तौहीद की फ़ज़ीलत

Touheed ki fazilat

मसला 2 : कलिमा तौहीद का इक़रार दीने इस्लाम का सबसे पहला बुनियादी स्तंभ है।

عن ابن عباس رضي الله عنهما أن النبي صلى الله عليه وسلم بعث معاذا رضي الله عنه إلى اليمن فقال ادعهم إلى شهادة أن لا إله إلا الله وأني رسول الله فإن لهم أطاعوا ذلك فأعلمهم أن الله قد افترض عليهم خمس صلوات في کل يوم وليلة فإن ھم أطاعوا لذلك فأعلمهم أن الله افترض عليهم صدقة في أموالهم توخذ من أغنيائهم وترد على فقرائهم ۔ رواه البخارى

हज़रत अब्दुल्ललाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि नबी अकरम सल्ल० ने हज़रत मुआज़ रज़ि० को हाकिम यमन बनाकर भेजा तो फ़रमाया “लोगों को (पहले) ला इला-ह इल्लल्लाहु और फिर यह कि मैं यानी (मुहम्मद सल्ल०) अल्लाह का रसूल हूं, इसकी तरफ़ दावत देना। अगर वे इसे मान लें तो फिर उन्हें बताना कि अल्लाह तआला ने हर दिन रात में उन पर पांच नमानें फर्ज की हैं अगर वे उसे भी मान लें तो फिर उन्हें बताना कि अल्लाह तआला ने उनके मालों पर ज़कात फ़+र्ज़ की है जो उनके मालदारों से। वसूल की जाएगी और उनके फुक़रा को दी जाएगी। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है। (किताबुञ्ज़कात)

मसला 3 : गैर मुस्लिम कलिमा तौहीद का इक़रार कर ले तो उसे क़त्ल करना मना है।

عن أسامة بن زيد رضي الله عنه قال بعثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في سرية فصبحنا الحرقات من جھینة فأدركت رجلا فقال لا إله إلا الله فطعنته فوقع في نفسي من ذلك فذكرته للنبي صلى الله عليه وسلم فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم اقال لا إله إلا الله وقتلته قال قلت يا رسول الله إنما قالها خوفا من السلاح قال افلا شققت عن قلبه حتى تعلم أقالها أم لا فما زال يكررها على حتی تمنيت اني أسلمت يومئذ ۔ رواه مسلم

हज़रत उसामा बिन जैद रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने हमें एक लश्कर में भेजा। हुरक़ात (एक गांव का नाम) में हमने जुहैना (क़बीला का नाम) से सुबह के वक़्त जंग की एक आदमी से मेरा सामना हुआ तो उसने ला इला-ह इल्लल्लाहु पढ़ा लेकिन मैंने उसे बरछी से मार डाला। (बाद में) मेरे दिल में तश्वीश पैदा हुई (कि मैंने गलत किया या सही) तो मैंने नबी अकरम सल्ल० से इसका ज़िक्र किया आप सल्ल० ने फ़रमाया* क्या उसने ला इला-ह इल्लल्लाहु कहा और तूने उसे क़त्ल कर डाला?” मैंने अर्ज़ किया ‘‘या रसूलल्लाह सल्ल०! उसने हथियार के डर से कलिमा पढ़ा था।” आपने फ़रमाया, “क्या तूने उसका दिल चीर कर देख लिया था कि तुझे पता चल गया उसने ख़ुलूसे दिल से कलिमा पढ़ा था या नहीं?” फिर आप सल्ल० बार बार यही बात इरशाद फ़रमाते रहे यहां तक कि मैंने आरजु की काश मैं आज के रोज़ मुसलमान हुआ होता। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।                                      (किताबुल ईमान)

मसला 4 : कलिमा तौहीद पर ईमान गुनाहों के कफ़्फ़ारे का कारण बनेगा।

عن أبي ذر رضي الله عنه قال أتيت النبي صلى الله عليه وسلم وهو نائم عليه ثوب أبيض ثم اتیته فإذا هو نائم ثم اتیته وقد استيقظ فجلست إليه فقال ما من عبد قال لا إله إلا الله ثم مات على ذلك إلا دخل الجنة قلت وإن زنى وإن سرق قال وإن زنى وإن سرق قلت وإن زنى وإن سرق قال وإن زنى وإن سرق ثلاثا ثم قال في الرابعة على رغم أنف أبي ذر قال فخرج أبوذر وهو يقول وإن رغم أنف أبي ذررواه مسلم

हज़रत अबूज़र रज़ि० कहते हैं मैं नबी अकरम सल्ल० की ख़िदमत में हाज़िर हुआ आप एक सफ़ेद कपड़े में सो रहे थे। मैं दोबारा हाज़िर हुआ तब भी आप सो रहे थे, मैं तीसरी बार आया तो आप जाग रहे थे। मैं आपके पास बैठ गया आपने फ़रमाया, “जिस व्यक्ति ने ला इला-ह इल्लल्लाहु कहा और उसी पर मरा वह जन्नत में दाख़िल होगा।” मैंने अर्ज़ किया, “चाहे ज़िना किया हो, चाहे चोरी की हो?” आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया, “चाहे ज़िना किया हो, चाहे चोरी की हो।” यह बात आपने तीन बार फ़रमाई। फिर चौथी मर्तः – आपने फ़रमाया, “चाहे अबूज़र की नाक ख़ाक आलूद हो।” तो जब अबूज़र रज़ि० (आपकी मजलिस से उठकर) बाहर आए तो कह रहे थे “चाहे अबूज़र की नाक ख़ाक आलूद हो।’ इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।              (किताबुल ईमान)

عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: إن الله سيخلص رجلا من أمتي على رءوس الخلائق يوم القيامة فينشر علیه تسعة وتسعين سجلا كل سجل مثل مد البصر ثم يقول: أتنكر من هذا شيئا و أظلمك كتبتي الحافظون فيقول لا يا رب فيقول أفلك عذر؟ فيقول لا یا رب فیقول بلى ، إن لك عندنا حسنة ، فإنه لا ظلم عليك اليوم فتخرج بطاقة فيها أشهد أن لا إله إلا الله وأشهد أن محمدا عبده ورسوله فيقول: احضر وزنك فيقول یا رب ما هذه البطاقه مع هذه السجلات؟ فقال: إنك لا تظلم قال: فتوضع السجلات في كفة، والبطاقة في كفة فطاشت السجلات ، وثقلت البطاقة فلا يثقل مع اسم الله شيئ ۔ رواه الترمذي

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ि० कहते हैं मैंने रसूले अकरम सल्ल० को फ़रमाते हुए सुना है कि क़यामत के दिन अल्लाह तआला सारी मख्लूक़ के सामने मेरी उम्मत के एक आदमी को लाएगा और उसके सामने (गुनाहों) के निन्नानवे दफ़्तर रख दिए जाएंगे हर दफ़्तर हदे निगाह तक फैला होगा, फिर अल्लाह तआला उस आदमी से पूछेगा, “तू अपने इन आमाल में से किसी का इंकार करता है? क्या (नामाए आमाल तैयार करने वाले) मेरे कातिबों ने तुझ पर जुल्म तो नहीं किया? वह आदमी कहेगा, “नहीं या अल्लाह।” फिर अल्लाह तआला पूछेगा (उन गुनाहों के बारे में) “तेरे पास कोई उज़र है?” वह आदमी कहेगा, “नहीं या अल्लाह।” अल्लाह तआला फिर इरशाद फ़रमाएगा, “अच्छा ठहरो! हमारे पास तुम्हारी एक नेकी भी है और आज तुम पर कोई जुल्म नहीं होगा चुनांचे एक कागज़ का टुकड़ा लाया जाएगा जिसमें अशहदु अल्ला इला-ह इल्लल्लाहु व अन्न मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलहू तहरीर होगा। अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाएगा, “नामाए आमाल वज़न होने की जगह चले जाओ।” बन्दा अर्ज़ करेगा, “या अल्लाह इस छोटे से कागज़ के टुकड़े को मेरे गुनाहों के ढेर से क्या निस्बत हो सकती है?” अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाएगा, “बन्दे! आज तुम पर कोई जुल्म नहीं होगा।” (यानी हर छोटे बड़े अमल का हिसाब ज़रूर होगा) रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया, “गुनाहों के ढेर तराजू के एक पलड़े में और कागज़ का टुकड़ा दूसरे पलड़े में रख दिया जाएगा, गुनाहों के दफ़्तर हल्के साबित होंगे और कागज़ का टुकड़ा भारी हो जाएगा। (फिर आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया), अल्लाह तआला के नाम से ज़्यादा कोई चीज़ भारी नहीं हो सकती।” इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।

(सही सुनन तिर्मिज़ी, लिलबानी, भाग-2, हदीस-2122)

عن أنس بن مالك رضي الله عنه قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم یقول قال الله تبارك وتعالی یا ابن آدم إنك ما دعوتني ورجوتني غفرت لك على ما كان فيك ولا أبالي يا ابن آدم لو بلغت ذنوبك عنان السماء ثم استغفرتني غفرت لك ولا أبالي يا ابن آدم إنك لو أتيتني بقرابھا الأرض خطايا ثم لقيتني لا تشرك بي شيئا لأتيتك بقرابها مغفرة ۔ رواه الترمذی

 हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० को फ़रमाते हुए सुना है, अल्लाह तआला फ़रमाता है : “ऐ इब्ने आदम! तू जब तक मुझे पुकारतां रहेगा और मुझसे बशिश की उम्मीद रखेगा मैं तुझसे होने वाला हर गुनाह माफ़ करता रहूंगा। ऐ इब्ने आदम! मुझे कोई परवाह नहीं अगर तुम्हारे गुनाह आसमान के किनारे तक पहुंच जाएं और तू मुझसे माफ़ी तलब करे, तो मैं तुझे माफ़ कर दूंगा। ऐ इब्ने आदम! मुझे कोई परवाह नहीं अगर तू रूए ज़मीन के बराबर गुनाह लेकर आए और मुझे इस हाल में मिले कि किसी को मेरे साथ शरीक न किया हो तो मैं रूए ज़मीन के बराबर ही तुझे मगफ़िरत् अता करूंगा। (यानी सारे गुनाह माफ़ करूंगा)।” इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है

(सही सुनन तिर्मिज़ी, लिलबानी, भाग-तीन, हदीस-2805)

| मसला 5 : खुलूसे दिल से कलिमा तौहीद का इक़रार करने वाले के लिए रसूले अकरम सल्ल० सिफ़ारिश करेंगे।

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال أسعد الناس بشفاعتي يوم القيامة من قال لا إله إلا الله خالصا من قلبه او نفسه ۔ رواه البخاری

हजरत अबू हुरैरह रज़ि० से रिवायत है कि नबी अकरम सल्ल० ने माया, “क़यामत के दिन मेरी सिफ़ारिश से फ़ैज़याब होने वाले लोग वे हैं। न्होंने सच्चे दिल से या (आपने फ़रमाया) जी जान से ला इला-ह इल्लल्लाह का इक़रार किया है। इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لکل نبي دعوة مستجابة فتعجل كل نبي دعوته وإني اختبات دغوتي شفاعة لامتي یوم القيامة فهي نائلة إن شاء الله من مات من أمتي لا يشرك بالله شيئا ۔ رواه مسلم

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया: नबी के लिए एक दुआ ऐसी है जो ज़रूर कुबूल होती है। तमाम अंबिया ने वह दुआ दुनिया ही में मांग ली, लेकिन मैंने अपनी दुआ क़यामत के दिन अपनी उम्मत की शफ़ाअत के लिए महफूज़ कर रखी है। मेरी शफ़ाअत अल्लाह हर उस आदमी के लिए होगी. जो इस हाल में मरा कि उसने किसी मो. अल्लाह तआला के साथ शरीक नहीं किया।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।                                                                     (किताबुल ईमान, बाब अशबातुश शफ़ाअत)

मसला 6 : अक़ीदा तौहीद पर मरने वाला जन्नत में दाख़िल होगा।

عن عثمان رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من مات وهو يعلم أنه لا إله إلا الله دخل الجنة رواه مسلم

हज़रत उसमान रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया : “जो आदमी इस हाल में मरे कि उसे ला इला-ह इल्लल्लाहु का इल्म (यक़ीन) हो तो वह जन्नत में जाएगा।” इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

(किताबुल ईमान, बाबुद दलील)

मसला 1 : खुलूसे दिल से कलिमा तौहीद का इक़रार अर्जे इलाही से कुर्बत का ज़रिया है।

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ما قال عبد لا اله الا اللہ قط مخلصا الا فتحت له ابواب السماء حتی تفضی الی العرش ما اجتنب الکبائر ۔ رواه الترمذي

हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया : जब बन्दा सच्चे दिल से ला इला-ह इल्लल्लाहु कहता है तो उसके लिए आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं यहां तक कि वह अर्श तक पहुंच जाता है बशर्ते कि कबीरा गुनाहों से बचता रहे।” इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। (सही सुनन तिर्मिज़ी, लिलबानी, जुज़ तीन, हदीस 2839)

मसला 8 : खुलूसे दिल से कलिमा तौहीद की गवाही देने वाले पर जहन्नम हराम है।

عن انس بن مالك رضي الله عنه أن نبي الله صلى الله عليه وسلم ومعاذ بن جبل رديفه على الرحل قال يا ماذا قال لبيك رسول الله وسعديك، قال يا معاذ؛ قال لبيك رسول الله وسعديك، قال يا ماذا قال لبیيك رسول الله وسعديك، قال ما بن عبد يشهد أن لا إله إلا الله وأن محمدا عبده ورسوله إلا حرمه الله على النار قال يا رسول الله أفلا أخبر بها الناس فيستبشروا قال إذا يتكلوا أخبر بها معاذ عند موته تأثما ۔ رواه مسلم

हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि० से रिवायत है कि मुआज़ बिन जबल रज़ि० रसूले अकरम सल्ल० के पीछे सवारी पर बैठे थे। आप सल्ल० ने फ़रमाया : “ऐ मुआज़।” हज़रत मुआज़ रजि० ने अर्ज़ किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! आपका फ़रमांबरदार हाज़िर है।” आपने फिर फ़रमाया, “ऐ मुआज़।” हज़रत मुआज़ रज़ि० ने अर्ज़ किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! आपका फ़रमांबरदार हाज़िर है।” रसूले अकरम सल्ल० ने फ़रमाया, “जो व्यक्ति गवाही दे कि अल्लाह के सिवा कोई इलाह नहीं और मुहम्मद सल्ल० उसके बन्दे और रसूल हैं, अल्लाह तआला उसको जहन्नम पर हराम कर देगा।” हज़रत मुआज़ रज़ि० ने अर्ज़ किया, “या रसूलल्लाह सल्ल०! क्या मैं लोगों को इससे आगाह न कर दें ताकि वे खुश हो जाएं। आप सल्ल० ने इरशाद फ़रमाया, “फिर तो लोग सिर्फ इसी पर तकिया कर लेंगे।” (आमाल की फ़िक्र नहीं करेंगे) चुनांचे हज़रत मुआज़ रज़ि० ने गुनाह से बचने के लिए मरते वक़्त यह हदीस बयान की। इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।

(किताबुल ईमान, बाबुर्द दलील) “

मसला 9 : खुलूसे दिल से कलिमा तौहीद का इक़रार करने वाला जन्नत में जाएगा।

عن أنس رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من مات وھو يشهد أن لا إله إلا الله وأن محمدا رسول الله صادقا من قلبه دخل الجنة ۔ رواه أحمد

हज़रत अनस रज़ि० कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने फ़रमाया : “जो आदमी इस हाल में मरां कि सच्चे दिल से गवाही देता था कि अल्लाह तआला के सिवा कोई इलाहे नहीं, और मुहम्मद सल्ल० अल्लाह के रसूल हैं। वह जन्नत मे दाख़िल होगा।” इसे अहमद ने रिवायत किया है। | (सिलसिलतुल अहादीस, लिलबानी, जुज़ पांच, सफ़ा 348)

वज़ाहत : तौहीद की फ़ज़ीलत के बारे में उपरोक्त उल्लिखित तमाम अहादीस में मोहिद के जन्नत में जाने की ज़मानत का मतलब यह हरगिज़ नहीं कि मोहिद जैसे अमल चाहे करता रहे, वह गुनाहों की सज़ा पाए बगैर सीधा जन्नत में चला जाएगा, बल्कि इन तमाम अहादीस का महूम यह है कि मोहिद अपने गुनाहों की सज़ा भुगतने के बाद या अल्लाह तआला की तरफ़ से गुनाह माफ़ किए जाने के बाद जन्नत में ज़रूर जाएगा, और जिस तरह मुश्रिक का हमेशा का ठिकाना जहन्नम है, उसी तरह मोहिंद का हमेशा का ठिकाना जन्नत होगा।

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