शिर्क के बारे में कुछ अहम मुबाहिस

शिर्क के बारे में कुछ अहम मुबाहिस

अक़ीदा तौहीद की वज़ाहत करते हुए हम यह लिख आए हैं कि अल्लाह तआला की ज़ात के साथ किसी को शरीक करना शिर्क फ़िज़ात, अल्लाह तआला की इबादत में किसी को शरीक करना शिर्क फ़िल इबादत, और अल्लाह तआला की सिफ़ात में किसी को शरीक करना, शिर्क फ़िस्सिफ़ात कहलाता है। शिर्क के मौजूरों पर मज़ीद गुफ़्तुगू करने से क़ब्ल निम्न मुबाहिस को पेशे नज़र रखना बहुत ज़रूरी है। 1. मुश्किीन अल्लाह तआला को जानते और मानते थे।

हर ज़माने के मुश्रिक अल्लाह तआला को जानते और मानते हैं, यहां तक कि उसी को माबूदे आला और रब्बे अकबर (Great God) तस्लीम करते हैं और जो कुछ इस कायनात में है उन सबंका ख़ालिक़, मालिक और राज़िक़ उसे ही समझते हैं। कायनात का मुदब्बिर और मुंतज़िम भी उसी को मानते हैं जैसा कि सूरह यूनुस की निम्न आयत से मालूम होता है :

قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ أَمَّن يَمْلِكُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَمَن يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ الْأَمْرَ ۚ فَسَيَقُولُونَ اللَّهُ (10 : 31

तर्जुमा : “इनसे पूछो कौन तुमको आसमान और ज़मीन से रिज्क़ देता है यह समाअत और बीनाई की कुव्वतें किसके इख़्तियार में हैं? कौन बे-जाने में से जानदार को और जानदार में से बे-जान को निकालता है। कौन इस निज़ामे आलम की तदबीर कर रहा है? वे ज़रूर कहेंगे, “अल्लाह।”

(सूरह यूनुस, आयत 30)

فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ (29 : 65

तर्जुमा : “जब ये लोग कश्ती पर सवार होते हैं तो अपने दीन को अल्लाह तआला के लिए ख़ालिस करके उससे दुआ मांगते हैं। फिर जब वह ॐ बचाकर खुश्की पर ले आता है तो यकायक शिर्क करने लगते हैं।”

(सूरहे नकबूत, आयत 65)

‘ इस आयत से यह भी मालूम होता है कि मुश्रिक न वर्फ अल्लाह तआला को कायनात का मालिक और मुदब्बिर तस्लीम करते है बल्कि मुश्किल कुशाई और हाजत रवाई के लिए उसी की बारगाह को आखिरी और बड़ी बारगाह समझते थे। १. मुश्किीन अपने उपास्यों के इख़्तियारात खुदाई समझते थे मुश्रिंक जिन्हें अपना मुश्किलकुशा और हाजतरवा समझते थे, उनके लियारात को ज़ाती नहीं बल्कि अल्लाह तआला की तरफ़ से अता. करदा अमझते थे। दौराने हज मुश्किीन जो तल्विया पढ़ते थे उससे मुश्किीन के इस अकीदे पर रोशनी पढ़ती है जिसके शब्द यह थे।

(لبيك لا شريك لك لبيك إلا شریکا ھو لك تملکه و ما ملك)

तर्जुमा : “ऐ अल्लाह मैं हाज़िर हूं तेरा कोई शरीक नहीं मगर एक तेरा शरीक है जिसका तू ही मालिक है और वह किसी चीज़ का मालिक नहीं।” बिया के इन शब्दों से निम्न तीन बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं।

  1. मुश्रिक अल्लाह तआला को रब्बे अकबर या खुदाए खुदावंद (Great God) मानते थे।
  1. मुश्रिक अपने ठहराए हुए शुरका (खुदाओं और माबूदों) का शालिक और ख़ालिक़ भी रब्बे अकबर को ही समझते थे। । 3. मुश्रिक यह अक़ीदा रखते थे कि उनके ठहराए हुए शुरका ज़ाती हैसियत में किसी चीज़ के मालिक व मुख़्तार नहीं बल्कि उनके इख़्तियारात अल्लाह तआला की तरफ़ से अता करदा हैं जिनसे वे अपने पैरोकारों की मुश्किल आई और होजतरवाई करते हैं।

याद रहे मुश्किीन के तल्विया से ज़ाहिर होने वाले इस अक़ीदे को रसूले . अकरम सल्ल० ने शिर्क क़रार दिया है।

  1. इस विषय की कुछ दूसरी आयात ये हैं : (29 : 61-63), (31 : 25), (39:। 98), (43 : 87)।
  2. कुरआन मजीद की इस्तलाह। ‘मिन दूनिल्लाह’ से क्या मुराद है?

मुश्किीन में पाए जाने वाले मुख़्तलिफ़ अक़ाइद में से एक अक़ीदा यह भी है कि कायनात की हर चीज़ में खुदा मौजूद है या कायनात की मुख्तलिफ़ अंशया दरअस्ल खुदा की कुव्वत और ताक़त के मुख़्तलिफ़ रूप और मज़ाहिर हैं इस अक़ीदे को सबसे ज़्यादा लोकप्रियता मुश्किीन के क़दीम तरीन मज़हब “हिन्दू मत” में हासिल हुई जिनके यहां सूरज, चांद, सितारे आग, पानी, हवा, सांप, हाथी, गाय, बन्दर, ईंट, पत्थर, पौधे और पेड़ गोया हर चीज़ खुदा ही का रूप है जो पूजा और परस्तिश के क़ाबिल है। इस अक़ीदे के तहत मुश्किीन अपने हाथों से पत्थरों के ख्याली खूबसूरत मुजस्समे और बुत तराशते हैं फिर उनकी पूजा और परस्तिश करते हैं और उन्हीं को अपना मुश्किलकुशा और हाजतरवा मानते हैं। कुछ मुश्रिक पत्थरों को तराशते और कोई शक्ल दिए बगैर कुदरती शक्ल में उसे नहला धुलाकर फूल वगैरह पहनाकर उसके आगे सज्दा में गिर जाते हैं और उससे दआएं फरियादें करने लगते हैं। इस क़िस्म के तमाम तराशीदा या गैर तराशीदा बुत, मुजस्समे, मूर्तियां और पत्थर वगैरह कुरआन मजीद की इस्तलाह में “मिन दूनिल्लाह कहलाते हैं।

मुश्किीन में बुतपरस्ती की वजह एक दूसरा अक़ीदा भी था जिसका उल्लेख इमाम इब्ने कसीर रह० ने सूरह नूह की आयत नम्बर 23 की तफ़सीर में किया है और वह यह कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद में से एक सालेह और वलीयुल्लाह मुसलमान मर गया तो उसके अक़ीदतमंद रोने और पीटने लगे। सदमा से निढाल उसकी क़ब्र पर आकर बैठ गए। इबलीस उनके पास इंसानी शक्ल में आया और कहा कि इस बुजुर्ग के नाम की यागकार क्यों क़ायम नहीं कर लेते ताकि हर वक़्त तुम्हारे सामने रहे और तुम मिन दूनिल्लाह का मतलब है अल्लाह तआला के सिवा दूसरे जिनकी पूजा और परस्तिश की जाती है वह “दूसरे” कौन कौन हैं? इन पंक्तियों में इसकी वज़ाहत की गई है।

तर्जुमा : और उन्होंने कहा हरगिज़ न छोड़ो अपने माबूदों को और न छोड़ो वुद और सुवाअ को और न यगूस, यऊक़ और नस्र को। (सूरह नूह, आयत 33)

लने न पाओ। इस नेक और सालेह बन्दे के अक़ीदतमंदों ने यह तजवीज़ मन्द की तो इबलीस ने खुद ही इस बुजुर्ग की तस्वीर बनाकर उन्हें मुहय्या दी। जिसे देखकर वे लोग अपने बुजुर्ग की याद ताज़ा करते और उसकी दत और जुहद के क़िस्से आपस में बयान करते रहते। इसके बाद दोबारा लीस उनके पास आया और कहा कि आप सब हज़रात को तकलीफ़ करके * आना पड़ता है, क्या मैं तुम सबको अलग अलग तस्वीरें न बना दें ताकि लोग अपने अपने घरों में उन्हें रख लो? अक़ीदतमंदों ने इस तजवीज़ को * पसन्द किया और इबलीस ने उन्हें इस बुजुर्ग की तस्वीरें या बुत अलग मुहय्या कर दिए जो उन्होंने अपने अपने घरों में रख लिए। इन अलग । कीदतमंदों ने यह तस्वीरें और बुत यादगार के तौर पर अपने पास महफूज़ व लिए लेकिन उनकी दूसरी नस्ल ने आहिस्ता आहिस्ता उन तस्वीरों और नों की पूजा और परस्तिश शुरू कर दी। उस बुजुर्ग का नाम “वुद” था और । पहला बुत था जिसकी दुनिया में अल्लाह तआला के सिवा पूजा और स्तिश की गई। “वुद” के अलावा क़ौमे नूह दीगर जिन बुतों की पूजा करती उनके नाम सुवाअ, यगूस, यऊक़ और नस्र थे। ये सब के सब अपनी क़ौम के सालेह और नेक लोग थे। (बुख़ारी) । इस घटना से यह मालूम हुआ कि जहां कुछ मुश्रिक पत्थरों के ख्याली न और मुजस्समे बनाकर उन्हें अपना माबूद बना लेते थे वहां कुछ मुश्रिक धनी कौम के बुजुर्गों और वलियों के मुजस्समे और बुत बनाकर उन्हें भी पना माबूद बना लेते थे। आज भी बुतपरस्त अक़वाम जहां फ़र्जी बुत तराश र उनकी पूजा और परस्तिश करती हैं वहां अपनी क़ौम की अज़ीम और अम्लह शख्सियतों के बुत और मुजस्समे तराशकर उनकी पूजा और परस्तिश ३ करती हैं। हिन्दू लोग “राम” उसकी मां “कौशल्या” उसकी बीवी सीता और उसके भाई “लक्ष्मण” के बुत तराशते हैं। “कृष्णा” के साथ ही मां “यशोधा और उसकी बीवी ‘‘राधा” के बुत और मूर्तियां बनाई भी हैं। इसी तरह बौद्ध मत के पैरोकार ‘गौतम बुद्ध का मुजस्समा और यहां इस बात का उल्लेख दिलचस्पी से खाली नहीं होगा कि हिन्दुओं में दो फिके हैं सनातन धर्म और आर्य समाज । सनातन धर्म की मज़हबी कुतुब में चार : शास्त्र, अरह पुराण और अठारह स्मृति शामिल हैं। इन कुतुब में 33 करोड़ मूरत बनाते हैं। जैन मत के पैरोकार स्वामी महावीर का बुत तराशते और उसकी पूजा पाट करते हैं उनके नाम की नज़र नियाज़ देते हैं। उनसे अपनी हाजते और मुरादें तलब करते हैं। ये सारे नाम तारीख़ के फ़र्जी नहीं बल्कि हक़ीक़ी किरदार हैं जिनके बुत तराशे जाते हैं ऐसे तमाम बुजुर्ग और उनके बुत भी कुरआन मजीद की इस्तलाह “मिन दूनिल्लाह” में शामिल हैं।

कुछ मुश्रिक लोग अपने वलियों और बुजुर्गों के बुत या मुजस्समे तराशने की बजाए उनकी क़ब्रों और मज़ारों के साथ बुतों जैसा मामला करते थे। मुश्किीन मक्का क़ौम के बुतों, वुद, सुवाअ, यगूस, यऊक़ और नस्र के अलावा दुसरे जिन बुतों की पूजा और परस्तिश करते थे उनमें लात, मनात, उज़्ज़ा और हुबुल ज़्यादा मशहूर थे। उनमें से लात के बारे में इमाम इब्ने कसीर रह० ने कुरआन मजीद की आयत ‘अ-फ़-र जैतुमुल्ला-त वल उज़्ज़ा’ तर्जुमा : “कभी तुमने लात और उज्ज़ा की हक़ीक़त पर भी गौर किया है?” की तफ़सीर के तहत लिखा है कि लात एक नेक व्यक्ति था जो मौसमे हज में हाजियों को सत्तू । घोलकर पिलाया करता था। उसके देहान्त के बाद लोगों ने उसकी क़ब्र पर मुजाविरी शुरू कर दी और रफ़्ता रफ़्ता उसकी इबादत करने लगें पस वह बुजुर्ग और औलिया किराम जिनकी क़ब्रों के साथ बुतों जैसा मामला किया जाए। उन पर मुजाविरत की जाए, उनके नाम की नज़र व नियाज़ दी जाए। उनसे हाजतें और मुरादें तलब की जाएं, वह भी “मिन दूनिल्लाह” में इसी तरह शामिल हैं। जिस तरह वह बुत मिन दूनिल्लाह में शामिल हैं जिनकी पूजा और परस्तिश की जाती है।

हासिल बहस यह है कि किताब व सुन्नत की रू से मिन दूनिल्लाह से मुराद निम्न तीन चीजें हैं। | 1. वह तमाम ज़ानदार या गैर जानदार अशया जिन्हें खुदा का मज़हर या रूप समझकर उनके सामने मरासिमे उबूदियत बजा लाए जाएं। के बावजूद मूहिद होने का दावा रखता है। और चार वेदों के अलावा बाक़ी कुतुब को इसलिए नहीं तस्लीम करता कि उनमें शिर्क की तालीम दी गई है। | आर्य समाज फ़िरक़ के एक मुबल्लिग राजा राम मोहन राय (1774 ई० से 1833 ई०) ने ‘‘तोहफुल मोहिदीन” एक किताब भी तस्नीफ़ की है जिसमें बुतपरस्ती की निंदा और तौहीद की तारीफ़ की गई है। (हिन्दू धर्म की जदीद शख़्सियतें अज़ मुहम्मद फ़ारूक़ ख़ां एम. ए.)

तारीख़ की वह अज़ीम शख़्सियतें जिनके तराशीदा बुतों मुजस्समों और मूर्तियों के सामने मरासिमे उबूदियत बजा लाए जाएं। औलिया किराम और उनकी क़ब्रों जहां मुख़्तलिफ़ मरासिमे उबूदियत बजी लाए जाए। मुश्रिकीने अरब के मरासिमे उबूदियत क्या थे?

मुश्किीने अरब बुतकदों और ख़ानक़ाहों में अपने बुजुर्गों और औलिया किराम के बुतों के सामने जो मरासिम उबूदियत बजा लाते थे उनमें दर्जे ज़ेल रुसूम शामिल थी। बुतकदों में मुजाविर बन कर बैठना, बुतों से पनाह तलब करना, उन्हें ज़ोर ज़ोर से पुकारना, हाजतरवाई और मुश्किलकुशाई के लिए उनसे फ़रियादें और इल्तिजाएं करना। अल्लाह तआला के यहां उन्हें अपना सिफ़ारिशी समझकर मुरादें तलब करना। उनका हज और तवाफ़ करना, उनके सामने नज़र व नियाज़ पेश आना, उन्हें सज्दा करना, उनके नाम के नज़राने और कुर्बानियां देना, जानवरों को कभी बुतकदों पर ले जाकर ज़ब्ह करना कभी किसी भी जगह ज़ब्ह कर लेना।’ यह तमाम रुसूमात तब भी शिर्क थीं और अब भी शिर्क हैं। 5. कलिमा पढ़ने वाला भी मुश्रिक हो सकता है।

शिर्क करने वालों में से कुछ लोग तो ऐसे हैं जो रिसालत और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते। मसलन रसूले अकरम सल्ल० के ज़माने में कुरैश मक्का या हमारे ज़माने में हिन्दू मत के पैरोकार, उन्हें काफ़िर मुश्रिक कहा जा सकता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह तआला, रिसालत और आख़िरंत पर ईमान रखने के बावजूद शिर्क करते हैं। यह एक ऐसी हक़ीक़त है जिसकी गवाही खुद कुरआन मज़ीद ने दी है।

الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُم بِظُلْمٍ أُولَٰئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ (6 : 82

तर्जुमा : “(क़यामत के रोज़) अम्न उन्हीं के लिए है और राहेरास्ते पर मुलाहिज़ा हो अर्रहीक़िल मख़्तूम अज़ मौलाना सफ़ीउर्रहमान मुबारकपुरी सफ़हा 48-49।

वही हैं जो ईमान लाए और अपने ईमान को जुल्म (शिक) के साथ आलूदा नहीं किया।”

| (सूरह अनआम, आयंत 82) दूसरी जगह इरशाद बारी तआला है:

وَمَا يُؤْمِنُ أَكْثَرُهُم بِاللَّهِ إِلَّا وَهُم مُّشْرِكُونَ (12 : 106

तर्जुमा : “लागों में से अकसर ऐसे हैं जो अल्लाह तआला पर ईमान लाने के बावजूद मुश्रिक हैं।” (सूरह यूसुफ़, आयत 106) दोनों आयतों से यह बात वाज़ेह है कि कुछ लोग कलिमा पढ़ने रिसालत और आख़िरत पर ईमान लाने के बावजूद शिर्क में मुबितला होते हैं। ऐसे लोगों को कलिमा पढ़ने वाला मुश्रिक कहा जा सकता है। 6. शिर्क की क़िस्में शिर्क की दो क़िस्में हैं, शिर्क अकबर और शिर्क असार। अल्लाह तआला की ज़ात, इबादत और सिफ़ात में किसी दूसरे को शरीक करना शिर्क अकबर कहलाता है। शिर्क अकबर का मुर्तकिब दायरा इस्लाम से ख़ारिज हो जाता है और उसकी सज़ा हमेशा हमेशा के लिए जहन्नम है। जैसा कि सूरह तौबा की निम्न आयत में है :

مَا كَانَ لِلْمُشْرِكِينَ أَن يَعْمُرُوا مَسَاجِدَ اللَّهِ شَاهِدِينَ عَلَىٰ أَنفُسِهِم بِالْكُفْرِ ۚ أُولَٰئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ وَفِي النَّارِ هُمْ خَالِدُونَ (9 : 17

तर्जुमा : “मुश्किीन का यह काम नहीं कि वह अल्लाह तआला की मस्जिदों को आबाद करें। इस हाल में कि वह अपने ऊपर ख़ुद कुफ़ की शहादत दे रहे हैं। उनके तो सारे आमाल ज़ाया हो गए। और उन्हें जहन्नम में हमेशा रहना है।” .:

(सूरह तौबा, आयत 17) । ‘ शिर्के अकबर के अलावा कुछ ऐसे दीगर उमूर जिनके लिए अहादीस में शिर्क का शब्द इस्तेमाल हुआ है। मसलन रिया या गैर अल्लाह की क़सम खाना वगैरह यह शिर्के असगर कहलाते हैं। शिर्क असगर का मुर्तकिब दायरा इस्लाम से ख़ारिज तो नहीं होता अलबत्ता गुनाह कबीरा का मुर्तकिब होता है। कबीरा गुनाह की सज़ा जहन्नम है जब तक अल्लाह तआला चाहे। शिर्क असगर से तौबा न करना, शिर्क अकबर का बाइस बन सकता है।

याद रहे शिर्क ख़फ़ी से मुराद हल्का या ख़फ़ीफ़ शिर्क नहीं बल्कि मफ़ी शिर्क है जो किसी इंसान के अंदर छुपी हुई कैफ़ियत का नाम है। यह शिर्क अकबर भी होता है जैसा कि मुनाफ़िक़ का शिर्क और शिर्क असगर भी हो सकता है जैसा कि रियाकार का शिर्क है। मुश्किीन के दलाइल और उनका विश्लेषण कुरआन मजीद की रू से मुश्किीन, शिर्क के हक़ में तीन क़िस्म के दलाइल रखते हैं। यहां तीनों दलाइल का अलग अलग विश्लेषण पेश कर रहे पहली दलील और उसका विश्लेषण इससे पहले यह बात लिखी जा चुकी है कि मुश्किीन अल्लाह तआला को अपना रब्बे अकबर, माबूदे आला और खुदाए खुदावंद (Great God) तस्लीम करते हैं। उसे अपना ख़ालिक़, और मालिक समझते हैं जान पे बन जाए तो खालिसन उसी को पुकारते भी हैं, लेकिन इसी के साथ यह अक़ीदा भी रखते हैं कि औलिया किराम चूंकि अल्लाह तआला के यहां बुलंन्द मर्तबा होते हैं। अल्लाह. के महबूब और प्यारे होते हैं। लिहाज़ा अल्लाह तआला ने अपने इख्तियारात में से कुछ इख़्तियारात उन्हें भी दे रखे हैं। इसलिए उनसे भी मुरादें मांगी जा सकती हैं, उनसे भी हाजत और मदद तलब की जा सकती है, वह भी तक़दीर बना और संवार सकते हैं। दुआ और फ़रियाद सुन सकते हैं। अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में मुश्किीन के उस अक़ीदे का उल्लेख इन शब्दों में किया है :

وَاتَّخَذُوا مِن دُونِ اللَّهِ آلِهَةً لَّعَلَّهُمْ يُنصَرُونَ (36 : 74

तर्जुमा : “मुश्रिकों ने अल्लाह तआला के सिवा दूसरे इलाह इसलिए बना रखे हैं ताकि वे उनकी मदद करें।” (सूरह या०सीन०, आयत 74) यही वह अक़ीदा है जिसके तहत मुश्किीन अरब बुतों की शक्ल में अपने बुजुर्गों और औलिया किराम को पुकारते और उनसे मुरादें तलब करते थे। इसी अक़ीदे के तहत हिन्दू, बुद्ध और जैनी, मूर्तियों, मुजस्समों और बुतों की शक्ल में अपने अपने बुजुर्गों और वलियों से हाजतें, और मुरादें तलब करते हैं। इसी अक़ीदे के तहत कुछ मुसलमान मृत औलिया किराम और बुजुर्गों को पुकारते और उनसे हाजते और मुरादें तलब करते हैं। सय्यद अला हजवेरी रह० अपनी मशहूर किताब “कश्फुल महजूब” में फ़रमाते हैं अल्लाह तआला के औलिया मुल्क के मुदब्बिर हैं और आलम (दुनिया) के निगरां हैं। अल्लाह तआला ने ख़ास तौर पर उनको आलम को वाली (हाकिम) गरदाना है और आलम (दुनिया) का हल व अक़्द (इंतिज़ाम) उनके साथ वाबस्ता कर दिया है और अहकामे आलम को उन्हीं की हिम्मत के साथ जोड़ दिया है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपनी मारूफ़ किताब “फ़वाइदुल फ़वाइद’ में फ़रमाते हैं

शैख़ निज़ामुद्दीन अबुल मवेद बारहा फ़रमाया करते “मेरी वफ़ात के बाद जिसको कोई मुहिम दरपेश हो तो उससे कहो तीन दिन मेरी ज़ियारत को आए अगर तीन दिन गुज़र जाने के बाद भी वह काम पूरा न हो तो चार दिन आए और अब भी काम न निकले तो मेरी क़ब्र की ईंट से ईंट बजा दे। जनाब अहमद रज़ा खान बरेलवी फ़रमाते हैं औलिया किराम मुर्दे को ज़िंदा कर सकते हैं मादरज़ाद अंधे को कोढ़ी को शिफ़ा दे सकते हैं और सारी ज़मीन को एक क़दम में तय कर सकते हैं?4 नीज़ फ़रमाते हैं औलिया किराम अपनी यहां यह बात क़ाबिले ज़िक्र है कि आलमे असबाब के तहत किसी ज़िंदा इंसान से मदद तलब करना शिर्क नहीं, अलबत्ता आलमे असबाब से बालोतर अल्लाह तआला के सिवा किसी दूसरे को पुकारना शिर्क है। मसलने समुन्द्र में डूबते हुए जहाज़ पर बैठे हुए लोगों का किसी क़रीब तरीन बंदरगार पर मौजूद लोगों को वायरलेस के ज़रिए सूरतेहाल से ख़बरदार करके मदद तलब करना शिर्क नहीं क्योंकि डूबने और बचाने की कोशिश करना यह सारे काम सिलसिला असबाब के तहत हैं। अलबत्ता अगर डूबने वाले मेरी कश्ती तूफ़ानों में फंसी है ऐ मुईनुद्दीन चिश्ती तू मेरी मदद कर’’ की दुहाई देने लगें तो यह शिर्क होगा। क्योंकि ऐसी फ़रियाद करने वाले का अक़ीदा होगा कि अव्वलन ख़्वाजा मईनुद्दीन चिश्ती मरने के बावजूद सैकड़ों यां हज़ारों मील दूर से सुनने की ताक़त रखते हैं यानी वह अल्लाह तआला की तरह समीअ हैं। दूसरे, फ़रियाद और पुकार सुनने के बाद खाजा मुईनुद्दीन चिश्ती फ़रियाद करने वाले की मदद करने और उसकी मुश्किल हल करने की पूरी कुदरत रखते हैं। यानी वह अल्लाह तआला की तरह क़ादिर भी हैं। इन दोनों सूरतों में जो फ़र्क है वह ब-आसानी समझा जा सकता है। में हयात अबदी के साथ ज़िंदा हैं उनके इल्म व इदराक समाअ बसर * की निस्बत ज़्यादा क़वी हैं।”

फारसी के एक शायर ने इसी अक़ीदे का इज़हार निम्न शेअर में यूं किया क़ब्रों में तीर जस्ता कुछ गर्दाइंद ज़राह तर्जुमा : “औलिया किराम को अल्लाह तआला की तरफ़ से ऐसी त हासिल होती है कि वह कमान से निकले हुए तीर को वापस ला सकते है। किसी पंजाबी शायर ने अपने इस अक़ीदे की तर्जुमानी इन शब्दों में की हथ वली दे क़लम रब्बानी लिखे जो मन भावे रब वली नू ताक़त बख्शी लिखे लेख मिटावे तर्जुमा : ‘‘अल्लाह तआला का क़लम वली के हाथ में है जो चाहे लिखे ह तआला ने वली को यह ताक़त बख़्शी है कि जो चाहे लिखे जो चाहे बुजुर्गाने दीन और औलिया किराम के बारे में इसी क़िस्म के मुबालिगा व अक़ाइद और तसव्वुरात का यह नतीजा है कि लोग औलिया किराम नामों की दुहाई देते और उनसे मदद और मुरादें मांगते हैं। खुद “इमाम ने सुन्नत’’ हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी, शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी के बारे में फ़रमाते हैं “ऐ अब्दुल क़ादिर! ऐ फ़ज़्ल करने वाले, बगैर मांगे बत करने वाले, ऐ इनाम व इकराम के मालिक, तू बुलन्द व अज़ीम है, पर एहसान फ़रमा और साइल की पुकार को सुन ले। ऐ अब्दुल क़ादिर आरजुओं को पूरा कर । जनाब अहमद रज़ा ख़ां के बारे में उनके एक दतमंद शायर का इज़हारे अक़ीदत मुलाहिज़ा हो : चार जानिब, मुश्किलें हैं एक मैं एक मेरे मुश्किल कुशा अहमद रज़ा 1. मुलाहिज़ा हो अर्रहीक़िल मख़्तूम अज़ मौलाना सफ़ीउर्रहमान मुबारकपुरी सफ़ा

लाज रख मेरे फैले हाथ की

ऐ मेरे हाजत रवा अहमद रज़ा

शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० के बारे में भी किसी शायर में ऐसा ही इज़हारे ख्याल किया है।

इमदाद कुन इमदाद कुन अज़ रंज व ग़म आज़ाद कुन | दर दीन व दुनिया शाद कुन या शैख़ अब्दुल क़ादिरा

तर्जुमा : ऐ शैख़ अब्दुल क़ादिर! मेरी मदद कीजिए, मेरी मदद कीजिए, और मुझे हर रंज व गम से आज़ाद कर दीजिए, नीज़ दीन व दुनिया के तमाम मामलात में मुझे खुश कीजिए।

हज़रत अली रज़ि० के बारे में अरबी के एक शायर ने अपने अक़ीदे को इज़्हार यूं किया है :

ناد علیا مظهر العجائب تجده عونا في النوائب

کل هم و غم سينجلی بولايتك يا علي يا على

तर्जुमा : अजाइबात ज़ाहिर करने वाले अली को पुकारो हर मुसीबत में. उसे अपना मददगार पाओगे। ऐ अली तेरी वलायत के सदक़ अंक़रीब सारे गम दूर हो जाएंगे।

इन अफ़्कार व अक़ाइद को सामने रखते हुए या मुहम्मद, या अली, या हुसैन, या गौस आज़म जैसे निदाइया कलिमात की हक़ीक़त आसानी से समझी जा सकती है और यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं कि इन कलिमात के पसे मंज़र में कौन सा अक़ीदा कारफ़रमा है?

औलिया किराम और बुजुर्गाने दीन के बारे में पाए जाने वाले उन तसव्वुरात और अक़ाइद का अब हमें किताब व सुन्नत की रोशनी में जायज़ा लेना है कि क्या वाक़ई औलिया किराम ऐसी कुदरत और इख़्तियारात रखते हैं जैसा कि उनके पैरोकार समझते हैं?

पहले क़ुरआन मजीद की कुछ आयात मुलाहिज़ा हों :

وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِهِ مَا يَمْلِكُونَ مِن قِطْمِيرٍ (35 : 13

तर्जुमा : “अल्लाह तआला को छोड़कर जिन्हें तुम पुकारते हो वे एक पर काह के भी मालिक नहीं हैं?”

(सूरह फ़ातिर, आयत 13)

قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ (34 : 22

तर्जुमा : “कहो पुकार देखो उन्हें जिन्हें तुम अल्लाह तआला के सिवा अपना माबूद समझ बैठे हों वे न आसमान में ज़र्रा बराबर किसी चीज़ के मालिक हैं न ज़मीन में वे आसमान व ज़मीन की मिल्कियत में भी शरीक नहीं। न ही उनमें से कोई अल्लाह तआला का मददगार है।” (सूरह सबा, आयत 22)

مَا لَهُم مِّن دُونِهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا يُشْرِكُ فِي حُكْمِهِ أَحَدًا (18 : 26

तर्जुमा: “मख्तूक़ात का अल्लाह के सिवा कोई ख़बरगीर नहीं और वह अपनी हुकूमत में किसी को शरीक नहीं करता।”

(सूरह कहफ़, आयत 26)’

इन आयात में अल्लाह तआला ने स्पष्ट रूप से यह बात इरशाद फ़रमाई है कि मैं अपनी हुकूमंत अपने मामलात और इख़्तियारात में किसी दूसरे को शरीक नहीं करता और मेरे अलावा जिन्हें लोग पुकारते हैं या जिनसे मुरादें और हाजते तलब करते हैं वे ज़र्रा बराबर का इख़्तियार नहीं रखते न ही उनमें से कोई मेरा मददगार है। – इस दुनिया में अंबिया और रुसुल अल्लाह तआला के पैगम्बर और नुमाइन्दा होने की हैसियत से अल्लाह के सबसे ज़्यादा मुक़र्रब, सबसे ज़्यादा महबूब और सबसे ज्यादा प्यारे होते हैं। कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने बहुत से अंबिया किराम के वाक़िआत बयान फ़रमाए हैं कि वे किस तरह अपनी अपनी क़ौम के पास दावते तौहीद लेकर आए और क़ौम ने उनके साथ क्या सुलूक रवा रखा। किसी को क़ौम ने जिला वतन कर दिया, किसी को कैद कर दिया, किसी को क़त्ल कर दिया, किसी को मारा पीटा, लेकिन वह खुद अपनी क़ौम का कुछ भी न बिगाड़ सके। हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने क़ौम को तौहीद की दावत दी। क़ौम न मानी बल्कि उलटा कहा’ : ‘‘फ़ातिना बिमा ताअिदना इन कुन-त मिनस्सादिक़ीन०” तर्जुमा : “अच्छा तो ले आ वह अज़ाब जिसकी तू हमें धमकी देता है अगर अपनी बात में सच्चा है।” (सूरह आराफ़, आयत 70) इस पर अल्लाह तआला का पैगम्बर सिर्फ इतना ही कहकर ख़ामोश हो गया : ‘फ़न-त-ज़ि-रू इन्नी म-अ-कुम मिनल मुंतज़िरीन०’ तर्जुमा : “तुम भी (अज़ाब का) इंतिज़ार करो मैं भी तुम्हारे साथ इंतिज़ार करता हूं (यानी अज़ाब लाना मेरे बस में नहीं)।” (सूरह आराफ़, आयत 71) ऐसा ही मामला दूसरे अंबिया किराम के साथ भी पेश आता रहा। हम यहां अल्लाह तआला के एक जलीलुल क़द्र पैगम्बर हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की घटना तफ़्सील से बयान करना चाहते हैं। जिनकी क़ौम इगलाम के मज़े में मुब्तिला थी। फ़रिश्ते अज़ाब लेकर खूबसूरत लड़कों की शक्ल में आए तो हज़रत लूत अलैहिस्सलाम अपनी बदकिरदार क़ौम के बारे में सोचकर घबरा उठे कहने लगे : ‘हाज़ा यौमुन असीब’ तर्जुमा : “यह दिन तो बड़ी मुसीबत का है।” (सूरह हूद, आयत 77) और अपनी क़ौम से यह दरख्वास्त की।

( فاتقوا الله ولا تخزون في ضيفى أليس منکم رجل رشيد )

तर्जुमा : “अल्लाह तआला से डरो और मेरे मेहमानों के मामले में मुझे ज़लील न करो क्या तुममें कोई भला आदमी नहीं।”

(सूरह हूद, आयत 78)

क़ौम पर आपकी इस मिन्नत समाजत का कोई असर न हुआ, तो आजिज़ और मजबूर होकर यहां तक कह डाला कि : ‘हा उला-इ बनाती इन कुनतुम फ़ा-इ-लीन’ तर्जुमा : “अगर तुम्हें कुछ करना ही है तो यह मेरी बेटियां (निकाह के लिए) मौजूद हैं।” (सूरह हिज्र, आयत 71) बदबख़्त क़ौम इस पर भी राज़ी न हुई तो पैगम्बर की ज़बान पर बड़ी हसरत के साथ यह शब्द आ गए : ‘लव अन्न ली बिकुम कुव्वतन अव आवी इला रुकनिन शदीद’ तर्जुमा : “ऐ काश, मेरे पास इतनी ताक़त होती कि तुम्हें सीधा कर देता या कोई मज़बूत सहारा होता जिसकी पनाह लेता।” (सूरह हूद, आयत 80) हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की इस घटना को सामने रखिए और फिर गौर फ़रमाइए कि पैग़म्बर की बाते के एक एक शब्द से बेबसी, बेकसी और मजबूरी किस तरह टपक रही है। सोचने की बात यह है कि क्या खुदाई इख़्तियारात का मालिक कोई व्यक्ति मेहमानों के सामने यूं अपने दुश्मन से मिन्नत समाजत करना गवारा करता है। और फिर यह कि कोई साहिबे इख़्तियार और साहिबे कुदरत व्यक्ति अपनी बेटियों को यूं बदकिरदार और बदमाश लोगों के निकाह में देना पसन्द करता है?

एक नज़र सय्यदुल र भी डालकर देखिए, मस्जिदुल हरा हालत में आप सल्ल० की पीठ रज़ियल्लाहु अन्हा ने आकर अपने एक मुश्रिक उक़बा बिन अबी म सख़्ती से गला घोंटा, हज़रत में सल्ल० की जान बचाई। ताइफ़ में कर दिया कि आपके नालैन । सल्ल० ने बिल आंख़िर शहर वापसी पर मुक्का मुअज्जमा में । मुश्रिक मुइम बिन अदी की , जुल्म व सितम से तंग आकर बार छोड़ना पड़ा। जंगे उहद में मारा जिससे आप नीचे गिर 7 में एक धूसरे मुश्रिक ने आप से मारी कि खोद की दो कडिया किराम रज़ि० ने निकाला। हजर लगाया गया। आप सल्ल० चाह यहां तक कि ब-ज़रिया ‘वही नाज़िल की गई। आप सल्ल. अदा करने के लिए निकले, म दिया। आप उमरा अदा न कर मर्तबा धोखा देकर तब्लीग इस रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन है) को ले जाकर शहीद कर हि * सीरते तय्यबा की इन ने सामने एक ऐसे इंसान की त इलाही और मशीयते ऐज़दी । मौलाना अलताफ़ हुसैन आली. की बड़ी ठीक ठीक तर्जुमानी निस तौहीद के मसाइल अय्यदल अंबिया सरवरे आलम सल्ल० की हयाते. तय्यबा पर न मस्जिदुल हराम में नमाज़ पढ़ते हुए मुश्किीन ने संज्दा की ल०- की पीठ पर ऊंट की ओझ रख दी। हज़रत फ़ातिमा ने आकर अपने बाबा को उस मुश्किल से निजात दिलाई। न बिन अबी मुईत ने आप सल्ल० के गले में चादर डालकर वा, हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० दौड़कर आए और आप बचाई। ताइफ़ में मुश्किीन ने पत्थर मार मारकर इतना ज़मी पिके नालैन मुबारक खून से तर ब तर हो गए और आप शाखिर शहर से बाहर एक बाग में पनाह ली। ताइफ़ से अज़मा में दाख़िल होने के लिए आप सल्ल० को एक अदी की पनाह हासिल करना पड़ी। मुश्रिकीने मक्को के के तंग आकर रात की ‘तारीकी में आप सल्ल० को अपना घर – जंगे उहुद में एक मुश्रिक ने आप सल्ल० को एक पत्थर * नीचे गिर गए और एक निचला दांत टूट गया। इसी जंग क ने आप सल्ल० के चेहरे मुबारक पर इस ज़ोर से तलवार दो कड़ियां चेहरे के अंदर धंस गईं जिन्हें बाद में सहाबा • निकाला। हज़रत आइशा रज़ि पर बदकारी को बोहतान सल्ल० चालीस दिन तक शदीद परेशानी में मुब्तिला रहे रिया ‘वही’ हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बराअत आप सल्ल० पंद्रह सौ मुसलमानों के साथ मदीना से उमरा निकले, मुश्रिकीने मक्का ने आप सल्ल० को रास्ते में रोक 1 अदा न कर सके। कुछ मुश्रिकों ने आप सल्ल० को दो तब्लीग इस्लाम के बहाने जलीलुल क़द्र सहाबा किराम टिम अजमईन (जिनकी मज्मूई तादाद 70 से 80 तक बनती शहीद कर दिया जिससे आपको शदीद सदमा पहुंचा। की इन तमाम घटनाओं को सामने रखा जाए तो हमारे सान की तस्वीर आती है जो पैगम्बर होने के बावजूद क़ानूने ते ऐज़दी के सामने बेबस और लाचार नज़र आता है। हुसैन आली रह० ने किताब व सुन्नत के इस दृष्टिकोण तर्जमानी निम्न अशआर में की है :

जहां दार मगलूब व मक़हूर हैं वां

नबी और सिद्दीक़ मजबूर हैं। वां

न पुरसिश है रोहबान व अहबार की वां

ने परवा है अबरार व अहरार की वां

अब एक तरफ़ बुजुर्गों और औलिया किराम के अक़ाइद और उनसे मंसूब घटनाएं सामने रखिए और दूसरी तरफ़ कुरआनी तालीमात और कुरआन मजीद में बयान किए गए अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम के वाक़िआत को सामने रखिए दोनों के तक़ाबुल से जो नतीजा निकलता है वह यह कि या तो किताब व सुन्नत की तालीमात और अंबिया किराम अलैहिमुस्सलाम की घटनाएं मात्र क़िस्से और कहानियां हैं जिनका हक़ीक़त से दूर का भी वास्ता नहीं या फिर बुजुर्गों और औलिया किराम के अक़ाइद और उनसे मंसूबे घटनाएं सरासर झूठ और मन गढ़त हैं। इन दोनों सूरतों में से जिसका जो जी चाहे रास्ता इख़्तियार कर ले। अहले ईमान के लिए तो सिर्फ एक ही रास्ता है:

رَبَّنَا آمَنَّا بِمَا أَنزَلْتَ وَاتَّبَعْنَا الرَّسُولَ فَاكْتُبْنَا مَعَ الشَّاهِدِينَ (3 : 53

तर्जुमा : ‘‘ऐ हमारे परवरदिगार! जो फ़रमान तूने नाज़िल किया है हमने उसे मान लिया और रसूल की पैरवी की हमारा नाम गवाही देने वालों में लिख ले ।’ ‘                                                                  (सूरह आले इमरान, आयत 53)

दूसरी दलील और उसका विश्लेषण

कुछ लोग यह अक़ीदा रखते हैं कि बुजुर्गाने दीन और औलिया किराम अल्लाह के यहां बुलन्द मर्तबा रखते हैं। अल्लाह तआला के महबूब और प्यारे होते हैं इसलिए अल्लाह तआला की बारगाह बुलन्द व बरतर तक रेसाई हासिल करने के लिए औलिया किराम और बुजुर्गों का वसीला या वास्ता पकड़ना बहुत ज़रूरी है। कहा जाता है कि जिस तरह दुनिया में किसी अफ़सरे आला तक दरख्वास्त पहुंचाने के लिए मुख़्तलिफ़ सिफ़ारिशों की ज़रूरत पड़ती है इसी तरह अल्लाह तआला की जनाब में अपनी हाजत पेश करने के लिए वसीला पकड़ना ज़रूरी है। अगर कोई व्यक्ति बिला वसीला अपनी हाजत पेश करेगा तो वह उसी तरह नाकाम व नामुराद होगा जिस तरह अफ़सरे आला को बिला सिफ़ारिश पेश की गई दरख्वास्त बे नतीजा रहती है। कुरआन मजीद में अल्लाह तआला ने इस अक़ीदे का उल्लेख निम्न शब्दों में किया है :

وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ (39 : 3

तर्जुमा : “वे लोग जिन्होंने अल्लाह तआला के सिवा दूसरों को अपना रस्त बना रखा है (वे अपने इस फ़ेअल की तौज़ीह यह करते हैं कि हम उनकी इबादत सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि वे अल्लाह तआला तक हमारी (सूरह जुमर, आयत 3)

शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० से मंसूब निम्न इक़्तबास इसी अक़ीदे तर्जमानी करता है “जब भी अल्लाह तआला से कोई चीज़ मांगो मेरे ले से मांगो ताकि मुराद पूरी हो और फ़रमाया कि जो किसी मुसीबत में वसीले से मदद चाहे, उसकी मुसीबत दूर हो। और जो किसी सख़्ती में नाम लेकर पुकारे उसे कुशादगी हासिल हो, जो मेरे वसीले से अपनी मुरादें न करे तो पूरी हों चुनांचे शैख़ के अक़ीदतमंद इन शब्दों से दुआ मांगते ते अल्लाह दोनों जहानों के फ़रियाद रस, अब्दुल क़ादिर जीलानी के सदक़ न हाजत पूरी फ़रमा” । जनाब अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी फ़रमाते हैं : “औलिया से मदद मांगना उन्हें पुकारना उनके साथ तबस्सुल करना अम्र रूअ और शैई मरगूब है जिसका इंकार न करेगा मगर हठधर्म या दुश्मन इंसान।”

वसीला पकड़ने के सिलसिले में हज़रत जुनेद बगदादी की निम्न घटना काबिले ज़िक्र है कि एक मर्तबा हुज़रत जुनेद बगदादी रह० या अल्लाह न अल्लाह कहकर दरिया उबूर कर गए। लेकिन मुरीद से कहा कि या जुनेद जनैद कहकर चला आ। फिर शैतान लईन ने उस (मुरीद) के दिल में वसा डाला क्यों न मैं भी यो अल्लाह कहूं जैसा कि पीर साहब कहते हैं। अल्लाह कहने की देर थी कि डूबने लगा। फिर जुनेद को पुकारा जुनेद ने “वही कह या जुनेद या जुनेद” जब पारं लगा तो पूछा “हज़रत! यह वा बात है?” फ़रमाया : “ऐ नादान! अभी तू जुनेद तक तो पहुंचा नहीं लाह तआला तक रसाई की हवस है।” अल्लाह तआला की बारगाह तक

रसाई हासिल करने के लिए बुज़ुर्गाने दीन और औलिया किराम का वसीला और वास्ता पकड़ने का अक़ीदा सही है या गलत। यह देखने के लिए हम किताब व सुन्नत की तरफ़ रुजू करेंगे ताकि मालूम करें कि शरीअत की अदालत इस बारे में क्या फैसला करती है। पहले कुरआन मजीद की कुछ आयात मुलाहिज़ा हों :

1وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ (40 : 60

तर्जुमा : “तुम्हारा रब कहता है मुझे पुकारो मैं तुम्हारी दुआएं कुबूल करूंगा।”

(सूरह मोमिन, आयत 60)

2  وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ (2 : 186

तर्जुमा : “ऐ नबी, मेरे बन्दे अगर तुमसे मेरे मुताल्लिक़ पूछे तो उन्हें बता दो कि मैं उनसे क़रीब ही हूं। पुकारने वाला जब मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार का जवाब देता हूं।” (सूरह बक़रा, आयत 186)

إِنَّ رَبِّي قَرِيبٌ مُّجِيبٌ (11 : 61

तर्जुमा : “मेरा रब क़रीब भी है और जवाब देने वाला भी।”                       (सूरह हूद, आयत 61)

उपरोक्त आयतों से दर्जे ज़ेल बातें मालूम होती हैं :

  1. अल्लाह तआला बिला इस्तसना अपने तमाम बन्दों, नेकोकार हों या गुनाहगार, परहेज़गार हों या ख़ताकार, आलिम हों या जाहिल, मुर्शिद हों या मुरीद, अमीर हों या गरीब, मर्द हों या औरत, सबको यह हुक्म दे रहा है कि तुम मुझे बराहेरास्त पुकारो मुझी से अपनी हाजते और मुरादें तलब करो, मुझी से दुआएं और फ़रियादें करो। . 2. अल्लाह तआला अपने तमाम बन्दों के बिल्कुल क़रीब है (अपने इल्म और कुदरत के साथ) लिहाज़ा हर व्यक्ति खुद अल्लाह के सामने अपनी दरख्वास्ते और हाजतें पेश कर सकता है। उससे अपना ग़म और दुखड़ा बयान कर सकता है, चाहे तो रात की तारीकियों, में, चाहे तो दिन के उजालों में चाहे तो बन्द कमरों की तंहाइयों में, चाहे तो मज्मा आम में, चाहे तो हजर में, चाहे तो सफ़र में, चाहे तो जंगलों में, चाहे तो सहराओं में, चाहे तो समुन्द्रो में. चाहे तो फ़िज़ाओं में, जब चाहे जहा चाहें, उसे पुकार सल सकता है कि वह हर व्यक्ति की रगे गर्दन से भी ज़्यादा करीत  3. अल्लाह तआला अपने तमाम बन्दों की दुआओं जवाब किसी वसीले या वास्ते के बर्गर खुद देता है, गौर वक़्त रिआया की दरख्वास्ते खुद वसूल करने के लिए है। दरबार आम खुला रखता हो और उन पर फैसला भी खुद ही हो उसके हुजूर दरख्वास्तें पेश करने के लिए वसीले और ना सरासर जिहालत नहीं तो और क्या है?

रसूले  अकरम सल्ल० से अहादीस में जितनी भी कोई एक ज़ईफ़ से ज़ईफ़ हदीस भी ऐसी नहीं मिलती कि अल्लाह से कोई हाजत तलब करते हुए या दुआ मांगते हजरत इब्राहीम अलीहस्सलाम, हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम अलैहिस्सलाम या हज़रत इसा अलाहस्सलाम को वसीला  बल की वफ़ात के बाद सहाबा किराम रिज़वानुल्लांहि साला या वास्ता बनाया अलीहम अजमइन से भी कोई ऐसा रिवायत या घटना साति सहाबा किराम रिज़वानुल्लाह अलीहम अजमईन ने दुआ मांगने : बिया सरवरे आलम सल्ल० को वसीला या वास्ता बनाया , ७ या वास्ता पकड़ना जाइज़ होता तो सहाबा किराम रिजवान अजमईन के लिए रसूले अकरम सल्ल० से बढ़कर अफ़ज़ल है, कोई नहीं हो सकता था। जिस काम को रसूलुल्लाह , रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन ने इख़्तियार नहीं ॥ इख़्तियार करने का जवाज़ कैसे पैदा किया जा सकता है, अल्लाह तआला के सामन रसाइ हासिल करने के लिए वसी, नाश करने की जो दुनियावी मिसाले दी जाती हैं आइए लम्हा भर पर भी गौर कर लें और यह देखें कि उनमें कहां तक सदाकत, दनिया में किसी भी अफ़सरे बालों तक रसाई हासिल करने के लिए वसीला और वास्ता की ज़रूरत निम्न वजूहात की बिना पर हो ।

  1. अफ़सराने बाला के दरवाज़ों पर हमेशा दरबान बैठे हैं जो तमाम दरख्वास्त गुज़ारा को अंदर नहीं जान दत अगर कोई अफ़सरे और अज़ीज़ साथ हो तो यह रुकावट फ़ौरन दूर हो जाती है और वास्ता मत्लूब होता है।
  1. मुताल्लिक़ा अफ़सर अगर साइल के ज़ाती हालात और मामलात से आगाह न हो तब भी वसीले और वास्ते की ज़रूरत पड़ती है ताकि मुताल्लिक़ा अफ़सर को मत्लूब मालूमात फ़राहम की जा सकें जिन पर वह एतेमाद कर सके।
  2. अगर अफ़सरे बाला बेरहम, बे-इंसाफ़ और ज़ालिम तबीअत का मालिक हो तब भी वसीले और वास्ते की ज़रूरत महसूस की जाती है कहीं खुद साइल ही बे-इंसाफ़ी और जुल्म का शिकार न हो जाए।
  3. अगर अफ़सरे बाला से नाजाइज़ मुराआत और मफ़ादात का हुसूल मलूब हो (मसलन रिश्वत देकर या किसी क़रीबी रिश्तेदार वालिदैन, बीवी, या औलाद वगैरह का दबाव डलवा कर मफ़ाद हासिल करना हो) तब भी वसीले और वास्ते की ज़रूरत महसूस की जाती है।

ये हैं वे मुख़्तलिफ़ सूरतें जिनमें दुनियावी वास्तों और वसीलों की ज़रूरत महसूस की जाती है। इन तमाम निकात को ज़ेहन में रखिए और फिर सोचिए क्या वाक़ई अल्लाह तआला के यहां दरबान मुक़र्रर हैं कि अगर कोई आम आदमी दरख्वास्त पेश करना चाहे तो उसे मुश्किल पेश आए और अगर उसके मुक़र्रब और महबूब आएं तो उनके लिए इज़्ने आम हो? क्या वाक़ई अल्लाह तआला भी दुनियावी अफ़सरों की तरह अपनी मलूक़ के हालात और मामलात से लाइल्म है जिन्हें जानने के लिए उसे वसीले या वास्ते की ज़रूरत हो? क्या अल्लाह तआला के बारे में हमारा ईमान यही है कि दुनिया की अदालतों की तरह उसके दरबार में भी रिश्वत या वास्ते और वसीले के दबाव से नाजाइज़ मुराआत और मफ़ादात का हुसूल मुमकिन है? अगर इन सारे सवालों का जवाब “हा” में है तो फिर कुरआन मजीद और हदीस शरीफ़ में अल्लाह सुब्हानहू व तआला के बारे में बताई गई सारी सिफ़ात मसलन, रहमान, रहीम, करीम, रऊफ, वदूद, समीअ, बसीर, अलीम, क़दीर, ख़बीर, मुक़सित आदि का सर्वथा इंकार कर दीजिए और फिर यह भी तस्लीम कर लीजिए कि जो जुल्म व सितम, अंधेर नगरी और जंगल का क़ानून इस दुनिया में राइज है (मआज़ल्लाह) अल्लाह तआला के यहां भी वही क़ानून राइज है। और अगर इन सवालों का जवाब नफ़ी में है (और वाक़ई नफ़ी में है) तो फिर सोचने की बात यह है कि उपरोक्त असबाब के अलावा आख़िर वह कौन-सा सबब है जिसके लिए वसीले और वास्ते की ज़रूरत है?

हम इस मसले को एक मिसाल से स्पष्ट करना चाहेंगे। गौर फ़रमाइए अगर कोई हाजतमंद पचास या सौ मील दूर अपने घर बैठे किसी अफ़सर मजाज़ को अपनी परेशानी और मुसीबत से आगाह करना चाहे तो क्या ऐसा कर सकता है? हरगिज़ नहीं, साइल और मसऊल दोनों ही वास्ते और वसीले के मोहताज हैं। फ़र्ज़ कीजिए साइल की दरख्वास्त किसी तरह अफ़सर मजाज़ तक पहुंचा दी गई क्या अब वह अफ़सर इस बात की कुदरत रखता है कि साइल के बयान करदा हालात की अपने ज़ाती इल्म की बिना पर तस्दीक़ या तर्दीद कर सके? हरगिज़ नहीं इंसान का इल्म इस क़द्र महदूद है कि वह किसी के सही हालात जानने के लिए क़ाबिले एतेमाद और सिक़ा गवाहों का मोहताज है। फ़र्ज़ कीजिए अफ़सर बाला अपनी इंतिहाई ज़हानत और फ़िरासत के सबब खुद ही हक़ाइक़ की तह तक पहुंच जाता है तो क्या वह इस बात पर क़ादिर है कि अपने दफ़्तर में बैठे बिठाए पचास या सौ मील दूर बैठे हुए साइल की मुश्किल आसान कर दे? हरगिज़ नहीं बल्कि ऐसा करने के लिए भी उसे वसीले और वास्ते की ज़रूरत है गोया साइल सवाल करने के लिए वास्ते को मोहताज है और अफ़सर मजाज़ मदद करने के लिए वास्ते और वसीले का मोहताज है। यही वह बात है जो अल्लाह करीम ने कुरआन मजीद में यूं इरशाद फ़रमाई : ‘ज़-उ-फ़त तालिबु वल मतलूब’ तर्जुमा : “मदद चाहने वाले भी कमज़ोर और जिनसे मदद चाही जाती है वह भी कमज़ोर” (सूरह हज, आयत 73) इसके बरअक्स अल्लाह तआला की सिफ़ात इख़्तियारात और कुदरत कामिला का हाल तो यह है कि सातों ज़मीनों के नीचे पत्थर के अंदर मौजूद छोटी सी चीटीं की पुकार भी सुन रहा है उसके हालात का पूरा इल्म रखता है और खरबों मील दूर बैठे बिठाए किसी वसीले और वास्ते के बगैर उसकी सारी ज़रूरतें और हाजतें भी पूरी कर रहा है। फिर आख़िर अल्लाह तआला की सिफ़ात और कुदरत के साथ इंसानों की सिफ़ात और कुदरत को कौन-सी निस्बत है कि अल्लाह तआला के लिए दुनियावी मिसालें दी जाएं और वसीले या वास्ते का जवाज़ साबित किया जाए? | हक़ीक़त यह है कि अल्लाह तआला के मामले में तमाम दुनियावी मिसालें महज़ शैतानी फ़रेब हैं। वसीअ कुदरतों और लामहदूद सिफ़ात के मालिक अल्लाह सुब्हानहू व तआला की ज़ात बाबरकात के मामलात को इंतिहाई महदूद, क़लील और आरज़ी इख़्तियारात के मालिक इंसानों के मामलात पर महमूल करना और अल्लाह तआला की ज़ात के लिए अफ़सरे बाला की मिसालें देना अल्लाह की जनाब में बहुत बड़ी तौहीन और गुस्ताख़ी है। जिससे खुद अल्लाह तआला ने मुसलमानों को इन शब्दों में मना फ़रमाया है : ‘फ़ला तंज़रिबू लिल्लाहिल अमसाल०, इन्नल्ला-ह यअलमु व अन्तुम ला तअलमून०’ तर्जुमा : ‘‘लोगों अल्लाह तआला के लिए मिसालें न दो बेशक अल्लाह तआला हर चीज़ जानता है और तुम नहीं जानते।” (सूरह नल, आयत 74) | पस हासिल कलाम यह है कि ने तो किताब व सुन्नत की रू से वसीला और वास्ता पकड़ना जाइज़ है न ही अक़्ले इंसानी इसकी ताईद करती है। ‘सुब्हानल्लाहि व तआला अम्मा युशरिकून०’ तर्जुमा : “पस अल्लाह तआला पाक और बालातर है उस शिर्क से जो लोग करते हैं।”

(सूरह, क़सस, आयत 68) “

तीसरी दलील और उसका विश्लेषण ।

कुछ लोग यह अक़ीदा रखते हैं कि औलिया किराम चूंकि अल्लाह तआला के यहां बड़े बुलन्द मर्तबे और मुक़र्रब होते हैं, लिहाज़ा उनका अल्लाह के यहां बड़ा असर व रुसूख़ है। अगर नज़र व नियाज़ देकर उन्हें खुश कर लिया जाए तो वे अल्लाह तआला के यहां हमारी सिफ़ारिश करके हमें बख़्शवा लेंगे। अल्लाह तआला ने कुरआन मजीद में इस अक़ीदे का इज़हार इन शब्दों में किया है :

وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَٰؤُلَاءِ شُفَعَاؤُنَا عِندَ اللَّهِ (10 : 18

तर्जुमा : “ये लोग अल्लाह तआला के सिवा उनकी इबादत करते हैं जो न उनको नुक़सान पहुंचा सकते हैं न नफ़ा और कहते हैं कि ये अल्लाह के यहां हमारे सिफ़ारिशी हैं।”

(सूरह यूनुस, आयत 18)

एक बुजुर्ग जनाब ख़लील बरकाती साहब ने इस अक़ीदे का इज़हार इन शब्दों में किया है : “बेशक औलिया और फुक़हा अपने पैरोकारों की शफ़ाअत करते हैं और उनकी निगहबानी करते हैं। जब उनकी रूह निकलती है, जब मुंकिर नकीर उनसे सवाल करते हैं, जब उनका हश्र होता है, जब उनका नामाए आमाल खुलता है, जब उनसे हिसाब लिया जाता है, जब उनके अमल मिलते हैं, जब वे पुल सिरात पर चलते हैं, हर वक़्त हर हाल में उनकी निगाहबानी करते हैं, किसी जगह उनसे गाफ़िल नहीं होते। शफ़ाअत के सिलसिले में शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० की एक घटना पाठकों की दिलचस्पी के लिए हम यहां नक़ल कर रहे हैं जिससे अंदाज़ा होता है कि कुछ लोगों के नज़दीक औलिया किराम किस क़द्र साहिबे इख्तियार और साहिबे शफ़ाअत होते हैं। घटना यह है : | “जब शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० जहां फ़ानी से आलमे जाविदानी में तशरीफ़ ले गए तो एक बुजुर्ग को ख़्वाब में बताया कि मुकिर नकीर ने जब मुझसे मन रब्बु-क? (यानी तेरा रब कौन है) पूछा, तो मैंने कहा इस्लामी तरीक़ा यह है कि पहले सलाम और मुसोहफ़ा करते हैं। चुनांचे फ़रिश्तों ने नादिम होकर मुसाहफ़ा किया तो शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० ने हाथ मज़बूती से पकड़ लिए और कहा कि तख़्नीक़ आदम के वक़्त तुमने ‘अतजअलु फ़ीहा मयं युफ़सिदू फ़ीहा’ तर्जुमा : “क्या तू पैदा करता है उसे जो ज़मीन में फ़साद बरपा करे” कहकर अपने इल्म को अल्लाह तआला के इल्म से ज़्यादा समझने की गुस्ताख़ी क्यों की। नीज़ तमाम बनी आदम की तरफ़ फ़साद और खू रेज़ी की निस्बत क्यों की? तुम मेरे इन सवालों का जवाब दोगे तो छोडूंगा वरना नहीं। मुंकिर नकीर हक्का बक्का एक दूसरे का मुंह देखने लगे। अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की मगर उस दिलावर, यकताए मैदाने जबरूत और ग़व्वास बहरे लाहूत के सामने कुव्वते मलकूती क्या काम आती। मजबूरन फ़रिश्तों ने अर्ज़ किया हुजूर! यह बात सारे फ़रिश्तों ने कही थी, लिहाज़ा आप हमें छोड़ दें ताकि बाक़ी फ़रिश्तों से पूछकर जवाब दें। हज़रत गौस सकलैन रह० ने एक फ़रिश्ते को छोड़ा दूसरे को पकड़ रखा, फ़रिश्ते ने जाकर सारा हाल बयान किया तो सब फ़रिश्ते उस सवाल के जवाब से आजिज़ रह गए। तब बारीतआला की तरफ़ से हुक्म हुआ कि मेरे महबूब की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपनी ख़ता माफ़ कराओ। जब तक वह माफ़ न करेगा रिहाई न होगी। चुनांचे तमाम फ़रिश्ते महबूब सुब्हानी रज़ि० की ख़िदमत में हाज़िर होकर माफ़ी के लिए हाज़िर हुए। हज़रत समदिय्यत (यानी अल्लाह तआला) की तरफ़ से भी शफ़ाअत का इशारा हुआ। उस वक्त हज़रत गौसे आज़म ने जनाब बारी तआला में अर्ज़ किया, ऐ ख़ालिक़ कुल! रब्बे अकबर! अपने रहम वे करम से मेरे मुरीदीन को बख़्श दे और उनको मुकिर नकीर के सवालों से बरी फ़रमा दे तो मैं इन फ़रिश्तों का कुसूर माफ़ करता हूं। फ़रमाने इलाही पहुंचा कि मेरे महबूब! मैंने तेरी दुआ कुबूल की फ़रिश्तों को माफ़ कर। तबै जनाब गौसियत मआब ने फ़रिश्तों को छोड़ा और वह आलमे मलकूत को चले गए।

गौर फ़रमाइए इस एक घटना में औलिया किराम के बाइख़्तियार होने, औलिया किराम का वसीला पकड़ने और औलिया किराम को अल्लाह तआला के यहां सिफ़ारिशी बनाने के अक़ीदे की किस क़द्र भरपूर तर्जुमानी की गई है। इस घटना से पता चलता है कि औलिया किराम जब चाहें सिफ़ारिश करके अल्लाह तआला से बख़्शवा सकते हैं और अल्लाह तआला को उनकी सिफ़ारिश के बरअक्स मजाल इंकार नहीं। बल्कि इस घटना से यह अंदाज़ा होता है कि औलिया किराम, अल्लाह तआला को सिफ़ारिश मानने पर मजबूर भी कर सकते हैं। ..

आइए एक नज़र कुरआनी तालीमात पर डालकर देखें क्या अल्लाह तआला के सामने इस तरह की सिफ़ारिश मुमकिन है या नहीं? सिफ़ारिश से मुताल्लिक़ कुछ कुरआनी आयात निम्न हैं:

1 مَن ذَا الَّذِي يَشْفَعُ عِندَهُ إِلَّا بِإِذْنِهِ (2 : 255

तर्जुमा : “कौन है जो उसकी जनाब में उसकी इजाज़त के बगैर सिफ़ारिश कर सके।” (सूरह बक़रा, आयत 255)

وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَىٰ (21 : 28

तर्जुमा : “वे फ़रिश्ते किसी के हक़ में सिफ़ारिश नहीं करते सिवाए उसके जिसके हक़ में सिफ़ारिश सुनने पर अल्लाह तआला राज़ी हो।”

(सूरह अंबिया, आयत 28)

तर्जुमा : “कहो सिफ़ारिश सारी की सारी अल्लाह तआला के इख़्तियार में है।” (सूरह जुमर, आयत 44)

इन आयात में अल्लाह तआला के हुजूर सिफ़ारिश की जो हुदूद व कुयूद बयान की गई हैं वह ये हैं :

  1. सिफ़ारिश सिर्फ वही व्यक्ति कर सकेगा जिसे अल्लाह तआला सिफ़ारिश करने की इजाज़त देगा।
  2. सिफ़ारिश सिर्फ उसी व्यक्ति के हक़ में हो सकेगी जिसके लिए अल्लाह तआला सिफ़ारिश करना पसन्द फ़रमाएगा।
  3. सिफ़ारिश की इजाज़त देने या न देने, कुबूल करने या न करने का • सारा इख़्तियार सिर्फ अल्लाह तआला के पास है।

कुरआन मजीद की इन मुक़र्रर करदा हुदूर्द में रहते हुए क़यामत के दिन अंबिया व सुलहा, अल्लाह तआला से सिफ़ारिश करने की इजाज़त कैसे हासिल करेंगे और फिर सिफ़ारिश करने का तरीक़ा क्या होगा, इसका अंदाज़ा बुख़ारी व मुस्लिम में दी गई तवील हदीसे शफ़ाअत से किया जा सकता है। जिसमें रसूले अकरम सल्ल० इरशाद फ़रमाते हैं “क़यामत के दिन लोग बारी बारी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम, नूह अलैहिस्सलाम, इब्राहीम अलैहिस्सलाम, मूसा अलैहिस्सलाम और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर होंगे कि अल्लाह तआला के हुजूर हमारी सिफ़ारिश कीजिए, लेकिन सब अंबिया किराम अपनी अपनी मामूली लग्ज़िशों को याद करके अल्लाह तआला से ख़ौफ़ महसूस करते हुए सिफ़ारिश करने से मना कर देंगे, बिल आख़िर लोग रसूले अकरम सल्ल० की ख़िदमत में हाज़िर होंगे तब आप अल्लाह तआला से हाज़िरी की इजाज़त तलब करेंगे। इजाज़त मिलने पर अल्लाह तआला के हुजूर सज्दे में गिर पड़ेंगे और उस वक़्त तक सज्दे में पड़े रहेंगे जब तक अल्लाह तआला चाहेगा। तब अल्लाह तआला इदशाद फ़रमाएगा “ऐ मुहम्मद (सल्ल०)! सर उठाओ सिफ़ारिश करो तुम्हारी सिफ़ारिश सुनी जाएगी।” चुनांचे रसूले अकरम संल्ल० पहले अल्लाह तआला की हम्द व सना करेंगे और उसके बाद अल्लाह तआला की मुक़र्रर करदा हेद के अंदर सिफ़ारिश करेंगे जो कुबूल होगी। (मुलाहिज़ा हो मसला नं० 50) किताब व सुन्नत में जाइज़ सिफ़ारिश की जो हुदूद व कुयूद बयान की गई हैं कुरआन मजीद में अंबिया किराम की • दी गई घटनाएं उनकी ताईद और तस्दीक़ करती हैं। हम यहां मिसाल के तौर .. पर सिर्फ एक पैगम्बर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की घटना बयान करना चाहते हैं। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम साढ़े नौ सौ साल तक मंसबे रिसालत के, फ़राइज़ अंजाम देते रहे। क़ौम पर जब अल्लाह तआला की तरफ़ से अज़ाब आया तो नबी का मुश्रिक बेटा भी डूबने वालों में शामिल था जिसे देखकर यक़ीनन बूढ़े बाप का कलेजा कटा होगा। चुनांचे अल्लाह तआला रब्बुल इज्ज़त की बारगार में सिफ़ारिश के लिए हाथ फैलाकर अर्ज़ किया है।

إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ (11 : 45

तर्जुमा : “ऐ रब! मेरा बेटा घर वालों में से है और तेरा वायदा सच्चा है तू सब हाकिमों से बढ़कर हाकिम है।” (सूरह हूद, आयत 45) जवाब में इरशाद हुआ :

فَلَا تَسْأَلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ ۖ إِنِّي أَعِظُكَ أَن تَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ (11 : 46

तर्जुमा : “ऐ नूह! जिस बात की तू हक़ीक़त नहीं जानता उसकी मुझसे दरख्वास्त न कर। मैं तुझे नसीहत करता हूं कि अपने आपको जाहिलों की तरह न बना ले।” (सूरह हूद, आयत 46) अल्लाह तआला की तरफ़ से इस तंबीह पर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम अपने लख़्ते जिगर का सदमा तो भूल ही गए अपनी फ़िक्र लाहिक़ हो गई चुनांचे फ़ौरन अर्ज़ किया :

رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ ۖ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُن مِّنَ الْخَاسِرِينَ (11 : 47

तर्जुमा : ‘‘ऐ मेरे रब मैं तेरी पनाह मांगता हूं. इससे कि वह चीज़ तुझसे मांगू जिसका मुझे इल्म नहीं। अगर तूने मुझे माफ़ न किया और रहम न फ़रमाया तो मैं बर्बाद हो जाऊंगा।” (सूरह हूद, आयत 47) यूं एक जलीलुल क़द्र पैग़म्बर की अपने बेटे के हक़ में की गई सिफ़ारिश बारगाहे ईज़दी से रद्द कर दी गई और पैग़म्बर ज़ादा अपने शिर्क की वजह से अज़ाब में मुब्तिला होकर रहा।

किताब व सुन्नत की तालीमात जान लेने के बावजूद अगर कोई व्यक्ति यह अक़ीदा रखता है कि हम फ़लां हज़रत साहब या पीर साहब के नाम की नज़र व नियाज़ देते हैं लिहाज़ा वे हमें क़यामत के दिन सिफ़ारिश करके बख्शवा लेंगे तो इसका अंजाम उस व्यक्ति से मुख़्तलिफ़ कैसे हो सकता है। जो अपना कोई जर्म बावाने के लिए हुकूमत के किसी कारिन्दे को बादशाह सलामत के पास अपना सिफ़ारिशी बनाकर भेजना चाहे जबकि वह कारिन्दा खुद हाकिमे वक्त के जाह व जलाल से थर थर कांप रहा हो और सिफ़ारिश करने से बार बार माज़रत कर रहा हो, लेकिन मुजरिम व्यक्ति यही कहता चला जाए कि हुजूर! बादशाह सलामत के दरबार में आप ही हमारे सिफ़ारिशी और हिमायती हैं। आप ही हमारा वसीला और वास्ता हैं। तो क्या ऐसे मुजरिम की वाकई सिफ़ारिश हो जाएगी या वह खुद अपनी हिमाक़त और नादानी के हाथों तबाह व बर्बाद होगा?

ا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ (35 : 3

तर्जमा: “उसके सिवा कोई इलाह नहीं आख़िर तुम कहां से धोखा खा रहे हो।” (सूरह फ़ातिर, आयत 3)

असबाबे शिर्क यूं तो न मालूम इबलीस किन किन और कैसे कैसे दीदा व नादीदा तरीक़ों से शब व रोज़ इस शजरा ख़बीसा “शिर्क” की आबयारी में मसरूफ़ है, और न मालूम जाहिल अवाम के साथ साथ बज़ाहिर कितने नेक सीरत दुर्वेश, पाक तीनत बुज़ुर्गाने दीन, साहिबे कश्फ़ व करामत औलिया उज्ज़ाम, तर्जुमाने शरीअत उलमा किराम, मुल्क व क़ौम के सियासी मुक्तिदहन्दा और ख़ादिमे इस्लाम हुक्मरा भी हज़रत इबलीस के क़दम बक़दम इस “कारेख़र” में शिरकत फ़रमा रहे हैं।

बक़ौल हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक रह० :

فھل افسد الدین الا الملوک و اخبار سوء و رھبانھا

तर्जुमा : “क्या दीन बिगाड़ने वालों में बादशाहों, उलमा ए सू और दुर्वेशों के अलावा कोई और भी है?” . | इसलिए ऐसे असबाब व अवामिल का ठीक ठीक शुमार करना तो मुश्किल है ताहम जो हमारे समाज में शिर्क की अधिकता का बाइस बन रहे। हैं हमारे नज़दीक शिर्क के दिन प्रति दिन फैलाव के मुख़्तलिफ़ असबाब में से अहम तरीन असबाब निम्न हैं : (1) जिहालत, (2) हमारे सनमकदे (तालीमी इदारे) (3) दीने ख़ानक़ाही (4) फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद, वहदत शहूद और हुलूल (5) बरें सगीर हिन्द व पाक का क़दीम तरीन मज़हब, हिन्दूमत, (6) हुक्मरां तबक़ा। 1. जिहालत । किताब व सुन्नत से लाइल्मी वह सबसे बड़ा सबब है जो शिर्क के फलने फूलने का बाइस बन रहा है। इसी जिहालत के नतीजे में इंसान पूर्वजों और रस्म व रिवाज की अंधी तक़्लीद का असीर होता है, इसी जिहालत के नतीजे में इंसान कमज़ोर अक़ीदे का शिकार होता है, इसी जिहालत के नतीजे में इंसान बुज़ुर्गाने दीन और औलिया किराम से अक़ीदत में गुलू का तर्जे अमल इख़्तियार करता है। निम्न घटनाएं इसी जिहालत के कुछ करिश्मे हैं।

धनी राम रोड लाहौर में तजाविज़ात पर जो तीर चल रहा है उसकी ज़द से बचने के लिए म्यू अस्पताल के नज़दीक एक मैडिकल स्टोर के मन चले मालिक ने अपने स्टोर के बैतुल ख़ला पर रात के अंधेरे में “शाह अज़ीजुल्लाह” के नाम से एक फ़रेज़ी मज़ार बना डाला। इस मज़ार पर दिन भर सैकड़ों अफ़राद जमा हुए जो मज़ार का दीदार करते और दुआएं मांगते रहे।

“इख़्तिलाफ़े उम्मत का अल्मिया” के मुसन्निफ़ फ़ैज़ आलम सिद्दीक़ साहब लिखते हैं “मैं आपके सामने एक घटना हल्फ़िया पेश करता हूं। कुछ रोज़ हुए मेरे पास एक अज़ीज़ रिश्तेदार आए जो शिद्दत से पीर परस्त हैं। मैंने बातों बातों में कहा कि फुलां पीर साहेब के मुताल्लिक़ अगर चार आक़िल बालिग गवाह पेश कर दूं जिन्होंने उन्हें ज़िना का इरतिकाब करते देखा हो तो फिर उनके मुताल्लिक़ क्या कहोगे? कहने लगे “यह भी कोई फ़क़ीरी का राज़ होगा जो हमारी समझ में न आता होगा” फिर एक पीर साहब की शराब ख़ोरी और भंग नोशी का ज़िक्र किया तो कहने लगे “भाई जान यह बातें हमारी समझ से बाहर हैं वह बहुत बड़े वसी हैं । | 3. ज़िला गूजरो वाला के गांव कोटली के एक पीर साहब (नहवां वाली सरकार) के चश्म दीद हालात की रिपोर्ट का एक इक़्तबास मुलाहिज़ा हो सुबह आठ बजे हज़रत साहब नमूदार हुए इर्द गिर्द (मर्द व ख्वातीन) मुरीद हो लिए। कोई हाथ बांधे खड़ा था कोई सर झुकाए खड़ा था, कोई पांव पकड़ रहा था, कुछ मुरीद हज़रत के पीछे पीछे हाथ बांधे चल रहे थे जबकि पीर साहब सिर्फ एक ढीली-ढाली लंगोटी बांधे हुए थे चलते चलते न जाने हज़रत को क्या ख्याल आया कि उसे भी लपेट कर कंधे पर डाल लिया। ख्वातीन ने जिनके मेहरम (भाई, बेटे या बाप) साथ थे शर्म के मारे सर झुका लिया, लेकिन अक़ीदत के पर्दे में यह सारी बे-इज्ज़ती बरदाश्त की जा रही थी।” | हमने यह कुछ घटनाएं बतौर मिसाल पेश की हैं वरना इस कूचे के इसरार व रमूज़ से वाक़िफ़ लोग खूब जानते हैं हक़ीक़ते हाल इससे कहीं ज़्यादा है। अक़्ल व ख़िरद की यह मौत, फ़िक्र व नज़र की यह मुफ़्लिसी, अख़्लाक़ व किरदार की यह पस्ती, इज्ज़ते नफ़्स और गैरत इंसानी की यह रुसवाई, ईमान और अक़ीदे की यह जांकनी किताब व सुन्नत से लाइल्मी और जिहालत का नतीजा नहीं तो और क्या है? 2. हमारे सनम कदे (तालीमी इदारे) .: किसी मुल्क के तालीमी इदारे उस क़ौम का नज़रिया और अक़ीदा बनाने या बिगाड़ने में बुनियादी किरदार अदा करते हैं। हमारे मुल्क और क़ौम की यह बदनसीबी है कि हमारे तालीमी इदारों में दी जाने वाली तालीम हमारे दीन के बुनियादी–अक़ीदा तौहीद-से कोई मुताबिक़त नहीं रखती। इस वक़्त हमारे सामने दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी, छठी, सातवीं और आठवीं जमाअत की उर्दू की कुतुब मौजूद हैं, जिनमें हज़रत अली रज़ि०, हज़रत फ़ातिमा रज़ि०, हज़रत दाता गंज बख़्श रह०, हज़रत बाबा फ़रीद गंज शकर रह०, हज़रत सख़ी सरवर रह०, हज़रत सुलतान बाहू रह०, हज़रत पीर बाबा कोहिस्तानी रह० और हज़रत बहाउद्दीन ज़करिया रह० पर मज़ामीन लिखे गए हैं। हज़रत फ़ातिमा रज़ि० पर लिखे गए मज़मून के आख़िर में जन्नतुल बक़ी (मदीना का क़बिस्तान) की एक फ़र्जी तस्वीर देकर नीचे यह फ़िक़रा तहरीर किया गया जन्नतुल बक़ी (मदीना मुनव्वरा) जहां अहले बैत के मज़ार हैं”–जिन लोगों ने जन्नतुल बक़ी देखा है वह जानते हैं कि सारे क़बिस्तान में “मज़ार” तो क्या किसी क़ब्र पर पक्की ईंट भी नहीं रखी गई। “अहले बैत के मज़ार” लिखकर मज़ार को न सिर्फ तक़स और एहतेराम का दर्जा दिया गया है। बल्कि उसे सनदे जवाज़ भी मुहैयां किया गया है। इन सारे मज़ामीन को पढ़ने के बाद दस बारह साल के ख़ाली ज़ेहन बच्चे पर जो असरात मुरत्तब हो सकते हैं वह ये हैं :

  1. बुजुर्गों के मज़ार और मक़बरे तामीर करना, उन पर उर्स और मेले लगाना, उनकी ज़ियारत करना नेकी और सवाब का काम है।
  2. बुजुर्गों के उर्से में ढोल ताशे बजाना, रंगदार कपड़ों के झंडे उठाकर चलनी बुजुर्गों की इज्ज़त और एहतेराम का बाइस है। | 3. बुजुर्गों के मज़ारों पर फूल चढ़ाना, फ़ातिहा पढ़ना, चिरागां करना, खाना तक़सीम करना और वहां बैठकर इबादत करना नेकी और सवाब का काम है।
  3. बुजुर्गों के मज़ार और मक़बरों के पास जाकर दुआ करना कुबूलियत का बाइस है।
  4. मुरदा बुजुर्गों के मज़ारों से फ़ैज़ हासिल होता है और इस इरादे से वहां जाना कारे सवाब है।

‘ इस तालीम का नतीजा यह है कि मुल्क के कलीदी ओहदों पर जो लोग फ़ाइज़ होते हैं वे अक़ीदा तौहीद की इशाअत या तंफ़ीज़ के मुक़द्दस फ़रीज़े को सरअंजाम देना तो दरकिनार, शिर्क की इशाअत और उसको फैलाने का बाइस बनते हैं। कुछ तल्ख़ हक़ाइक़ मुलाहिज़ा फ़रमाएं।

  1. संदर अय्यूब ख़ां एक नंगे पीर (बाबा लाल शाह) के मुरीद थे। जो मरी, के जंगलात में रहा करता था और अपने मोतक़िदीन को गालियां बकता था और पत्थर मारता था। उस वक़्त की आधी काबीना और हमारे बहुत से जर्नल भी उसके मुरीद थे।
  2. हमारे समाज में जस्टिस” को जो मक़ाम और मर्तबा हासिल है। उससे हर आदमी वाक़िफ़ है। मोहतरम जस्टिस मुहम्मद इलियास साहब, हज़रत सय्यद कबीरुद्दीन अल मारूफ़ शाहदोला (गुजरात) के बारे में एक मज़मून लिखते हुए रक़म तराज़ हैं “आपका मज़ारे अक़दस शहर के वस्त में है। अगर दुनिया में नहीं, तो बरें सगीर पाक व हिंन्द में यह वाहिद बुलन्द मर्तबा हस्ती हैं जिनके दरबार पुरअनवार पर इंसान का नज़राना पेश किया जाता है, वह इस तरह कि जिन लोगों के यहां औलाद न हो वह आपके दरबार मुबारक पर हाज़िर होते हैं और औलाद के लिए दुआ करते हैं साथ ही यह मन्नत मानते हैं कि जो पहली औलाद होगी वह उनकी नज़र की जाएगी। इस पर जो अव्वलीन बच्चा पैदा होता है उसे उर्फ आम में शाहदोला का चूहा’ कहा जाता है। उस बच्चे को बतौर नज़राना दरबारे अक़दसे में छोड़ दिया जाता है और फिर उसकी निगहदाश्त दरबार शरीफ़ के खुद्दाम करते हैं। बाद में जो बच्चे पैदा होते हैं वह आम बच्चों की तरह तंदुरुस्त होते हैं। रिवायत है कि अगर कोई व्यक्ति उल्लिखित मन्नत मानकर पूरी न करे तो फिर अव्वलीन बच्चे के बाद पैदा होने वाले बच्चे भी पहले बच्चे की तरह होते
  3. जनाब जस्टिस उसमान अली शाह साहब मुमलिकते खुदादाद इस्लामी जमहूरिया पाकिस्तान के एक इंतिहाई आला और अहम मुन्सिफ़ वक़ाफ़ी मोहतसिब आला” पर फ़ाइज़ हैं। एक इंटर व्यू में उन्होंने यह इंकिशाफ़ फ़रमाया “मेरे दादा भी फ़क़ीर थे उनके मुताल्लिक़ मशहूर था कि अगर बारिश न हो तो उस मस्त आदमी को पकड़ कर दरिया में फेंक दो तो बारिश हो जाएगी। उन्हें दरिया में फेंकते ही बारिश हो जाती थी। आज भी उनके मज़ार पर लोग पानी के घड़े भर भरकर डालते हैं।” | 4. हज़रत मुजद्दिद अल्फ़ी सानी रह० के उर्स शरीफ़ में शामिल होने वाले पाकिस्तानी वफ़द के सरबराह सय्यद इफ़्तिख़ारुल हसन मिम्बर सूबाई असेम्बली ने अपनी तक़रीर में सरहिन्द को काबा का दर्जा देते हुए दावा किया कि “हम नक़्शबन्दियों के लिए मुजद्दिद अल्फ़ी सानी रह० का रोज़ा हज के मक़ाम (बैतुल्लाह शरीफ़) का दर्जा रखता है।”

सदर मुमलिकत, काबीना के अरकान, फ़ौज के जर्नल, अदलिया के जज और असेम्बलियों के मिम्बर सभी हज़रात वतन अज़ीज़ के तालीमी इदारों के सनद याफ्ता और फ़ारिग हैं। उनके अक़ीदे और ईमान का इफ़्लास पुकार पुकार कर यह गवाही दे रहा है कि हमारे तालीमी इदारे दरहक़ीक़त इल्म कदे नहीं सनम कदे । जहां तौहीद की नहीं शिर्क की तालीम दी जाती है। इस्लाम की नहीं जिहालत की इशाअत हो रही है जहां से रोशनी नहीं तारीकी फैलाई जा रही है। हकीमुल उम्मत अल्लामा इक़बाल रह० ने हमारे तालीमी इदारों पर कितना दुरुस्त तबस्सरा फ़रमाया है :

गला तो घोंट दिया अहले मदरसा ने तेरा कहां से आए सदा ला इला-ह इल्लल्लाह उपरोक्त हक़ाइक़ से इस तसव्वुर की भी मुकम्मल नफ़ी हो जाती है कि क़ब्रपरस्ती और पीरपरस्ती के शिर्क में सिर्फ अनपढ़, जाहिल और गंवार क़िस्म के लोग ही मुक्तिला होते हैं और पढ़े लिखे लोग उससे महफूज़ हैं।

इस्लाम के नाम पर दीने ख़ानक़ाही दरहक़ीक़त एक खुली बगावत है। दीने मुहम्मद सल्ल० के ख़िलाफ़। अक़ाइद व इफ़्कार में भी और आमाल व हाल में भी। अम्र वाक़िआ यह है कि दीने इस्लाम की जितनी रुसवाई जानकाहों, मज़ारों, दरबारों और आस्तानों पर हो रही है शायद गैर मुस्लिमों के मंदिरों, गिरज और गुरुद्वारों में भी न होती हो। बुजुर्गों की क़ब्रों पर क़ब्बे तामीर करना, उनकी तज़ईन व आराइश करना, उन पर चिरागां करना, फूल झटाना, उन्हें गुस्ल देना, उन पर मुजाविरी करना, उन पर नज़र व नियाज़ शाना, वहां ख़ाना और शीरनी तक़सीम करना, जानवर ज़ब्ह करना, वहां सुजूद करना, हाथ बांध कर बाअदब खड़े होना, उनसे मुरादें मांगना, उनके नाम की चोटी रखना, उनके नाम के धागे बांधना, उनके नाम की दुहाई ना तकलीफ़ और मुसीबत में उन्हें पुकारना, मज़ारों का तवाफ़ करना, तवाफ़ वाद करबानी करना और सर के बाल मुंडवाना, मज़ार की दीवारों को बोसा देना वहां से ख़ाक शिफ़ा हासिल करना, नंगे क़दम मज़ार तक पैदल चलकर नाना और उलटे पांव वापस पलटना यह सारे अफ़आल तो वे हैं जो हर छोटे वडे मज़ार पर रोज़ मर्रा का मामूल हैं और जो मशहूर औलिया किराम के मज़ार उनमें से हर मज़ार का कोई न कोई अलग इमतियाज़ी वस्फ़ है। मसलन : न खानकाहों पर बहिश्ती दरवाज़े तामीर किए गए हैं जहां गद्दी नशीन और मज्जादा नशीन नज़राने वसूल करते और जन्नत की टिकटें तक़सीम फ़रमाते हैं। कितने ही उमरा, वुज़रा, अराकीन असेम्बली, सिविल और फ़ौज के आला सर के बल वीं पहुंचते हैं और दौलत दुनिया के ऐवज़ जन्नत सीदते हैं। कुछ ऐसी ख़ानक़ाहें भी हैं जहां मनासिके हज अदा किए जाते हैं, मजार का तवाफ़ करने के बाद कुरबानी दी जाती है, बाल कटवाए जाते हैं, और मस्नुई आबे ज़मज़म नोश किया जाता है। कुछ ऐसी ख़ानक़ाहें भी हैं जहां नोमोलद मासूम बच्चों के चढ़ावे चढ़ाए जाते हैं। कुछ ख़ानक़ाहें ऐसी हैं जहां वारी दोशीज़ाएं ख़िदमत के लिए वक़्फ़ की जाती हैं। कुछ ऐसी ख़ानक़ाहें हैं जहां औलाद से महरूम ख्वातीन “नौराता” बसर करने जाती हैं। इन्हीं ख़ानक़ाहों में से बेशतर भंग, चरस, अफ़ीम, गांजा और हीरोइन जैसी मंशियात के कारोबारी मराकिज़ बने हुए हैं। कुछ खानक़ाहों में फ़हाशी बदकारी और हवसपरस्ती के अड्डे भी बने हुए हैं। कुछ ख़ानक़ाहें मुजरिमों और क़ातिलों की महफूज़ पनाहगाहें तसव्वुर की जाती हैं। इन ख़ानक़ाहों के गद्दी नशीनों और मुजाविरों के हुजरों में जन्म लेने वाली हयासूज़ दास्ताने सुनें तो कलैजा मुंह को आता है। इन ख़ानक़ाहों पर मुंअक़िद होने वाले सालाना उर्से में मर्दो, औरतों का खुले आम इख़्तेलात, इश्क़िया और शिर्किया मज़ामीन पर मुश्तमिल क़व्वालियां, ढोल ढमके के साथ नवजवान मलंगों और मलंगनियों की धमाले, रातों के लिए जाकर क़याम करती हैं और साहिबे मज़ार के हुजूर नज़र नियाज़ पेश करती हैं, मुजाविरों की ख़िदमत और सेवा करती हैं और यह अक़ीदा रखती हैं कि इस तरह साहिबे मज़ार उन्हें औलाद से नवाज़ देगा। उर्फ आम में इसे नौ रातो कहा जाता है।

  1. वैसे तो अख़बारों में आए दिन मज़ारों और ख़ानक़ाहों पर पेश आने वाली दुखद घटनाएं लोगों की नज़रों से गुज़रती ही रहती हैं। हम यहां मिसाल के तौर पर सिर्फ एक ख़बर का हवाला देना चाहते हैं जो रोज़नामा ‘‘ख़बरें” दिनांक 15 अक्टूबर 1992 ई० में प्रकाशित हुई है। वह यह कि ज़िला भावलपुर में ख्वाजा मुहकमुद्दीन मीराई के सालाना उर्स पर आने वाली भावलपुर यूनीवर्सिटी की दो तालिबात को सज्जादा नशीन के बेटे ने इगवा कर लिया जबकि मुल्ज़िम का बाप सज्जादा नशीन मंशियात फरोख्त करते हुए ‘पकड़ा गया।
  2. क़व्वाली के बारे में कहा जाता है कि हिन्दुओं को इस्लाम की तरफ़ माइल करने के लिए औलिया किराम ने क़व्वाली का सहारा लिया और यूं बरें सगीर में क़व्वाली इस्लामी की तब्लीग को ज़रिया बनी। नामवर क़व्वाल नुसरत फ़तह अली खान ने अपने एक इंटर व्यू में दावा किया है कि स्पैन, फ्रांस और दूसरे बहुत से मुमालिक में लातादाद लोग हमारी क़व्वाली सुनने के बाद मुसलमान हो गए (नवाए वक़्त फैमली मैगज़ीन 12-18 मई 1992 ई०) चुनांचे हमने कुछ नामवर क़व्वालों के कैसेट हासिल करके सुने जिनके कुछ हिस्से बतौर नमूना यहां नक़ल किए जा रहे हैं। इन क़व्वालियों से बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि क़व्वालियों के ज़रिए औलिया किराम किस क़िस्म के इस्लाम की तब्लीग फ़रमाया करते थे और आज अगर लातादाद लोग मग़रिबी मुमालिक में क़व्वालियां सुनकर वाक़ई मुसलमान हुए हैं तो वे किस क़िस्म के मुसलमान हुए हैं। इब्ने ज़ोहरा को दुहला बनाया गया औलिया अंबिया को बुलाया गया मरहबा, मरहबा, मरहबा, मरहबा जागने को मुक़द्दर है इंसान का । उर्स है आज महबूब सुब्हान का हर तरफ़ आज रहमत की बरसात है। आज खुलने पे कफ़्ल मेहमात है। हर सू जलवा आराई ज्ञात है, कोई भरने पे कश्कील हाजात है। जागने को मुक़द्दर है इंसान का, उर्स है आज महबूब सुब्हान का, मरहबा, मरहबा, मरहबा, मरहबा, वहदत वहदत वहदत वहदत वहदत तेरे खजाने में सिवाए वहदत के रखा क्या है? मज़हर जात रब क़दीर आप हैं, दस्तगीर आप हैं।

टाट पीराने पीर आप हैं, दस्तगीर आप हैं। पूरी सरकार सब की तमन्ना करो, हर भिखारी की दाता जी झोली भरो। किसे झै दी नई दाता कोल थोड़, ऐ पूरी करदा सवालियां दी लोड़ ऐ। गुल झूठ नहीं अल्लाह दी सोंह मेरी, तू सच्चे दिलों देख मंग के। दिल गनाह मर दा नहीं तोड़दा, खाली दाता कदे वी नहीं मोड़दा। झोली भर देगा सरदारां नाल तेरी तों, सच्चे दिलों देख मंग के।। अली साडे दिल विच, अली साडे साहवां । अली साडे आसे पासे, अली ऐ निगाहवां विच । अली दा मलंग में ते अली दा मलंग में ते अली दा मलंग हाडां ते तफानां विच किनारा मौला अली ऐ. दुखियां दे दिलां दा सहारा मौला अली ऐ। h i में ते अली दा मलंग में ते अली दा मलंग नजर उस टी करदा सोहना, खाली झोलियां भरदा सोहना। बेटा ती अहा विदं पुकांदा, मुरशद बेड़ी पार लगांदा अली मौला अली मौला दम अली अली अली दम अली अली अली दम अंली अली जिन्हां जिन्हां कर लई पहचान मौला इली दी, ओहिनां ताई.मिल गई अमान मौला अली दी + अली दम अली मौला अली मौला अली मौला अली .

(नक़ल कु, कुफ़ नबाशद)

खुले बालों के साथ औरतों के रक़्स, तवायफ़ों के मुजरे, थियेटर और फिल्मों के मनाज़िर आम नज़र आते हैं। दीने ख़ानक़ाही की इन्ही रंग रलियों और अय्याशियों के बाइस गली गली, मुहल्ले मुहल्ले, गांव गावं, शहर शहर, नित नए मज़ार तामीर हो रहे हैं।

रहीम यार ख़ां (ज़िला पंजाब पाकिस्तान) में दीने ख़ानक़ाही के अलमबरदारों ने पेशा वर माहिरीन आसारे क़दीमा से भी ज़्यादा महारत का सुबूत देते हुए चौदह सौ साल बाद रांझे खां बस्ती के क़रीब सड़क के किनारे एक सहाबी रसूल सल्ल० की क़ब्र तलाश करके उस पर न सिर्फ मज़ार तामीर कर डाला है बल्कि “सहाबी रसूल खुमैर बिन रबीअ का रोज़ा मुबारक” का बोर्ड लगाकर अपना कारोबार भी शुरू कर दिया है। गुज़िश्ता कुछ सालों से एक नई रस्म देखने में आ रही है वह यह कि अपनी अपनी ख़ानक़ाहों की रौनक़ बढ़ाने के लिए बुजुर्गों के मज़ारात पर रसूले अकरम सल्ल० के इस्म मुबारक से उर्स मुंअक़िद किए जाने लगे हैं। मुसलमानों की इस हालते ज़ार पर आज अल्लामा इक़बाल रह० का यह तबस्सरा किस क़द्र दुरुस्त साबित हो रहा है। .

लेकिन जो उर्स रिकार्ड पर मौजूद हैं उन पर एक नज़र डालिए और अंदाज़ा कीजिए कि दीन ख़ानक़ाही का कारोबार किस क़द्र वुस्अत पज़ीर है। और हज़रते इबलीस ने जाहिल अवाम की अक्सरियत को किस तरह अपने शिकन्जों में जकड़ रखा है। ताज़ा तरीन आदाद व शुमार के मुताबिक़ पाकिस्तान में एक साल के अंदर 634 उर्स शरीफ़ मुंअक़िद होते हैं गोया एक महीने में 53 या दूसरे शब्द में रोज़ाना 1.76 यानी पौने दो अदद उर्स मुंअक़िद होते हैं जो उर्स रिकार्ड पर नहीं या जिनका इजरा दौराने साल होता है उनकी तादाद भी शामिल की जाए तो यक़ीनन यह तादाद दो उर्स योमिया से बढ़ जाएगी।’ उन आदाद में शुमार के मुताबिक़ मुमलिकत | खुदादाद इस्लामी जमहूरिया पाकिस्तान की सरज़मीन पर अब ऐसा कोई सूरज तुलूअ नहीं होता जब यहां उर्मों के ज़रिए शिर्क व बिदअत का बाजार गर्म करके अल्लाह तआला के गैज़ व गज़ब को दावत न दी जाती हो। (अल अियाज़ बिल्लाह)

ये आदाद व शुमार शमअ इस्लामी क़ानून 1992 ई० से लिए गए हैं। क़मरी, ईसवी और विक्रमी महीनों के हिसाब से साल भर में मुंअक़िद होने वाले उर्मों की कुल तादाद : 634

उर्मों के इन्अिक़ाद में क़ाबिले ज़िक्र बात यह है कि यह सिलसिला दौराने रमज़ानुल मुबारक भी पूरे ज़ोर वे शौर से जारी रहता है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दीने ख़ानक़ाही में इस्लाम के बुनियादी फ़राइंज़ का किस क़द्र एहतेमाम पाया जाता है? याद रहे रमज़ानुल मुबारक के रोज़ों के बारे में हदीस शरीफ़ में है कि नबी अकरम सल्ल० ने रोज़ा ख़ोरों को जहन्नम में इस हालत में देखा कि उलटे लटके हुए हैं उनके मुंह चिरे हुए हैं। जिससे खून बह रहा है।” (इब्ने ख़त्रैमा) हिन्दुस्तान के एक मशहूर सूफ़ी बुजुर्ग हज़रत बू अली क़लन्दर रहे० का उर्स शरीफ़ भी इसी मुबारक महीने (13 रमज़ान) में पानीपत के मक़ाम पर मुंअक़िद होता है। दीने ख़ानक़ाही में रमज़ान के अलावा बाक़ी फ़राइज़ का कितना एहतेमाम पाया जाता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूफ़िया के नज़दीक तसव्वुर शैख़’ के बगैर अंदा की गई नमाज़ नाक़िस होती है। हज के बारे में कहा जाता है कि मुर्शिद की ज़ियारत हज बैतुल्लाह से अफ़ज़ल है। दीने इस्लाम के फ़राइज़ के मुक़ाबले में दीने ख़ानक़ाही के अलमबरदार ख़ानक़ाहों, मज़ारों, दरबारों और आस्तानों को क्या मक़ाम और मर्तबा देते हैं इसका अंदाज़ा ख़ानक़ाहों में लिखे गए कतबों, यां औलिया किराम के बारे में अक़ीदतमंदों के लिखे हुए अशआर से लगाया जा सकता है। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा हों :

  1. मदीना भी मुतहर है मुक़द्दस है अली पुर भी उधर जाएं तो अच्छा है इधर जाएं तो अच्छा है।
  2. मखदूम का हुजरा भी गुलज़ारे मदीना है। यह गंज फरीदी का अनमोल नगीना है।
  3. दिल तड़पता है जब रोज़े की ज़ियारत के लिए पाक पत्तन तेरे हुजरे को मैं चूम आता हू
  4. आरजू है कि मौत आए तेरे कूचे में रश्क जन्नत तेरे कलियर की गली पाता हूँ
  5. चाचड़ वांग मदीना दसे ते कूट मिठन बैतुल्लाह

ज़ाहिर दे विच पीर फ़रीदन ते बातिन दे विच अल्लाह तर्जुमा : चाचड़ (जगह का नाम) मदीना की तरह है और कूट मिठन (जगह का नाम) बैतुल्लाह शरीफ़ की तरह है। हमारा मुर्शिद, पीर फ़रीद ज़ाहिर में तो इंसान है लेकिन बातिन में अल्लाह है।

बाबा फ़रीदगंज शकर रह०-के मज़ार पर “ज़ब्दतुल अंबियां (यानी तमाम अंबिया किराम का सरदार) का कतबा लिखा गया है। सय्यद अलाउद्दीन अहमद साबिरी रह० कलियर के हुजरे शरीफ़ (पाक पत्तन) पर यह इबारत कंदा है “सुलतान अलाउद्दीन कुतुबे आलम, गौसुल ग़यास, हश्त दो हज़ार आलमीन (वलियों का बादशाह, सारे जहान का कुतुब, अठारह हज़ार जहानों के फ़रियाद का सबसे बड़ा फ़रियादरस)-हज़रत लाल हुसैन लाहौर के मज़ार पर “गौसुल इस्लाम वल मुस्लिमीन (इस्लाम और मुसलमानों का फ़रियादरस) का कतबा लिखा हुआ है। सय्यद अली हजवीरी रह० के मज़ार पर लगाया गया कतबा तो कुरआनी आयात की तरह उर्मों में पढ़ा जाता है। गंजबख़्श, फ़ैज़ आलम, मज़हरे नूरे खुदा (ख़ज़ाने अता करने वाला, सारी दुनिया को फ़ैज़ पहुंचाने वाला, खुदा के नूर के ज़हूर की जगह)

गौर फ़रमाइए जिस दीन में तौहीद, रिसालत, नमाज़ रोज़े और हज के मुक़ाबले में पीरों, बुजुर्गों उर्सा मज़ारों और ख़ानक़ाहों को यह तक़द्दस और मर्तबा हासिल हो वह दीन मुहम्मद सल्ल० के ख़िलाफ़ बगावत नहीं तो और क्या है। शायरे मिल्लत अल्लामा इक़बाल रह० ने अरमुगाने हिजाज़ की एक तवील नज़्म “इबलीस की मजलिसे शूरा” में इबलीस के ख़िताब की जो तफ़्सील लिखी है उसमें इबलीस मुसलमानों को दीने इस्लाम का बागी बनाने के लिए अपनी शूरा के अरकान को जो हिदायत देता है उनमें सबसे आख़िरी हिदायत दीने ख़ानक़ाही पर बड़ा जामेअ तबस्सरा है। मुलाहिज़ा फ़रमाएं…मस्त रखो ज़िक्र व फ़िक्र सुबह गाही में इसे पुख्तातरं कर दो मिज़ाजे ख़ानक़ाही में इसे हमारे जाइज़े के मुताबिक़ उल्लिखित 634 ख़ानक़ाहों या आस्तानों में से बेशतर गद्दियां ऐसी हैं जो वसीअ व अरीज़ जागीरों की मालिक हैं। सूबाई असेम्बली, क़ौमी असेम्बली यहां तक कि सिनेट में भी उनकी नुमाइंदगी मौजूद होती है। सूबाई और क़ौमी असेम्बली की नशिस्तों में उनके मद्देमुक़ाबिल कोई दूसरा आदमी खड़ा होने की जुर्रत नहीं कर सकता। .. किताब व सुन्नत के निफ़ाज़ के अलमबरदारों और इस्लामी इंक़लाब के दाइयों ने अपने रास्ते के इस संगे गरां के बारे में भी कभी संजीदगी से गौर किया है?

  1. फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद, वहदत शहूद और हुलूल

। कुछ लोग यह अक़ीदा रखते हैं कि इंसान इबादत और रियाज़त के जरिए उस मक़ाम पर पहुंच जाता है कि उसे कायनात की हर चीज़ में अल्लाह नजर आने लगता है या वह हर चीज़ को अल्लाह की ज़ात का जुज़ समझने लगता है। तसव्वुफ़ की इस्तलाह में इस अक़ीदे को वहदतुल वजूद कहा जाता है। इबादत और रियाज़त में मज़ीद तरक़्क़ी करने के बाद इंसान की हस्ती अल्लाह की हस्ती में मुदगम हो जाती है और वह दोनों (खुदा और इंसान) एक हो जाते हैं। इस अक़ीदे को वहदत शहूद या “फ़नाफ़िल्लाह’ कहा जाता है। इबादत और रियाज़त में मज़ीद तरक़्क़ी से इंसान का आईना दिल इस क़द्र लेतीफ़ और साफ़ हो जाता है कि अल्लाह की ज़ात खुद उस इंसान में दाख़िल हो जाती है जिसे हुलूल कहा जाता है।

| गौर किया जाए तो इन तीनों इस्तलाहात के शब्दों में कुछ न कुछ फ़र्क जरूर है, लेकिन नतीजे के एतेबार से उनमें कोई फ़र्क नहीं और वह यह कि “इंसान अल्लाह की ज़ात का जुज़ और हिस्सा है” यह अक़ीदा हर ज़माने में किसी न किसी शक्ल में मौजूद रहा है। हिन्दू मत के अक़ीदे “औतार” बुद्ध मत के अक़ीदे “निरवान” और जैन मत के यहां बुतपरस्ती की बुनियाद ही फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद और हुलूल है’ यहूदियों ने फ़लसफ़ा हुलूल के तहत

मुसलमानों में इसकी इब्तिदा अब्दुल्लाह बिन सबा ने की जो यमन का यहूदी था। अहदे नबवी में यहूदियों की ज़िल्लत व रुसवाई का इंतक़ाम लेने के लिए अनाफ़िक़ाना तौर पर अहदे फ़ारूक़ी (या अहदे उसमानी) में ईमान लाया अपने मज़मूम अज़ाइम को अमल में लाने के लिए हज़रत अली रज़ि० को माफूकुल बशर हस्ती कहना प्रारू किया। बिल आख़िर अपने मोतक़िदीन का एक ऐसा हल्क़ा पैदा करने में कामयाब हो गया जो हज़रत अली रज़ि० को ख़िलाफ़त का असल हक़दार और बाक़ी ख़ुल्फ़ा को गासिब समझने लगा। इस गुमराहकुन प्रोपगंडा के नतीजे में सय्यदना हज़रत उसमान जि० की मलूमाना शहादत वाक़अ हुई । जमल और सफ़्फ़ीन की खून रंज़ जंगें हुईं। इस सारे अर्से में अब्दुल्लाह बिन सबा और उसके पैरोकार हज़रत अली रज़ि० का साथ देते रहे और फितने पैदा करने के मौक़ तलाश करते रहे। हज़रत अली रज़ि० से मुहब्बत व अक़ीदत के नाम पर बिल आख़िर उसने हज़रत अली रज़ि० को अल्लाह तआला का रूप या अवतार कहना शुरू कर दिया और मुश्किलकुशा, हाजतरवा, आलिमुल गैब और ही हज़रत उजैर अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा (जुज़) क़रार दिया। ईसाइयों ने इसी फ़लसफ़े के तहत हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का बेटा (जुज़) क़रार दिया। मुसलमानों के दो बड़े गिरोहों, अहले तशी और अहले तसव्वुफ़, के अक़ाइद की बुनियाद भी यही फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद और हुलूल है। सूफ़िया के सरखैल जनाब हसीन बिन मंसूर हल्लाज (ईरानी) ने सबसे पहले खुल्लम खुल्ला यह दावा किया कि खुदा उसके अंदर हुलूल कर गया है और अनल हक़ (मैं अल्लाह हूँ) का नारा लगाया। मंसूर बिन हल्लाज के दावा खुदाई की ताईद और तौसीफ़ करने वालों में हज़रत अली हजवैरी रह० पीराने पीर शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० और सुलतान औलिया ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया रह० जैसे कब्बार औलिया शामिल हैं। हम यहां मिसाल के तौर पर जनाब अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी के शब्द नक़ल करने पर ही इक्तिफ़ा करेंगे। फ़रमाते हैं “हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने पेड़ से सुना ‘इन्नी अनल्लाह’ यानी मैं अल्लाह हूं। क्या पेड़ ने यह कहा था? हाशा, बल्कि अल्लाह ने। यूं ही यह हज़रात (औलिया किराम) अनल हक़ कहते वक़्त शजर मूसा होते हैं। (अहकामे शरीअत, सफ़ा 93) हज़रत बायज़ीद बुस्तामी ने भी इसी अक़ीदे की बुनियाद पर यह दावा किया ‘सुब्हाना मा आज़मु शानी’ (मैं पाक हूं मेरी शान बुलन्द है) वहदतुल वजूद या हुलूल का नज़रिया मानने वाले हज़रात को न तो खुद खुदाई का दावा करने में कोई दिक़्क़त महसूस होती है, न ही उनके पास किसी दूसरे के दावा खुदाई को मुस्तरद करने का कोई जवाज़ होता है। यही वजह है कि सूफ़िया की शायरी में रसूले अकरम सल्ल० हाज़िर नाज़िर जैसी खुदाई सिफ़ात उनसे मंसूब करना शुरू कर दीं। उस मक़सद के हुसूल के लिए कुछ रिवायात भी गढ़ दी गईं। मसलन जंग उहुद में जब रसूले अकरम सल्ल० ज़ख़्मी हो गए तो जिब्रील ने आकर कहा (ऐ मुहम्मद सल्ल०) नाद अली वाली दुआ पढ़ो यानी अली को पुकारो। जब रसूले अकरम सल्ल० ने यह दुआ पढ़ी तो हज़रत अली रज़ि० फ़ौरन आप की मदद को आए और कुफ़्फ़ार को क़त्ल करके आप सल्ल० को और तमाम मुसलमानों को क़त्ल होने से बचा लिया। (इस्लामी तसव्वुफ़ में गैर इस्लामी तसव्वुफ़ की आमेज़िश अज़ प्रौफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती, सफ़ा 34)

और अपने पीरों व मुर्शिद को अल्लाह का रूप या अवतार कहने के अक़ीदे का इज़हार ब-कसरत पाया जाता है। चन्द अश्आर मुलाहिज़ा हों।

खुदा कहते हैं जिसको मुस्तफ़ा मालूम होता है। जिसे कहते हैं बन्दा खुद खुदा मालूम होता है। 2. बजाते थे जो अना अब्दहु की बांसुरी हर दम खुदा के अर्श पर इन्नी अनल्लाह बनके निकलेंगे 3. शरीअत का डर है वगरना यह कह. दू खुदा ख़ुद रसूले खुदा बनके आया 4. वही जो मस्तवी अर्श था खुदा होकर उतर पड़ा मदीना में मुस्तफ़ा होकर 5. बन्दगी से आपकी हमको खुदावंदी मिली है। खुदावंद जहां बन्दा रसूलुल्लाह का 6. पीर कामिल सूरत ज़िल्ले इलाहयानी दीद पीर दीद किबरिया | तर्जुमा : कामिल पीर गोया ज़िल्ले इलाह है, ऐसे पीर की ज़ियारत ख़ुदा की ज़ियारत है।

झले लोग जहान दे भले फिर दे सब सामने देख के पीर नू फरीदी पछदे रब तर्जुमा : वे लोग बेवकूफ़ है और भटके हुए हैं जो पीर को अपने सामने देखकर भी रब के बारे में सवाल करते हैं।

“हक़ीक़त वजूद” के मुसन्निफ़ अब्दुल हकीम अंसारी ने अपनी किताब में तहरीर किया है। जो कि हस्बे ज़ेल है : “हमारे एक चिश्तिया ख़ानदान के पीर भाई सूफ़ी जी के नाम, से मशहूर थे। एक दिन मेरे पास आए तो हम मिलकर चाय पीने लगे। चाय पीते पीते सूफ़ी जी के चेहरे पर “कैफ़ियत के असर नुमायां हुए। चेहरा सुर्ख हो गया, आंखों में लाल डोरे उभर आए। फिर कुछ नशा की सी हालत तारी हुई यकायक सूफ़ी जी ने सर उठाया और कहने लगे “भाई जान मैं ख़ुदा हूँ” इस पर मैंने ज़मीन से एक तिंका उठाया और उसके दो टुकड़े करके सूफ़ी जी से कहा “आप ख़ुदा हैं तो इसे जोड़ दीजिए” सूफ़ी जी ने दोनों टूटे हुए टुकड़ों को मिलाकर उन पर “तवज्जोह” फ़रमाई, लेकिन क्या बनना था साथ ही उनकी वह कैफ़ियत भी गायब हो गई जिसकी वजह से वह खुदाई को दावा कर रहे थे। (शरीअत व तरीक़त, सफ़ा 94)

ज़ाहिर दे विच पीर फ़रीदन ते बातिन दे विच अल्लाह जनाब अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी ने रसूले अकरम सल्ल० में अल्लाह तआला के हुलूल के साथ पीराने पीर शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० में रसूले अकरम सल्ल० के हुलूल को भी तस्लीम किया है। फ़रमाते हैं “हुजूर पुर अनवर (यानी रसूले अकरम सल्ल०) मय अपनी सिफ़ात, जमाल व जलाल, कमाल व अफ़ज़ाल के हुजूर पुर अनवर सय्यदना गौसे आज़म पर मुतजली हैं। जिस तरह ज़ात अहदियत (यानी अल्लाह तआला) मय जुमला सिफ़ात व जलालियत आईनाए मुहम्मदी में तजल्ली फ़रमा है।’ (फ़तावा अफ़्रीक़ा, सफ़ा 101)

क़दीम व जदीद सूफ़िया किराम ने फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद और हुलूल का दुरुस्त साबित करने के लिए बड़ी तूल व तवील बहसें की हैं, लेकिन सच्ची बात यह है कि आज के साइंसी दौर में अक़्ल उसे तस्लीम करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं। जिस तरह ईसाइयत का अक़ीदा तस्लीस “एक में से तीन और तीन में से एक आम आदमी के लिए नाक़ाबिले फ़हम है इसी तरह सूफ़िया किराम का यह फ़लसफ़ा ‘कि इंसान अल्लाह में या अल्लाह इंसान में हुलूल किए हुए है” नाक़ाबिले फ़हम है। अगर यह फ़लसफ़ा दुरुस्त है तो इसका सीधा सीधा मतलब यह है कि इंसान ही दरहक़ीक़त अल्लाह है और अल्लाह ही दरहक़ीक़त इंसान है। अगर वास्तविक घटना यह है तो फिर सवाल पैदा होता है कि आबिद कौन है माबूद कौन? साजिद कौन है मस्जूद कौन? ख़ालिक़ कौन है मख्नूक़ कौन? हाजतमंद कौन है हाजतरवा कौन? मरने वाला कौन है मारने वाला कौन? ज़िंदा होने वाला कौन है ज़िंदा करने वाला कौन? गुनाहगार कौन है बख़्शने वाला कौन? रोज़े जज़ा हिंसाब लेने ला कौन है देने वाला कौन? और फिर जज़ा या सज़ा के तौर पर जन्नत या हिन्नम में जाने वाले कौन हैं और भेजने वाला कौन?*इस फलसफ़े को तस्लीम करने के बाद इंसान, इंसान का मक़सद तख़्लीक़ और आखिरत यह सारी चीजें या एक पहेली और मसला नहीं बन जातीं? अगर अल्लाह तआला के यहां अस्तव में मुसलमानों का यह अक़ीदा क़ाबिले कुबूल है तो फिर यहूदियों और ईसाइयों का अक़ीदा ‘‘इब्नुल्लाह” क्यों क़ाबिले कुबूल नहीं? मुश्किीन मक्का का यह अक़ीदा कि इंसान अल्लाह का जुज़ है क्यों क़ाबिले कुबूल नहीं? वहदतुल वजूद के क़ाइल बुतपरस्तों की बुतपरस्ती क्यों क़ाबिले कुबूल नहीं?

हक़ीक़त यह है कि किसी इंसान को अल्लाह की ज़ात का जुज़ समझना या अल्लाह की ज़ात में मुदगम समझना) या अल्लाह तआला को किसी इंसान में मुदगम समझना ऐसा खुला और नंगा शिर्क फ़िज़्ज़ात है जिस पर अल्लाह तआला का शदीद गज़ब भंड़क सकता है। ईसाइयों ने हज़रत ईसा अलैहिस्स ने अल्लाह का बेटा (जुज़) क़रार दिया तो उस पर अल्लाह तआला ने कुर मजीद में जो तबस्सरा फ़रमाया है उसका एक एक शब्द काबिले गौर है। इरशाद बारी तआला है :

لَّقَدْ كَفَرَ الَّذِينَ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ هُوَ الْمَسِيحُ ابْنُ مَرْيَمَ ۚ قُلْ فَمَن يَمْلِكُ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ أَن يُهْلِكَ الْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُ وَمَن فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا ۗ وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (5 : 17

तर्जुमा : “यक़ीनन कुफ़ किया उन लोगों ने जिन्होंने कहा मरयम का बेटा, मसीह ही अल्लाह है। ऐ नबी कहो अगर अल्लाह मसीह इब्ने मरयम ओ और उसकी मां को और तमाम ज़मीन वालों को हलाक कर देना चाहे तो किसकी मजाल है कि उसको इस इरादे से रोके रखे? अल्लाह तो ज़मीन और आसमानों का और उन सब चीज़ों का मालिक है जो ज़मीन और आसमान के र्मियनि पाई जाती है। जो कुछ चाहता है पैदा करता है और वह हर चीज़ पर क़ादिर है।” (सूरह माइदा, आयत 17)

तर्जुमा और उन्होंने उसके बन्दों में से कुछ को उसका जुज़ बना डाला। (सूरह जुख़रुफ़, आयत 15) ।

सूरह मरयम में इससे भी ज़्यादा सख़्त शब्दों में उन लोगों को चेतावनी दी गई है जो बन्दों को अल्लाह तआला का जुज़ क़रार देते हैं। इरशाद मुबारक

وَقَالُوا اتَّخَذَ الرَّحْمَٰنُ وَلَدًا ۔ لَّقَدْ جِئْتُمْ شَيْئًا إِدًّا ۔ تَكَادُ السَّمَاوَاتُ يَتَفَطَّرْنَ مِنْهُ وَتَنشَقُّ الْأَرْضُ وَتَخِرُّ الْجِبَالُ هَدًّا ۔ أَن دَعَوْا لِلرَّحْمَٰنِ وَلَدًا (19 : 88-91

तर्जुमा : “वे कहते हैं रहमान ने किसी को बेटा बनाया है सख़्त बेहूदा बात है जो तुम गढ़ रहे हो, क़रीब है कि आसमान फट पड़े ज़मीन शक़ हो जाए और पहाड़ गिर जाएं इस बात पर कि लोगों ने रहमान के लिए औलाद । होने का दावा किया है।” (सूरहे मरयम, आयत 88-91)

बन्दों को अल्लाह का जुज़ या बेटा क़रार देने पर अल्लाह तआला के उस शदीद गुस्से और नाराज़गी की वजह साफ़ ज़ाहिर है कि किसी को अल्लाह का जुज़ क़रार देने का लाज़मी नतीजा यह होगा कि उस बन्दे में अल्लाह तआला की सिफ़ात तस्लीम की जाएं। मसलन यह कि वह हाजतरवा और इख्तियारात और कुव्वतों का मालिक है, यानी शिर्क फ़िज़ात का लाज़मी नतीजा शिर्क फ़िस्सिफ़ात है और जब किसी इंसान में अल्लाह की सिफ़ात तस्लीम कर ली जाएं तो फिर उसका लाज़मी नतीजा होगा कि उसकी रज़ा हासिल की जाए। जिसके लिए बन्दा तमाम मरासिम उबूदियत, रुकूअ व सुजूद, नज़र व नियाज़, इताअत व फ़रमांबरदारी, बजा लाता है यानी शिर्क फ़िस्सिफ़ोत का लाज़मी नतीजा है शिर्क फ़िल इबादत। गोया शिर्क फ़िज़ात ही सबसे बड़ा दरवाजा है। दूसरी क़िस्म के शिर्क का। जैसे ही यह दरवाज़ा खुलता है हर क़िस्म के शिर्क का आगाज़ होने लगता है। यही वजह है कि शिर्क फ़िज़ात पर अल्लाह तआला का गैज़ व ग़ज़ब इस क़द्र भड़कता है कि मुमकिन है आसमान फट जाए, ज़मीन दो टुकड़े हो जाए और पहाड़ चूरा चूरा हो जाएं।

फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद और हुलूल का यह खुल्लम खुल्ला और खुला टकराव है अक़ीदाए तौहीद के साथ जिसमें बे-शुमार मलूक़ ख़ुदा पीरी मुरीदी के चक्कर में आकर फंसी हुई है। दीने इस्लाम की बाक़ी तालीमात पर,

  1. कुरआन व हदीस

दीने इस्लाम की बुनियाद कुरआन व हदीस पर है लेकिन सूफ़िया के नज़दीक इन दोनों का मक़ाम और मर्तबा क्या है इसका अंदाज़ा एक मशहूर सूफ़ी अफ़ीफुद्दीन तिलमसानी के इस इरशाद से लगाइए। “कुरआन में तौहीद है कहां? वह तो पूरे का पूरा शिर्क से भरा हुआ है जो व्यक्ति उसकी इत्तिबा करेगा वह कभी तौहीद के बुलन्द मर्तबे पर नहीं पहुंच सकता।” (इमाम इब्ने तैमिया अज़ कोकुन उमरी, सफ़ा 321) हदीस शरीफ़ के बारे में जनाब बायज़ीद बुस्तामी का यह तबसरा पढ़ लेना काफ़ी, होगा “तुम (अहले शरीअत) ने अपना इल्म मुर्दा लोगों (यानी मुहदिद्दसीन) से हासिल किया है। और हमने अपना इल्म उसी ज़ात से हासिल किया है जो हमेशा ज़िंदा है (यानी सीधे अल्लाह तआला से) हम लोग कहते हैं मेरे दिल ने अपने रब से रिवायत किया और तुम कहते हो फ़लां (रावी) ने मुझसे रिवायत किया (और अगर सवाल किया जाए कि) वह रावी कहां है? जवाब मिलता है मर गया। (और अगर पूछा जाए कि) उस फ़ला (रावी) ने फ़लां (रावी) से बयान किया तो वह कहां है? जवाब वही कि मर गया है। कुरआन वे हदीस का यह इस्तहज़ा और तमस्खुर और उसके साथ हवाए नफ़्स की इत्तिबा के लिए “मेरे दिल ने मेरे रब से रिवायत किया””* का पुरफ़रेब जवाज़ किस क़द्र जसारत है। अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० के मुक़ाबले में? इमाम इब्ने जोज़ी इस बातिल दावे पर तबसरा करते हुए फ़रमाते हैं “जिसने “मेरे दिल ने मेरे रब से रिवायत किया’ कहा उसने दरपर्दा इस बात का इक़रार किया कि वह रसूलुल्लाह सल्ल० से मुस्तगना है। अतः जो व्यक्ति ऐसा दावा करे वह काफ़िर है।” 3. इबादत और साधना

सूफ़िया के यहां नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज वगैरह का जिस क़द्र एहतेमाम पाया जाता है चुका है। यहां हम सः तरीक़ों का ज़िक्र कर से देखा जाता है, लेकि…….. पाया जाता है उसका तड्किरा उससे क़ब्ल दीने ख़ानक़ाही में गुज़र यहां हम सूफ़िया की इबादत और रियाज़त के कुछ ऐसे खुद साख़्ता जिक्र करना चाहते हैं जिन्हें सूफ़िया के यहां बड़ी क़द्र व मंज़िलत जाता है, लेकिन किताब व सुन्नत में उनका जवाज़ तो क्या शदीद मत पाई जाती है। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा हों : । धीराने पीर (हज़रत शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी) पंद्रह साल तक के बाद तुलूअ सुबह से पहले एक कुरआन शरीफ़ ख़त्म करते। । सारे कुरआन पाक एक पांव पर खड़े होकर ख़त्म किए नीज़ खुद → “मैं पच्चीस साल तक इराक़ के जंगलों में तंहा फिरता रहा एक ८ साग घास और फेंकी हुई चीज़ों पर गुज़ारा करता रहा और पानी पिया फिर एक साल तक पानी भी पीता रहा फिर तीसरे साल सिर्फ भाग रहा फिर एक साल न कुछ खाया न पिया न सोया?

इजरत बायज़ीद बुस्तामी तीस साल तक शाम के जंगलों में रियाज़त Pटा करते रहे। एक साल आप हज को गए तो हर क़दम पर दोगाना ते थे यहां तक कि बारह साल में मक्का मुअज्ज़मा पहुंचे।

हज़रत फ़रीदगंज शकर ने चालीस दिन कुएं में बैठकर चिल्लाकशी * (तारीख़ मशाइख़ चिश्त, सफ़ा 178) “” ६ हज़रत जुनैद बगदादी कामिल तीस साल तक इशा की नमाज़ पढ़ने वाट एक पांव पर खड़े होकर अल्लाह अल्लाह करते रहे। (सूफ़िया नक़्शबंदी, सफ़ा 89)

ख्वाजा मुहम्मद चिश्ती ने अपने मकान में एक गहरा कुआं खोद रखा था जिसमें उल्टा लटक कर इबादते इलाही में मसरूफ़ रहते।।।

हज़रत मुल्ला शाह क़ादरी फ़रमाया करते “तमाम उम्र हमको गुस्ले जनाबत और एहतिलाम की हाजत नहीं हुई क्योंकि यह दोनों गुस्ल, निकाह और नींद से मुताल्लिक़ हैं। हमने न निकाह किया है न सोते हैं। (हदीक़तुल औलिया, सफ़ा 57) | इबादत और रियाज़त के ये तमाम तरीक़ किताब व सुन्नत से तो दूर हैं ही लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि जिस क़द्र यह तरीक़ किताब व सुन्नत से दूर हैं उसी क़द्र हिन्दू मज़हब की इबादत और रियाज़त के तरीक़ों से क़रीब हैं। आइंदा सफ़हात में हिन्दू मज़हब का मुताला करने के बाद आपको अंदाज़ा होगा कि दोनों मज़ाहिब में किस क़द्र नाक़ाबिले यक़ीन हद तक समानता और एक रूपता पाई जाती है।

फ़लसफ़ा वहदतुल वुजूद और हुलूल के मुताबिक़ चूंकि इंसान खुद तो कुछ भी नहीं बल्कि वही ज़ात बरहक़ कायनात की हर चीज़ (बिशमूल इंसान) में जलवागर है, लिहाज़ा इंसान वही करता है जो ज़ात बरहक़ चाहती है। इंसाने उसी रास्ते पर चलता है जिस पर वह ज़ात बरहक़ चलाना चाहती है।

“इंसान का अपना कोई इरादा है न इख़्तियार” इस नज़रिये ने अहले तसव्वुफ़ के नज़दीक नेकी और बुराई, हलाल और हराम, इताअत और नाफ़रमानी, सवाब व अज़ाब, जज़ा व सज़ा का तसव्वुर ही ख़त्म कर दिया है। यही वजह है कि अक्सर सूफ़िया हज़रात ने अपनी तहरीरों में जन्नत और दोज़ख़ का तमस्खुर और मज़ाक़ उड़ाया है।

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने मल्फ़ज़ात फ़वाइल फ़वाइद में फ़रमाते हैं क़यामत के दिन हज़रत मारूफ़ करख़ी को हुक्म होगा बहिश्त में चलो वह कहेंगे “मैं नहीं जाता मैंने तेरी बहिश्त के लिए इबादत नहीं की थी” चुनांचे फ़रिश्तों को हुक्म दिया जाएगा कि उन्हें नूर की जंजीरों में जकड़ कर खींचते, खींचते बहिश्त में ले जाओ।

हज़रत राबिआ बसरी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक दिन दाएं हाथ में पानी का प्याला और बाएं हाथ में आग का अंगारा लिया और फरमाया यह जन्नत है और यह जहन्नम है। इस जन्नत को जहन्नम पर उंडेलती हूं ताकि न रहे जन्नत न रहे जहन्नम और लोग ख़ालिस अल्लाह की इबादत करें।

  1. करामात

सूफ़िया किराम, वहदतुल वजूद और हुलूल के क़ाइल होने की वजह से खुदाई ख़्तियारात रखते हैं। इसलिए ज़िंदों को मार सकते हैं। मुर्दो को जिंदा कर सकते हैं। हवा में उड़ सकते हैं, क़िस्मतें बदल सकते हैं। कुछ मिसालें मुलाहिज़ा हों : | 1. “एक बार पीराने पीर शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी रह० ने मुर्गी का सालन खाकर हड्डियां एक तरफ़ रख दीं, उन हड्डियों पर हाथ रखकर फ़रमाया ‘कुम बिइज्रिनल्लाह’ तो वह मुर्गी जिंदा हो गई।’ (सीरते गौस, सफ़ा 191)

“एक औरत ख्वाजा फ़रीदुद्दीन गंज शकर के पास रोती हुई आयी और कहा बादशाह ने मेरे बेगुनाह बच्चे को तख़्तादार पर लटकवा दिया है। चुनांचे आप असहाब समेत वहां पहुंचे और कहा “इलाही अगर यह बेगुनाह है तो इसे ज़िंदा कर दे” लड़का ज़िंदा हो गया और साथ चलने लगा यह करामत देखकर (एक) हज़ार हिन्दू मुसलमान हो गए। (इसरारुल औलियां, सफ़ां 110-111)

“एक व्यक्ति ने बारगाह ग़ौसिया में लड़के की दरख्वास्त की आपने उसके हक़ में दुआ फ़रमाई। इत्तिफ़ाक़ से लड़की पैदा हो गई आप ने फ़रमाया इसे घर ले जाओ और कुदरत का करिश्मा देखो जब घर आया तो उसे लड़की की बजाए लड़का पाया।”

“पीराने पीर गौसे आज़म मदीना से हाज़िरी देकर नंगे पांव बगदाद। आ रहे थे। रास्ते में चोर मिला जो लूटना चाहता था। जब चोर को इल्म हुआ कि आप गौसे आज़म हैं तो क़दमों पर गिर पड़ा और ज़बान पर “या सय्यदी अब्दुल क़ादिर शैअन लिल्लाह’ जारी हो गया। आप को उसकी हालत पर रहम आ गया उसकी इस्लाह के लिए बारगाहे इलाही में मुतवज्जह हुए। गैब से निदा आई “चोर को हिदायत की रहनुमाई करते हो कुतुब बना दो चुनांचे आपकी एक निगाह फ़ैज़ से वह कुतुब के दर्जे पर फ़ाइज़ हो गया।” (सीरत गौसिया सफ़ा 640)

“मियां इस्माईल लाहौर अलमारूफ़ मियां कलां ने सुबह की नमाज़ के बाद सलाम फेरते वक़्त जब निगाह करम डाली तो दायीं तरफ़ के मुक़तदी सब के सब हाफ़िज़ कुरआन बन गए और बायीं तरफ़ के नाज़रा पढ़ने वाले।” (हदीक़तुल औलिया, सफ़ा 176)

ख्वाजा अलाउद्दीन साबिर कलियरी को ख्वाजा फ़रीदुद्दीन गंज शकर ने कलियर भेजा। एक रोज़ ख़्वाजा साहब इमाम के मुसल्ले पर बैठ गए। लोगों ने मना किया तो फ़रमाया “कुतुब का रुत्वा क़ाज़ी से बढ़कर है” लोगों ने ज़बरदस्ती मुसल्ला से उठा दिया। हज़रत को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए जगह न मिली तो मस्जिद को मुखातब करके फ़रमाया “लोग सज्दा करते हैं तू भी सज्दा कर” यह बात सुनते ही मस्जिद मयं छत और दीवार के लोगों पर गिर पड़ी और सब लोग हलाक हो गए।” (हदीक़तुल औलिया, सफ़ा, 70) : बातिनियत किताब व सुन्नत से सीधा टकराव अक़ाइद व इफ़्कार पर पर्दा डालने के लिए अहले तसव्वुफ़ ने बातिनियत का सहारा भी लिया है। कहा जाता है। कि कुरआन व हदीस के शब्दों के दो दो मायना हैं। एक ज़ाहिरी दूसरे बातिनी (या हक़ीक़ी) यह अक़ीदा बातिनियत कहलाता है। अहले तसव्वुफ़ के नज़दीक दोनों मायना को आपस में वही निस्बत है जो छिलके को मुग्ज़ से होती है। यानी बातिनी मायना ज़ाहिरी मायना से अफ़ज़ल और मुक़द्दम है। ज़ाहिरी मायना से तो उलमा वाक़िफ़ हैं लेकिन बातिनी मायना को सिर्फ अहले इसरार व रमूज़ ही जानते हैं। इन इसरार व रमूज़ का स्रोत औलिया किराम के मुकाशिफ़, मुराक़बे, मुशाहिदे और इल्हामं या फिर बुजुर्गों का फ़ैज़ और तवज्जोह क़रार दिया गया। जिसके ज़रिए पवित्र शरीअत की मन मानी तावीलें की गईं। मसलन क़ुरआन मजीद की आयत वअबुद रब्ब-क हत्ता याति-य-कल यक़ीन० (15 : 99) का तर्जुमा यह है कि अपने रब की इबादत उस आख़िरी घड़ी तक करते रहो जिसका आना यक़ीनी है (यानी मौत) । (सूरह हुजुरात, आयत 99) अहले तसव्वुफ़ के नज़दीक यह उलमा (अहले ज़ाहिर) का तर्जुमा है उसका बातिनी या हक़ीक़ी तर्जुमा यह है कि सिर्फ उस वक़्त तक अपने रब की इबादत करो जब तक तुम्हें यक़ीन (मारफ़त) हासिल न हो जाए यक़ीन या मारफ़त से मुराद मारफ़ते इलाही है यानी जब अल्लाह की पहचान हो जाए तो सूफ़िया के नज़दीक नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज और तिलावत वगैरह की ज़रूरत बाक़ी नहीं रहती। इसी तरह सूरह बनी इसराईल की आयत 23 ‘व क़ज़ा रब्बु-क अल्ला तअबुदू इल्ला इय्याहु’ यानी तेरे र्ब ने फैसला कर दिया है कि तुम लोग किसी की इबादत न करो मगर सिर्फ उसकी”यह उलमा का तर्जुमा है और अहले इसरार व रमूज़ का तर्जुमा यह है “तुम न इबादत करोगे मगर वह उसी (यानी अल्लाह) की होगी जिस चीज़ की भी इबादत करोगे” जिसका मतलब यह है कि तुम चाहे किसी इंसान को सज्दा करो या क़ब्र को या किसी मुजस्समे और बुत को वह दरहक़ीक़त अल्लाह ही की इबादत होगी। कलिमा तौहीद ला इला-ह इल्लल्लाहु का साफ़ और सीधा मतलब यह है कि “अल्लाह के सिवा कोई इलाह नहीं सूफ़िया के नज़दीक इसका मतलब यह है ला मौजू-द इल्लल्लाह यानी दुनिया में अल्लाह के सिवा कोई चीज़ मौजूद नहीं। इलाह का तर्जुमा मौजूद करके अहले तसव्वुफ़ ने कलिमा तौहीद से अपना नज़रिया वहदतुल वजूद तो साबित कर दिया लेकिन साथ ही कलिमा तौहीद को कलिमा शिर्क में बदल डाला। तर्जुमा : “जो बात उनसे कही गई थी ज़ालिमों ने उसे बदल कर कुछ और कर दिया।” (सूरह बक़रा, आयत 59)

बातिनीयत के पर्दे में किताब व सुन्नत के अहकामात और अक़ाइद की मन मानी तावीलों के अलावा अहले तसव्वुफ़ ने कैफ़, जज़्ब, मस्ती, इस्तग़राक़, सकर (बेहोशी) और सहू (होश) जैसी इस्तलाहात गढ़ करके जिसे चाहा हलाल क़रार दे दिया जिसे चाहा हराम ठहरा दिया। ईमान की तारीफ़ यह की गई कि यह दरअस्ल इश्क़ हक़ीक़ी (इश्क़ इलाही) का दूसरा नाम है इसी के साथ यह फ़लसफ़ा तराशा गया कि इश्क़ हक़ीक़ी का हुसूल इश्क़ मजाज़ी के बगैर मुमकिन ही नहीं चुनांचे इश्क़ मुजाज़ी के सारे लवाज़मात, गिना, मौसीक़ी, रक़्स व सुरूर, समाअ, वज्द, हाल वगैरह और हुस्न व इश्क़ की दास्तानों और जाम व सुबू की बातों से लबरेज़ शायरी मुबाह ठहरी। शैख़ हसीन लाहौरी जिनका एक ब्राह्मण लड़के के साथ इश्क़ का क़िस्सा हम “दीने ख़ानक़ाही” में बयान कर चुके हैं, के बारे में “ख़ज़ाना असफ़िया’ में लिखा है कि वह बहलोल दरियाई के ख़लीफ़ा थे। 36 साल वीराने में रियाज़त व मुजाहिदा केया। रात को दातागंज बख़्श के मज़ार पर ऐतिकाफ़ में बैठते। आपने तरीक़ा मिलामिया इख़्तियार किया। चारं अबरू का सफ़ाया, हाथ में शराब का . प्याला, सुरूर व नगमा, चंग व रबाब, तमाम शरई कैदों से आज़ाद जिस तरफ़ चाहते निकल जाते” यह है वह बातिनियत जिसके खुशनुमा पर्दे में अहले हवा व हवस दीने इस्लाम के अक़ाइद ही नहीं अख़्लाक़ और शर्म व हया का दामन भी तार तार करते रहे और फिर भी बक़ौल मौलाना अलताफ़ हुसैन हाली रहे । | “न तौहीद में ख़ालल इससे आए न इस्लाम बिगड़े न ईमान जाए पाठक गणो! फ़लसफ़ा वहदतुल वजूद और हुलूल के नतीजे में पैदा होने वाली गुमराही का यह मुख़्तसर सा परिचय है जिससे बखूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मुसलमानों को इल्हाद और कुफ़ व शिर्क के रास्ते पर डालने में इस बातिल फ़लसफ़े का कितना बड़ा हिस्सा है? हिन्द व पाक का क़दीम तरीन मज़हब, हिन्दूमत । पंद्रह सौ साल (पूर्व मसीह), जहां गर्द आर्यन अक़वाम मध्य एशिया से आकर वादी सिंध के इलाक़ हड़प्पा और मोहन जूदड़ो में आबाद हुईं। यह इलाके इस वक़्त बॅरें सगीर की तहज़ीब व तमधुन का सरचश्मा समझे जाते थे। हिन्दुओं की पहली मुक़द्दस किताब “ऋगवेद” उन्ही आर्यन अक़वाम के विचारकों ने लिखी जो उनके देवी देवताओं की महानता के गीतों पर मुश्तमिल है। यहीं से हिन्दू मज़हब की इब्तिदा हुई जिसका मतलब यह है कि हिन्दू मज़हब गुज़िश्ता साढ़े तीन हज़ार साल से बरें सगीर की तहज़ीब व तमद्दन, मआशिरत और मज़ाहिब पर असर अंदाज़ होता चला आ रहा है।

हिन्दूमत के अलावा बुद्धमत और जैनमत का शुमार भी क़दीमतरीन मज़ाहिब में होता है। बुद्धमत का बानी गौतम बुद्ध 563 (पूर्व मसीह) में 80 साल की उम्र पाकर गुज़र गया, जबकि जैनमत का बानी महावीर जैन 599 (पूर्व मसीह) में पैदा हुआ और 72 साल की उम्र पाकर 527 (पूर्व मसीह) में मरा। जिसका मतलब यह है कि यह दोनों मज़हब भी कम से कम चार पांच सौ साल पूर्वमसीह से बर्षे सगीर की तहज़ीब व तमन, मुआशिरत और . मज़ाहिब पर असरअंदाज़ हो रहे हैं।

हिन्दूमत, बुद्धमत और जैनमत तीनों मज़ाहिब वहदतुल वजूद और हुलूल के फ़लसफ़े पर ईमान रखते हैं। बुद्धमत के पैरोकार गौतम बुद्ध को अल्लाह तआला का अवतार समझकर उसके मुजस्समों और मूर्तियों की पूजा और परस्तिश करते हैं। जैनमत के पैरोकार महावीर के मुजस्समे के अलावा तमाम मज़ाहिर कुदरत, मसलन, सूरज, चांद, सितारे, हजर, शजर, दरिया, समुन्द्र, आग और हवा वगैरह की पूजा करते हैं। हिन्दूमत के पैरोकार अपनी क़ौम के महान व्यक्तियों (मर्द व औरत) के मुजस्समों के अलावा मज़ाहिर कुदरत की पूजा भी करते हैं। हिन्दू कुतुब में इसके अलावा जिन चीज़ों को पूजा योग्य कहा गया है उनमें गाय (बिशमोल गाय का मक्खन, दूध, घी, पेशाब और गोबर) बैल, आग, पीपल का पेड़, हाथी, शैर, सांप, चूहे, सूवर और बन्दर भी शामिल हैं। उनके बुत और मुजस्समे भी इबादत के लिए मंदिरों में रखे जाते हैं। औरत और मर्द के लिंग व योनि भी पूजा योग्य समझते जाते हैं, चुनांचे शिवजी महाराज की पूजा उसके मर्दाना लिंग की पूजा करके की जाती है और शक्ति देवी की पूजा उसके पोशीदा अंग की पूजा करके की जाती है।”

बरें सगीर में बुतपरस्ती के क़दीमतरीन तीनों मज़ाहिब के मुख़्तसर परिचय के बाद हम हिन्दू मज़हब की कुछ तालीमात का उल्लेख करना चाहते हैं। ताकि यह अंदाज़ा किया जा सके कि बरें सगीर हिन्द व पाक में शिर्क की इशाअत और फैलाव में हिन्दूमत के असरात किस क़द्र गहरे हैं।

हिन्दू मज़हब की तालीमात के मुताबिक़ निजात हासिल करने के लिए हिन्दू दूर जंगलों और गारों में रहते। अपने जिस्म को रियाज़तों से तरह तरह की तकलीफें पहुंचाते। गर्मी, सर्दी, बारिश और रेतीली ज़मीन पर नंगे बदन रहना अपनी रियाज़तों का मुक़द्दस अमंल समझते जहां यह अपने आपको दीवाना वार तकलीफें पहुंचाकर अंगारों पर लोटकर, गर्म सूरज में नंगे बदन | 1. पिछले दिनों विश्व हिन्दू परिषद के रहनुमा राम चन्द्र जी ने खड़ाओं की पूजा और परस्तिश करने की मुहिम का बाक़ायदा आगाज़ किया। अख्बारात में जो तसावीर प्रकाशित हुईं उनमें राम चन्द्र जी आला क़िस्म की खड़ाओं पहनकर ताज़ीमन खड़े नज़र आ रहे हैं। (मुलाहिज़ा हो नवाए वक़्त, 8 अक्टूबर 1992 ई०) गोया अब उपरोक्त अशया के साथ साथ खड़ाव भी हिन्दुओं की मुक़द्दस अशया में शामिल हो गई हैं।

बैठकर, कांटों के बिस्तर अपने हाथ को बेहरकत न तक रखते ताकि वह जिस्मानी आज़ार की मशक़्क़तों को भी नि से बाहर गौर व फ़िक्र अपने ग्रहों की रहनमा गुज़ारा करते हुए से लंगोटी बांध लेते। १ धडंग और ख़ाकतर पहाड़ों में कसरत से की जाती है।

और एक हाथ को इस लम्बे अर्से तक बेकार बना देना कि वह सूख जाए या मुसलसल उलटे लटके रहना। सारी उम्र हर मौसम और बारिश में नंगे रहना, तमाम उम्र ब्रह्मचारी यानी कुंवारा रहना या अपने तमाम अंहले ख़ाना से अलग होकर बुलन्द पहाड़ों के गारों में ज्ञान ध्यान करना वगैरह भी योगी इबादत के मुख़्तलिफ़ तरीके हैं। उसे हिन्दू योगी हिन्दू धर्म या वेदांत यानी तसव्वुफ़ के मज़ाहिर क़रार देते हैं।’ | हिन्दू मत और बुद्धमत में जंतर मंतर और जादू के ज़रिए इबादत का तरीक़ा भी राइज है। इबादत का यह तरीक़ा इख़्तियार करने वालों को “तांत्रिक फ़िरक़ा कहते हैं। ये लोग जादूई मंतर जैसे आदम मनी ‘‘पदमनी ओम” योगा के अंदाज़ में ज्ञान ध्यान को निजात का ज़रिया समझते हैं। क़दीम वेदिक लिट्रेचर बताता है कि साधू और उनके कुछ वर्ग जादू और सिफ़ली अमलियात में महारत हासिल करने के अमल दोहराया करते थे। इस फ़िरक़ में तेज़ बेहोश करने वाली शराबों का पीना, गोश्त और मछली खाना, जिंसी अफ़आल का बढ़ चढ़कर करना, गिलाज़तों को गिज़ा बनाना, मज़हबी रस्मों के नाम पर क़त्ल करना, जैसी क़बीह और मकरूह हरकात भी इबादत समझी जाती हैं। 2. हिन्दू बुजुर्गों के अलौकिक इख़्तियारात जिस तरह मुसलमानों के यहां गौस, कुतुबे, नजीब, अबदाल, वली, फ़क़ीर और दर्वेश वगैरह मुख़्तलिफ़ मरातिब और मनासिब के बुजुर्ग समझे जाते हैं। जिन्हें अलौकिक कुव्वत और इख़्तियारात हासिल होते हैं। इसी तरह हिन्दुओं में ऋषि, मुनी, महात्मा, अवतार, साधू, संत, संयासी, योगी, शास्त्री और चध्चधुरवेदी वगैरह मुख़्तलिफ़ मरातिब और मनासिब के बुजुर्ग समझे जाते हैं। जिन्हें अलौकिक कुव्वत और इख़्तियारात हासिल होते हैं। हिन्दुओं की मुक़द्दस किताबों के मुताबिक़ यह बुजुर्ग माज़ी हाल और मुस्तक़बिल को देख सकते हैं। जन्नत में दौड़ते हुए जा सकते हैं। देवताओं के दरबार में । उनका बड़े सम्मान से इस्तक़बाल किया जाता है। यह इतनी ज़बरदस्त जादूई ताकेत के मालिक होते हैं कि अगर चाहें तो पहाड़ों को उठाकर समुन्द्र में फेंक दें। यह एक निगाह से अपने दुश्मनों को जलाकर ख़ाक कर सकते हैं। तमाम फ़सलों को बर्बाद कर सकते हैं, अगर यह खुश हो जाएं तो पूरे शहर को तबाही से बचा लेते हैं, दौलत में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा कर सकते हैं, क़हत साली से बचा सकते हैं, दुश्मनों के हमले रोक सकते हैं। मुनी वह मुक़द्दस इंसान हैं जो कोई कपडा नहीं पहनते, हवा को बतौर लिबासे इस्तेमाल करते हैं, जिनकी गिज़ा उनकी ख़ामोशी है, वे हवा में उड़ सकते हैं और परिंदों से ऊपर जा सकते हैं, यह मुनी तमाम इंसानों के अंदर पोशीदा ख्यालों को जानते हैं क्योंकि उन्होंने वह शराब पी हुई है जो आम इंसानों के लिए ज़हर है। शिव जी के बेटे लार्ड गणेश के बारे में हिन्दुओं का अक़ीदा है कि वह किसी भी मुश्किल को आसान कर सकते हैं, अगर चाहें तो किसी के लिए भी मुश्किल पैदा कर सकते हैं, इसलिए बच्चा जब पढ़ने की उम्र को पहुंचता है तो सबसे पहले उसे गणेश की पूजा करना ही सिखाया जाता है। 3. हिन्द बुजुर्गों की कुछ करामात हिन्दुओं की मुक़द्दस कुतुब में अपने बुजुर्गों से मंसूब बहुत सी करामात का उल्लेख मिलता है हम यहां दो चार मिसालों पर ही इक्तिफ़ा करेंगे।

  1. हिन्दओं की मज़हबी किताब रामायण में राम और रावण का तवील किस्सा दिया गया है कि राम अपनी बीवी सीता के साथ जंगलात में जिंदगी बसर कर रहा था। लंका का राजा रावण उसकी बीवी को इगवा करके ले गया। राम ने हनुमान (बन्दरों के शहंशाह) की मदद से ज़बरदस्त खूनी जंग के बाद अपनी बीवी वापस हासिल कर ली, लेकिन मुक़द्दद क़वानीन के तहत उसे बाद में अलग कर दिया। सीता यह गम बरदाश्त न कर सकी और अपने आपको हलाल करने के लिए आग में कूद गई। अग्नी देवता जो मुक़द्ददसे आग के मालिक हैं उन्होंने आग को हुक्म दिया कि वह बुझ जाए और सीता को न जलाए। इस तरह सीता दहकती हुई आग से सालिम निकल आई
  2. एक बार बुद्धमत के दुर्वेश (भिक्षु) ने यह चमत्कार दिखलाया कि एक पत्थर से एक ही रात में उसने हज़ारों शाख़ वाला आम का पेड़ पैदा कर दिया। (मुक़दमा अर्थशास्त्र सफ़ा, 116-117)
  3.  मुहब्बत के देवता (काम) और उसकी देवी (रती) और उन देवी देवताओं के दोस्त ख़ास तौर से मौसम बहार के खुदा जब बाहम खेलते तो काम देवता” अपने फूलों के तीरों से “शिव देवता” पर बारिश करते और शिव देवता अपनी तीसरी आंख से उन तीरों पर निगाह डालते तो यह तीर बुझी हुई ख़ाक की शक्ल में तबाह हो जाते और वह हर क़िस्म के नुक़्सान से महफूज़ रहता क्योंकि वह जिस्मानी शक्ल से आज़ाद था।
  4. हिन्दुओं के एक देवता लाई गणेश के वालिद शिव जी के बारे में रिवायत है कि देवी पारवती’ (उनकी बीवी का नाम) ने एक दिन तय किया कि लार्ड शिव उनके गुस्ल के वक़्त शरारतन गुस्ल ख़ाना में घुसकर उन्हें परेशान करते हैं, चुनांचे उसका निवारण करने के लिए एक इंसानी पुतला बनाया और उसमें जान डाल कर उसे गुस्ल ख़ाने के दरवाज़े पर पहरा देने के एक तरफ़ बुद्धमत के भिक्षु का यह चमत्कार और दूसरी तरफ़ बुद्धमत के संस्थापक गौतम बुद्ध के बारे में यह दिलचस्प ख़बर मुलाहिज़ा हो “हैदराबाद की खूबसूरत सागर झील में एक छोटे जहाज़ से गौतम बुद्ध का मुजस्समा फिसल कंर झील में गिर गया। मुजस्समे का वज़न 450 टन था और उसे 9 मई को बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर नक़ाब कुशाई के लिए नसब किया जाना था। यह मुजस्समा दुनिया का सबसे बड़ा मुजस्समा था। इस हादसे में (गौतम बुद्ध को बचाते बचाते) दस लोग झील में डूब गए और छः व्यक्ति ज़ख़्मी हो गए। (नवाए वक़्त 11 मार्च 1990 ई०) मुश्किीन के माबूदों की असल हक़ीक़त तो यही है चाहे वह बुद्धिस्टों के हों या हिन्दुओं के या मुसलमानों के ला इला-ह इल्ला हु-व फ़अन्ना तूफ़कून तर्जुमा : उस अल्लाह तआला के सिवा कोई दूसरा इलाह नहीं आख़िर तुम कहां से धोखा खा रहे हो। (सूरह फ़ातिर, आयत 3)

फिर यह हुआ कि शिव जी हस्बे आदत देवी पारवती को छेड़ने और सताने के लिए गुस्ल ख़ाने की सिम्तं चले आए। उनकी हैरत की इंतिहा न रही जब उन्होंने गुस्ल ख़ाना के दरवाज़े पर एक खूबसूरत बच्चे को पहरा देते देखा। शिव जी ने गुस्ल ख़ाने में घुसने की कोशिश की तो उस बच्चे ने रास्ता रोक लिया। शिव जी को इस बात पर इतना गुस्सा आया कि उन्होंने त्रिशूल (तीन नोक का नेज़ा) से उसका सेर काट कर धड़ से अलग कर दिया। देवी पारवती के लिए यह क़त्ल शदीद सदमे का कारण बना । तब शिव जी ने मुलाज़मीन को हुक्म दिया कि वह फ़ौरी किसी का सर काट कर ले आएं। मुलाज़िमीन भागे बाहर निकले तो सबसे पहले उनका सामना हाथी से हुआ और वह हाथी का सर काट के ले आए शिव जी ने बच्चे के धड़ पर हाथी । का सर जमा कर फिर से जान डाल दी और देवी पारवती बच्चे की नई जिंदगी से बहुत खुश हुईं।

हिन्दूमते की तालीमात का मुताला करने के बाद यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि मुसलमानों के एक बड़े फ़िरक़ अहले तसव्वुफ़” के अक्राइद और तालीमात हिन्दू मज़हब से किस दर्जे मुतास्सिर हैं। अक़ीदा वहदतुल वजूद और हुलूल समान, इबादत और रियाज़त के तरीके समान, बुजुर्गों के अलौकिक इख़्तियारात समान और बुजुर्गों की करामात का सिलसिला भी समान। अगर कोई फ़र्क है तो वह है सिर्फ नामों का। तमाम मामलात में समानता और एक रूपता पा लेने के बाद हमारे लिए हिन्दुस्तान की तारीख़ में ऐसी मिसालें बाइस ताज्जुबे नहीं रहतीं कि हिन्दू लोग, मुसलमान पीरों, फ़क़ीरों के मुरीद क्यों बन गए और मुसलमान हिन्दू साधुओं और जोगियों के ज्ञान ध्यान में क्यों हिस्सा लेने लगे। इस मेल जोल का नतीजा यह है कि हिन्द व पाक के मुसलमानों की बड़ी संख्या जिस इस्लाम पर आज अमल करती है. उस पर किताब व सुन्नत की बजाए हिन्दू मज़हब के नुक़श कहीं ज़्यादा गहरे और नुमायां हैं।

हिन्द व पाक में शिर्क व बिदअत के असबाब तलाश करते हुए अकसर यह बात कही जाती है कि चूंकि यहां इस्लाम पहली सदी हिजरी के आख़िर में उस वक़्त पहुंचा जब मुहम्मद बिन क़ासिम रह० ने 93 हि० में सिंध फ़तह किया। उस वक़्त मुहम्मद बिन क़ासिम रह० और उसकी सेना के जल्द वापस चले जाने की वजह से एक तो इस्लाम ख़ालिस किताब व सुन्नत की शक्ल में पहुंचा ही नहीं, दूसरे इस्लाम की यह दावत बड़े महदूद पैमाने पर थी। यही वजह है कि हिन्द व पाक के मुसलमानों की बड़ी तादाद के विचार व आमाल में मुश्रिकाना और हिन्दुवाना रस्म व रिवाज बड़े स्पष्ट और नुमायां हैं।

तारीख़ी एतेबार से यह बात दुरुस्त साबित नहीं होती। असल बात यह है कि सरज़मीन हिन्द व पाक अहदे फ़ारूक़ी (15 हिं०) से ही सहाबा किराम रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन के आगमन से पवित्र होनी शुरू हो गई थी। अहदे फ़ारूक़ी और अहदे उसमानी में इस्लामी रियासत के अन्तर्गत आने वाले मुमालिक में शाम, मिस्र, ईराक़, यमन, तुर्किस्तान, समरकंद, बुख़ारा, तुर्की, अफ़्रीक़ा और हिन्दुस्तान में मालाबार, जज़ाइर सरान द्वीप, मालद्वीप, गुजरात और सिंध के इलाके शामिल थे और इस अवधि में सरज़मीन हिन्द में तशरीफ़ माल और पाबन्द शरअ शरीफ़ हैं। (रियाज़ुस्सालिकीन सफ़ा 272 ब-हवाला शरीअत वे तरीक़त, सफ़ा 477) दूसरी तरफ़ इस्माईलिया फ़िरक़ा के पीर शमशुद्दीन साहब कश्मीर तशरीफ़ लाएं तो तक़य्या करके अपने आपको यहां के बाशिन्दों के रंग में रंग लिया। एक दिन जब हिन्दू दसहरे की खुशी में गरबा नाच रहे थे, पीर साहब भी उस नाच में शरीक हो गए और 28 गरबा गीत तस्नीफ़ फ़रमाए। इसी तरह एक दूसरे पीर सदरुद्दीन साहब (इस्माईली) ने हिन्दुस्तान में आकर अपना हिन्दुवाना नाम ‘‘साह देव” (बड़ा दुर्वेश) रेख लिया और लोगों को बताया कि विष्णु का दसवां अवतार हज़रत अली रज़ि० की शक्ल में ज़ाहिर हो चुका है। उसके पीर व सूफ़ियों की ज़बान में मुहम्मद और अली की तारीफ़ में भजन गाया करते थे। (इस्लामी तसव्वुफ़ में गैर इस्लामी तसव्वुफ़ की आमेज़िश, सफ़ा 32-33)

लाने वाले सहाबा किराम रिज़वानुल्लाह अलैहिम अजमईन की तादाद 25 । बिईन की तादाद 37 और तबअ ताबईन की तादाद 15 बताई जाती है।’ अर्थात पहली सदी हिजरी के आरंभ में ही इस्लाम हिन्द व पाक में ख़ालिस किताब व सुन्नत की शक्ल में पहुंच गया था और हिन्दू मत के हज़ारों साला धराने और गहरे असरात के बावजूद सहाबा किराम रिज़वानुल्लाह अलैहिम जनई, ताबईन और तबअ ताबईन रहिम० की सई जमीला के नतीजे में पसलसल प्रगति पर था—जो बात तारीख़ी हक़ाइक़ से साबित है वह यह कि जब कभी मूहिद और मोमिन अफ़राद बर सरे इक़तदार आए तो वह इस्लाम की शान वे शौक़त में इज़ाफ़े का बाइस बने। मुहम्मद बिन क़ासिम के बाद सुलतान सुबुक्तगीन-सुलतान महमूद गज़नवी और सुलतान शहाबुद्दीन मुहम्मद जौरी का अहद (986 से 1175 ई०) इस बात का स्पष्ट सुबूत है कि इस दौर में इस्लाम हिन्द व पाक की एक ज़बरदस्त सियासी और समाजी कुव्वत बन गया था उसके विपरीत जब कभी मुल्हिद और बे दीन क़िस्म के लोग सत्ता ॐ आए तो वह इस्लाम की पस्पाई और रुस्वाई का बाइस बने उसकी एक पष्ट मिसाल अहदे अकबरी है जिसमें सरकारी तौर पर ला इला-ह इल्लल्लाहु अकबरु ख़लीफ़तुल्लाह मुसलमानों का कलिमा क़रार दिया गया। अकबर को दरबार में बाक़ायदा सज्दा किया जाता। नुबुवत, वय, हश्न-नश्र और जन्नत दोज़ख़ का मज़ाक़ उड़ाया जाता। नमाज़, राज़ा, हज और दीगर इस्लामी आइर पर खुल्लम खुल्ला एतराज़ात किए जाते सूद, जुवा और शराब हलाल लहराए गए सुअर को एक मुक़द्दस जानवर क़रार दिया गया हिन्दुओं की वशनूदी हासिल करने के लिए गाय का गोश्त हराम क़रार दिया गया। दीवाली, दशहरा, राखी, पूनम, शिव रात्रि जैसे त्यौहार हिन्दुवाना रसूम के साथ सरकारी सतह पर मनाए जाते। हक़ीक़त यह है कि हिन्दुस्तान में हिन्दु मज़हब के अहया और शिर्क के फैलाव का अस्ल सबब ऐसे ही बेदीन और इक्तदार परस्त मुसलमान हुक्मरान थे।

तसीम हिन्द के बाद का जायज़ा लिया जाए तो यह हक़ीक़त और भी स्पष्ट होकर सामने आती है कि शिर्क व बिदअत और सैक्यूलरिज़्म को फैलाने या रोकने में हुक्मरानों का किरदार बड़ी एहमियत रखता है हमारे नज़दीक हर पाकिस्तानी को इस सवाल पर संजीदगी से गौर करना चाहिए कि आख़िर क्या वजह है कि दुनिया की वह वाहिद रियासत जो कम व बेश निस्फ़ सदी पहले केवल कलिमा तौहीद ला इला-ह इल्लल्लाहु की बुनियाद पर वजूद में आई थी। उसमें आज फिर कलिमा तौहीद को लागू करने का दूर दूर कोई निशान नज़र नहीं आ रहा? अगर इसका सबब जिहालत क़रार दिया जाए तो जिहालत ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी भी हुक्मरानों पर थी। अगर उसका सबब निज़ामे तालीम क़रार दिया जाए तो निज़ामे तालीम को बदलने की ज़िम्मेदारी भी हुक्मरानों पर थी। अगर उसका सबब दीन ख़ानक़ाही क़रार दिया जाए तो दीन ख़ानक़ाही के अलमबरदारों को सही राह पर लाना भी हुक्मरानों की ज़िम्मेदारी थी। लेकिन विडम्बना तो यह है कि तौहीद को लागू करने के मुक़द्दस फ़रीज़े की बात तो दूर की बात, हमारे हुक्मरान खुद किताब वे सुन्नत के निफ़ाज़ की राह में सबसे बड़ी रुकावट बनते आए हैं। सरकारी सतह पर शरई हुदूद को ज़ालिमाना क़रार देना, क़िसास, दैत और क़ानून शहादत को दक़यानूसी कहना, इस्लामी शआइर का मज़ाक़ उड़ाना, सूदी निज़ाम के तहफ़्फ़ज़ के लिए अदालतों के दरवाज़े खटखटाना आइली क़वानीन और फैमिली प्लानिंग जैसे गैर इस्लामी मंसूबे ज़बरदस्ती मुसल्लत करना, सक्लाफ़ती ताइफ़ों, क़व्वलों, गाने वालियों और संगीत कारों को सम्मानित करना’ साले नो और जश्न आज़ादी जैसी तक़ारीब के बहाने शराब व शबाब की मेहफ़िलें आयोजित करना हमारे सभ्य हुक्मरानों का मामूल बन चुका है। दूसरी तरफ़ ख़िदमत इस्लाम के नाम पर हमारे सभी हुक्मरान (इल्ला माशाअल्लाह) जो कारनामे सरअंजाम देते चले आ रहे हैं उनमें सबसे नुमायां और सरे फ़हरिस्त दीने ख़ानक़ाही से अक़ीदत का इज़हार और उसका तहफ़्फ़्ज़ है। शायद हमारे हुक्मरानों के नज़दीक इस्लाम को सबसे प्रमुख गुण यही है कि बानी पाकिस्तान मुहम्मद अली जिनाह रह० से लेकर मरहूम मुहम्मद ज़ियाउल हक़ तक और हकीमुल उम्मत अल्लामा इक़बाल रह० से लेकर मरहूम हफ़ीज़ जालंधरी तक तमाम क़ौमी लीडरों के खूबसूरत संग मरमर के मुनक़्क़श मज़ार तामीर कराए जाएं उन पर मुजाविर (गाड) मुतअय्यन किए जाएं। क़ौमी दिनों में उन मज़ारों पर हाज़िरी दी जाए। फूलों की चादरें चढ़ायी जाएं। सलामी दी जाए फ़ातिहा ख्वानी और कुरआन ख्वानी के ज़रिए उन्हें सवाब पहुंचाने का काम किया जाए तो यह दीन इस्लाम की बहुत बड़ी ख़िदमत है।

याद रहे बानी पाकिस्तान मुहम्मद अली जिनाह रह० के मज़ार की देख भाल और हिफ़ाज़त के लिए बाक़ायदा एक अलग मैनेजिंग बोर्ड क़ायम है। जिसके मुलाज़िम सरकारी ख़ज़ाने से वेतन पाते हैं पिछले वर्ष मज़ार के तक़द्दुस की ख़ातिर सिनेट की सेटिंग कमेटी ने मज़ार के इर्द गिर्द 6 फ़रलांग के इलाके में मज़ार से बुलन्द किसी भी इमारत की तामीर पर पाबन्दी आयद करने का फैसला किया है। (रोज़नामा जंग 13 अगस्त 1991 ई०)’

1975 में शहंशाह ईरान ने सोने का दरवाज़ा सय्यद अली हजवैरी रह० के मज़ार की नज़र किया जिसे पाकिस्तान के उसको वक़्त के वज़ीरे आज़म ने अपने हाथों से दरबार में नसब फ़रमाया। 1989 ई० में फेडरल हुकूमत ने झंग में एक मज़ार की तामीर व तज्ञईन के लिए 68 लाख रुपये का अतिया सरकारी ख़ज़ाने से अदा किया। 1991 में सय्यद अली हजवैरी के उर्स को इफ़्तताह वज़ीरे आला पंजाब ने मज़ार को 40 मन अर्क गुलाब से गुस्ल देकर किया जबकि इस साल “दाता साहब” के 948वीं उर्स के इफ़्तताह के लिए जनाब वज़ीरे आज़म साहब स्वयं तशरीफ़ ले गए मज़ार पर फूलों की चादर चढ़ाई, फ़ातिहा ख्वानी की, मज़ार से मुत्तसिल मस्जिद में नमाज़े इशा अदा की और दूध की सबील का इफ़्तताह किया नीज़ मुल्क में शरीअत के निफ़ाज़ याद रहे मक्का मुअज्ज़मा में बैतुल्लाह शरीफ़ की इमारत के इर्द गिर्द बैतुल्लाह शरीफ़ से दुगनी तिगनी बुलन्द व बाला इमारतें मौजूद हैं। जो मस्जिदुल हराम के बिल्कुल क़रीब वाक़अ हैं इसी तरह मदीना मुनव्वरा में रोज़ा रसूल सल्ल० के इर्द गिर्द रोज़ा मुबारक से दुगनी तिगनी बुलन्द व बाला इमारतें मौजूद हैं जिनमें आम लोग रहते हैं। उलमा किराम के नज़दीक उन रिहाइशी इमारतों की वजह से न तो बैतुल्लाह शरीफ़ का तक़द्दस मजरूह होता है न रोज़ा रसूल सल्ल० का। |, 2. सहीफ़ा अहले हदीस कराची 16 दिसम्बर, 1989 ई०।

कश्मीर और फ़लिस्तीन की आज़ादी अफ़गानिस्तान में अम्न व अमान और मुल्क की यक जहती तरक़्क़ी और खुशहाली के लिए दुआएं कीं ।। पिछले दिनों वज़ीरे आज़म साहब अज़ बक्सतान तशरीफ़ ले गए जहां उन्होंने चालीस लाख डालर (तक़रीबन एक करोड़ रुपये पाकिस्तानी) इमाम बुख़ारी रह० के मज़ार की तामीर के लिए बतौर अतिया इनायत फ़रमाए। ।

उपरोक्त कुछ मिसालों को देखते हुए, अहले बसीरत के समझने के लिए बहुत कुछ मौजूद है, ऐसी संरज़मीन जिसके शासक खुद यह “ख़िदमते इस्लाम” सरअंजाम दे रहे हों वहां के अवाम की अक्सरियत अगर गली गली, मुहल्ले मुहल्ले, गांव गांव, शब व रोज़ मराकिज़ शिर्क क़ायम करने में व्यस्त हों तो उसमें ताज्जुब की कौन सी बात है? कहा जाता है अन्नासु अला दीनि मुलूकिहिम (यानी अवाम अपने हुक्मरानों के दीन पर चलते हैं) यह दौर अपने बराहीम की तलाश में है।

सनम कदे है जहां ला इला-ह इल्लल्लाह । जैसा कि हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि इंसानी समाज में तमामतर शर व फ़साद की अस्ल बुनियाद शिर्क ही है। शिर्क का ज़हर जिस तेज़ी से समाज में काम कर रहा है उसी तेज़ी से पूरी क़ौम हलाकत और बरबादी की तरफ़ बढ़ती चली जा रही है। इस सूरतेहाल का तक़ाज़ा यह है कि अक़ीदाए तौहीद की समझ रखने वाले लोग व्यक्तिगत और सामूहिक, हर सतह पर शिर्क के ख़िलाफ़ जिहाद करने का अज़्म करें। व्यक्तिगत सतह पर सबसे पहले अपने अपने घरों में अहल. व अयाल पर तवज्जोह दें जिनके बारे में अल्लाह तआला का स्पष्ट हुक्म भी है :

(يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوا أَنْفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًا

तर्जुमा : “ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अपने आपको और अपने अहले व अयाल को (जहन्नम की) आग से बचाओ।” (सूरह तहरीम, आयत 6) उसके बाद अपने अज़ीज़ व अक़ारिब दोस्त अहबाब पर तवज्जोह दी जाए और, फिर घर घर, गली गली, मुहल्ले मुहल्ले और बस्ती बस्ती जाकर अक़ीदा तौहीद की दावत पेश की जाए। लोगों को शिर्क की बरबादियों और तबाह कारियों से सचेत किया जाए।

सामूहिक सतह पर मुल्क में अगर कोई गिरोह या जमाअत ख़ालिस . तौहीद की बुनियाद पर ग़लबा इस्लाम के लिए जद्दोजहद कर रही हो तो उसके साथ सहयोग किया जाए कोई फ़र्द या इदारा यह मुक़द्दस फ़रीज़ा अंजाम दे रहा हो तो उसके साथ सहयोग किया जाए, कोई अवार, जरीदा या रिसाला इस कारे खैर में लगा हो तो उसके साथ सहयोग किया जाए। शिर्क अपने सामने होते देखना और फिर उसे रोकने या मिटाने के लिए जद्दोजहद न करना सरासर अल्लाह तआला के अज़ाब को दावत देना है। एक हदीस शरीफ़ में इरशाद मुबारक है।

जब लोग कोई ख़िलाफ़ शरअ काम होता देखें और उसे न रोकें तो क़रीब है कि अल्लाह तआला उन सब पर अज़ाब नाज़िल फ़रमा दे।” (इब्ने माजा, तिर्मिज़ी)

एक दूसरी हदीस शरीफ़ में इरशाद नबवी सल्ल० है :

उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है तुम दूसरों को नेकी का हुक्म देते रहो, और बुराई से रोकते रहो वरना अल्लाह तआला तुम पर अज़ाब नाज़िल कर देगा। फिर तुम उससे दुआ करोगे तो वह तुम्हारी दुआ भी कुबूल नहीं करेगा।” (तिर्मिज़ी) | गौर फरमाइए कि अगर आम गुनाहों से लोगों को न रोकने पर अल्लाह तआला का अज़ाब नाज़िल हो सकता है तो फिर शिर्क, जिसे खुद अल्लाह तआला ने सबसे बड़ा गुनाह (जुल्म) क़रार दिया है…को न रोकने पर अज़ाब क्यों नाज़िल न होगा? रसूले अकरम सल्ले० का इरशाद मुबारक है :

“जो व्यक्ति ख़िलाफ़ शरअ काम होता देखे तो उसे चाहिए कि वह उसे हाथ से रोके, अगर उसकी ताक़त न हो तो फिर ज़बान से रोके, और अगर इसकी भी ताक़त न हो तो फिर दिल से ही बुरा जाने, और यह ईमान का कमज़ोर तरीन दर्जा है।” (मुस्लिम शरीफ़) ।

तो ऐ अहले ईमान! अपने आपको अल्लाह तआला के अज़ाब से बचाओ, और हर हाल में शिर्क के ख़िलाफ़ जिहाद करने के लिए उठ खड़े हो, जो जान से कर सकता हो वह जान से करे, जो माल से कर सकता हो वह माल से करे, जो हाथ से कर सकता हो वह हाथ से करे, जो ज़बान से कर सकता हो वह ज़बान से करे, जो क़लम से कर सकता हो वह क़लम से करे।

इरशाद बारी तआला है :

انفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا وَجَاهِدُوا بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنفُسِكُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ (9 : 41

तर्जुमा : “निकलो, चाहे हल्के हो या बोझल और जिहाद करो अल्लाह तआला की राह में अपने मालों और अपनी जानों के साथ, यह तुम्हारे लिए। बेहतर है अगर तुम जानो।” (सूरह तौबा, आयत 41)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *