तौहीद कुरआन की रोशनी में

Touheed Quran Ki roshni me

मसला 16 : अल्लाह तआला खुद तौहीद की गवाही देता है।

شَهِدَ اللَّهُ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ وَالْمَلَائِكَةُ وَأُولُو الْعِلْمِ قَائِمًا بِالْقِسْطِ ۚ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ (3 : 18

 “अल्लाह तआला ने खुद शहादत दी है कि उसके सिवा कोई इलाह नहीं। नीज़ फ़रिश्ते और इल्म वाले लोग जो इंसाफ़ पर क़ायम हैं वे भी (यही शहादत देते हैं) वाक़ई इस ज़बरदस्त और हकीम के अलावा कोई इलाह नहीं है।” (सूरह आले इमरान, आयत 18)

मसला 17 : कुरआन मजीद ने लोगों को सिर्फ एक अल्लाह तआला की इबादत और बन्दगी की दावत दी है।

وَإِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الرَّحْمَٰنُ الرَّحِيمُ (2 : 163

“लोगो! तुम्हारा इलाह तो बस एक ही है, उसके सिवा कोई इलाह नहीं, वह बड़ा मेहरबान और निहायत रहम करने वाला है।” (सूरह बक़रा, आयत 63) .

وَلَا تَدْعُ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۘ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۚ كُلُّ شَيْءٍ هَالِكٌ إِلَّا وَجْهَهُ ۚ لَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (28 : 88

 “अल्लाह तआला के सिवा किसी दूसरे इलाह को न पुकारो, उसके सिवा कोई इलाह नहीं, उसकी ज़ात के सिवा हर चीज़ हलाक होने वाली है। शासन उसी के लिए है और उसी की तरफ़ तुम सब पलटाए जाने वाले हो।” (सूरह, । क़सस, आयत 88)

لا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ رَبُّكُمْ وَرَبُّ آبَائِكُمُ الْأَوَّلِينَ (44 : 8

“उसके सिवा कोई इलाह नहीं, वही जिंदगी अता करता है, वहीं मौत देता है, वह तुम्हारा भी रब है और तुम्हारे बाप दादा जो गुज़र चुके उनका भी रब है।”                               (सूरह दुख़ान, आयत 8)

मसला 18 : तमाम अंबिया किराम और रसूलों ने सबसे पहले अपनी अपनी क़ौमों को अक़ीदा तौहीद की दावत दी।

  1. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम : :

لَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ (7 : 59

हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा, उन्होंने कहा : “ऐ बिरादराने क़ौम! अल्लाह तआला की बन्दगी करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई इलाह नहीं है, मैं तुम्हारे हक़ में एक हौलनाक दिन के अज़ाब से डरता हूं। (सूरह आराफ़, आयत 59)

  1. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम:

وَإِلَىٰ عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۚ أَفَلَا تَتَّقُونَ (7 : 65

“और क़ौमे आद की तरफ़ हमने उनके भाई हूद (अलैहिस्सलाम) को भेजा। उन्होंने कहा ऐ बिरादराने क़ौम! अल्लाह तआला की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई इलाह नहीं, फिर क्या तुम गलत रविश से परहेज़ न करोगे?” (सूरह आराफ़, आयत 65)

  1. हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम :

وَإِلَىٰ ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ هَٰذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آيَةً ۖ فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ ۖ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (7 : 73

“और क़ौमे समूद की तरफ़ उनके भाई सालेह (अलैहिस्सलाम) को भेजा। उन्होंने कहा: “ऐ बिरादराने क़ौम! अल्लाह तआला की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई इलाह नहीं है तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से खुली दलील आ गई है। यह अल्लाह तआला की ऊंटनी तुम्हारे लिए एक निशानी है, लिहाज़ा इसे छोड़ दो कि अल्लाह तआला की ज़मीन में चरती फिरे

इसे किसी बुरे इरादे से हाथ न लगाना वरना एक दर्दनाक अज़ाब तुम्हें आ : लेगा।” (सूरह आराफ़, आयत 73)

  1. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम : .

وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ (7 : 85

 “और मदयन वालों की तरफ़ हमने उनके भाई शुऐब (अलैहिस्सलाम) को भेजा। उन्होंने कहा : “ऐ बिरादराने क़ौम! अल्लाह तआला की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई इलाह नहीं, तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से स्पष्ट दलील आ गई है। लिहाज़ा वज़न और पैमाने पूरे करो, लोगों को उनकी चीज़ों में घाटा न दो और ज़मीन में फ़साद बरपा न करो जबकि उसकी इस्लाह हो चुकी, इसी में तुम्हारी भलाई है अगर तुम वाक़ई मोमिन हो।” (सूरह आराफ़, आयत 85)

  1. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम :

وَإِبْرَاهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ ۖ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ۔ إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا ۚ إِنَّ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَابْتَغُوا عِندَ اللَّهِ الرِّزْقَ وَاعْبُدُوهُ وَاشْكُرُوا لَهُ ۖ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (29 : 16-17

 “और इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम से कहा, “अल्लाह की बन्दगी करो और उसी से डरो यह तुम्हारे लिए बेहतर है अगर तुम जानो। तुम अल्लाह तआला को छोड़कर जिनकी इबादत कर रहे हो वे तो महज़ बुत हैं और तुम एक झूठ गढ़ रहे हो। देरहक़ीक़त अल्लाह तआला के सिवा जिनकी तुम पूजा करते हो वे तुम्हें रिज़्क़ तक देने का इख़्तियार नहीं रखते। (लिहाज़ा) अल्लाह तआला से रिज़्क़ मांगों और उसी की बन्दगी करो और उसी का शुक्र अदा करो। उसी की तरफ़ तुम बुलाए जाने वाले हो ।”  (सूरह अन्कबूत, आयत 16-17)

  1. हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम :

مَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِهِ إِلَّا أَسْمَاءً سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ بِهَا مِن سُلْطَانٍ ۚ إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلَّهِ ۚ أَمَرَ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا إِيَّاهُ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ اكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (12 : 40

 “अल्लाह तआला को छोड़कर जिनकी तुम बन्दगी कर रहे हो वे उसके सिवा कुछ नहीं हैं कि बस कुछ नाम हैं जो तुमने और तुम्हारे बाप दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह तआला ने उनके लिए कोई सनद नाज़िल नहीं की। (सूरह यूसुफ़, आयत 40)

  1. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम :

إِنَّ اللَّهَ هُوَ رَبِّي وَرَبُّكُمْ فَاعْبُدُوهُ ۚ هَٰذَا صِرَاطٌ مُّسْتَقِيمٌ (43 : 64

 ‘हकीक़त यह है कि अल्लाह तआला मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब, लिहाज़ा उसी की तुम इबादत करो यही सीधा रास्ता है।” (सूरह, जुख़रुफ़, आयते 64)

  1. हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम :

قُلْ إِنَّمَا أَنَا مُنذِرٌ ۖ وَمَا مِنْ إِلَٰهٍ إِلَّا اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ ۔ رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ (38 : 65-66

“ऐ मुहम्मद! कह दीजिए मैं तो बस ख़बरदार करने वाला हूं कि कोई हक़ीकी माबूद नहीं मगर अल्लाह जो यकता है सब पर ग़ालिब आसमान और ज़मीन का मालिक और उन सारी चीज़ों का मालिक जो उनके दर्मियान है। वह ज़बरदस्त भी है और बख़्शने वाला भी।” (सूरह सॉद, आयत 65-66)

  1. दीगर तमाम अंबिया किराम व रुसुल :

وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ إِلَّا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنَا فَاعْبُدُونِ (21 : 25

 “हमने तुमसे पहले जो रसूल भी भेजा है उसको यही ‘वय’ की है कि मेरे सिवा कोई इलाहे नहीं, अतः तुम लोग मेरी ही बन्दगी करो।”

(सूरह अंबिया, आयत 25) मसला 19 : किसी नबी ने अल्लाह तआला के सिवा अपनी या किसी दूसरे की बन्दगी की दावत नहीं दी।

مَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُؤْتِيَهُ اللَّهُ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ ثُمَّ يَقُولَ لِلنَّاسِ كُونُوا عِبَادًا لِّي مِن دُونِ اللَّهِ وَلَٰكِن كُونُوا رَبَّانِيِّينَ بِمَا كُنتُمْ تُعَلِّمُونَ الْكِتَابَ وَبِمَا کنتم تَدْرُسُونَ (3 : 79

“किसी इंसान का यह काम नहीं कि अल्लाह तआला उसे किताब और नुबूवत अता फ़रमाए और वह लोगों से कहे कि अल्लाह तआला के बजाए तुम मेरे बन्दे बन जाओ वह तो यही कहेगा कि सच्चे रब्बानी बनो जैसा कि उसकी किताब की तालीम का तक़ाज़ा हैं जिसे तुम पढ़ते और पढ़ाते हो ।”                                       (सूरह आले इमरान, आयत 79)

मसला 20 : अक़ीदा तौहीद इंसान की फ़ितरत में शामिल है।

فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا ۚ فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (30 : 30

“(ऐ नबी!) यकसू होकर अपना रुख़ उस दीन (इस्लाम) की तरफ़ जमा दो और क़ायम हो जाओ उस फ़ितरत पर जिस पर अल्लाह तआला ने इंसानों को पैदा किया है। अल्लाह तआला की बनाई हुई सात बदली नहीं जा सकती, यही सीधा दीन है, लेकिन अकसर लोग नहीं जानते।” (सूरह रूम, आयतं 30)

मसला 21 : ख़ालिस अक़ीदा तौहीद ही दुनिया व आख़िरत में अम्न व सलामती का ज़ामिन है।

الَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُم بِظُلْمٍ أُولَٰئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ (6 : 82

 “जो लोग ईमान लाए और अपने को जुल्म (शिक) के साथ आलूदा नहीं किया उन्ही के लिए अम्न है और वही सीधी राह पर हैं।”

(सूरह अनआम, आयत 82)

मसला 22 : अक़ीदा तौहीद पर ईमान लाने वाले हमेशा हमेशा जन्नत में रहेंगे।

وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَنُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ۖ وَعْدَ اللَّهِ حَقًّا ۚ وَمَنْ أَصْدَقُ مِنَ اللَّهِ قِيلًا (4 : 122

“वे लोग जो ईमान ले आएं और नेक अमल करें तो उन्हें हम ऐसे. बागों में दाख़िल करेंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और वे वहां हमेशा हमेशा रहेंगे, यह अल्लाह तआला की सच्चा वायदा है और अल्लाह तआला से बढ़कर कौन अपनी बात में सच्चा होगा?”

(सूरह निसा, आयत 122)

मसला 23 : अक़ीदा तौहीद के लिए सारी दुनिया के इंसानों को कुरआन मजीद की दावते फ़िक्र।

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِنْ أَخَذَ اللَّهُ سَمْعَكُمْ وَأَبْصَارَكُمْ وَخَتَمَ عَلَىٰ قُلُوبِكُم مَّنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِهِ ۗ انظُرْ كَيْفَ نُصَرِّفُ الْآيَاتِ ثُمَّ هُمْ يَصْدِفُونَ (6 : 46

(ऐ नबी!) इनसे कहो कभी तुमने यह भी सोचा है कि अगर अल्लाह तआला तुम्हारी बीनाई और तुम्हारी समाअत तुमसे छीन ले और तुम्हारे दिलों पर मुहुर लगा दे तो अल्लाह तआला के सिवा और कौन-सा इलाह है जो यह कवतें तुम्हें वापस दिला सकता है? देखो किस तरह बार बार हम अपने दलाइल उनके सामने पेश करते हैं फिर भी यह मुंह मोड़ लेते हैं।” (सूरह अनआम, आयत 46)

قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ اللَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِضِيَاءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ ۔ قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ النَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِلَيْلٍ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ (28 : 72

 “ऐ नबी! इनसे कहो क़भी तुम लोगों ने गौर किया कि अगर अल्लाह तआला क़यामत तक तुम पर हमेशा के लिए रात तारी कर दे तो अल्लाह तआला के सिवा वह कौन-सा इलाह है जो तुम्हें रोशनी दिला दे। क्या सुनते नहीं हो? इनसे पूछो, कभी तुमने सोचा कि अगर अल्लाह तआला क़यामत तक तुम पर हमेशा के लिए दिन तारी कर दे तो अल्लाह तआला के सिवा वह कौन-सा इलाह है जो तुम्हें रात दिला दे ताकि तुम उसमें सुकून हासिल कर सको, क्या तुम देखते नहीं हो?” (सूरह क़सस, आयत 71-72)

أَفَرَأَيْتُمُ الْمَاءَ الَّذِي تَشْرَبُونَ ۔ أَأَنتُمْ أَنزَلْتُمُوهُ مِنَ الْمُزْنِ أَمْ نَحْنُ الْمُنزِلُونَ ۔ لَوْ نَشَاءُ جَعَلْنَاهُ أُجَاجًا فَلَوْلَا تَشْكُرُونَ (56 : 68-70

कभी तुमने आंखें खोलकर देखा, यह पानी जो तुम पीते हो इसे तुमने बादल से बरसाया है या इसके बरसाने वाले हम हैं? हम चाहें तो इसे सख़्त । खारी बनाकर रख दें फिर तुम शुक्र गुज़ार क्यों नहीं बनते?”

(सूरह वाक़िआ, आयत 68-70)

أَفَرَأَيْتُم مَّا تُمْنُونَ ۔ أَأَنتُمْ تَخْلُقُونَهُ أَمْ نَحْنُ الْخَالِقُونَ ۔ نَحْنُ قَدَّرْنَا بَيْنَكُمُ الْمَوْتَ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ ۔ عَلَىٰ أَن نُّبَدِّلَ أَمْثَالَكُمْ وَنُنشِئَكُمْ فِي مَا لَا تَعْلَمُونَ (61) وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ النَّشْأَةَ الْأُولَىٰ فَلَوْلَا تَذَكَّرُونَ (56 : 58-62

कभी तुमने गौर किया, यह नुत्फ़ा जो तुम डालते हो, उससे बच्चा तुम बनाते हों या उसके बनाने वाले हम हैं? हमने तम्हारे दर्मियान मौत को तक़सीम किया है। और हम इससे आजिज़ नहीं हैं कि तुम्हारी शक्लें बदल दें। और किसी ऐसी शक्ल में तुम्हें पैदा कर दें जिसको तुम नहीं जानते, अपनी पहली पैदाइश को तो तुम जानते हो, फिर क्यों सबक़ नहीं लेते?” (सूरह वाक़िआ, आयत 58-62) :

أَفَرَأَيْتُم مَّا تَحْرُثُونَ ۔ أَأَنتُمْ تَزْرَعُونَهُ أَمْ نَحْنُ الزَّارِعُونَ ۔ لَوْ نَشَاءُ لَجَعَلْنَاهُ حُطَامًا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ ۔ إِنَّا لَمُغْرَمُونَ ۔بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ (56 : 63-67

.. “कभी तुमने सोचा, यह बीज जो तुम बोते हो, उनसे खेतियां तुम उगाते हो या उनके उगाने वाले हम हैं? हम चाहें तो इन खेतियों को भुस बनाकर रख दें और तुम तरह तरह की बातें बनाते रह जाओ कि हम पर तो उलटी चट्टी पड़ गई, बल्कि हमारे तो नसीब ही फूटे हुए हैं।”

(सूरह वाक़िआ, आयत 63-67)

وَإِنَّ لَكُمْ فِي الْأَنْعَامِ لَعِبْرَةً ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِي بُطُونِهِ مِن بَيْنِ فَرْثٍ وَدَمٍ لَّبَنًا خَالِصًا سَائِغًا لِّلشَّارِبِينَ (16 : 66

 “और तुम्हारे लिए मवेशियों में भी एक सबक़ मौजूद है। उनके पेट से गोबर और खून के दर्मियान से हम एक चीज़ तुम्हें पिलाते हैं यानी कि ख़ालिस दूध जो पीने वालों के लिए निहायत ख़ुशगवार है।” (सूरह नल, आयत 66)

فَلَوْلَا إِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُومَ ۔ وَأَنتُمْ حِينَئِذٍ تَنظُرُونَ ۔ وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنكُمْ وَلَٰكِن لَّا تُبْصِرُونَ ۔ فَلَوْلَا إِن كُنتُمْ غَيْرَ مَدِينِينَ ۔ تَرْجِعُونَهَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ (56 : 83-87

 “अब अगर तुम किसी के महकूम नहीं हो और अपने इस ख्याल में सच्चे हो तो जब मरने वाले की जान हलक़ तक पहुंच चुकी होती है और तुम आंखों से देख रहे होते हो कि वह मर रहा है, उस वक़्त उसकी निकलती हुई जान को वापस क्यों नहीं ले आते?”

(सूरह वाक़िआ, आयत 83-87)

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