रसूल सल्ल० के रोज़े की ज़ियारत के बारे में ज़ईफ़ या मौजूअ अहादीस

عن عبد الله بن عمر رضي الله عنهما قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من حج فزار قبري بعد موتی كان كمن زارنی فی حیاتی، رواه الطبراني والدار قطن والبيهقي

 हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्ल ने फ़रमाया ‘जिसने मेरे मरने के बाद हज किया फिर मेरी क़ब्र की ज़ियारत की, उसने मानो मेरी ज़िंदगी में ज़ियारत की।’ इसे तबरानी, दारे कुतनी और बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : इस रिवायत की सनद में दो रावी हफ़्स बिन सुलैमान और लैस बिन अबी सलीम ज़ईफ़ है। हफ़्स बिन सुलैमान को इब्ने मुईन रह० ने कज़ाब, हाफ़िज़ इब्ने हजर रह० ने हदीस को छोड़ने वाला लिखा है। इब्ने हराश रह० ने कहा है वह हदीसे गढ़ा करता था। शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी ने इस हदीस को मौजूअ कहा है। देखें सिलसिला अहादीस ज़ईफ़ वल मौजूअ लिल अलबानी हदीस नम्बर 47, जिल्द 1।

ابن عمر رضي الله عنهما قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من حج البيت ولم يزرني فقد جفانی . رواه فردوس في مسنده

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘जिसने हज किया और मेरी (क़ब्र की) ज़ियारत न की उसने मुझ पर जुल्म किया।” यह हदीस मुसनद फ़िरदौस में है।

स्पष्टीकरण : इमाम ज़हबी रह०, इमाम इब्ने जोज़ी रह० और शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी ने इस हदीस को मौजूअ कहा है। देखें सिलसिला अहादीस ज़ईफ़ वल मौजूअ लिल अलबानी हदीस नम्बर 45, जिल्द 1।

عن أنس رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله علىه وسلم من زارني بالمدينة محتسبا کنت له شهيدا و شفيعا يوم القيمة . رواه البيهقى

हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया जिसने मदीना आकर सवाब की नीयत से मेरी (क़ब्र की) ज़ियारत की, क़यामत के दिन मैं उसके हक़ में गवाही भी दूंगा और सिफ़ारिश भी करूंगा।” इसे बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : हदीस ज़ईफ़ है। देखें ज़ईफ़ जामेअ सगीर, लिल अलबानी, हदीस 619, जिल्द 5।

 عن ابن عمر رضى الله عنهما قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من زار قبری وجبت له شفاعتي . رواه البيهقى

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘जिसने मेरी क़ब्र की ज़ियारत की उसके लिए सिफ़ारिश करना मुझ पर वाजिब है।” इसे बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : यह हदीस मौजूअ है। देखें ज़ईफ़ जामेअ सगीर लिल अलबानी, हदीसे नम्बर 5618, जिल्द 5।

 عن رجل من آل الخطاب عن النبي صلى الله عليه وسلم قال : من زارنی متعمدا كان في حواری یوم القيمة و من سكن و صبر على بلانها كنت له شهيدا و شفيعا يوم القيمة ومن مات في أحد الحرمين بعثه الله في الامنين يوم القيمة . رواه البيهقى

आले ख़त्ताब से एक आदमी रिवायत करता है कि नबी अकरम सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘जिसने जानकर मेरी (क़ब्र की) ज़ियारत की वह क़यामत के दिन मेरे साथ होगा। जिसने मदीना में क़याम किया और उस दौरान आने वाली मुसीबतों पर सब्र किया मैं क़यामत के दिन उसकी गवाही और उसके लिए सिफ़ारिश करूंगा। जो व्यक्ति हरम मक्का या हरम मदीना में से किसी एक में मरेगा अल्लाह क़यामत के दिन अम्न दिए गए लोगों के साथ उठाएगा।” इसे बैहेक़ी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : यह हदीस ज़ईफ़ है। देखें, मिश्कातुल मसाबीह, लिल अलबानी, बाब हरमुल मदीना।

 قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من زارنی و زار أبي إبراهيم في عام واحد دخل الجنة

रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘जिसने एक ही साल में मेरी और बाबे इबराहीम अलैहि० की ज़ियारत की वह जन्नत में दाख़िल होगा।”

स्पष्टीकरण : इमाम नववी रह०, इमाम सुयूती रह०, इमाम इब्ने तैमिया रह० और शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी ने इसे मौजूअ कहा है। देखें, सिलसिला अहादीस ज़ईफ़ वल मौजूअ लिल अलबानी, हदीस नम्बर 46, जिल्द 1

 عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من حج حجة الاسلام و زار قبری و غزا غزوة و صلى على في المقدس لم يسأله : الله فيما افترض عليه . رواه السخاوى

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया ‘‘जिसने हालते इस्लाम में हज किया और मेरी क़ब्र की ज़ियारत की जिहाद किया बैतुल मक़दिस में मुझ पर दुरूद भेजा, अल्लाह तआला फ़राइज़ में कोताही के बारे में उससे सवाल नहीं करेगा।” इसे सख़ावी ने रिवायत किया है।

स्पष्टीकरण : इब्ने अहदुल हादी रह०, इमाम सुयूती रह० और शैख़ मुहम्मद नासिरुद्दीन अलबानी ने इसे मौजूअ कहा है। देखें, सिलसिला अहादीस ज़ईफ़ वल मौजूअ लिल अलबानी, हदीस नम्बर 4, जिल्द 1।

क़ब्र की ज़ियारत के बारे में वे बातें जो सुन्नते रसूल से साबित नहीं

  1. सोमवार और जुमेरात का दिन क़ब्र की ज़ियारत के लिए तै करना।
  2. जुमा का दिन मां बाप की क़ब्रों की ज़ियारत के लिए तै करना।
  3. यौमे आशूरा पर क़ब्र की ज़ियारत का आयोजन करना।
  4. शाबान की पंद्रहवीं रात (शबे बराअत) क़ब्रों पर चिरागां करना।
  5. क़ब्र या मज़ार पर नाअत ख्वानी और महफ़िल समारों का आयोजन करना।
  6. क़ब्र या मज़ार पर चिराग, रौशनी, अगरबत्ती आदि जलाना।
  7. रजब, शाबान, रमज़ान या ईदैन के अवसर पर ज़ियारत क़ुबूर का आयोजन करना।
  8. ज़ियारत कुबूर के लिए वुजू, तयम्मुम या गुस्ल करना।
  9. ज़ियारत कुबूर के समय दो रकअत नफ़्ल अदा करना
  10. जियारत कुबूर के समय केवल सूरह फ़ातिहा पढ़ना (फ़ातिहा ख्वानी करना)
  11. जियारत कुबूर के समय सूरह यासीन तिलावत करना।
  12. जियारत कुबूर के समय ग्यारह बार “कुलहु वल्लाह” पढ़ना।
  13. यारत कुबूर के बाद उलटे पांव वापस पलटना।
  14. विस्तान में या किसी मज़ार पर कुरआन पाक रखना।
  15. वियों, वलियों या बुजुर्गों की क़ब्रों पर अपनी हाजतें लिखकर रखना या बाल काट कर डालना।
  16. त नबी, वली या बुजुर्ग को वसीला बनाते हुए ये शब्द इस्तेमाल ना. या बा-बरकत फ़लां मेरी दुआ सुन ले।
  17. अपने जिस्म को क़ब्र या मज़ार की दीवार से लगाना या अपने गाल करना, या बाबर क़ब्र से रगड़ना।
  18. औरतों का हामिला होने की नीयत से अपने जिस्म को क़ब्र से रगड़ना।
  19. क़ब्र वालों के लिए दुआ करते समय मुंह क़ब्र या मज़ार की तरफ़ करना।
  20. नबी, वली या बुजुर्ग की क़ब्र पर यह शब्द कहना ‘‘ऐ फ़लां! मेरे लिए अपने रब से दुआ कीजिए।”
  21. जियारत करने वालों के ज़रिए मृत नबी, वली या किसी बुजुर्ग को सलाम भिजवाना।
  22. किसी नबी, वली या बुजुर्ग की क़ब्र पर दूसरों की तरफ़ से सूरह फ़ातिहा पढ़ना।
  23. नबियों, वलियों या बुजुर्गों की क़ब्रों की ख़ाक को शिफ़ा का सबब समझना
  24. नबियों, वलियों या बुजुर्गों की क़ब्रों पर चादरें चढ़ाना, फूल डालना या खुश्बू लगाना।
  25. यह अक़ीदा रखना कि नबियों, वलियों और बुजुर्गों की क़ब्रों के पास दुआ ज़रूर कुबूल होती है।
  26. यह अक़ीदा रखना कि नबियों, वलियों और बुजुर्गों की क़ब्रों या मज़ारों पर हाज़िरी देने से मेरी सेहत, मेरा कारोबार, मेरी इज़्ज़त, मेरा पद, मेरी कुर्सी (मंत्री पद) या मेरी सदारत आदि क़ायम रहेगी।
  27. यह अक़ीदा रखना कि नबियों, वलियों या बुजुर्गों की क़ब्रों के आस पास पेड़ों, दीवारों, पत्थरों आदि को इसलिए हाथ नहीं लगाना चाहिए कि इससे नुक़सान होगा।
  28. मृत नबी, वली या बुजुर्ग की क़ब्र पर दुआ करते समय यह अक़ीदा रखना कि अपनी दुनियावी ज़िंदगी की तरह अब भी यह मेरी गुज़ारिशात सुन रहे हैं। मेरे हाल, कर्म और नीयत से अवगत हैं।
  29. क़ब्र या मज़ार को वसीला बनाकर दुआ मांगना।।
  30. हर जुमा को बक़ीअ (मदीना मुनव्वरा का क़ब्रिस्तान) की ज़ियारत का आयोजन करना।
  31. रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक की ज़ियारत के बाद ज़रूरी समझकर बक़ीअ की ज़ियारत करना।
  32. बरकत हासिल करने की नीयत से रसूल सल्ल० की क़ब्र मुबारक की जालियों को बोसा देना, छूना या अपने जिस्म को लगाना।
  33. रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर दुरूद व सलाम पढ़ने के बाद कुरआन मजीद की आयत वलव अन्नहुम इज़ा ज़-ल-मू अन्हु-स-हुम | तिलावत करने के बाद आप सल्ल० से इस्तग़फ़ार की दरख़ास्त करना।
  34. रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक की ज़ियारत के मौके पर ऐ | अल्लाह! मुहम्मद सल्ल० के सदके, वसीले, वास्ते, ज़रिए से मेरी दुआ कुबूल फ़रमा कहना।
  35. रसूले अकरम सल्ल० सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर दुआ करते समय, अश्शफ़ाअतु या रसूलुल्लाह, अल अमान या रसूलुल्लाह, अत्तवस्सुल बि या रसूलुल्लाह आदि कहना।
  36. रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर कुरआन ख्वानी या नाअत की नीयत करके जाना।
  37. क़ब्र बारक की ज़ियारत के समय यह अक़ीदा रखना कि जिस तरह रसूलुल्लाह सल्ल० अपने पाक जीवन में ख़िदमत मुबारक मे हाज़िर होने वालों की फ़रियादें सुनते थे। इसी तरह मेरी फ़रियाद सुन रहे हैं।
  38. रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक की ज़ियारत के समय यह अक़ीदा रखना कि रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक पर हाज़िर होने वाले लोगों की हालतों व कर्मों और नीयतों से वाक़िफ़ हैं।
  39. मदीना मनव्वरा जाने वालों के ज़रिए आप सल्ल० को सलाम भिजवाना।
  40. दुआ करते समय अपना रुख़ क़िबला के बजाए रसूले अकरम सल्ल० की क़ब्र मुबारक की तरफ़ करना।

 

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