकर यूं सलाम कहते, अस्सलामु अलै-क या रसूलल्लाह, अस्सलामु अलै-क या अबा बक्र, अस्सलामु अलै-क या अबताह अर्थात रसूलुल्लाह सल्ल० आप पर सलाम, हज़रत अबूबक्र रज़ि० पर सलाम और मेरे बाप उमर रज़ि० पर सलाम।” इसे बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

मसला 210. नबी अकरम सल्ल० पर दुरूद भेजने के मसनून शब्द ये हैं

عن عبد الرحمن بن ابی لیلی رضی الله عنه قالى لقيني كعب بن عجرة رضى الله عنه فقال: ألا أهدي لك هدية سمعتها من النبي صلى الله عليه وسلم فقالت بلى فاهدها لي، فقال :  سألنا رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف الصلاة عليكم أهل البيت فإن الله قد علمنا كيف نسلم عليك؟ قال قولوا: ألهم صل على محمد وعلى آل محمد كما صليت على إبراهيم وعلى آل إبراهيم إنك حميد مجيد أللهم بارك على محمد و على آل محمد كما باركت على إبراهيم وعلى آل إبراهيم إنك حميد مجيد . رواه البخارى

हज़रत अब्दुर्रहमान बिन अबू याला रज़ि० से रिवायत है कि मुझे काअब बिन उजरह रज़ि० मिले और कहा “क्या मैं तुझे वह चीज़ तोहफ़ा न दें, जो मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० से सुनी है। मैंने कहा “क्यों नहीं ज़रूर दो।” काअब बिन उजरह रज़ि० कहने लगे हम (सहाबा किराम रज़ि०) ने रसूलुल्लाह सल्ल० से मालूम किया “या रसूलुल्लाह! हम आप सल्ल० पर और आपके घर वालों पर दुरूद कैसे भेजें जबकि अल्लाह तआला ने हमें आप सल्ल० पर सलाम भेजने का तरीक़ा तो बता दिया है?” रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, यूं कहा करो “या अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर इसी तरह रहमत भेज जिस तरह तूने इबराहीम पर रहमत भेजी। बेशक तू बुजुर्ग है और आपकी ज़ात में आप महमूद है। या अल्लाह! मुहम्मद और आले मुहम्मद पर इसी तरह बरकतें नाज़िल फ़रमा जिस तरह तूने इबराहीम और आले इबराहीम पर बरकतें नाज़िल फ़रमाईं। तू निश्चय ही बुजुर्ग है और अपनी ज़ात में आप महमूद है।” इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

 

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